Harivamsha Purana
257
अध्याय 257 / 318

Parva 3, Adhyāya 74

27 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ27 श्लोक

अध्याय 257

श्लोक 1

भगवतः श्रीकृष्णेन यादवसभायां कैलासयात्रायाः स्वविचारं प्रकटयित्वा नगरस्य रक्षार्थं यादवेभ्यः सावधानं भवितुं आदेशं प्रभातायां तु शर्वर्यां गन्तुमैच्छज्जनार्दनः ।हुताग्निः कृतकल्याणः समाप्तवरदक्षिणः

bhagavataḥ śrīkṛṣṇena yādavasabhāyāṃ kailāsayātrāyāḥ svavicāraṃ prakaṭayitvā nagarasya rakṣārthaṃ yādavebhyaḥ sāvadhānaṃ bhavituṃ ādeśaṃ prabhātāyāṃ tu śarvaryāṃ gantumaicchajjanārdanaḥ | hutāgniḥ kṛtakalyāṇaḥ samāptavaradakṣiṇaḥ

श्लोक 1–2 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! जब रात बीती और प्रभात हुआ, तब भगवान्‌ श्रीकृष्णने अग्निहोत्र करके मज़लाचारके पश्चात्‌ ब्राह्मणोंको उत्तम दक्षिणाएँ देकर उन्हें बहुत-सी गौएँ दीं और उन श्रेष्ठ द्विजोंको नमस्कार करके जगत्पति श्रीकृष्णने आस्थानमण्डप (सभाभवन)-में प्रवेश किया

अध्याय 257

श्लोक 2

गाश्च दत्त्वाथ विप्रेभ्यो नमस्कृत्य द्विजोत्तमान् ।आस्थानमण्डपं कृष्णः प्रविवेश जगत्पतिः

gāśca dattvātha viprebhyo namaskṛtya dvijottamān | āsthānamaṇḍapaṃ kṛṣṇaḥ praviveśa jagatpatiḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 257

श्लोक 3

आसनं महदास्थाय वृष्णीनाहूय सर्वशः ।बलभद्रं शिनेः पौत्रं हार्दिक्यं शुकसारणौ

āsanaṃ mahadāsthāya vṛṣṇīnāhūya sarvaśaḥ | balabhadraṃ śineḥ pautraṃ hārdikyaṃ śukasāraṇau

श्लोक 3–4 का हिन्दी अर्थ

वहाँ महान्‌ सिंहासनपर बैठकर उन्होंने समस्त वृष्णिवंशी वीरोंको बुलाया। बलभद्र, सात्यकि, कृतवर्मा, शुक, सारण, राजा उग्रसेन तथा उन महाबुद्धिमान्‌ एवं नीतिशास्त्रके महान्‌ पण्डित उद्धवको भी बुलाया, जिनकी बुद्धिका आश्रय लेकर समस्त यादव सुखसे रहते थे

अध्याय 257

श्लोक 4

उग्रसेनं महाबुद्धिमुद्धवं नीतिमत्तरम् ।यस्य बुद्धिं समाश्रित्य जीवन्ते यादवाः सुखम्

ugrasenaṃ mahābuddhimuddhavaṃ nītimattaram | yasya buddhiṃ samāśritya jīvante yādavāḥ sukham

अर्थ श्लोक 3 के साथ

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श्लोक 5

नेता च यदुवृष्णीनां स तु धर्मपरः सदा ।यस्य बिभ्यति देवाश्च नीतेस्तस्य महात्मनः

netā ca yaduvṛṣṇīnāṃ sa tu dharmaparaḥ sadā | yasya bibhyati devāśca nītestasya mahātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

वे सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले और वृष्णिवंशी यादवोंके नेता थे। उन महात्माकी नीतिसे देवता भी सदा भयभीत रहते थे

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श्लोक 6

यस्य बुद्धिबलाद् विष्णुः शशास पृथिवीं सदा ।तं च वृष्णिवरं वीरमुद्धवं देवसुप्रभम्

yasya buddhibalād viṣṇuḥ śaśāsa pṛthivīṃ sadā | taṃ ca vṛṣṇivaraṃ vīramuddhavaṃ devasuprabham

श्लोक 6–7 का हिन्दी अर्थ

जिनके बुद्धिबलसे भगवान्‌ श्रीकृष्ण सदा पृथिवीका शासन करते थे तथा जो देवताओंके समान परम कान्तिमान्‌ एवं. वृष्णिवंशके प्रमुख वीर थे, उन उद्धवको तथा अन्य यादवोंको भी बुलाकर भगवान्‌ श्रीहरिने उन सबसे कहा—' समस्त यादव मेरी बातें सुनें ! मेरे पिताके मित्र उद्धवजी! आप भी मेरा वचन सुनिये

अध्याय 257

श्लोक 7

अन्यानपि यदून् सर्वानुवाच भगवान् हरिः ।शृण्वन्तु मम वाक्यानि यादवाः सर्व एव हि ।शृणु चापि वचो मह्यं पितुरुद्धव मे सखे

anyānapi yadūn sarvānuvāca bhagavān hariḥ | śṛṇvantu mama vākyāni yādavāḥ sarva eva hi | śṛṇu cāpi vaco mahyaṃ pituruddhava me sakhe

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 257

श्लोक 8

बाल्यात्प्रभृति यो यत्नो मम दुष्टनिबर्हणे ।प्रत्यक्षं भवता दृष्टं पूतनानिधनं नृप

bālyātprabhṛti yo yatno mama duṣṭanibarhaṇe | pratyakṣaṃ bhavatā dṛṣṭaṃ pūtanānidhanaṃ nṛpa

श्लोक 8–9 का हिन्दी अर्थ

नरेश्वर उग्रसेन ! बाल्यकालसे लेकर अबतक दुष्टिोंका संहार करनेके लिये मेरे द्वारा जो प्रयत्र हुआ है, उसे आपने प्रत्यक्ष देखा है। यादवो! बाल्यावस्थामें बालकरूपसे मैंने पूतनाको मारा, केशीका संहार किया, गोवर्धन पर्वत उठाया और गौऑकी रक्षा की

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श्लोक 9

केशी च निहतो बाल्ये मया बालेन यादवाः ।गोवर्धनो धृतः शैलो गावश्च परिपालिताः

keśī ca nihato bālye mayā bālena yādavāḥ | govardhano dhṛtaḥ śailo gāvaśca paripālitāḥ

अर्थ श्लोक 8 के साथ

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श्लोक 10

अभिषिक्तोऽस्मि शक्रेण देवानामग्रतः स्थितः ।कंसोऽपि निधनं नीतो मया चाणूरमुष्टिकौ

abhiṣikto'smi śakreṇa devānāmagrataḥ sthitaḥ | kaṃso'pi nidhanaṃ nīto mayā cāṇūramuṣṭikau

हिन्दी अर्थ

मुझे देवताओंके आगे खड़ा करके देवराज इन्द्रने मेरा अभिषेक किया। मेरे हाथसे कंस मारा गया और चाणूर तथा मुष्टिकका भी संहार हुआ

अध्याय 257

श्लोक 11

उग्रसेनोऽभिषिक्तश्च कृता द्वारवती मया ।अन्ये चापि नृपा राजन् बलिनो निहता मया

ugraseno'bhiṣiktaśca kṛtā dvāravatī mayā | anye cāpi nṛpā rājan balino nihatā mayā

हिन्दी अर्थ

महाराज उग्रसेनका अभिषेक हुआ और मैंने द्वारकापुरीका नवनिर्माण किया । राजनू्‌ ! अन्य बलवान नरेश भी मेरे द्वारा मारे गये

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श्लोक 12

योऽपि वीरो जरासन्धो निगृहीतो बलान्मया ।भीमेन बलिना राजन्नयने मम यादवाः

yo'pi vīro jarāsandho nigṛhīto balānmayā | bhīmena balinā rājannayane mama yādavāḥ

हिन्दी अर्थ

यादवो ! और राजन्‌! जो वीर राजा जरासंध था, उसका भी मैंने बलवान्‌ भीमसेनके द्वारा बलपूर्वक दमन किया। मेरी नीतिके अनुसार ही जरासंधका संहार हुआ

अध्याय 257

श्लोक 13

शृगालो निहतः सङ्ख्ये गोमन्ताद् गच्छता मया ।योऽपि वीरो दुरात्मासौ दानवो नरको हतः

śṛgālo nihataḥ saṅkhye gomantād gacchatā mayā | yo'pi vīro durātmāsau dānavo narako hataḥ

हिन्दी अर्थ

गोमन्त पर्वतसे जाते समय मैंने युद्धमें राजा श्रगालका वध किया और वह जो वीर दुरात्मा दानव नरकासुर था, वह भी मेरे हाथसे मारा गया

अध्याय 257

श्लोक 14

निष्कण्टकमिमं लोकं कृतवान् राजसत्तमाः ।किं तु वीरो नृपो जज्ञे सखा भौमस्य यादवाः

niṣkaṇṭakamimaṃ lokaṃ kṛtavān rājasattamāḥ | kiṃ tu vīro nṛpo jajñe sakhā bhaumasya yādavāḥ

श्लोक 14–16 का हिन्दी अर्थ

क्षत्रियशिरोमणि यादवो! इस प्रकार मैंने इस लोकको निष्कण्टक (शत्रुविहीन) बना दिया है। परंतु जो नरकासुरका सखा है, वह वीर राजा पौण्ड़क़ अबतक शेष है। वह बलवानोंका नेता और मुझसे सदा द्वेष रखनेवाला है। राजेन्द्र पौण्ड्रक द्रोणाचार्यका शिष्य, बलवान, ब्रह्मास्त्रवेत्ता, रणकर्मकुशल, शास्त्रज्ञ, नीतिमानू, सबका साक्षात्‌ नेता, यत्रशील, योद्धा और दूसरे परशुरामकी भाँति युद्धप्रेमी राजा है

अध्याय 257

श्लोक 15

पौण्ड्रो वीर्यवतां नेता द्वेष्टा चासौ सदा मम ।शिष्यो द्रोणस्य राजेन्द्रो बली ब्रह्मास्त्रवित्कृती

pauṇḍro vīryavatāṃ netā dveṣṭā cāsau sadā mama | śiṣyo droṇasya rājendro balī brahmāstravitkṛtī

अर्थ श्लोक 14 के साथ

अध्याय 257

श्लोक 16

शास्त्रज्ञो नीतिमान्साक्षान्नेता सर्वस्य यत्नवान् ।योद्धा युद्धप्रियो राजा जामदग्न्य इवापरः

śāstrajño nītimānsākṣānnetā sarvasya yatnavān | yoddhā yuddhapriyo rājā jāmadagnya ivāparaḥ

अर्थ श्लोक 14 के साथ

अध्याय 257

श्लोक 17

एकान्तशत्रुरस्माकं छिद्रान्वेषी सदा मम ।बाधिष्यते पुरीं योद्धाच्छिद्रं यदि लभेत सः

ekāntaśatrurasmākaṃ chidrānveṣī sadā mama | bādhiṣyate purīṃ yoddhācchidraṃ yadi labheta saḥ

हिन्दी अर्थ

वह मेरा एकान्त शत्रु है और सदा मेरे छिद्र ढूँढ़ृता रहता है। यदि वह थोड़ा-सा भी छिद्र पा जाय तो युद्धके लिये उद्यत होकर द्वारकापुरीको सताने लग जाय

अध्याय 257

श्लोक 18

न ह्यल्पसाध्यो बलवान् पुण्ड्रस्येशो नृपोत्तमाः ।यत्ता भवन्तस्तिष्ठन्तु प्रगृहीतशरासनाः

na hyalpasādhyo balavān puṇḍrasyeśo nṛpottamāḥ | yattā bhavantastiṣṭhantu pragṛhītaśarāsanāḥ

श्लोक 18–20 का हिन्दी अर्थ

श्रेष्ठ नरेशो! पुण्ड्र देशका बलवान्‌ राजा पौण्ड्रक थोड़े-से साधनोंद्वारा वशमें आनेवाला नहीं है। अत: आपलोग सदा धनुष लेकर युद्धके लिये तैयार खड़े रहें, जिससे यदुकुलकी निवासभूमि द्वारकापुरीको वह राजा पौण्ड्रक बाधा न दे सके। नरेशो! मैं किसी कारणवश कैलास पर्वतको जाऊँगा। वहाँ जाकर समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और पालन करनेवाले भगवान्‌ शड्रका दर्शन करना चाहता हूँ। जबतक मैं लौट न आऊँ तबतक आपलोग यहाँ नगरकी रक्षाके लिये सतत सावधान रहें '

अध्याय 257

श्लोक 19

यथा न बाधते राजा पुरीं यदुकुलाश्रयाम् ।अहं तु यास्ये कैलासं कुतश्चित्कारणान्नृपाः

yathā na bādhate rājā purīṃ yadukulāśrayām | ahaṃ tu yāsye kailāsaṃ kutaścitkāraṇānnṛpāḥ

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 257

श्लोक 20

शङ्करं द्रष्टुकामोऽस्मि भूतभावनभावनम् ।यावदागमनं मह्यं तावद् यत्ता भवन्त्विह

śaṅkaraṃ draṣṭukāmo'smi bhūtabhāvanabhāvanam | yāvadāgamanaṃ mahyaṃ tāvad yattā bhavantviha

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 257

श्लोक 21

मया विरहितां चेमां यदि जानाति पुण्ड्रकः ।आगमिष्यति राजेन्द्रो योत्स्यते च पुरीमिमाम्

mayā virahitāṃ cemāṃ yadi jānāti puṇḍrakaḥ | āgamiṣyati rājendro yotsyate ca purīmimām

हिन्दी अर्थ

पोइध्याय: + १२२७ "यदि राजेन्द्र पौण्ड्रक यह जान लेगा कि मैं द्वारकापुरीमें नहीं हूँ तो वह अवश्य आक्रमण करेगा और इस नगरीके साथ युद्ध छेड़ देगा

अध्याय 257

श्लोक 22

इमां निर्यादवीं कर्तुं शक्नोतीति च मे मतिः ।यत्ता भवत राजेन्द्राः खड्गैः पाशैः परश्वधैः

imāṃ niryādavīṃ kartuṃ śaknotīti ca me matiḥ | yattā bhavata rājendrāḥ khaḍgaiḥ pāśaiḥ paraśvadhaiḥ

हिन्दी अर्थ

राजेन्द्रगण ! मैं तो ऐसा मानता हूँ कि पौण्ड्क इस पुरीको यादवोंसे सूनी कर सकता है; अत: आपलोग खड्ग, पाश और फरसे लेकर युद्धके लिये सदा तैयार रहें

अध्याय 257

श्लोक 23

पाषाणैः कर्षणीयैश्च सन्नद्धा भवत स्वकैः ।पिधाय च कपाटानि महाद्वाराणि यत्नतः

pāṣāṇaiḥ karṣaṇīyaiśca sannaddhā bhavata svakaiḥ | pidhāya ca kapāṭāni mahādvārāṇi yatnataḥ

हिन्दी अर्थ

पाषाणों तथा आकर्षण करनेवाले अपने यन्त्रोंके द्वारा आपलोग सदा सन्नद्ध रहें। बड़े-बड़े फाटकोंकी किवाड़ें बंद करके यत्रपूर्वक पुरीकी रक्षा करें

अध्याय 257

श्लोक 24

एक एव महाद्वारो गमनागमने सदा ।मुद्रया सह गच्छन्तु राज्ञो ये गन्तुमीप्सवः

eka eva mahādvāro gamanāgamane sadā | mudrayā saha gacchantu rājño ye gantumīpsavaḥ

हिन्दी अर्थ

नगरसे बाहर आने-जानेके लिये एक ही सदा बड़ा फाटक काममें लाया जाय। जो बाहर जाना चाहते हों, वे राजाकी पुद्रा( पास) लेकर उसके साथ जा सकते हैं

अध्याय 257

श्लोक 25

न चामुद्रः प्रवेष्टव्यो द्वारपालस्य पश्यतः ।यावदागमनं मह्यं तावदेवं भविष्यति

na cāmudraḥ praveṣṭavyo dvārapālasya paśyataḥ | yāvadāgamanaṃ mahyaṃ tāvadevaṃ bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

जिसके पास राजाकी मुद्रा न हो, वह द्वारपालके देखते- देखते नगरमें प्रवेश न करने पाये। जबतक मैं लौटकर न आऊँ, तबतक ऐसी ही व्यवस्था रहेगी

अध्याय 257

श्लोक 26

मृगया नात्र कर्तव्या न च क्रीडा बहिः पुरात् ।ज्ञातव्याश्च परे स्वे च गमनागमने सदा

mṛgayā nātra kartavyā na ca krīḍā bahiḥ purāt | jñātavyāśca pare sve ca gamanāgamane sadā

हिन्दी अर्थ

इस बीचमें शिकार खेलना बंद कर दिया जाय, नगरसे बाहर जाकर क्रीड़ा न की जाय। गमनागमनके समय सदा अपने और परायेकी पहचान की जाय

अध्याय 257

श्लोक 27

एवमादिक्रिया कार्या यावदागमनं मम ।इत्युक्त्वा यादवान्सर्वान्सात्यकिं पुनराह च

evamādikriyā kāryā yāvadāgamanaṃ mama | ityuktvā yādavānsarvānsātyakiṃ punarāha ca

हिन्दी अर्थ

जबतक मेरा आना न हो तबतक इसी तरहकी व्यवस्था करनी चाहिये ।' समस्त यादवोंसे ऐसा कहकर भगवान्‌ श्रीकृष्णने पुन: सात्यकिसे इस प्रकार कहा—

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

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पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.