Harivamsha Purana
216
अध्याय 216 / 318

Parva 3, Adhyāya 33

46 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ46 श्लोक

अध्याय 216

श्लोक 1

वाराहावतारस्य उपक्रमः प्रादुर्भावः पुराणेषु विष्णोरमिततेजसः ।सतां कथयतां विप्र वाराह इति नः श्रुतः

vārāhāvatārasya upakramaḥ prādurbhāvaḥ purāṇeṣu viṣṇoramitatejasaḥ | satāṃ kathayatāṃ vipra vārāha iti naḥ śrutaḥ

हिन्दी अर्थ

अन्तर्गत भविष्यपर्वसों पुष्करप्रादर्धावविषयक रा हुआ॥ ३२/ ी5ध्याय: स्स्स्‍्स्‍्स्स्‍्स्‍्ससाणाण का उपक्रम जनमेजयने पूछा—विप्रवर ! मैंने सत्पुरुषोंके मुखसे पुराणोंमें अमिततेजस्वी भगवान्‌ विष्णुके *वाराह ' नामक अवतारकी चर्चा सुनी है

अध्याय 216

श्लोक 2

न जानतेऽस्य चरितं न विधिं नैव विस्तरम् ।न कर्म गुणवद्भावं न हेतुं न मनीषितम्

na jānate'sya caritaṃ na vidhiṃ naiva vistaram | na karma guṇavadbhāvaṃ na hetuṃ na manīṣitam

हिन्दी अर्थ

प्राय: लोग भगवान्‌ वाराहका चरित्र नहीं जानते हैं। उसकी विधि और विस्तारसे भी अपरिचित हैं। भगवान्‌ वाराहके कर्म, उनकी गुणवत्ता, उनके उस अवतारका हेतु तथा उनके मनोगत विचार क्या हैं? यह भी लोगोंको ज्ञात नहीं है

अध्याय 216

श्लोक 3

किमात्मको वराहोऽसौ का मूर्तिः कास्य देवता ।किमाचारः किं प्रभावः किं वा तेन पुरा कृतम्

kimātmako varāho'sau kā mūrtiḥ kāsya devatā | kimācāraḥ kiṃ prabhāvaḥ kiṃ vā tena purā kṛtam

हिन्दी अर्थ

उस वाराहका स्वरूप क्या है? उसकी मूर्ति कैसी है ? उसके देवता कौन हैं ? उसका आचार और प्रभाव क्‍या है ? अथवा उसने पूर्वकालमें कौन-सा कार्य किया था?

अध्याय 216

श्लोक 4

एतन्मे संशयत्वेन वाराहं श्रुतिविस्तरम् ।यज्ञार्थं च समेतानां द्विजातीनां महात्मनाम्

etanme saṃśayatvena vārāhaṃ śrutivistaram | yajñārthaṃ ca sametānāṃ dvijātīnāṃ mahātmanām

हिन्दी अर्थ

यह मेरा संशयरूपसे प्रश्न है। यज्ञके लिये एकत्र हुए इन महात्मा ब्राह्मणोंके लिये भी वाराह- अवतारसम्बन्धी कथाका श्रवण विस्तारपूर्वक अपेक्षित है। (अत: आप इसका वर्णन करें)

अध्याय 216

श्लोक 5

एतत् ते कथयिष्यामि पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।नानाश्रुतिसमायुक्तं कृष्णद्वैपायनेरितम् ।महावराहचरितं कृष्णस्याद्भुतकर्मणः

etat te kathayiṣyāmi purāṇaṃ brahmasammitam | nānāśrutisamāyuktaṃ kṛṣṇadvaipāyaneritam | mahāvarāhacaritaṃ kṛṣṇasyādbhutakarmaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजीने कहा—राजन्‌! अद्धुतकर्मा भगवान्‌ _ विष्णुका यह महावराह-चरित पुराणकथित एवं वेदके तुल्य आदरणीय है, नाना श्रुतियोंसे युक्त (अनुमोदित) तथा साक्षात्‌ श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीके द्वारा प्रतिपादित है। मैं इसका तुम्हारे समक्ष वर्णन आरम्भ करता हूँ

अध्याय 216

श्लोक 6

यथा नारायणो राजन् वाराहं वपुरास्थितः ।दंष्ट्र्या गां समुद्रस्थामुज्जहारारिसूदनः

yathā nārāyaṇo rājan vārāhaṃ vapurāsthitaḥ | daṃṣṭryā gāṃ samudrasthāmujjahārārisūdanaḥ

श्लोक 6–7 का हिन्दी अर्थ

राजा जनमेजय ! शत्रूसूदन भगवान्‌ नारायणने वराहरूप धारणकर उदार वैदिक श्रुतियोंसे अलंकृत, पवित्र एवं प्रयलशील हो जिस प्रकार एकार्णवके जलमें डूबी हुई पृथ्वीका अपनी एक दाढ़के द्वारा उद्धार किया, वह सब चरित्र सुनो

अध्याय 216

श्लोक 7

छान्दसीभिरुदाराभिः श्रुतिभिः समलङ्कृतः ।शुचिः प्रयत्नवान् भूत्वा निबोध जनमेजय

chāndasībhirudārābhiḥ śrutibhiḥ samalaṅkṛtaḥ | śuciḥ prayatnavān bhūtvā nibodha janamejaya

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 216

श्लोक 8

इदं पुराणं परमं पुण्यं वेदैश्च सम्मितम् ।नानाश्रुतिसमायुक्तं नास्तिकाय न कीर्तयेत्

idaṃ purāṇaṃ paramaṃ puṇyaṃ vedaiśca sammitam | nānāśrutisamāyuktaṃ nāstikāya na kīrtayet

हिन्दी अर्थ

इस परम पवित्र, पुरातन वेदोंके तुल्य प्रामाणिक तथा नाना श्रुतियोंसे अनुमोदित चरित्रका वर्णन किसी नास्तिकके सामने नहीं करना चाहिये

अध्याय 216

श्लोक 9

पुराणमेतदखिलं साङ्ख्यं योगं तथैव च ।कार्त्स्न्येन विधिना प्रोक्तं योऽस्यार्थं ज्ञास्यते पुमान्

purāṇametadakhilaṃ sāṅkhyaṃ yogaṃ tathaiva ca | kārtsnyena vidhinā proktaṃ yo'syārthaṃ jñāsyate pumān

हिन्दी अर्थ

यह सारा पुराण सांख्य-योगमय है। जो विद्वान्‌ पुरुष इसके अर्थको ठीक-ठीक समझेगा, उसके लिये इसमें पूर्णतया विधिपूर्वक सांख्य-योगका वर्णन है

अध्याय 216

श्लोक 10

विश्वेदेवास्तथा साध्या रुद्रादित्यास्तथाश्विनौ ।प्रजानां पतयश्चैव सप्त चैव महर्षयः

viśvedevāstathā sādhyā rudrādityāstathāśvinau | prajānāṃ patayaścaiva sapta caiva maharṣayaḥ

श्लोक 10–13 का हिन्दी अर्थ

विश्वेदेव, साध्य, रुद्र, आदित्य, अश्विनीकुमार, प्रजापति, सात महर्षि, ब्रह्माजीके मन:संकल्पसे उत्पन्न हुए पूर्वज महर्षि, वसु, अप्सरा, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, दैत्य, पिशाच, नाग, नाना प्रकारके भूत, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, भूतलवासी म्लेच्छ आदि, समस्त चौपाये, तिर्यगू योनिके जीव, जज़ममात्र जीव तथा दूसरे भी जीव नामधारी भूत—ये सभी भगवान्‌ वराह (विष्णु)-के स्वरूप हैं

अध्याय 216

श्लोक 11

मनःसङ्कल्पजाश्चैव पूर्वजाश्च महर्षयः ।वसवोऽप्सरसश्चैव गन्धर्वा यक्षराक्षसाः

manaḥsaṅkalpajāścaiva pūrvajāśca maharṣayaḥ | vasavo'psarasaścaiva gandharvā yakṣarākṣasāḥ

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 216

श्लोक 12

दैत्याः पिशाचा नागाश्च भूतानि विविधानि च ।ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा म्लेच्छादयो भुवि

daityāḥ piśācā nāgāśca bhūtāni vividhāni ca | brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ śūdrā mlecchādayo bhuvi

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 216

श्लोक 13

चतुष्पदानि सर्वाणि तिर्यग्योनिगतानि च ।जङ्गमानि च सत्त्वानि यच्चान्यज्जीवसंज्ञितम्

catuṣpadāni sarvāṇi tiryagyonigatāni ca | jaṅgamāni ca sattvāni yaccānyajjīvasaṃjñitam

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 216

श्लोक 14

पूर्णे युगसहस्रान्ते ब्राह्मेऽहनि तथागते ।निर्वाणे सर्वभूतानां सर्वोत्पातसमुद्भवे

pūrṇe yugasahasrānte brāhme'hani tathāgate | nirvāṇe sarvabhūtānāṃ sarvotpātasamudbhave

श्लोक 14–15 का हिन्दी अर्थ

एक सहस्र चतुर्युग पूर्ण होनेपर अन्तमें जब ब्रह्माजीका दिन समाप्त हो जाता है और सब प्रकारके उत्पातोंसे सभी प्राणियोंका संहार होने लगता है, उस समय अग्रि, वायु और सूर्यरूप तीन शिखावाले प्रलयंकर अग्रिदेव प्रकट होते हैं, जो ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप हैं। वे अपनी शिखाओंद्वारा विविध लोकों तथा समस्त देहधारियोंका शोषण कर लेते हैं

अध्याय 216

श्लोक 15

हिरण्यरेतास्त्रिशिखस्ततो भूत्वा वृषाकपिः ।शिखाभिर्विविधाँल्लोकान् संशोषयति देहिनः

hiraṇyaretāstriśikhastato bhūtvā vṛṣākapiḥ | śikhābhirvividhā~llokān saṃśoṣayati dehinaḥ

अर्थ श्लोक 14 के साथ

अध्याय 216

श्लोक 16

दह्यमानास्ततस्तस्य तेजोराशिभिरग्रतः ।विवर्णवर्णा दग्धाङ्गा हतार्चिष्मद्भिराननैः

dahyamānāstatastasya tejorāśibhiragrataḥ | vivarṇavarṇā dagdhāṅgā hatārciṣmadbhirānanaiḥ

श्लोक 16–19 का हिन्दी अर्थ

उस अग्रिके ज्वालामय मुखों तथा तेजकी राशियोंसे अज्भ दग्ध होनेके कारण श्रीहीन हुए छहों अज्ञलोंसहित वेद, उपनिषद्‌ और इतिहास आदि, जो सभी विद्याओंके आश्रय तथा सत्यधर्मपरायण हैं, ब्रह्माजीको आगे करके ईश्वरकी इच्छासे सब ओर मुखवाले परमात्मामें प्रविष्ठ हो गये। वह दिन आनेपर तैंतीस कोटि संख्यावाले समस्त देवता भी महान, अविनाशी, हंसस्वरूप, महायोगी, प्रभु श्रीनारायण हरिमें प्रवेश कर जाते हैं

अध्याय 216

श्लोक 17

साङ्गोपनिषदा वेदा इतिहासपुरोगमाः ।सर्वविद्याश्रयाश्चैव सत्यधर्मपरायणाः

sāṅgopaniṣadā vedā itihāsapurogamāḥ | sarvavidyāśrayāścaiva satyadharmaparāyaṇāḥ

अर्थ श्लोक 16 के साथ

अध्याय 216

श्लोक 18

ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा छन्दतो विश्वतोमुखम् ।सर्वे देवगणाश्चैव त्रयस्त्रिंशच्च कोटयः

brahmāṇamagrataḥ kṛtvā chandato viśvatomukham | sarve devagaṇāścaiva trayastriṃśacca koṭayaḥ

अर्थ श्लोक 16 के साथ

अध्याय 216

श्लोक 19

तस्मिन्नहनि सम्प्राप्ते तं हंसं महदक्षरम् ।प्रविशन्ति महायोगं हरिं नारायणं प्रभुम्

tasminnahani samprāpte taṃ haṃsaṃ mahadakṣaram | praviśanti mahāyogaṃ hariṃ nārāyaṇaṃ prabhum

अर्थ श्लोक 16 के साथ

अध्याय 216

श्लोक 20

तेषां भूयः प्रविष्टानां निधनोत्पत्तिरुच्यते ।यथा सूर्यस्य सततमुदयास्तमयाविह

teṣāṃ bhūyaḥ praviṣṭānāṃ nidhanotpattirucyate | yathā sūryasya satatamudayāstamayāviha

हिन्दी अर्थ

जैसे इस जगतमें सदा ही सूर्यदेवके उदय और अस्त बने रहते हैं अर्थात्‌ एक देशमें विद्यमान सूर्य जब दूसरे देशमें नहीं दिखायी देता, तब उस देशके लोग उसे अस्त हुआ कहते हैं और जब वह दिखायी देने लगता है, तब उसका उदय हुआ मानते हैं, उसी प्रकार भगवान्‌ नारायणमें बार्म्बार प्रविष्ठ होनेवाले जीवोंके संहार और प्रलय सदा ही होते रहते हैं । तात्पर्य यह कि ब्रह्माजीके दिनके अन्तमें जब सारा जगत्‌ नारायणमें प्रविष्ट हो जाता है, तब उसका प्रलय हुआ कहा जाता है; क्योंकि प्रलयावस्थामें मार्कण्डेयजीको नारायणके उदरमें पूर्ववत्‌ जगत्‌का दर्शन हुआ था

अध्याय 216

श्लोक 21

पूर्णे युगसहस्रान्ते कल्पो निःशेष उच्यते ।तस्मिञ्जीवकृतं सर्वं निःशेषमवतिष्ठते

pūrṇe yugasahasrānte kalpo niḥśeṣa ucyate | tasmiñjīvakṛtaṃ sarvaṃ niḥśeṣamavatiṣṭhate

हिन्दी अर्थ

सहस्र चतुर्युग पूर्ण हो जानेपर एक कल्पका संहार हो जाता है। फिर उसमेंसे कुछ भी शेष नहीं रह जाता। उस अवस्थामें जीवका किया हुआ सब कुछ नष्ट हो जाता है

अध्याय 216

श्लोक 22

संहृत्य लोकान् सर्वान् स सदेवासुरपन्नगान् ।कृत्वाऽऽत्मगर्भे भगवानास्त एको जगद्गुरुः

saṃhṛtya lokān sarvān sa sadevāsurapannagān | kṛtvā''tmagarbhe bhagavānāsta eko jagadguruḥ

हिन्दी अर्थ

देवता, असुर और नागोंसहित सम्पूर्ण लोकोंका संहार करके उन्हें अपने उदरमें स्थापित कर एकमात्र जगदुरु भगवान्‌ श्रीहरि ही शेष रह जाते हैं

अध्याय 216

श्लोक 23

यः स्रष्टा सर्वभूतानां कल्पान्तेषु पुनः पुनः ।अव्यक्तः शाश्वतो देवस्तस्य सर्वमिदं जगत्

yaḥ sraṣṭā sarvabhūtānāṃ kalpānteṣu punaḥ punaḥ | avyaktaḥ śāśvato devastasya sarvamidaṃ jagat

हिन्दी अर्थ

जो कल्पान्तमें बारम्बार पमस्त प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले अव्यक्त सनातनदेव श्रीहरि हैं, उन्हींका यह सम्पूर्ण जगत्‌ है

अध्याय 216

श्लोक 24

नष्टार्ककिरणे लोके चन्द्ररश्मिविवर्जिते ।त्यक्तभूताग्निपवने क्षीणयज्ञवषट्क्रिये

naṣṭārkakiraṇe loke candraraśmivivarjite | tyaktabhūtāgnipavane kṣīṇayajñavaṣaṭkriye

श्लोक 24–27 का हिन्दी अर्थ

शो जब जगत्‌से सूर्यकी किरणोंका लोप हो गया है चन्द्रमाकी रशिमियाँ भी नहीं रह गयीं, अग्नि और पवन भी परित्यक्त हो गये, यज्ञ और वषट्कारकी क्रियाएँ सर्वथा क्षीण हो गयीं, पक्षियोंका समूह नहीं रह गया, मार्गोपर समस्त प्राणियोंका चलना-फिरना बंद हो गया, जब यह जगत्‌ मर्यादारहित, भयंकर और सब ओरसे अन्धकारसे आच्छन्न हो गया, जब इसमें सभी लोक अदृश्य हो गये, सब कर्मोका अभाव हो गया, सब ओरसे शान्ति छा गयी, सबका अन्त हो गया, वैर-विरोध नष्ट हो गये, सब लोग अपनी स्वाभाविक स्थितिको पहुँच गये और सारा विश्व नारायणस्वरूप हो गया, उस समय परमेष्ठी भगवान्‌ हषीकेश शयनकी तैयारी करने लगे

अध्याय 216

श्लोक 25

अपक्षिगणसङ्घाते सर्वप्राण्यचरे पथि ।अमर्यादाकुले रौद्रे सर्वतस्तमसावृते

apakṣigaṇasaṅghāte sarvaprāṇyacare pathi | amaryādākule raudre sarvatastamasāvṛte

अर्थ श्लोक 24 के साथ

अध्याय 216

श्लोक 26

अदृश्ये सर्वलोकेऽस्मिन्नभावे सर्वकर्मणाम् ।प्रशान्ते सर्वसम्पाते नष्टे वैरपरिग्रहे

adṛśye sarvaloke'sminnabhāve sarvakarmaṇām | praśānte sarvasampāte naṣṭe vairaparigrahe

अर्थ श्लोक 24 के साथ

अध्याय 216

श्लोक 27

गते स्वभावसंस्थानं लोके नारायणात्मके ।परमेष्ठी हृषीकेशः शयनायोपचक्रमे

gate svabhāvasaṃsthānaṃ loke nārāyaṇātmake | parameṣṭhī hṛṣīkeśaḥ śayanāyopacakrame

अर्थ श्लोक 24 के साथ

अध्याय 216

श्लोक 28

पीतवासा लोहिताक्षः कृष्णो जीमूतसन्निभः ।शिखासहस्रविकचं जटाभारं समुद्वहन्

pītavāsā lohitākṣaḥ kṛṣṇo jīmūtasannibhaḥ | śikhāsahasravikacaṃ jaṭābhāraṃ samudvahan

हिन्दी अर्थ

उनके श्रीअज्लोंपर पीताम्बर शोभा पा रहा था। नेत्र कुछ-कुछ लाल थे। अद्भकान्ति मेघके समान श्याम थी। सिरपर सहस्रों शिखाओंसे विकसित जटाका भार वे वहन करते थे

अध्याय 216

श्लोक 29

श्रीवत्सकलिलं पुण्यं रक्तचन्दनभूषितम् ।वक्षो बिभ्रन्महाबाहुः सविद्युदिव तोयदः

śrīvatsakalilaṃ puṇyaṃ raktacandanabhūṣitam | vakṣo bibhranmahābāhuḥ savidyudiva toyadaḥ

हिन्दी अर्थ

उनका रक्त-चन्दनसे विभूषित पवित्र वक्ष:स्थल श्रीवत्सकी शोभासे संयुक्त था । उसे धारण किये महाबाहु श्रीहरि बिजलीसहित मेघके समान सुशोभित होते थे

अध्याय 216

श्लोक 30

पुण्डरीकसहस्रस्य मालास्य शुशुभे तदा ।पत्नी चैव स्वयं लक्ष्मीर्देहमावृत्य तिष्ठति

puṇḍarīkasahasrasya mālāsya śuśubhe tadā | patnī caiva svayaṃ lakṣmīrdehamāvṛtya tiṣṭhati

हिन्दी अर्थ

उस समय उनके गलेमें सहस्र कमलोंकी माला शोभा पा रही थी। उनकी पत्नी साक्षात्‌ लक्ष्मी उनके सम्पूर्ण शरीरको घेरकर खड़ी थीं

अध्याय 216

श्लोक 31

ततः स्वपिति धर्मात्मा सर्वलोकपितामहः ।किमप्यमितविक्रान्तो निद्रायोगमुपागतः

tataḥ svapiti dharmātmā sarvalokapitāmahaḥ | kimapyamitavikrānto nidrāyogamupāgataḥ

हिन्दी अर्थ

समस्त लोकों के पितामह तथा अमितपराक्रमी वे धर्मात्मा नारायण निद्रायोगका आश्रय ले किसी अनिर्वचनीय ढंगसे सो गये

अध्याय 216

श्लोक 32

ततो वर्षसहस्रे तु पूर्णे स पुरुषोत्तमः ।स्वयमेव विभुर्भूत्वा बुध्यते विबुधाधिपः

tato varṣasahasre tu pūrṇe sa puruṣottamaḥ | svayameva vibhurbhūtvā budhyate vibudhādhipaḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर सहसत्रों वर्ष पूर्ण होनेपर वे सर्वव्यापी देवेश्वर पुरुषोत्तम स्वयं ही जाग्रतू हुए (प्रत्येक कल्पके अन्तमें वे इसी तरह सोते और जागते हैं)

अध्याय 216

श्लोक 33

ततश्चिन्तयते भूयः सृष्टिं लोकस्य लोककृत् ।पितृदेवासुरनरान् पारमेष्ठ्येन कर्मणा

tataścintayate bhūyaḥ sṛṣṭiṃ lokasya lokakṛt | pitṛdevāsuranarān pārameṣṭhyena karmaṇā

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ वे लोककर्ता भगवान्‌ विष्णु पुन: लोकसृष्टिके विषयमें विचार करते हैं । ब्रहमोचित कर्मद्वारा पितरों, देवताओं, असुरों और मनुष्योंकी उत्पत्तिके विषयमें सोचते हैं

अध्याय 216

श्लोक 34

ततश्चिन्तयते कार्यं देवेषु समितिञ्जयः ।सम्भवं सर्वलोकस्य विदधाति स वाक्पतिः

tataścintayate kāryaṃ deveṣu samitiñjayaḥ | sambhavaṃ sarvalokasya vidadhāti sa vākpatiḥ

हिन्दी अर्थ

इसके बाद वे युद्धविजयी तथा वाणीके अधिपति भगवान्‌ नारायण देवताओंके प्रयोजनका विचार करते हैं और सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि करने लगते हैं

अध्याय 216

श्लोक 35

कर्ता चैव विकर्ता च संहर्ता च प्रजापतिः ।धाता विधाता च तथा संयमो नियमो यमः

kartā caiva vikartā ca saṃhartā ca prajāpatiḥ | dhātā vidhātā ca tathā saṃyamo niyamo yamaḥ

हिन्दी अर्थ

वे ही भूतोंके ख्रष्ट तथा भौतिक वस्तुओंको विविध रूपोंमें उत्पन्न करनेवाले हैं। वे ही संहार करनेवाले और प्रजाके पालक हैं । धाता, विधाता, संयम, नियम और यम वे ही हैं

अध्याय 216

श्लोक 36

नारायणपरा देवा नारायणपराः क्रियाः ।नारायणपरो यज्ञो नारायणपरा श्रुतिः

nārāyaṇaparā devā nārāyaṇaparāḥ kriyāḥ | nārāyaṇaparo yajño nārāyaṇaparā śrutiḥ

हिन्दी अर्थ

सब देवता नारायणके ही उपासक हैं । सम्पूर्ण क्रियाएँ नारायणको ही प्राप्त होती हैं। यज्ञके परम आश्रय नारायण ही हैं तथा श्रुतियोंके परम प्रतिपाद्य तत्त्व भी वे ही हैं

अध्याय 216

श्लोक 37

नारायणपरो मोक्षो नारायणपरा गतिः ।नारायणपरो धर्मो नारायणपरः क्रतुः

nārāyaṇaparo mokṣo nārāyaṇaparā gatiḥ | nārāyaṇaparo dharmo nārāyaṇaparaḥ kratuḥ

हिन्दी अर्थ

मोक्षकी पराकाष्ठा नारायण ही हैं । सर्वोत्तम गति श्रीनारायण ही हैं । धर्मके परम लक्ष्य नारायण ही हैं और यज्ञ भी नारायणकी ही प्रसन्नताके लिये किया जाता है

अध्याय 216

श्लोक 38

नारायणपरं ज्ञानं नारायणपरं तपः ।नारायणपरं सत्यं नारायणपरं पदम् ।नागयणपरो देवो न भूतो न भविष्यति

nārāyaṇaparaṃ jñānaṃ nārāyaṇaparaṃ tapaḥ | nārāyaṇaparaṃ satyaṃ nārāyaṇaparaṃ padam | nāgayaṇaparo devo na bhūto na bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

ज्ञानके उत्कृष्ट रूप नारायण ही हैं, तपस्याद्वारा परम भाप्य वस्तु नारायण ही हैं, सत्य भी नारायणकी ही प्ाप्तिका साधन है तथा परमपद भी नारायण ही हैं । गरायणसे बढ़कर न तो कोई दूसरा देवता हुआ है न होगा

अध्याय 216

श्लोक 39

स्वयम्भूरिति विज्ञेयः स ब्रह्मा भुवनाधिपः ।स वायुरिति विज्ञेय एष यज्ञः सनातनः

svayambhūriti vijñeyaḥ sa brahmā bhuvanādhipaḥ | sa vāyuriti vijñeya eṣa yajñaḥ sanātanaḥ

हिन्दी अर्थ

उन्हींको सम्पूर्ण भुवनोंके अधिपति स्वयम्भू ्रह्मा समझना चाहिये। वे ही वायुके नामसे भी जाननेयोग्य हैं तथा ये ही सनातन यज्ञ हैं

अध्याय 216

श्लोक 41

सदसच्च स विज्ञेयः स यज्ञः स प्रजाकरः ।यद् वेदितव्यं त्रिदशैस्तदेष परिविन्दति ॥ ३.३३.४०॥।यच्च वेद्यं भगवतो देवा अपि न तद् विदुः ।प्रजानां पतयः सप्त ऋषयश्च सहामरैः

sadasacca sa vijñeyaḥ sa yajñaḥ sa prajākaraḥ | yad veditavyaṃ tridaśaistadeṣa parivindati || 3.33.40||| yacca vedyaṃ bhagavato devā api na tad viduḥ | prajānāṃ patayaḥ sapta ṛṣayaśca sahāmaraiḥ

श्लोक 41–43 का हिन्दी अर्थ

भगवान्‌का जो ेद्य तत्त्व है, उसे देवता भी नहीं जानते । देवताओंसहित अजापति और ससर्षि भी उनका अन्त नहीं जानते, सलिये ' अनन्त' नामसे उनकी प्रसिद्ध है। इनका जो परम उत्कृष्ट रूप है, उसका देवलोकमें देवता दर्शन करते हैं । अवतारोंमें उनका जो स्वरूप प्रकट होता है, इसकी भी देवता पूजा करते हैं। जिसे भगवान्‌ने स्वयं हीं दिखा दिया, उसका अन्वेषण कौन कर सकता हे

अध्याय 216

श्लोक 42

नास्यान्तमधिगच्छन्ति ततोऽनन्त इति श्रुतिः ।यदस्य परमं रूपं तत्र पश्यन्ति देवताः

nāsyāntamadhigacchanti tato'nanta iti śrutiḥ | yadasya paramaṃ rūpaṃ tatra paśyanti devatāḥ

अर्थ श्लोक 41 के साथ

अध्याय 216

श्लोक 43

प्रादुर्भावेषु सम्भूतं यत् तदर्चन्ति देवताः ।यन्न दर्शितवान् देवः कस्तदन्वेष्टुमर्हति

prādurbhāveṣu sambhūtaṃ yat tadarcanti devatāḥ | yanna darśitavān devaḥ kastadanveṣṭumarhati

अर्थ श्लोक 41 के साथ

अध्याय 216

श्लोक 44

ग्रामणीः सर्वभूतानामग्निमारुतयोर्गतिः ।तेजसस्तपसश्चैव निधानममृतस्य च

grāmaṇīḥ sarvabhūtānāmagnimārutayorgatiḥ | tejasastapasaścaiva nidhānamamṛtasya ca

हिन्दी अर्थ

वे समस्त प्राणियोंके नेता, जठरानल और प्राणकी गति तथा तप, तेज और अमृतकी निधि

अध्याय 216

श्लोक 45

चतुराश्रमवर्णेषु चातुर्होत्रफलाशनः ।चतुःसागरपर्यन्तश्चतुर्युगविवर्तकः

caturāśramavarṇeṣu cāturhotraphalāśanaḥ | catuḥsāgaraparyantaścaturyugavivartakaḥ

हिन्दी अर्थ

चारों आश्रमों और वर्णोंमें चातुर्होत्र यज्ञका फल भोगनेवाले तथा उस फलकाी प्राप्ति करानेवाले वे री हैं। वे चारों समुद्रोंतक व्याप्त हैं तथा चारों युगोंकी भावृत्ति करनेवाले हैं

अध्याय 216

श्लोक 46

तदेष संहृत्य जगत् कृत्वा गर्भस्थमात्मनः ।मुमोचाण्डं महायोगी धृतं वर्षसहस्रिकम्

tadeṣa saṃhṛtya jagat kṛtvā garbhasthamātmanaḥ | mumocāṇḍaṃ mahāyogī dhṛtaṃ varṣasahasrikam

हिन्दी अर्थ

इन महायोगी श्रीहरिने पम्पूर्ण जगत्‌का संहार करके उसे अपने गर्भमें स्थापित कर सहस्रों वर्षोतंक धारण करनेके पश्चात्‌ अण्ड ब्रह्माण्ड)-के रूपमें प्रकट किया

अध्याय 216

श्लोक 47

सुरासुरद्विजभुजगाप्सरोगणैर्महौषधिक्षितिधरयक्षगुह्यकैः ।प्रजापतिः श्रुतिधर रक्षसां कुलं तदासृजज्जगदिदमात्मना प्रभुः

surāsuradvijabhujagāpsarogaṇairmahauṣadhikṣitidharayakṣaguhyakaiḥ | prajāpatiḥ śrutidhara rakṣasāṃ kulaṃ tadāsṛjajjagadidamātmanā prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

वेदोंका धारण और पालन करनेवाले जनमेजय ! उस समय इन गगवान्‌ प्रजापतिने देवता, असुर, द्विज, नाग, अप्सरागण, पहौषधि, पर्वत, यक्ष और गुह्मकोंसहित राक्षसकुलकी भी अपने ही स्वरूपसे सृष्टि की ॥ '

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.