Harivamsha Purana
259
अध्याय 259 / 318

Parva 3, Adhyāya 76

35 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ35 श्लोक

अध्याय 259

श्लोक 1

गरुडोपरि आरूढो भूत्वा श्रीकृष्णस्य बदरिकाश्रमे गमनं, मार्गे देवेभिः मुनिभिश्च तस्य स्तुतिः ततः सञ्चिन्तयामास गरुडं पक्षिपुङ्गवम् ।आगच्छ त्वरितं तार्क्ष्य इति विष्णुर्जगत्पतिः

garuḍopari ārūḍho bhūtvā śrīkṛṣṇasya badarikāśrame gamanaṃ, mārge devebhiḥ munibhiśca tasya stutiḥ tataḥ sañcintayāmāsa garuḍaṃ pakṣipuṅgavam | āgaccha tvaritaṃ tārkṣya iti viṣṇurjagatpatiḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर जगदीश्वर श्रीकृष्णने मन-ही-मन पक्षिराज गरुड़का चिन्तन करते हुए कहा—'ता्ष्य! शीघ्र आओ '

अध्याय 259

श्लोक 2

ततः स भगवांस्तार्क्ष्यो वेदराशिरिति स्मृतः ।बलवान् विक्रमी योगी शास्त्रनेता कुरूद्वह

tataḥ sa bhagavāṃstārkṣyo vedarāśiriti smṛtaḥ | balavān vikramī yogī śāstranetā kurūdvaha

हिन्दी अर्थ

कुरश्रेष्ठ! तब भगवान्‌ गरुड़ वहाँ आ पहुँचे, जिन्हें वेदकी राशि माना गया है; वे बलवान, पराक्रमी, योगी तथा शास्त्रों (शास्त्रज्ञों >-के नेता हैं

अध्याय 259

श्लोक 3

यज्ञमूर्तिः पुराणात्मा साममूर्द्धा च पावनः ।ऋग्वेदपक्षवान् पक्षी पिङ्गलो जटिलाकृतिः

yajñamūrtiḥ purāṇātmā sāmamūrddhā ca pāvanaḥ | ṛgvedapakṣavān pakṣī piṅgalo jaṭilākṛtiḥ

हिन्दी अर्थ

यज्ञ उनका स्वरूप है, वे पुराणात्मा और पावन हैं, सामवेद उनका मस्तक है, ऋग्वेद उनकी पाँखें हैं, पक्षधारी गरुड़ पिज्लवर्णके हैं, उनकी आकृति जटिल दिखायी देती है

अध्याय 259

श्लोक 4

ताम्रतुण्डः सोमहरः शक्रजेता महाशिराः ।पन्नगारिः पद्मनेत्रः साक्षाद् विष्णुरिवापरः

tāmratuṇḍaḥ somaharaḥ śakrajetā mahāśirāḥ | pannagāriḥ padmanetraḥ sākṣād viṣṇurivāparaḥ

हिन्दी अर्थ

उनकी चोंच ताँबेके समान लाल है। वे अमृतका हरण करनेवाले हैं। उन्होंने युद्धमें इन्द्रको जीत लिया था। उनका मस्तक विशाल है। वे सर्पोके शत्रु हैं और साक्षात्‌ दूसरे विष्णुकी भाँति कमलसदूश नेत्रोंसे सुशोभित होते हैं

अध्याय 259

श्लोक 5

वाहनं देवदेवस्य दानवीगर्भकृन्तनः ।राक्षसासुरसङ्घानां जेता पक्षबलेन यः

vāhanaṃ devadevasya dānavīgarbhakṛntanaḥ | rākṣasāsurasaṅghānāṃ jetā pakṣabalena yaḥ

हिन्दी अर्थ

वे देवाधिदेव भगवान्‌ विष्णुके वाहन तथा दानवपत्रियोंके गर्भका उच्छेद करनेवाले हैं। वे अपने पंखोंके बलसे राक्षसों और असुरोंके समूहपर विजय पाते हैं

अध्याय 259

श्लोक 6

प्रादुरासीन्महावीर्यः केशवस्याग्रतस्तदा ।जानुभ्यामपतद् भूमौ नमो विष्णो जगत्पते

prādurāsīnmahāvīryaḥ keśavasyāgratastadā | jānubhyāmapatad bhūmau namo viṣṇo jagatpate

श्लोक 6–8 का हिन्दी अर्थ

श्२३१ उस समय महापराक्रमी गरुड़ भगवान्‌ केशवके सम्मुख प्रकट हुए और घुटनोंके बल पृथ्वीपर पड़कर प्रणाम करते हुए बोले-'जगत्पते! विष्णो! आपको नमस्कार है। देवदेवेश्वर ! हरे ! स्वामिन्‌ ! आपके चरणों में मेरा प्रणाम है। भगवान्‌ श्रीकृष्णने गरुड़-जातिके पक्षियोंमें प्रधान गरुड़का अपने हाथसे स्वागतपूर्वक स्पर्श किया और उनसे तत्काल कहा-' मैं कैलासपर्वतको चलूँगा। सनातन देवता कल्याणस्वरूप भगवान्‌ शड्रका दर्शन करना चाहता हूँ'

अध्याय 259

श्लोक 7

नमस्ते देवदेवेश हरे स्वामिन्निति ब्रुवन् ।पस्पर्श पाणिना कृष्णः स्वागतं तार्क्ष्यपुङ्गवम्

namaste devadeveśa hare svāminniti bruvan | pasparśa pāṇinā kṛṣṇaḥ svāgataṃ tārkṣyapuṅgavam

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 259

श्लोक 8

इत्युवाच तदा तार्क्ष्यं यास्ये कैलासपर्वतम् ।शूलिनं द्रष्टुमिच्छामि शङ्करं शाश्वतं शिवम्

ityuvāca tadā tārkṣyaṃ yāsye kailāsaparvatam | śūlinaṃ draṣṭumicchāmi śaṅkaraṃ śāśvataṃ śivam

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 259

श्लोक 9

बाढमित्यब्रवीत् तार्क्ष्य आरुह्यैनं जनार्दनः ।तिष्ठध्वमिति होवाच यादवान् पार्श्ववर्तिनः

bāḍhamityabravīt tārkṣya āruhyainaṃ janārdanaḥ | tiṣṭhadhvamiti hovāca yādavān pārśvavartinaḥ

हिन्दी अर्थ

तब गरुड़ने * बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की। गरुड़पर आरूढ़ होकर भगवान्‌ जनार्दनने आस-पास खड़े हुए यादवोंसे कहा-“'तुम सब सतत सावधान रहना'

अध्याय 259

श्लोक 10

ततो ययौ जगन्नाथो दिशं प्रागुत्तरां हरिः ।रवेण महता तार्क्ष्यस्त्रैलोक्यं समकम्पयत्

tato yayau jagannātho diśaṃ prāguttarāṃ hariḥ | raveṇa mahatā tārkṣyastrailokyaṃ samakampayat

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर जगदीश्वर श्रीहरि पूर्वोत्तर दिशाकी ओर चले। गरुड़ने अपने महानादसे तीनों लोकोंको कम्पित कर दिया

अध्याय 259

श्लोक 11

सागरं क्षोभयामास पद्भ्यां पक्षी व्रजंस्तदा ।पक्षेण पर्वतान् सर्वान् वहन् देवं जनार्दनम्

sāgaraṃ kṣobhayāmāsa padbhyāṃ pakṣī vrajaṃstadā | pakṣeṇa parvatān sarvān vahan devaṃ janārdanam

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ श्रीकृष्णका भार वहन करके आगे बढ़ते हुए पक्षी गरुड़ने अपने पैरोंसे समुद्रको क्षुब्ध कर दिया और पंखोंकी हवासे समस्त पर्वतोंको कम्पित कर दिया

अध्याय 259

श्लोक 12

ततो देवाः सगन्धर्वा आकाशेऽधिष्ठितास्तदा तुष्टुवुः पुण्डरीकाक्षं वाग्भिरिष्टाभिरीश्वरम्

tato devāḥ sagandharvā ākāśe'dhiṣṭhitāstadā tuṣṭuvuḥ puṇḍarīkākṣaṃ vāgbhiriṣṭābhirīśvaram

हिन्दी अर्थ

उस समय गन्धवॉसहित देवता आकाशमें खड़े हो प्रिय वचनोंद्वारा भगवान्‌ श्रीकृष्णकी स्तुति कर रहे थे

अध्याय 259

श्लोक 13

जय देव जगन्नाथ जय विष्णो जगत्पते ।जयाजेय नमो देव भूतभावनभावन

jaya deva jagannātha jaya viṣṇo jagatpate | jayājeya namo deva bhūtabhāvanabhāvana

हिन्दी अर्थ

(वे कहते थे—) ' जगन्नाथ! देव! आपकी जय हो! जगत्पते! विष्णो! आपकी जय हो! अजेय परमेश्वर! आपकी जय हो ! देव! भूतभावनभावन ! आपको नमस्कार है

अध्याय 259

श्लोक 14

नमः परमसिंहाय दैत्यदानवनाशन ।जयाजेय हरे देव योगिध्येय परागत

namaḥ paramasiṃhāya daityadānavanāśana | jayājeya hare deva yogidhyeya parāgata

हिन्दी अर्थ

उत्तम नृसिंहरूपधारी आपको नमस्कार है। आप दैत्यों और दानवोंका नाश करनेवाले हैं। अजेय हरे! आपकी जय हो! देव ! आप योगियोंके ध्येय और परमगतिस्वरूप हैं

अध्याय 259

श्लोक 15

नारायण नमो देव कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।आदिकर्तः पुराणात्मन् ब्रह्मयोने सनातन

nārāyaṇa namo deva kṛṣṇa kṛṣṇa hare hare | ādikartaḥ purāṇātman brahmayone sanātana

हिन्दी अर्थ

नारायण! कृष्ण! कृष्ण! हरे! हरे! आदिकर्त: ! पुराणात्मन्‌! ब्रह्मयोने ! सनातन देव! आपको नमस्कार है

अध्याय 259

श्लोक 16

नमस्ते सकलेशाय निर्गुणाय गुणात्मने ।भक्तिप्रियाय भक्ताय नमो दानवनाशन

namaste sakaleśāya nirguṇāya guṇātmane | bhaktipriyāya bhaktāya namo dānavanāśana

हिन्दी अर्थ

सर्वेश्वर ! आपको नमस्कार है। आप निर्गुण एवं गुणस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप भक्तिप्रिय और भक्तस्वरूप हैं। दानवनाशन ! आपको नमस्कार है

अध्याय 259

श्लोक 17

अचिन्त्यमूर्तये तुभ्यं नमस्ते सकलेश्वर ।इत्यादिभिस्तदा देवं वाग्भिरीशानमव्ययम्

acintyamūrtaye tubhyaṃ namaste sakaleśvara | ityādibhistadā devaṃ vāgbhirīśānamavyayam

श्लोक 17–21 का हिन्दी अर्थ

सकलेश्वर ! आपका स्वरूप अचिन्त्य है, आपको नमस्कार है।' इस प्रकारके वचनोंद्वारा देवताओं, गन्धर्वों, ऋषियों, सिद्धों और चारणोंने अविनाशी ईश्वर श्रीकृष्णका स्तवन किया। जगदीश्वर श्रीकृष्ण उन स्तुतिवचनोंको सुनते हुए वेदपारंगत मुनियों और देवताओंके साथ उस स्थानपर गये, जहाँ पूर्वकालमें लोकवृद्धि करनेवाले साक्षातू भगवान्‌ विष्णुने लोकहितकी कामनासे अत्यन्त कठोर तप किया था। प्रभावशाली भगवान्‌ विष्णुने दस हजार वर्षोतक वहाँ तपस्या की थी। जगदीश्वर विष्णुने अत्यन्त कठोर तप करके वहाँ अपने-आपको नर और नारायण नामसे विख्यात दो स्वरूपोंमें अभिव्यक्त किया था

अध्याय 259

श्लोक 18

तुष्टुवुर्देवगन्धर्वा ऋषयः सिद्धचारणाः ।शृण्वन्नेवं जगन्नाथः स्तुतिवाक्यानि तानि च

tuṣṭuvurdevagandharvā ṛṣayaḥ siddhacāraṇāḥ | śṛṇvannevaṃ jagannāthaḥ stutivākyāni tāni ca

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 259

श्लोक 19

ययौ सार्धं सुरगणैर्मुनिभिर्वेदपारगैः ।यत्र पूर्वं स्वयं विष्णुस्तपस्तेपे सुदारुणम्

yayau sārdhaṃ suragaṇairmunibhirvedapāragaiḥ | yatra pūrvaṃ svayaṃ viṣṇustapastepe sudāruṇam

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 259

श्लोक 20

लोकवृद्धिकरः श्रीमाँल्लोकानां हितकाम्यया ।वर्षायुतं तपस्तप्तं विष्णुना प्रभविष्णुना

lokavṛddhikaraḥ śrīmā~llokānāṃ hitakāmyayā | varṣāyutaṃ tapastaptaṃ viṣṇunā prabhaviṣṇunā

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 259

श्लोक 21

यत्र विष्णुर्जगन्नाथस्तपस्तप्त्वा सुदारुणम् ।द्विधाकरोत् स्वमात्मानं नरनारायणाख्यया

yatra viṣṇurjagannāthastapastaptvā sudāruṇam | dvidhākarot svamātmānaṃ naranārāyaṇākhyayā

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 259

श्लोक 22

गङ्गा यत्र सरिच्छ्रेष्ठा मध्ये धावति पावनी ।यत्र शक्रः स्वयं हत्वा वृत्रं वेदार्थतत्त्वगम्

gaṅgā yatra saricchreṣṭhā madhye dhāvati pāvanī | yatra śakraḥ svayaṃ hatvā vṛtraṃ vedārthatattvagam

श्लोक 22–24 का हिन्दी अर्थ

उस क्षेत्रके मध्यभागमें सरिताओंमें श्रेष्ठ पावनी गड्भा प्रखर गतिसे प्रवाहित होती रहती हैं । जहाँ इन्द्रने वेदार्थतत्त्वके ज्ञाता वृत्रासुर्का वध करके लगी हुई ब्रह्मृहत्याका विनाश करनेके लिये दस हजार वर्षोतक तप किया था। जहाँ भगवान्‌ जनार्दनका ध्यान करनेसे ही सिद्ध पुरुषोंको सिद्धि प्राप्त हुई है । रणभूमिमें लोकको रुलानेवाले रावणका वध करके भगवान्‌ श्रीरामने इन्द्रद्वारा पालित हुई शास्त्राज्ञाका पालन करनेकी इच्छासे जहाँ घोर तपस्या की थी

अध्याय 259

श्लोक 23

ब्रह्महत्याविनाशार्थं तपो वर्षायुतं चरत् ।यत्र सिद्धाश्च सिद्धाः स्युर्ध्यात्वा देवं जनार्दनम्

brahmahatyāvināśārthaṃ tapo varṣāyutaṃ carat | yatra siddhāśca siddhāḥ syurdhyātvā devaṃ janārdanam

अर्थ श्लोक 22 के साथ

अध्याय 259

श्लोक 24

यत्र हत्वा रणे रामो रावणं लोकरावणम् ।एतच्छासनमिच्छंश्च तपो घोरमतप्यत

yatra hatvā raṇe rāmo rāvaṇaṃ lokarāvaṇam | etacchāsanamicchaṃśca tapo ghoramatapyata

अर्थ श्लोक 22 के साथ

अध्याय 259

श्लोक 25

देवाश्च मुनयश्चैव सिद्धिं यान्ति शुचिव्रताः ।यत्र नित्यं जगन्नाथः साक्षाद् वसति केशवः

devāśca munayaścaiva siddhiṃ yānti śucivratāḥ | yatra nityaṃ jagannāthaḥ sākṣād vasati keśavaḥ

हिन्दी अर्थ

देवता और उत्तम ब्रतका पालन करनेवाले मुनि जहाँ सिद्धिको प्राप्त होते हैं और जहाँ जगदीश्वर केशव साक्षात्‌ रूपसे नित्य निवास करते हैं

अध्याय 259

श्लोक 26

यत्र यज्ञाः प्रवर्तन्ते नित्यं मुनिगणैः सह ।यस्याः स्मरणमात्रेण नरः स्वर्गं गमिष्यति

yatra yajñāḥ pravartante nityaṃ munigaṇaiḥ saha | yasyāḥ smaraṇamātreṇa naraḥ svargaṃ gamiṣyati

हिन्दी अर्थ

जहाँ मुनियोंके साथ यज्ञ नित्य होते रहते हैं। जिसके स्मरणमात्रसे मनुष्य स्वर्गलोक प्राप्त कर लेता है

अध्याय 259

श्लोक 27

स्वर्गसोपानमिच्छन्ति यां पुण्यां मुनिसत्तमाः ।शत्रवो मित्रतां यान्ति यत्र नित्यं नृपोत्तम

svargasopānamicchanti yāṃ puṇyāṃ munisattamāḥ | śatravo mitratāṃ yānti yatra nityaṃ nṛpottama

श्लोक 27–28 का हिन्दी अर्थ

नृपोत्तम! मुनिश्रेष्ठमण जिस पुण्यभूमिको स्वर्गकी सीढ़ी समझ उसे पानेकी इच्छा करते हैं तथा जहाँ शत्रु भी मित्र हो जाते हैं। जिसे पुण्यशील उत्तम धर्मात्मा मनुष्योंका स्थान बताया गया है। जहाँ भगवान्‌ विष्णुकी आराधना करके देवता स्वर्गलोकको प्राप्त होते हैं

अध्याय 259

श्लोक 28

यामाहुः पुण्यशीलानां स्थानमुत्तमधर्मिणाम् ।यत्र विष्णुं समाराध्य देवाः स्वर्गं समाययुः

yāmāhuḥ puṇyaśīlānāṃ sthānamuttamadharmiṇām | yatra viṣṇuṃ samārādhya devāḥ svargaṃ samāyayuḥ

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 259

श्लोक 29

सिद्धक्षेत्रमिदं प्राहुरृषयो वीतमत्सराः ।विशालां बदरीं विष्णुस्तां द्रष्टुं सकलेश्वरः

siddhakṣetramidaṃ prāhurṛṣayo vītamatsarāḥ | viśālāṃ badarīṃ viṣṇustāṃ draṣṭuṃ sakaleśvaraḥ

श्लोक 29–30 का हिन्दी अर्थ

मात्सर्यरहित ऋषि-मुनि जिसे सिद्ध पुरुषोंका क्षेत्र कहते हैं, उस विशाला बदरीका दर्शन करनेके लिये सर्वेधर श्रीकृष्णने सायंकालमें तत्त्वदर्शी मुनियें और देवताओंकि साथ वहाँके परम पवित्र ऋषि-मुनिसेवित तपोवनमें प्रवेश किया

अध्याय 259

श्लोक 30

सायाह्ने चामरगणैर्मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।प्रविवेश महापुण्यमृषिजुष्टं तपोवनम्

sāyāhne cāmaragaṇairmunibhistattvadarśibhiḥ | praviveśa mahāpuṇyamṛṣijuṣṭaṃ tapovanam

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 259

श्लोक 31

अग्निहोत्राकुले काले पक्षिव्याहारसङ्कुले ।नीडस्थेषु विहङ्गेषु दुह्यमानासु गोषु च

agnihotrākule kāle pakṣivyāhārasaṅkule | nīḍastheṣu vihaṅgeṣu duhyamānāsu goṣu ca

श्लोक 31–35 का हिन्दी अर्थ

जिस समय सब ओर अग्रिहोत्रकी आग प्रज्वलित हो चुकी थी, पक्षियोंके कलरवसे तपोवन गूँज रहा था, विहड़्म अपने-अपने घोंसलोंमें आ बैठे थे, गौएँ दुह्दी जा रही थीं, मुनियोंमें उत्साही ऋषि-महर्षि सब ओर खड़े थे, सिद्धलोग समाधिस्थ होकर भगवान्‌ जनार्दनका चिन्तन करते थे, हवनीय घृत आगपर चढ़ा दिये गये थे, सब ओर अग्रिहोत्रकी अग्रियाँ प्रज्वलित हो उठी थीं और उन अग्रियोंमें सब ओर आहुतियाँ दी जा रही थीं, अतिथियोंका सत्कार हो रहा था और जगत्‌को प्रकाशित करनेवाले सूर्य संध्याकालमें अस्त हो रहे थे, उसी वेलामें श्२३३ देवताओंके साथ सर्वव्यापी भगवान्‌ श्रीकृष्णने मुनिसेवित तपोमयी बदरीतीर्थकी भूमिमें प्रवेश किया । बदरिकाश्रमके मध्यभागमें प्रवेश करके कमलनयन भगवान्‌ श्रीकृष्ण दीपकोंसे प्रकाशित प्रदेशमें गरुडसे उतरकर देवताओंसहित खड़े हुए

अध्याय 259

श्लोक 32

ऋषिष्वप्यथ तिष्ठत्सु मुनिवीरेषु सर्वतः ।समाधिस्थेषु सिद्धेषु चिन्तयत्सु जनार्दनम्

ṛṣiṣvapyatha tiṣṭhatsu munivīreṣu sarvataḥ | samādhistheṣu siddheṣu cintayatsu janārdanam

अर्थ श्लोक 31 के साथ

अध्याय 259

श्लोक 33

अधिश्रितेषु हविषु ज्वाल्यमानेषु चाग्निषु ।हूयमानेषु तत्रैव पावकेषु समन्ततः

adhiśriteṣu haviṣu jvālyamāneṣu cāgniṣu | hūyamāneṣu tatraiva pāvakeṣu samantataḥ

अर्थ श्लोक 31 के साथ

अध्याय 259

श्लोक 34

अतिथौ पूज्यमाने च सन्ध्याविष्टे जगन्मणौ ।स तस्यामथ वेलायां देवैः सह जनार्दनः

atithau pūjyamāne ca sandhyāviṣṭe jaganmaṇau | sa tasyāmatha velāyāṃ devaiḥ saha janārdanaḥ

अर्थ श्लोक 31 के साथ

अध्याय 259

श्लोक 36

विवेश बदरीं विष्णुर्मुनिजुष्टां तपोमयीम् ।आश्रमस्याथ मध्यं तु प्रविश्य हरिरीश्वरः ॥ ३५॥।गरुडादवरुह्याथ दीपिकादीपिते तदा ।प्रदेशे पुण्डरीकाक्षः स्थितस्तावत् सहामरैः

viveśa badarīṃ viṣṇurmunijuṣṭāṃ tapomayīm | āśramasyātha madhyaṃ tu praviśya harirīśvaraḥ || 35||| garuḍādavaruhyātha dīpikādīpite tadā | pradeśe puṇḍarīkākṣaḥ sthitastāvat sahāmaraiḥ

अर्थ श्लोक 31 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

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शोध टिप्पणीResearch note

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पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.