Harivamsha Purana
215
अध्याय 215 / 318

Parva 3, Adhyāya 32

64 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ64 श्लोक

अध्याय 215

श्लोक 1

दक्षयज्ञविध्वंसः ततो महति वृत्तान्ते स्थिते राज्ये महोदये ।देवतानां मनुष्याणां सहवासोऽभवत् तदा

dakṣayajñavidhvaṃsaḥ tato mahati vṛttānte sthite rājye mahodaye | devatānāṃ manuṣyāṇāṃ sahavāso'bhavat tadā

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर पूर्वेक्त महान्‌ वृत्तान्त घटित होनेपर जब परम अभ्युदयकारी राज्यकी प्रतिष्ठा हो गयी, तब देवता और मनुष्य परस्पर साथ-साथ रहने लगे

अध्याय 215

श्लोक 2

एकतः समधीयन्ति सहिताः प्ररुदन्ति च ।स्वयं च भागं गृह्णन्ति यज्ञकर्मणि भारत

ekataḥ samadhīyanti sahitāḥ prarudanti ca | svayaṃ ca bhāgaṃ gṛhṇanti yajñakarmaṇi bhārata

हिन्दी अर्थ

भारत! वे देवता और मनुष्य 'एक साथ स्वाध्याय करते, परस्पर प्रेमवश एक साथ रोते और यज्ञकर्ममें मनुष्योंद्वारा दिये गये भागको देवता स्वयं आकर ग्रहण करते थे

अध्याय 215

श्लोक 3

प्राचेतसं ततो दक्षं दीक्षित्वा वै बृहस्पतिः ।वाजिमेधाय भगवानृषिभिः परिवारितः

prācetasaṃ tato dakṣaṃ dīkṣitvā vai bṛhaspatiḥ | vājimedhāya bhagavānṛṣibhiḥ parivāritaḥ

हिन्दी अर्थ

उन्हीं दिनों प्राचेतस दक्षको अध्वयमेध यज्ञकी दीक्षा देकर भगवान्‌ बृहस्पति ऋषियोंसे घिरे हुए वहाँ बैठे

अध्याय 215

श्लोक 4

तस्मिन् मातामहे यज्ञे दक्षस्य विदितात्मनः ।शामित्रमकरोद् रुद्रो भागार्थे सह नन्दिना

tasmin mātāmahe yajñe dakṣasya viditātmanaḥ | śāmitramakarod rudro bhāgārthe saha nandinā

हिन्दी अर्थ

आत्मज्ञान शून्य मातामह दक्षके उस यज्ञमें नन्दीसहित भगवान्‌ रुद्रने अपने भागके लिये शामित्र कर्म किया

अध्याय 215

श्लोक 5

रुद्रस्यैव हि तद् रूपं द्विधाभूतं तदीप्सया ।जातः परमधर्मात्मा नन्दी पुरुषविग्रहः

rudrasyaiva hi tad rūpaṃ dvidhābhūtaṃ tadīpsayā | jātaḥ paramadharmātmā nandī puruṣavigrahaḥ

हिन्दी अर्थ

नन्दी भगवान्‌ रुद्रके ही दूसरे रूप हैं, जो उन्हींकी इच्छासे परम धर्मात्मा पुरुष-शरीरसे प्रकट हुए हैं

अध्याय 215

श्लोक 6

तेन योगेन राजेन्द्र यत्तद् ब्रह्म सनातनम् ।विहितं सत्यवचनैस्तेनैव परमात्मना

tena yogena rājendra yattad brahma sanātanam | vihitaṃ satyavacanaistenaiva paramātmanā

हिन्दी अर्थ

शजेन्द्र ! पूर्वोक्त योगके प्रभावसे वह जो प्रसिद्ध सनातन ब्रह्म है, उसीको उन परमात्मा रुद्रने ही वेदवाक्योंद्वारा उस रूपमें प्रकाशित किया था

अध्याय 215

श्लोक 7

सरूपैश्चाप्यरूपैश्च विरूपाक्षैर्घटोदरैः ।ऊर्ध्वनेत्रैर्महाकायैर्विकटैर्वामनैस्तथा

sarūpaiścāpyarūpaiśca virūpākṣairghaṭodaraiḥ | ūrdhvanetrairmahākāyairvikaṭairvāmanaistathā

श्लोक 7–10 का हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ रुद्रके गणोंमेंसे कुछ रूपवान्‌ थे, कुछ रूपहीन। कितनोंके नेत्र विकराल रूपवाले थे। कितने ही घटोदर (घड़े-जैसे पेटवाले) थे। कितने ही गणोंके नेत्र ऊपर (सिरपर) थे। कोई विशालकाय थे तो कोई वामन। बहुतेरे बड़े विकट दिखायी देते थे। कितनोंके सिरपर बड़ी-बड़ी चोटियाँ थीं और बहुत-से जटाएँ रखाये हुए थे। किन्हींके तीन आँखें थीं तो किन्हींके खूँटे-जैसे कान थे। कोई चीर (फटे-पुराने वस्त्र) पहने हुए थे तो कोई चमड़े लपेटे रहते थे। कितनोंके हाथोंमें कूट, मुद्रर शोभा पाते थे। क्रोई घण्टा धारण करते थे तो कोई मूँजकी मेखला पहने हुए थे। कितनोंके हाथोंमें कड़े और कानोंमें सोनेके कुण्डल शोभा पाते थे। कोई डिण्डिम (डंका) पीटते थे तो कोई भेरी (ढाक); कोई मृदज्ध बजाते थे तो कोई त्रेणु। ऐसे गणोंसे घिरे हुए महादेवजीने दक्षके उस पज्ञका विध्वंस किया था

अध्याय 215

श्लोक 8

शिखिभिर्जटिभिश्चैव त्र्यक्षैश्च शङ्कुकर्णिभिः ।चीरिभिश्चर्मिभिश्चैव कूटमुद्गरपाणिभिः

śikhibhirjaṭibhiścaiva tryakṣaiśca śaṅkukarṇibhiḥ | cīribhiścarmibhiścaiva kūṭamudgarapāṇibhiḥ

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 215

श्लोक 9

सघण्टाधारिभिश्चैव मुञ्जमेखलधारिभिः ।सहस्तकटकैश्चैव स्वर्णकुण्डलधारिभिः

saghaṇṭādhāribhiścaiva muñjamekhaladhāribhiḥ | sahastakaṭakaiścaiva svarṇakuṇḍaladhāribhiḥ

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 215

श्लोक 10

सडिण्डिमैः सभेरीयैः समृदङ्गैः सवेणुभिः ।एतैः परिवृतो देवो मखं तं समुपारुजत्

saḍiṇḍimaiḥ sabherīyaiḥ samṛdaṅgaiḥ saveṇubhiḥ | etaiḥ parivṛto devo makhaṃ taṃ samupārujat

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 215

श्लोक 11

सशङ्खमुरजैश्चापि सतालफलपाणिभिः ।उप्रायुधधरो देवः सपिनाक इवान्तकः

saśaṅkhamurajaiścāpi satālaphalapāṇibhiḥ | uprāyudhadharo devaḥ sapināka ivāntakaḥ

हिन्दी अर्थ

कितने ही गण शड्ख़ और मुरज बजाते थे। कितनोंके हाथोंमें ताड़के फल थे। उस समय भयंकर आयुध एवं पिनाक धारण करनेवाले महादेवजी यमराजके समान जान पड़ते थरे

अध्याय 215

श्लोक 12

विरराजार्चिभिर्दीप्तैर्मखे मखवतां वरः ।कालाग्निरिव दीप्तार्चिर्जगद्दग्धुमिवोद्यतः

virarājārcibhirdīptairmakhe makhavatāṃ varaḥ | kālāgniriva dīptārcirjagaddagdhumivodyataḥ

हिन्दी अर्थ

आगकी लपटोंसे उद्दीद हुए उस यज्ञमण्डपमें पज्ञवानों में श्रेष्ठ भगवान्‌ रुद्र सारे जगतूको जला डालनेके लिये उद्यत हुई प्रज्वलित शिखावाली प्रलयाग्िके समान शोभा पाते थे

अध्याय 215

श्लोक 13

नन्दी पिनाकपाणिश्च जघ्नतुर्मखमुत्तमम् ।युगान्त इव कालाग्निः क्षिप्रं दग्धुमिवोद्यतः

nandī pinākapāṇiśca jaghnaturmakhamuttamam | yugānta iva kālāgniḥ kṣipraṃ dagdhumivodyataḥ

हिन्दी अर्थ

नन्दी और पिनाकधारी महादेवजी दोनों ही उस उत्तम यज्ञका नाश कर रहे थे। भगवान्‌ द्र प्रलयकालमें समस्त संसारको भस्म करनेके लिये उद्यत हुए अग्रिदेवके समान जान पड़ते थे

अध्याय 215

श्लोक 14

यूपमुत्क्षिप्य धावन्ति निशाचरगणास्तथा ।त्रासयन् मुनिसङ्घांश्च चीरचर्मनिवासिनः

yūpamutkṣipya dhāvanti niśācaragaṇāstathā | trāsayan munisaṅghāṃśca cīracarmanivāsinaḥ

हिन्दी अर्थ

चीर और चर्म धारण करनेवाले निशाचरगण मुनियोंके समुदायको त्रास देते और यूप उछालते हुए दौड़ रहे थे

अध्याय 215

श्लोक 15

हवींष्यन्ये पिबन्त्येव जिह्वाभिस्ताम्रलोचनाः ।भक्षयन्ति पशूनन्ये रसनान्तावलम्बिभिः

havīṃṣyanye pibantyeva jihvābhistāmralocanāḥ | bhakṣayanti paśūnanye rasanāntāvalambibhiḥ

हिन्दी अर्थ

बे-जैसे नेत्रवाले कितने ही रुद्रगण अपनी जिह्लाओंसे डविष्योंका पान कर रहे थे। कितने वहाँ पशुओंको चबा हे थे और वे पशु उनकी जिह्ाके अग्रभागपर लटक हे थे

अध्याय 215

श्लोक 16

मुमुचुश्चापरे यूपान् पशवः प्रहरन्ति च ।वह्निमध्ये प्रसिञ्चन्ति वारिभिः प्रशमाय च

mumucuścāpare yūpān paśavaḥ praharanti ca | vahnimadhye prasiñcanti vāribhiḥ praśamāya ca

हिन्दी अर्थ

दूसरे रुद्रगण यूपोंको ऊपर फेंकते और शशुओंको पीटते थे। कितने ही यज्ञकुण्डमें पानी डालते पे, जिससे वहाँ प्रज्वलित हुई आग बुझ जाय

अध्याय 215

श्लोक 17

सोममन्ये जहुः केचिन्नेत्रैस्ताम्रजपोपमैः ।दर्भान् केचिद् विलुम्पन्ति हस्तैः पद्मदलप्रभैः

somamanye jahuḥ kecinnetraistāmrajapopamaiḥ | darbhān kecid vilumpanti hastaiḥ padmadalaprabhaiḥ

हिन्दी अर्थ

+ १०४५ कोई ताँबे और जपा-कुसुमके समान लाल नेत्रोंसे देखते हुए सोमरसको नष्ट करने लगे। कोई प्रफुल्ल कमलदलके समान कान्तिवाले हाथोंसे वहाँ बिछे हुए कुशोंको चौपट करने लगे

अध्याय 215

श्लोक 18

बभञ्जिरे च यूपाग्रान् कलशांश्चापि चिक्षिपुः ।चिच्छिदुः काञ्चनान् वृक्षाञ्छोभार्थमुपकल्पितान्

babhañjire ca yūpāgrān kalaśāṃścāpi cikṣipuḥ | cicchiduḥ kāñcanān vṛkṣāñchobhārthamupakalpitān

हिन्दी अर्थ

किन्हींने यूप तोड़ डाले, किन्हींने कलश उठाकर फेंक दिये तथा कुछ गणोंने वहाँ शोभाके लिये बनाये गये सुवर्णमय वृश्षोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले

अध्याय 215

श्लोक 19

बिभिदुश्चैव बाणैस्ते मुमुचुश्च हिरण्मयान् ।लुलुपुश्चैव पात्राणि ममन्थुश्चारणीमपि

bibhiduścaiva bāṇaiste mumucuśca hiraṇmayān | lulupuścaiva pātrāṇi mamanthuścāraṇīmapi

हिन्दी अर्थ

कुछ गणोंने बाणोंद्वारा सुवर्णमय वृक्षोंको विदीर्ण कर दिया तथा उनपर सुनहरे बाण छोड़े। कितनोंने यज्ञपात्र तोड़ डाले और अरणीको भी मथ डाला

अध्याय 215

श्लोक 20

अरुजंश्चैव प्राग्वंशं लुलुपुश्च समाहिताः ।चखादिरे पुरोडाशान् नखाग्रैश्च चकर्तिरे

arujaṃścaiva prāgvaṃśaṃ lulupuśca samāhitāḥ | cakhādire puroḍāśān nakhāgraiśca cakartire

हिन्दी अर्थ

कुछ गणोंने पत्नी-शाला उजाड़ दी और वहाँके सब सामान लूट लिये। यह सब कार्य वे बड़ी सावधानीसे कर रहे थे। उन्होंने पुरोडाश खा लिये और उनके रक्षकोंको अपने नखोंके अग्रभागसे बकोट लिया

अध्याय 215

श्लोक 21

एवं दिवा च रात्रौ च भिद्यमानो महामखः ।चुक्रोश च महानादान् भिद्यमान इवार्णवः

evaṃ divā ca rātrau ca bhidyamāno mahāmakhaḥ | cukrośa ca mahānādān bhidyamāna ivārṇavaḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार जब दिनमें और रातमें भी पीड़ा दी गयी, तब वह महान्‌ यज्ञ मूर्तिमान्‌ होकर मथे जाते हुए समुद्रके समान बड़े जोर-जोरसे आर्तनाद करने लगा

अध्याय 215

श्लोक 22

धनुः सशरमादाय पूर्वदत्तं स्वयम्भुवा ।कृतं कीचकवेणुभ्यां समरे सुमहारथः

dhanuḥ saśaramādāya pūrvadattaṃ svayambhuvā | kṛtaṃ kīcakaveṇubhyāṃ samare sumahārathaḥ

श्लोक 22–23 का हिन्दी अर्थ

तब महारथी महादेवजी दोनों घुटनोंके बलपर खड़े हो गये और साक्षात्‌ ब्रह्माजीने जिसे बाणसहित पहलेसे दे रखा था तथा जो *कीचक और वेणु' नामक बाँसोंसे बनाया गया था, उस धनुषको हाथमें ले उसे झुकाकर उन्होंने उसपर बाण रखा तथा उस महायज्ञको उसका निशाना बनाया

अध्याय 215

श्लोक 23

प्रतिगृह्य महादेवः स शरैः समयोजयत् ।धनुर्विगृह्य जानुभ्यां जघान स महाक्रतुम्

pratigṛhya mahādevaḥ sa śaraiḥ samayojayat | dhanurvigṛhya jānubhyāṃ jaghāna sa mahākratum

अर्थ श्लोक 22 के साथ

अध्याय 215

श्लोक 24

स विद्धस्तेन बाणेन खं समुत्पतितः क्रतुः ।मृगो भूत्वा नर्दमानो ब्रह्माणमुपधावति

sa viddhastena bāṇena khaṃ samutpatitaḥ kratuḥ | mṛgo bhūtvā nardamāno brahmāṇamupadhāvati

हिन्दी अर्थ

उस बाणसे घायल होकर वह यज्ञ आकाशमें उछला और मृग होकर आर्तनाद करता हुआ ब्रह्माजीके पास दौड़ा गया

अध्याय 215

श्लोक 25

शरेणाभिहतस्त्राणं न लेभे प्रशमं भुवि ।शरणार्थी ह्ययं प्राप्तः शरेणान्तर्गतेन च

śareṇābhihatastrāṇaṃ na lebhe praśamaṃ bhuvi | śaraṇārthī hyayaṃ prāptaḥ śareṇāntargatena ca

हिन्दी अर्थ

बाणसे आहत हो जानेके कारण उसे भूतलपर न तो कहीं रक्षाका आश्वासन मिला और न चित्तमें शान्ति ही प्राप्त हुई। अत: वह शरणार्थी होकर शरीरमें धँसे हुए बाणके साथ ही ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित हुआ

अध्याय 215

श्लोक 26

तमुवाच मृगं ब्रह्मा शुभं सानुनयं वचः ।स्वरेणोत्तमवीर्येण गम्भीरेण सुभाषिणा

tamuvāca mṛgaṃ brahmā śubhaṃ sānunayaṃ vacaḥ | svareṇottamavīryeṇa gambhīreṇa subhāṣiṇā

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजीने उस मृगसे उत्तम बलसे युक्त, गम्भीर एवं सुन्दर भाषण करनेवाले स्वरसे यह शुभ एवं अनुनयपूर्ण बात कही—

अध्याय 215

श्लोक 27

एवंरूपो नभसि त्वं भविष्यसि महामृगः ।विजितश्च त्रिपर्वेण शरेणानतपर्वणा

evaṃrūpo nabhasi tvaṃ bhaviṣyasi mahāmṛgaḥ | vijitaśca triparveṇa śareṇānataparvaṇā

हिन्दी अर्थ

महायज्ञ ! तुम झुकी हुई गाँठ और तीन पर्ववाले बाणसे पराजित हो इसी तरह महान्‌ मृगके रूपमें आकाशमें स्थित रहोगे

अध्याय 215

श्लोक 28

तिष्ठन् नक्षत्रशिरसि सह रुद्रेण नित्यशः ।सोमेन सह संयुक्तो ह्यक्षयेणाव्ययेन च

tiṣṭhan nakṣatraśirasi saha rudreṇa nityaśaḥ | somena saha saṃyukto hyakṣayeṇāvyayena ca

हिन्दी अर्थ

तुम नक्षत्रके सिरपर स्थित हो 'मृगशिरा' कहलाओगे और रुद्र (आर्द्रा)-के साथ तुम्हारा सदा सांनिध्य बना रहेगा। तुम अक्षय अव्यय सोमके साथ संयुक्त रहोगे (सोम ही तुम्हारे देवता होंगे)

अध्याय 215

श्लोक 29

दिवि सञ्चारभूतो वै ताराभिः सह सङ्गतः ।ज्योतिर्भूतो ज्योतिषां त्वं ध्रुवश्चैव महाध्रुवः

divi sañcārabhūto vai tārābhiḥ saha saṅgataḥ | jyotirbhūto jyotiṣāṃ tvaṃ dhruvaścaiva mahādhruvaḥ

हिन्दी अर्थ

आकाशमें तुम्हें संचार प्राप्त होगा। तुम ताराओंके साथ मिले रहोगे। तुम ज्योतियोंके बीच ज्योतिर्मय होकर प्रकाशित होओगे तथा ' ध्रुव एवं ' महाधुव' बने रहोगे

अध्याय 215

श्लोक 30

यच्चैतद् रुधिरं दिव्यं क्षतजादभिनिःसृतम् ।नभस्युत्पतितं चैव प्रवेगेन प्रधावतः

yaccaitad rudhiraṃ divyaṃ kṣatajādabhiniḥsṛtam | nabhasyutpatitaṃ caiva pravegena pradhāvataḥ

श्लोक 30–31 का हिन्दी अर्थ

तुम्हारे शरीरमें जो बाणके आघातसे घाव हो गया दे और इससे जो यह दिव्य रुधिर निकला है, तुम्हारे तेगपूर्वक दौड़नेसे आकाशमें भी उछला है और अनेक गोंमें परिणत हो गया है; अत: यह मण्डल नामसे सिद्ध क्षेत्र होगा और वर्षा-ऋतुमें प्राणियोंके लिये नेमित्त (वर्षासूचक लक्षण) बनकर वृष्टि प्रदान करनेवाला होगा

अध्याय 215

श्लोक 31

क्षतजं बहुवर्णं च क्षेत्रं मण्डलसंज्ञितम् ।निमित्तभूतं भूतानां वर्षे वर्षप्रदं तथा

kṣatajaṃ bahuvarṇaṃ ca kṣetraṃ maṇḍalasaṃjñitam | nimittabhūtaṃ bhūtānāṃ varṣe varṣapradaṃ tathā

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 215

श्लोक 32

सुखं दुःखं च भूतानां दर्शने सम्प्रवर्तते ।इन्द्रियश्रवणाच्चैव नभसीन्द्रायुधोऽभवत्

sukhaṃ duḥkhaṃ ca bhūtānāṃ darśane sampravartate | indriyaśravaṇāccaiva nabhasīndrāyudho'bhavat

हिन्दी अर्थ

इसके दर्शनसे प्राणियोंको सुख और दु:ख होता है। यह नेत्रेन्द्रिका विषय सुना गया है। भरत: लोकमें इन्द्रायुध (अथवा इन्द्रधनुष)-के नामसे सिद्ध हुआ

अध्याय 215

श्लोक 33

चक्षुषी मानुषे राजन् विस्मयात् समवैक्षत ।अद्भुतं बहुचित्रं च मनसा सम्प्रकल्पितम्

cakṣuṣī mānuṣe rājan vismayāt samavaikṣata | adbhutaṃ bahucitraṃ ca manasā samprakalpitam

हिन्दी अर्थ

राजनू ! पहले-पहल जब यह प्रकट हुआ, तब मनुष्योंकी आँखोंने बड़े विस्मयसे इसकी ओर रेखा । यह अद्भुत, विचित्र तथा ब्रह्माजीके मनसे कल्पित

अध्याय 215

श्लोक 34

न तु रात्रौ प्रदृश्येत खे सब्रह्मणि संज्ञितम् ।दिनस्यैव सदा त्वग्रे महत्कार्यं प्रदृश्यते

na tu rātrau pradṛśyeta khe sabrahmaṇi saṃjñitam | dinasyaiva sadā tvagre mahatkāryaṃ pradṛśyate

श्लोक 34–35 का हिन्दी अर्थ

यह रातमें नहीं दिखायी देता। आकाशमें नबतक सूर्यकी ज्योति रहती है, तभीतक इसका भान होता है । यह महान्‌ कार्य सदा दिनके आगे ही दृष्टिगोचर ता है। यह भूतलपर ही उठता है और आकाशमें वलीन होता है। उस यज्ञमण्डपमें जो परम उत्साही तथा भाणधारी वीर पुरुष सैकड़ोंकी संख्यामें मौजूद थे, वे मब-के-सब महाधनुर्धर रुद्रके भयसे सब ओर भागने नगे

अध्याय 215

श्लोक 35

भूमावेव समुत्तिष्ठेदाकाशे तु विलीयते ।शतशश्च समं सर्वे प्रधावन्ति प्रचेतसः ।भयाद् रुद्रस्य महतो धन्विनो बाणपाणयः

bhūmāveva samuttiṣṭhedākāśe tu vilīyate | śataśaśca samaṃ sarve pradhāvanti pracetasaḥ | bhayād rudrasya mahato dhanvino bāṇapāṇayaḥ

अर्थ श्लोक 34 के साथ

अध्याय 215

श्लोक 36

नन्दी रुद्रगणैः सार्द्धं पिनाकी समतिष्ठत ।युगान्तकाले ज्वलितो ब्रह्मदण्ड इवोद्यतः

nandī rudragaṇaiḥ sārddhaṃ pinākī samatiṣṭhata | yugāntakāle jvalito brahmadaṇḍa ivodyataḥ

हिन्दी अर्थ

प्रलयकालमें प्रज्वलित ब्रह्मदण्डके प्रमान उद्यत हुए पिनाकधारी नन्दी वहाँ रुद्रगणोंको साथ नेकर विपक्षियोंसे युद्ध करनेके लिये खड़े हो गये

अध्याय 215

श्लोक 37

विष्णुः शृङ्गसमुद्भूतं प्रगृह्य विपुलं धनुः ।प्रातिष्ठत महाबाहुः पाणिना चक्रमादधत्

viṣṇuḥ śṛṅgasamudbhūtaṃ pragṛhya vipulaṃ dhanuḥ | prātiṣṭhata mahābāhuḥ pāṇinā cakramādadhat

हिन्दी अर्थ

धर महाबाहु भगवान्‌ विष्णु श्रूज्धसे निर्मित हुए विशाल गाजधनुष और चक्र हाथमें लेकर युद्धके लिये प्रस्थित डुए

अध्याय 215

श्लोक 38

गदां सघण्टामन्येन खड्गमन्येन पाणिना ।प्रगृह्य सोऽग्रतोऽतिष्ठद् रुद्रायोद्यतपाणये

gadāṃ saghaṇṭāmanyena khaḍgamanyena pāṇinā | pragṛhya so'grato'tiṣṭhad rudrāyodyatapāṇaye

हिन्दी अर्थ

वे एक हाथमें घण्टायुक्त गदा और दूसरे ाथमें नन्दक खड्ग लेकर उठे हुए हाथवाले रुद्रका मना करनेके लिये युद्धके मुहानेपर खड़े थे

अध्याय 215

श्लोक 39

ततः शृङ्गाग्रसम्भूतं प्रगृह्य विपुलं धनुः ।शङ्खं चाप्रतिमं लोके शरांश्चानतपर्वणः

tataḥ śṛṅgāgrasambhūtaṃ pragṛhya vipulaṃ dhanuḥ | śaṅkhaṃ cāpratimaṃ loke śarāṃścānataparvaṇaḥ

श्लोक 39–40 का हिन्दी अर्थ

उस समय विशाल शा धनुष, जगत्‌की अनुपम वस्तु ाज्जजन्य शड्ख और झुकी हुई गाँठवाले बाण लेकर टी हुई अज़ूलियोंवाले शक्तिशाली भगवान्‌ विष्णु गथोंमें गोहके चर्मके बने हुए दस्ताने बाँधे संग्रामभूमिमें भागे खड़े होकर चन्द्रमासहित मेघके समान सुशोभित गो रहे थे

अध्याय 215

श्लोक 40

विष्णुरग्रस्थितो भाति सबलः संहताङ्गुलिः ।बद्धगोधाङ्गुलित्राणः सचन्द्र इव तोयदः

viṣṇuragrasthito bhāti sabalaḥ saṃhatāṅguliḥ | baddhagodhāṅgulitrāṇaḥ sacandra iva toyadaḥ

अर्थ श्लोक 39 के साथ

अध्याय 215

श्लोक 41

आदित्या वसवश्चैव दिव्यैः प्रहरणैः सह ।विष्णुमेवाभितः सर्वे तिष्ठन्ति ज्वलनप्रभाः

ādityā vasavaścaiva divyaiḥ praharaṇaiḥ saha | viṣṇumevābhitaḥ sarve tiṣṭhanti jvalanaprabhāḥ

हिन्दी अर्थ

अग़्िके समान तेजस्वी आदित्य मौर वसुगण सभी अपने दिव्य आयुधोंके साथ भगवान्‌ विष्णुके ही आस-पास दोनों ओर खड़े हो गये

अध्याय 215

श्लोक 42

मरुतश्चैव विश्वे च रुद्रमेवाभिपेदिरे ।गन्धर्वाः किन्नराश्चैव नागा यक्षाः सपन्नगाः

marutaścaiva viśve ca rudramevābhipedire | gandharvāḥ kinnarāścaiva nāgā yakṣāḥ sapannagāḥ

श्लोक 42–44 का हिन्दी अर्थ

रुद्रणों और विश्वेदेवोंने रुद्रदेवका ही साथ दिया। न्धर्व, किन्नर, नाग, यक्ष, पन्नन तथा दण्डका त्याग ररनेवाले ऋषि—दोनों पक्षोंके हितैषी थे। वे प्रतिदिन ान्ति एवं लोकहितकी कामनासे मन्त्र-जप करते पे ॥ ४र-ड॥ अग्रगामी रुद्रने रणभूमिमें अपने बाणसे पहले भगवान्‌ विष्णुके ही वक्ष:स्थल तथा समस्त अड्गोंकी सन्धियोंमें आघात किया। उस बाणका अग्रभाग बहुत तीखा तथा उत्तम यन्त्रसे युक्त था

अध्याय 215

श्लोक 43

ऋषयो न्यस्तदण्डाश्च उभयोः पक्षयोर्हिताः ।जपन्ति शान्तये नित्यं लोकानां हितकाम्यया

ṛṣayo nyastadaṇḍāśca ubhayoḥ pakṣayorhitāḥ | japanti śāntaye nityaṃ lokānāṃ hitakāmyayā

अर्थ श्लोक 42 के साथ

अध्याय 215

श्लोक 44

रुद्रः शरेणाभ्यहनद् विष्णुमेवाग्रणी रणे ।हृदि सर्वाङ्गसन्धीषु तीक्ष्णाग्रेण सुयन्त्रिणा

rudraḥ śareṇābhyahanad viṣṇumevāgraṇī raṇe | hṛdi sarvāṅgasandhīṣu tīkṣṇāgreṇa suyantriṇā

अर्थ श्लोक 42 के साथ

अध्याय 215

श्लोक 45

न चकम्पे तदा विष्णुः सर्वात्मा ब्रह्मसम्भवः ।न च रोषमना नित्यं वृतः सर्वैः षडिन्द्रियैः

na cakampe tadā viṣṇuḥ sarvātmā brahmasambhavaḥ | na ca roṣamanā nityaṃ vṛtaḥ sarvaiḥ ṣaḍindriyaiḥ

हिन्दी अर्थ

परंतु ब्रह्माजीके उत्पादक तथा सबके आत्मा भगवान्‌ विष्णु न तो उस आघातसे कम्पित हुए और न मनमें उन्होंने तनिक भी रोष ही आने दिया। छहों इन्द्रियोंन उनका पतिरूपसे वरण किया है (अर्थात्‌ सभी इन्द्रियाँ उनके वशमें रहती हैं)

अध्याय 215

श्लोक 46

विष्णुश्च धनुरानम्य शरेण समयोजयत् ।जत्रुदेशे मुमोचाशु ब्रह्मदण्डमिवोद्यतम्

viṣṇuśca dhanurānamya śareṇa samayojayat | jatrudeśe mumocāśu brahmadaṇḍamivodyatam

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ विष्णुने अपने धनुषको नवाकर उसपर बाणका संधान किया और उद्यत हुए ब्रह्मदण्डके समान उस बाणको भगवान्‌ शिवके गलेकी हँसलीपर शीघ्रतापूर्वक छोड़ दिया

अध्याय 215

श्लोक 47

स विद्धस्तेन बाणेन महादेवो न कम्पते ।वज्रेण च महासन्धिर्मन्दरस्य न चाल्यते

sa viddhastena bāṇena mahādevo na kampate | vajreṇa ca mahāsandhirmandarasya na cālyate

हिन्दी अर्थ

उस बाणसे बिंध जानेपर भी महादेवजी विचलित नहीं हुए। ठीक उसी तरह, जैसे वज्के प्रहारसे मन्दराचलकी महासन्धि नहीं हिलती है

अध्याय 215

श्लोक 48

ततः प्रसभमाप्लुत्य रुद्रं विष्णुः सनातनम् ।कण्ठे जग्राह भगवान् नीलकण्ठस्ततोऽभवत्

tataḥ prasabhamāplutya rudraṃ viṣṇuḥ sanātanam | kaṇṭhe jagrāha bhagavān nīlakaṇṭhastato'bhavat

श्लोक 48–49 का हिन्दी अर्थ

तब नीलवर्ण भगवान्‌ विष्णु हठातू उछलकर सनातनदेव रुद्रके गलेसे जा लगे, इससे महादेवजी 'नीलकण्ठ' नामसे प्रसिद्ध हुए। फिर विष्णु बोले-' अनादि अनन्त देवता रुद्र मेरा अपराध क्षमा करें; क्योंकि मैं यह जान गया कि आप सम्पूर्ण भूतों और आगमोंके आचार्य हैं। कर्म जड हैं, अत: वे आप चिन्मय परमात्माको प्रकाशित नहीं कर सकते' ॥ ४८- '

अध्याय 215

श्लोक 49

अनादिनिधनो देवो क्षमतां हि भवान्मम ।सर्वभूतागमाचार्यमचलत्वाच्च कर्मणाम्

anādinidhano devo kṣamatāṃ hi bhavānmama | sarvabhūtāgamācāryamacalatvācca karmaṇām

अर्थ श्लोक 48 के साथ

अध्याय 215

श्लोक 50

कर्मणां चैव कर्ता च विकर्ता चैव भारत ।अशेषत्वाच्च भूतानां सर्वभूतेषु चोत्तमः

karmaṇāṃ caiva kartā ca vikartā caiva bhārata | aśeṣatvācca bhūtānāṃ sarvabhūteṣu cottamaḥ

हिन्दी अर्थ

भारत! भगवान्‌ शिव ही सर्वात्मा होनेके कारण कर्मोके कर्ता और विकर्ता हैं। वे भूतोंके शेष (अज्) नहीं शेषी (अड्गी ) हैं, इसलिये समस्त प्राणियों में उत्तम हैं

अध्याय 215

श्लोक 51

स्वयमेव हि यत् कर्म विधत्ते कर्मयोनिषु ।तयोः शुभतमो राजन् स्वयमेव तथाकरोत्

svayameva hi yat karma vidhatte karmayoniṣu | tayoḥ śubhatamo rājan svayameva tathākarot

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! जिन्हें कर्मोद्वारा नाना प्रकारके शरीर प्राप्त हुए हैं, उनमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित होकर वे स्वयं ही कर्म करते हैं (उसके लिये प्रेरणा देते हैं) । कर्ता और प्रयोजक दोनोंसे भिन्न जो शुभतम (विशुद्ध) परमात्मा हैं, उन्होंने ही बैसा नियम बनाया है

अध्याय 215

श्लोक 52

अन्तरिक्षाच्छुभा वाचः श्रूयन्ते परमाद्भुताः ।सिद्धानां वदनोन्मुक्ताः सनातन नमोऽस्तु ते

antarikṣācchubhā vācaḥ śrūyante paramādbhutāḥ | siddhānāṃ vadanonmuktāḥ sanātana namo'stu te

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर अन्तरिक्षसे सिद्धोंके मुखसे निकली हुई परम अद्भुत एवं शुभ वाणी सुनायी देने लगी-'*सनातन परमेश्वर! आपको नमस्कार है'

अध्याय 215

श्लोक 53

नन्दी पिनाकमुद्यम्य बलवान् रुद्रसम्भवः ।मूर्द्धन्यभिजघानाजौ विष्णुं क्रोधेन मूर्छितः

nandī pinākamudyamya balavān rudrasambhavaḥ | mūrddhanyabhijaghānājau viṣṇuṃ krodhena mūrchitaḥ

हिन्दी अर्थ

इतनेहीमें क्रोधसे मूर््छित हुए रुद्रजनित बलवान्‌ नन्दीने पिनाक उठाकर युद्धमें भगवान्‌ विष्णुके मस्तकपर प्रहार किया

अध्याय 215

श्लोक 54

ततः प्रहसितो विष्णुर्नन्दीं दृष्ट्वा सुरोत्तमः ।स्तम्भयामास भगवान् सर्वभूतपतिर्हरिः

tataḥ prahasito viṣṇurnandīṃ dṛṣṭvā surottamaḥ | stambhayāmāsa bhagavān sarvabhūtapatirhariḥ

हिन्दी अर्थ

तब सम्पूर्ण भूतोंके प्रतिपालक सुरश्रेष्ठ भगवान्‌ विष्णु हरि नन्दीकी ओर देखकर जोर-जोरसे हँसने लगे। फिर उन्होंने नन्दीको स्तम्भित कर दिया—वे हिल-डुल भी न सके

अध्याय 215

श्लोक 55

विष्णुर्ब्रह्मसमो भूत्वा तेजसा प्रज्वलन्निव ।क्षमया च समायुक्तः स्थितः स्थाणुरिवाचलः

viṣṇurbrahmasamo bhūtvā tejasā prajvalanniva | kṣamayā ca samāyuktaḥ sthitaḥ sthāṇurivācalaḥ

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ विष्णु ब्रह्म-समान होकर तेजसे प्रज्वलित- से होने लगे। वे क्षमाभावसे युक्त हो दूँठे काठकी भाँति अविचल भावसे खड़े रहे

अध्याय 215

श्लोक 56

अचिन्त्यश्चाप्रमेयश्च ह्यजेयश्चाप्यरिन्दमः ।युगान्ताग्निसमो भूत्वा शान्तात्मा हरिरव्ययः

acintyaścāprameyaśca hyajeyaścāpyarindamaḥ | yugāntāgnisamo bhūtvā śāntātmā hariravyayaḥ

हिन्दी अर्थ

अचिन्त्य, अप्रमेय, अजेय, शत्रुका दमन करनेमें समर्थ और प्रलयाग्निके समान महातेजस्वी होकर भी अविनाशी श्रीहरिनि उस समय अपने चित्तको शान्त कर लिया

अध्याय 215

श्लोक 57

प्रसन्नः कल्पयामास भागं रुद्राय धीमते ।विष्णुर्धर्मपरो नित्यं त्यक्तकामः सुरोत्तमः

prasannaḥ kalpayāmāsa bhāgaṃ rudrāya dhīmate | viṣṇurdharmaparo nityaṃ tyaktakāmaḥ surottamaḥ

हिन्दी अर्थ

सदा ही कामनाओंका परित्याग करनेवाले धर्मपरायण सुरश्रेष्ठ भगवान्‌ विष्णुने प्रसन्न होकर उस यज्ञमें बुद्धिमान्‌ रुद्रदेवके लिये भागकी कल्पना (व्यवस्था) की

अध्याय 215

श्लोक 58

विष्णुना चैव राजेन्द्र स यज्ञः सन्धितः पुनः ।यथापक्षं च ते सर्वे गणास्त्वासन् महीपते ।तस्मिन् युद्धे महाघोरे विष्णू रुद्रस्य चैव ह

viṣṇunā caiva rājendra sa yajñaḥ sandhitaḥ punaḥ | yathāpakṣaṃ ca te sarve gaṇāstvāsan mahīpate | tasmin yuddhe mahāghore viṣṇū rudrasya caiva ha

हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र! जिसे रुद्रने भंग कर दिया था, उस यज्ञको भगवान्‌ विष्णुने फिरसे जोड़ा—उसे विधिपूर्वक सम्पन्न किया । पृथ्वीनाथ ! उस समय भगवान्‌ विष्णु और रुद्रके घोर युद्धमें सभी गण यथायोग्य पक्षमें सम्मिलित हो गये थे

अध्याय 215

श्लोक 59

यथापक्षं भवेद् युद्धं दक्षयज्ञविनाशने ।विनाशश्चैव यज्ञस्य तदा लोके प्रतिष्ठितः

yathāpakṣaṃ bhaved yuddhaṃ dakṣayajñavināśane | vināśaścaiva yajñasya tadā loke pratiṣṭhitaḥ

श्लोक 59–60 का हिन्दी अर्थ

परंतु राजेन्द्र ! यज्ञ समस्त प्राणियोंके लिये हितकर एवं सनातन है। प्रजापति दक्षने यज्ञका पूरा-पूरा फल पाया

अध्याय 215

श्लोक 60

सर्वभूतेषु राजेन्द्र हितो यज्ञः सनातनः ।दक्षो यज्ञफलं चैव प्राप्तवान् स प्रजापतिः

sarvabhūteṣu rājendra hito yajñaḥ sanātanaḥ | dakṣo yajñaphalaṃ caiva prāptavān sa prajāpatiḥ

अर्थ श्लोक 59 के साथ

अध्याय 215

श्लोक 61

इमां चोदाहृतां दिव्यां कथामिति स बुद्धिमान् ।श्रावयेद् यस्तु विप्रेभ्यः शुचिः प्रयतमानसः

imāṃ codāhṛtāṃ divyāṃ kathāmiti sa buddhimān | śrāvayed yastu viprebhyaḥ śuciḥ prayatamānasaḥ

श्लोक 61–63 का हिन्दी अर्थ

जो पवित्र, संयतचित्त एवं बुद्धिमान्‌ पुरुष यहाँ कही गयी इस दिव्य कथाका ब्राह्मणोंको श्रवण कराता है, वह समस्त अध्यात्मशास्त्रका अध्ययन करके देवलोकमें पूजित होता है। परमात्माका यह पुष्कर नामक प्रादुर्भाव, जिसे द्वैपायन व्यासजीने कहा था, मैंने इस पुराणमें पुष्कर-प्रादुर्भावके प्रसज्ध में क्रमश: यथावत्रूपसे सुनाया है। महर्षियोंने इसका संस्कार किया है

अध्याय 215

श्लोक 62

अधीत्य सर्वमध्यात्मं देवलोके महीयते ।एष पौष्करको नाम प्रादुर्भावो महात्मनः

adhītya sarvamadhyātmaṃ devaloke mahīyate | eṣa pauṣkarako nāma prādurbhāvo mahātmanaḥ

अर्थ श्लोक 61 के साथ

अध्याय 215

श्लोक 63

पुराणे पौष्करे चैव मया द्वैपायनेरितः ।यथावदनुपूर्वेण संस्कृतः परमर्षिभिः

purāṇe pauṣkare caiva mayā dvaipāyaneritaḥ | yathāvadanupūrveṇa saṃskṛtaḥ paramarṣibhiḥ

अर्थ श्लोक 61 के साथ

अध्याय 215

श्लोक 64

यश्चैनमग्र्यं पुरुषः पुराणं सदाप्रमत्तः शृणुयाद् यथोक्तम् ।अवाप्य कामानिह वीतशोकः परत्र च स्वर्गफलानि भुङ्क्ते

yaścainamagryaṃ puruṣaḥ purāṇaṃ sadāpramattaḥ śṛṇuyād yathoktam | avāpya kāmāniha vītaśokaḥ paratra ca svargaphalāni bhuṅkte

हिन्दी अर्थ

जो पुरुष सदा सावधान रहकर इस श्रेष्ठ पुराणका यथावत्‌-रूपसे श्रवण करता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण कामनाओंको पाकर वीतशोक हो परलोकमें भी स्वर्गीय फलोंका उपभोग करता है

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

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पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.