Harivamsha Purana
258
अध्याय 258 / 318

Parva 3, Adhyāya 75

30 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ30 श्लोक

अध्याय 258

श्लोक 1

भगवतः श्रीकृष्णस्य सात्यकिना उद्धवेन सार्धं च नगरस्य रक्षाविषयकं वार्तालापं, बलरामादिभ्यः यादवेभ्यः रक्षणस्य भारं समर्पयित्वा कैलासयात्रायां प्रति उद्योगं सात्यके शृणु मद्वाक्यं यत्तो भव युधां वर ।त्वं तु खड्गी गदी भूत्वा चापपाणिस्तनुत्रवान्

bhagavataḥ śrīkṛṣṇasya sātyakinā uddhavena sārdhaṃ ca nagarasya rakṣāviṣayakaṃ vārtālāpaṃ, balarāmādibhyaḥ yādavebhyaḥ rakṣaṇasya bhāraṃ samarpayitvā kailāsayātrāyāṃ prati udyogaṃ sātyake śṛṇu madvākyaṃ yatto bhava yudhāṃ vara | tvaṃ tu khaḍgī gadī bhūtvā cāpapāṇistanutravān

हिन्दी अर्थ

श्रीभगवान्‌ बोले—योद्धाओंमें श्रेष्ठ सात्यके! मेरी बात सुनो। तुम स्वयं कवच पहनकर तलवार, गदा और धनुष हाथमें लिये नगरकी रक्षाके लिये प्रयत्रशील हो

अध्याय 258

श्लोक 2

तिष्ठ यत्नेन रक्षस्व पुरीं बहुनृपाश्रयाम् ।न च निद्रा त्वया कार्या रात्रौ यदुवृष प्रभो

tiṣṭha yatnena rakṣasva purīṃ bahunṛpāśrayām | na ca nidrā tvayā kāryā rātrau yaduvṛṣa prabho

हिन्दी अर्थ

यदुकुलतिलक प्रभावशाली वीर ! द्वारकापुरी त्रहुसंख्यक क्षत्रियोंकी निवासभूमि है। तुम यत्रपूर्वक बड़े रहो और इसकी रक्षा करो। तुम्हें रातभर नींद हीं लेनी चाहिये

अध्याय 258

श्लोक 3

न च व्याख्या त्वया कार्या शास्त्राणां शास्त्रतत्पर ।न च वादस्त्वया कार्यो वादिभिः सह वृष्णिप

na ca vyākhyā tvayā kāryā śāstrāṇāṃ śāstratatpara | na ca vādastvayā kāryo vādibhiḥ saha vṛṣṇipa

हिन्दी अर्थ

शास्त्रपरायण सात्यके! आजसे तुम्हें शास्त्रोंकी व्याख्यामें भी नहीं लगना चाहिये। वृष्णिवंशका पालन करनेवाले तीर! अब तुम्हें वादियोंके साथ वाद भी नहीं करना चाहिये

अध्याय 258

श्लोक 4

त्वं हि योद्धा बली ज्ञाता धनुर्वेदाख्यवेदवित् ।तथा कुरु यथा वीर नोपहास्या भवेदियम्

tvaṃ hi yoddhā balī jñātā dhanurvedākhyavedavit | tathā kuru yathā vīra nopahāsyā bhavediyam

हिन्दी अर्थ

वीर ! तुम योद्धा, बलवान्‌, ज्ञानवान्‌ और घनुर्वेदनामक उपवेदके विद्वान्‌ हो। अत: ऐसा प्रयत्न करो, जिससे यह पुरी उपहासका पात्र न बने

अध्याय 258

श्लोक 5

करिष्यामि वचस्तुभ्यं यथाशक्ति जनार्दन ।आज्ञा तव जगन्नाथ धार्या यत्नेन मे सदा

kariṣyāmi vacastubhyaṃ yathāśakti janārdana | ājñā tava jagannātha dhāryā yatnena me sadā

हिन्दी अर्थ

सात्यकि बोले—जनार्दन! मैं यथाशक्ति आपके इन त्चनोंका पालन करूँगा। जगन्नाथ! मुझे सदा यत्रपूर्वक आपकी आज्ञाको शिरोधार्य करना चाहिये

अध्याय 258

श्लोक 6

भृत्यवत् प्रचरिष्यामि कामपालस्य माधव ।यावदागमनं तुभ्यं तावत्स्थास्यामि यत्नतः

bhṛtyavat pracariṣyāmi kāmapālasya mādhava | yāvadāgamanaṃ tubhyaṃ tāvatsthāsyāmi yatnataḥ

हिन्दी अर्थ

माधव ! मैं भृत्यकी भाँति बलरामजीकी आज्ञाका अनुसरण करूँगा। जबतक आपका आना होगा, तबतक मैं य्न्नपूर्वक पुरीकी रक्षामें लगा रहूँगा

अध्याय 258

श्लोक 7

प्रसादस्तव गोविन्द यदि स्यान्मयि माधव ।किं नाम मे च दुःसाध्यं शत्रूणां निग्रहे रणे

prasādastava govinda yadi syānmayi mādhava | kiṃ nāma me ca duḥsādhyaṃ śatrūṇāṃ nigrahe raṇe

हिन्दी अर्थ

गोविन्द! माधव ! यदि आपकी कृपा मुझपर बनी रहे तो रणभूमिमें शत्रुओंका दमन करनेके लिये कौन-सा ऐसा कार्य है, जो मेरे लिये दु:साध्य हो

अध्याय 258

श्लोक 8

यदि शक्रं यमं वापि कुबेरमपि पाशिनम् ।सर्वानेतान्विजेष्यामि किमु पौण्ड्रं नृपोत्तमम्

yadi śakraṃ yamaṃ vāpi kuberamapi pāśinam | sarvānetānvijeṣyāmi kimu pauṇḍraṃ nṛpottamam

श्लोक 8–11 का हिन्दी अर्थ

यदि इन्द्र, यम, कुबेर अथवा पाशधारी वरुण भी युद्धके लिये आ जायँ तो आपकी कृपासे इन सबपर विजय पा जाऊँगा; फिर नुपश्रेष्ठ पौण्ड्रकको पराजित करना कौन बड़ी बात है। हरे! जाइये, अपना यह कार्य कीजिये। मैं सतत सावधान हूँगा। तत्पश्चात्‌ कमलनयन श्रीकृष्णने पुन: उद्धवसे इस प्रकार कहा—' उद्धवजी! मेरी यह बात सुनिये और इसका प्रयत्रपूर्वक पालन कीजिये ' । * राजेन्द्र! आपको अपनी नीतिसे द्वारकापुरीकी रक्षा करनी चाहिये। तात! आप सदा सावधान रहें और इस विषयमें हमलोगोंकी पहायता करें। इस समय यहाँ सब बातें कहनेमें मुझे बड़ा संकोच होता है

अध्याय 258

श्लोक 9

गच्छ कार्य कुरुष्वेदं यत्तोऽहं सततं हरे ।उद्धवं पुनराहेदं कृष्णः पद्मनिभेक्षणः

gaccha kārya kuruṣvedaṃ yatto'haṃ satataṃ hare | uddhavaṃ punarāhedaṃ kṛṣṇaḥ padmanibhekṣaṇaḥ

अर्थ श्लोक 8 के साथ

अध्याय 258

श्लोक 10

शृणूद्धव त्वं वाक्यं मे कुर्यास्त्वेतत्प्रयत्नवान् ।रक्ष्या नयेन राजेन्द्र पुरी द्वारवती त्वया

śṛṇūddhava tvaṃ vākyaṃ me kuryāstvetatprayatnavān | rakṣyā nayena rājendra purī dvāravatī tvayā

अर्थ श्लोक 8 के साथ

अध्याय 258

श्लोक 11

यत्तो भव सदा तात कुरु साहय्यमत्र नः ।लज्जा मम समुत्पन्ना वदतस्तव साम्प्रतम्

yatto bhava sadā tāta kuru sāhayyamatra naḥ | lajjā mama samutpannā vadatastava sāmpratam

अर्थ श्लोक 8 के साथ

अध्याय 258

श्लोक 12

त्वं हि नेता समस्तस्य विद्यापारस्य सर्वतः ।को नु शक्ष्यति मेधावी वक्तुं विद्यावतः पुरः

tvaṃ hi netā samastasya vidyāpārasya sarvataḥ | ko nu śakṣyati medhāvī vaktuṃ vidyāvataḥ puraḥ

हिन्दी अर्थ

जो सब प्रकारसे वद्याओंमें पारंगत हैं, उन सबके आप ही नेता हैं। कौन मेधावी पुरुष आप-जैसे विद्वानके समक्ष कोई बात कह पकेगा

अध्याय 258

श्लोक 13

यत् कार्यं तद्भवान् वेत्ति ह्यकार्यं वापि सर्वतः ।अतोऽहं विरमे तात वक्तुं सम्प्रति वृष्णिप

yat kāryaṃ tadbhavān vetti hyakāryaṃ vāpi sarvataḥ | ato'haṃ virame tāta vaktuṃ samprati vṛṣṇipa

हिन्दी अर्थ

जो करनेयोग्य कार्य है, उसे आप जानते हैं । जो सर्वथा नहीं करनेयोग्य है, वह भी आपसे अज्ञात हीं है; अत: वृष्णिवंशका पालन करनेवाले तात! मैं इस समय कुछ कहनेसे विराम लेता हूँ

अध्याय 258

श्लोक 14

किमिदं तव गोविन्द वर्तते मां प्रति प्रभो ।अहो प्रसन्नता मह्यं किन्तु प्रीतिरियं तव

kimidaṃ tava govinda vartate māṃ prati prabho | aho prasannatā mahyaṃ kintu prītiriyaṃ tava

हिन्दी अर्थ

उद्धव बोले—गोविन्द! प्रभो! मेरे प्रति आपके पुँहसे यह कैसी बात निकल रही है? अहो! यह मेरे लिये प्रसन्नताकी बात है; किंतु यह आपका प्रेम ही इस रूपमें प्रकट हुआ है

अध्याय 258

श्लोक 15

जानाम्यहं जगन्नाथ प्रसादस्यैष विस्तरः ।यस्य प्रसन्नो भवति तस्य किं नास्ति केशव

jānāmyahaṃ jagannātha prasādasyaiṣa vistaraḥ | yasya prasanno bhavati tasya kiṃ nāsti keśava

हिन्दी अर्थ

जगन्नाथ! मैं समझता हूँ कि परह मुझपर आपकी कृपाका विस्तार ही व्यक्त हुआ दै। केशव! जिसपर आप प्रसन्न होते हैं, उसमें कौन- पी विशेषता नहीं है

अध्याय 258

श्लोक 16

त्वं हि सर्वस्य जगतः कर्ता हर्ता प्रधानतः ।प्रभवः सर्वकार्याणां वक्ता श्रोता प्रमाणवित्

tvaṃ hi sarvasya jagataḥ kartā hartā pradhānataḥ | prabhavaḥ sarvakāryāṇāṃ vaktā śrotā pramāṇavit

हिन्दी अर्थ

+ श्२२९ आप ही समस्त जगत्‌के प्रधानत: स्रष्टा और संहारक ैं। आप ही समस्त कार्योके कारण, वक्ता, श्रोता और प्रमाणवेत्ता हैं

अध्याय 258

श्लोक 17

ध्याता ध्यानमयो ध्येय इति ब्रह्मविदो विदुः ।जेता देवरिपूणां च गोप्ता नाकसदां भवान्

dhyātā dhyānamayo dhyeya iti brahmavido viduḥ | jetā devaripūṇāṃ ca goptā nākasadāṃ bhavān

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मज्ञानी मुनि आपको ही ध्याता, यान और ध्येयरूपमें जानते हैं। आप देवद्रोहियोंको जीतनेवाले और स्वर्गवासियोंके रक्षक हैं

अध्याय 258

श्लोक 18

त्वन्नाथा वयमेवेति जीवामो निहतद्विषः ।इयं नीतिरहं मन्ये नेता नीतेर्यतो भवान्

tvannāthā vayameveti jīvāmo nihatadviṣaḥ | iyaṃ nītirahaṃ manye netā nīteryato bhavān

हिन्दी अर्थ

हमारे ऐ आप ही स्वामी और संरक्षक हैं; इसीलिये हम जी हे हैं और हमारे शत्रु मारे गये हैं। यही मेरी नीति है और इसीको मैं मानता हूँ, क्योंकि आप ही नीतिके नेता ं

अध्याय 258

श्लोक 19

को नु नाम नयो वेद त्वां विना साम्प्रतं वद ।नीतिस्त्वं सर्वकार्याणामिति मे निश्चिता मतिः

ko nu nāma nayo veda tvāṃ vinā sāmprataṃ vada | nītistvaṃ sarvakāryāṇāmiti me niścitā matiḥ

हिन्दी अर्थ

वेदस्वरूप परमात्मन्‌ू! कहिये, इस समय भापके सिवा दूसरा कौन नीतिमार्गका दर्शन करानेवाला दे । मेरा तो यह निश्चित विचार है कि आप ही समस्त कार्योंकी नीति हैं

अध्याय 258

श्लोक 20

दुर्गाढो नयमार्गोऽयमित्याहुस्तद्विदो जनाः ।चतुर्धा प्रोच्यते नीतिः सामदाने जनार्दन

durgāḍho nayamārgo'yamityāhustadvido janāḥ | caturdhā procyate nītiḥ sāmadāne janārdana

श्लोक 20–21 का हिन्दी अर्थ

इस नीतिमार्गमें प्रवेश करना हुत ही कठिन है, ऐसा नीतिज्ञ पुरुष कहते हैं। ननार्दन ! चार प्रकारकी नीति बतलायी जाती है—साम, शान, दण्ड और भेद। मनुष्योंके निग्रह (दूसरेके द्वारा मपना अवरोध) और अवग्रह (अपने द्वारा दूसरोंका मवरोध) होनेपर सदा इन्हीं चार नीतियोंका प्रयोग होता डे । हरे! जो दण्डनीय (दुर्बल) हों, उन शत्रुओंके प्रति ीतिज्ञ पुरुष दण्ड-नीतिके ही प्रयोगकी इच्छा करते हैं और नीतिकी समता होनेपर अर्थात्‌ शत्रुके अपने समान बलशाली होनेपर उसके प्रति साम-नीतिका ही प्रयोग प्रभीष्ट माना जाता है

अध्याय 258

श्लोक 21

दण्डो भेदो मनुष्याणां निग्राहावग्रहे सदा ।दण्ड्येषु दण्डमिच्छन्ति समान्यं तु नये हरे

daṇḍo bhedo manuṣyāṇāṃ nigrāhāvagrahe sadā | daṇḍyeṣu daṇḍamicchanti samānyaṃ tu naye hare

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 258

श्लोक 22

बलवत्स्वथ दानं तु त्रयाणामप्यगोचरे ।प्रयोक्तव्यो महाभेद इति नीतिमतां मतम्

balavatsvatha dānaṃ tu trayāṇāmapyagocare | prayoktavyo mahābheda iti nītimatāṃ matam

हिन्दी अर्थ

शत्रु बलवान्‌ हों तो नके प्रति दान-नीतिका प्रयोग उचित होता है (अर्थात्‌ न्हें कुछ भेंट देकर शान्त कर देना आवश्यक समझा नाता है) । जहाँ साम, दान और दण्ड-'इन तीनों ीतियोंकी पहुँच न हो सके, वहाँ महान्‌ ' भेद' का [योग करना चाहिये, यह नीतिज्ञ पुरुषोंका मत है

अध्याय 258

श्लोक 23

तेषु तेष्वथ सर्वेषु प्रमाणं त्वां विदुर्बुधाः ।किमत्र बहुनोक्तेन सर्वं त्वयि समर्पितम्

teṣu teṣvatha sarveṣu pramāṇaṃ tvāṃ vidurbudhāḥ | kimatra bahunoktena sarvaṃ tvayi samarpitam

हिन्दी अर्थ

न-उन सभी नीतियोंमें विद्वान्‌ पुरुष आपको ही प्रमाण पानते हैं (आपने जिस अवसरपर जैसी नीतिका प्रयोग केया है, वहाँ वही उचित था, ऐसा लोगोंका मत है) । हाँ बहुत कहनेसे क्या लाभ? सारा ज्ञान आपमें ही पमर्पित है

अध्याय 258

श्लोक 24

इत्युक्त्वा विररामैव उद्धवो नीतिमत्तरः ।ततः स भगवान् विष्णुरेवमेव नृपोत्तम

ityuktvā virarāmaiva uddhavo nītimattaraḥ | tataḥ sa bhagavān viṣṇurevameva nṛpottama

श्लोक 24–26 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं-नृपग्रेष्ठ ऐसा कहकर अतिशय ीतिमान्‌ उद्धवजी चुप हो गये । राजन्‌ ! तदनन्तर वे तत्त्ववेत्ता गगवान्‌ श्रीकृष्णने इसी तरह यादव-सभामें महाबाहु बलराम, हहाराज उग्रसेन तथा कृतवर्मासे पूर्वोक्त बात कही। इसके बाद वे पुन: बलरामजीसे बोले—' भैया! आपको प्रमाद नहीं करना चाहिये। आप सदा नगरकी रक्षाके लिये यत्रशील बने रहिये '

अध्याय 258

श्लोक 25

कामपालं महाबाहुमुवाच यदुसंसदि ।उग्रसेनं नृपं राजंस्तथा हार्दिक्यमेव च

kāmapālaṃ mahābāhumuvāca yadusaṃsadi | ugrasenaṃ nṛpaṃ rājaṃstathā hārdikyameva ca

अर्थ श्लोक 24 के साथ

अध्याय 258

श्लोक 26

कामपालं पुनर्विष्णुरिदं प्रोवाच तत्त्ववित् ।न प्रमादस्त्वया कार्यः सर्वदा यत्नवान् भव

kāmapālaṃ punarviṣṇuridaṃ provāca tattvavit | na pramādastvayā kāryaḥ sarvadā yatnavān bhava

अर्थ श्लोक 24 के साथ

अध्याय 258

श्लोक 27

स्थिते त्वयि महाबाहो का पीडा जगतो भवेत् ।गदी भव सदा त्वार्य न क्रीडा सर्वदा भवेत्

sthite tvayi mahābāho kā pīḍā jagato bhavet | gadī bhava sadā tvārya na krīḍā sarvadā bhavet

हिन्दी अर्थ

महाबाहो ! आप रक्षाके लिये खड़े हो जायँ तो जगत्‌को क्या पीड़ा हो सकती है? आर्य! अब गदा उठाइये, सदा क्रीडा और मनोरज्जनका ही अवसर नहीं होता

अध्याय 258

श्लोक 28

रक्ष त्वं सर्वदा यत्नात् पुरीं द्वारवतीं प्रभो ।नोपहास्या यथा स्याम तथा कुरु गदी भव

rakṣa tvaṃ sarvadā yatnāt purīṃ dvāravatīṃ prabho | nopahāsyā yathā syāma tathā kuru gadī bhava

हिन्दी अर्थ

प्रभो! आप सदा यत्रपूर्वक द्वारकापुरीकी रक्षा करें। हमें उपहासका पात्र न बनना पड़े, ऐसा प्रयत्न कीजिये और गदा लिये सदा रक्षाके लिये उद्यत रहिये

अध्याय 258

श्लोक 29

उत्साहः सर्वदा कार्यो निरुत्साहो न यत्नतः ।बाढमित्यब्रवीद् रामः कृष्णं वृष्णिकुलोद्भवम्

utsāhaḥ sarvadā kāryo nirutsāho na yatnataḥ | bāḍhamityabravīd rāmaḥ kṛṣṇaṃ vṛṣṇikulodbhavam

हिन्दी अर्थ

आपको सदा उत्साह बनाये रखना चाहिये। कभी उत्साहका अभाव न हो, इसके लिये यत्रशील रहना चाहिये ।' तब बलरामजीने वृष्णिवंशावतंस श्रीकृष्णसे कहा—* बहुत अच्छा

अध्याय 258

श्लोक 30

वृष्णयः सर्व एवैते स्वं स्वं सद्म समाययुः ।गन्तुमैच्छज्जगन्नाथः कैलासं पर्वतोत्तमम्

vṛṣṇayaḥ sarva evaite svaṃ svaṃ sadma samāyayuḥ | gantumaicchajjagannāthaḥ kailāsaṃ parvatottamam

हिन्दी अर्थ

उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके सभी वृष्णिवंशी अपने- अपने घरको लौट गये । तब जगन्नाथ श्रीकृष्णने पर्वतप्रवर कैलासको जानेका विचार किया

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

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व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.