Harivamsha Purana
217
अध्याय 217 / 318

Parva 3, Adhyāya 34

47 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ47 श्लोक

अध्याय 217

श्लोक 1

भगवता यज्ञवराहेण पृथिव्याः उद्धारः जगदण्डमिदं पूर्वमासीत् सर्वं हिरण्मयम् ।प्रजापतेर्मूर्तिमयमित्येवं वैदिकी श्रुतिः

bhagavatā yajñavarāheṇa pṛthivyāḥ uddhāraḥ jagadaṇḍamidaṃ pūrvamāsīt sarvaṃ hiraṇmayam | prajāpatermūrtimayamityevaṃ vaidikī śrutiḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वैदिकी श्रुतिका कथन है कि प्रजापतिका स्वरूपभूत यह सारा जगत्‌ पहले सुवर्णमय अण्डके रूपमें उत्पन्न हुआ था

अध्याय 217

श्लोक 2

ततो वर्षसहस्रान्ते बिभेदोर्ध्वमुखं विभुः ।लोकसञ्जननार्थाय बिभेदाण्डं पुनः पुनः

tato varṣasahasrānte bibhedordhvamukhaṃ vibhuḥ | lokasañjananārthāya bibhedāṇḍaṃ punaḥ punaḥ

हिन्दी अर्थ

उन सर्वव्यापी भगवान्‌ने सहस्र वर्षके बाद उक्त अण्डको ऊपरकी ओरसे फोड़ दिया। फिर समस्त लोकोंकी उत्पत्तिके लिये उन्होंने उस अण्डमें (नीचेकी ओरसे ) दूसरा छेद भी किया

अध्याय 217

श्लोक 3

भूयोऽष्टधा बिभेदाण्डं प्रभुर्वै लोकयोनिकृत् ।चकार जगतश्चात्र विभागं सर्वभागवित्

bhūyo'ṣṭadhā bibhedāṇḍaṃ prabhurvai lokayonikṛt | cakāra jagataścātra vibhāgaṃ sarvabhāgavit

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ समस्त लोकोंको जन्म देनेवाले सामर्थ्यशाली भगवान्‌ने फिर उस अण्डमें आठ छिद्र किये। समस्त भागोंके ज्ञाता श्रीहरिने यहाँ जगत्‌का विभाग किया

अध्याय 217

श्लोक 4

यच्छिद्रमूर्ध्वमाकाशं परा सुकृतिनां गतिः ।विहितं विश्वयोगेन यदधस्तद् रसातलम्

yacchidramūrdhvamākāśaṃ parā sukṛtināṃ gatiḥ | vihitaṃ viśvayogena yadadhastad rasātalam

हिन्दी अर्थ

उस अण्डमें जो ऊपर छेद किया गया था, वही आकाश हुआ, जो पुण्यात्मा पुरुषोंकी | परम गति है। फिर यह सम्पूर्ण विश्व जिनका योग है, उन परमात्माने जो इस ब्रह्माण्डमें नीचेकी ओर छेद किया, वही रसातल है

अध्याय 217

श्लोक 5

यदण्डमकरोत् पूर्वं देवलोकसिसृक्षया ।समन्तादष्टधा यानि च्छिद्राणि कृतवांस्तु सः

yadaṇḍamakarot pūrvaṃ devalokasisṛkṣayā | samantādaṣṭadhā yāni cchidrāṇi kṛtavāṃstu saḥ

श्लोक 5–9 का हिन्दी अर्थ

देवलोककी सृष्टिकी इच्छासे भगवानूने पहले जो अण्ड उत्पन्न किया और उसमें सब ओर जो उन्होंने आठ छिद्र किये, वे ही सम्पूर्ण दिशाएँ और विदिशाएँ हैं । उन्होंने मनसे ही उन सबके दो भाग किये। उस अण्डके जो रंग-बिरंगे टुकड़े थे, वे ही अनेक वर्ण धारण करनेवाले बहुत-से विचित्र मेघ हुए। उस अण्डके मध्यभागमें जो स्खलित हुआ द्रवपदार्थ, जिसे ऋत कहते हैं, जगह-जगह स्थापित हो गया, वह सब इस पृथ्वीपर जातरूप (सुवर्ण) हो गया। राजन्‌ ! जैसे प्रलयकालमें सारी पृथ्वी समुद्रोंद्वारा सब ओरसे आच्छादित हो जाती है, उसी प्रकार उस क्लेदरूप जलके प्रवाहने भूतलको सब ओरसे आच्छादित कर लिया

अध्याय 217

श्लोक 6

विदिशस्ता दिशः सर्वा मनसैवाकरोद् द्विधा ।नानारागविरागाणि यान्यण्डशकलानि वै

vidiśastā diśaḥ sarvā manasaivākarod dvidhā | nānārāgavirāgāṇi yānyaṇḍaśakalāni vai

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 217

श्लोक 8

बहुवर्णधराश्चित्रा बभूवुस्ते बलाहकाः ।यदण्डमध्ये स्कन्नं तदृतमासीत् समाहितं ७ जातरूपं तदभवत् तत् सर्वं पृथिवीतले ।तस्य क्लेदार्णवौघेन प्राच्छाद्यत समन्ततः

bahuvarṇadharāścitrā babhūvuste balāhakāḥ | yadaṇḍamadhye skannaṃ tadṛtamāsīt samāhitaṃ 7 jātarūpaṃ tadabhavat tat sarvaṃ pṛthivītale | tasya kledārṇavaughena prācchādyata samantataḥ

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 217

श्लोक 9

पृथिवी निखिला राजन् युगान्ते सागरैरिव

pṛthivī nikhilā rājan yugānte sāgarairiva

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 217

श्लोक 10

यच्चाण्डमकरोत् पूर्वं देवलोकचिकीर्षया ।तत्र तत्सलिलं स्कन्नं सोऽभवत् काञ्चनोगिरिः

yaccāṇḍamakarot pūrvaṃ devalokacikīrṣayā | tatra tatsalilaṃ skannaṃ so'bhavat kāñcanogiriḥ

हिन्दी अर्थ

भगवानूने देवलोककी सृष्टिकी इच्छासे पहले जो अण्ड उत्पन्न किया था, उसमें जहाँ-जहाँ वह जल स्खलित होकर गिरा, वही सुवर्णमय पर्वत हो गया

अध्याय 217

श्लोक 11

तेनाम्भसा प्लुताः सर्वा दिशश्चोपदिशस्तथा ।अन्तरिक्षं च नाकं च यच्चान्यत् किञ्चिदन्तरम्

tenāmbhasā plutāḥ sarvā diśaścopadiśastathā | antarikṣaṃ ca nākaṃ ca yaccānyat kiñcidantaram

श्लोक 11–13 का हिन्दी अर्थ

उस जलने सारी दिशाओं और उपदिशाओंको आप्लावित कर दिया। अन्तरिक्ष, स्वर्ग तथा इनके बीचका और जो कुछ स्थान है, उसमें जहाँ-जहाँ वह जल गिरा, वहाँ-वहाँ एक पर्वत खड़ा हो गया। उन समस्त पर्वतोंसे अवरुद्ध हुई यह पृथ्वी गहन एवं विषम हो गयी। अनेक योजनोंतक फैले हुए उन भारी पर्वत समूहोंसे दबी हुई पृथ्वीदेवी पीड़ासे व्यथित हो गयी

अध्याय 217

श्लोक 12

यत्र यत्र जलं स्कन्नं तत्र तत्र स्थितो गिरिः ।शैलैः समस्तैर्गहना विषमा मेदिनी भवत्

yatra yatra jalaṃ skannaṃ tatra tatra sthito giriḥ | śailaiḥ samastairgahanā viṣamā medinī bhavat

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 217

श्लोक 13

ते सपर्वतजालौघैर्बहुयोजनविस्तृतैः ।पीडिता गुरुभिर्देवी पृथिवी व्यथिताभवत्

te saparvatajālaughairbahuyojanavistṛtaiḥ | pīḍitā gurubhirdevī pṛthivī vyathitābhavat

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 217

श्लोक 14

महीतले भूरि जलं दिव्यं नारायणात्मकम् ।हिरण्मयं समुद्दिष्टं तेजो विमलरूपितम्

mahītale bhūri jalaṃ divyaṃ nārāyaṇātmakam | hiraṇmayaṃ samuddiṣṭaṃ tejo vimalarūpitam

श्लोक 14–15 का हिन्दी अर्थ

पृथ्वीपर निर्मल तेजस्वरूप सुवर्णमय जो नारायणात्मक दिव्य जल अधिक मात्रामें गिरा, उसे धारण करनेमें असमर्थ होकर वह नीचे रसातलसे भी नीचेके भागमें प्रवेश करने लगी, क्योंकि भगवान्‌के उस तेजसे वह पृथ्वी अत्यन्त पीड़ित हो रही थी

अध्याय 217

श्लोक 15

अशक्ता वै धारयितुमधः सा प्रविवेश ह ।पीड्यमाना भगवतस्तेजसा तेन सा क्षितिः

aśaktā vai dhārayitumadhaḥ sā praviveśa ha | pīḍyamānā bhagavatastejasā tena sā kṣitiḥ

अर्थ श्लोक 14 के साथ

अध्याय 217

श्लोक 16

पृथिवीं विशतीं दृष्ट्वा तामधो मधुसूदनः ।उद्धारार्थं मनश्चक्रे लोकानां हितकाम्यया

pṛthivīṃ viśatīṃ dṛṣṭvā tāmadho madhusūdanaḥ | uddhārārthaṃ manaścakre lokānāṃ hitakāmyayā

हिन्दी अर्थ

पृथ्वीको नीचे जाती देख भगवान्‌ मधुसूदनने समस्त लोकोंके हितकी कामनासे उसका उद्धार करनेका विचार किया

अध्याय 217

श्लोक 17

मत्तेज एव बलवत् समासाद्य तपस्विनी ।रसातलं विशेद् देवी पङ्के गौरिव दुर्बला

matteja eva balavat samāsādya tapasvinī | rasātalaṃ viśed devī paṅke gauriva durbalā

हिन्दी अर्थ

श्रीभगवान्‌ मन-ही-मन बोले—यह तपस्विनी रैवी पृथ्वी मेरे प्रबल तेजका भार पाकर कीचड़में फँसी हुई दुबली गायकी भाँति रसातलके नीचे धँस जायगी, सा जान पड़ता है

अध्याय 217

श्लोक 18

त्रिविक्रमायामितविक्रमाय महानृसिंहाय चतुर्भुजाय ।श्रीशार्ङ्गचक्रासिगदाधराय नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय

trivikramāyāmitavikramāya mahānṛsiṃhāya caturbhujāya | śrīśārṅgacakrāsigadādharāya namo'stu tasmai puruṣottamāya

हिन्दी अर्थ

उस समय पृथ्वी भगवान्‌की स्तुति करती हुई बरोली—जो तीनों लोकोंको अपने चरणोंसे आक्रान्त कर नेनेके कारण त्रिविक्रम कहलाते हैं, जिनके पराक्रमका क्रोई माप नहीं है तथा जो अपने हाथोंमें शा धनुष, पुदर्शन चक्र, नन्दक खड्ग और कौमोदकी गदा धारण करते हैं, उन महानृसिंह, चार भुजाधारी पुरुषोत्तमको मेरा ममस्कार है

अध्याय 217

श्लोक 19

त्वयाऽऽत्मना धार्यते वै त्वया संह्रियते जगत् ।त्वं धारयसि भूतानां भुवनं त्वं बिभर्षि च

tvayā''tmanā dhāryate vai tvayā saṃhriyate jagat | tvaṃ dhārayasi bhūtānāṃ bhuvanaṃ tvaṃ bibharṣi ca

हिन्दी अर्थ

भगवन्‌! आप ही अपनी शक्तिसे रस जगत्‌को धारण करते हैं और आपके द्वारा ही इसका पंहार होता है। आप समस्त प्राणियोंके भुवनका धारण और पोषण करते हैं

अध्याय 217

श्लोक 20

यत्त्वया धार्यते किञ्चित्तेजसा च बलेन च ।ततस्तव प्रसादेन मया पश्चात् तु धार्यते

yattvayā dhāryate kiñcittejasā ca balena ca | tatastava prasādena mayā paścāt tu dhāryate

हिन्दी अर्थ

आप अपने तेज और बलसे जो कुछ धारण करते हैं, उसीको मैं पीछेसे आपकी ही कृपासे धारण करती हूँ

अध्याय 217

श्लोक 21

त्यया धृतं धारयामि नाधृतं धारयाम्यहम् ।न हि तद् विद्यते रूपं यत्त्वया न तु धार्यते

tyayā dhṛtaṃ dhārayāmi nādhṛtaṃ dhārayāmyaham | na hi tad vidyate rūpaṃ yattvayā na tu dhāryate

हिन्दी अर्थ

आपके धारण किये डुएको ही मैं धारण करती हूँ। जिसे आपने धारण न केया हो, ऐसी किसी वस्तुको मैं धारण नहीं करती। सा कोई रूप नहीं है, जो आपके द्वारा धारण न किया नाता हो

अध्याय 217

श्लोक 22

त्वमेव कुरुषे वीर नारायण युगे युगे ।मम भारावतरणं जगतो हितकाम्यया

tvameva kuruṣe vīra nārāyaṇa yuge yuge | mama bhārāvataraṇaṃ jagato hitakāmyayā

हिन्दी अर्थ

वीर! नारायण! आप ही जगत्‌के हेतकी कामनासे युग-युगमें (अवतार ग्रहण करके) रा भार उतारा करते हैं

अध्याय 217

श्लोक 23

तवैव तेजसाऽऽक्रान्तां रसातलतलं गताम् ।त्रायस्व मां सुरश्रेष्ठ त्वामेव शरणं गताम्

tavaiva tejasā''krāntāṃ rasātalatalaṃ gatām | trāyasva māṃ suraśreṣṭha tvāmeva śaraṇaṃ gatām

हिन्दी अर्थ

सुरश्रेष्ठ ! मैं आपके ही जसे (प्रकट हुए पर्वतोंद्वारा) आक्रान्त हो रसातलसे पी नीचे चली आयी हूँ और आपकी ही शरण ले रही हूँ.। भाप मेरी रक्षा करें

अध्याय 217

श्लोक 24

दानवैः पीड्यमानाहं राक्षसैश्च दुरात्मभिः ।त्वामेव शरणं नित्यमुपयामि सनातनम्

dānavaiḥ pīḍyamānāhaṃ rākṣasaiśca durātmabhiḥ | tvāmeva śaraṇaṃ nityamupayāmi sanātanam

हिन्दी अर्थ

दुरात्मा दानवों और राक्षसोंसे गीड़िति होकर मैं सदा आप सनातन परमेश्वरकी ही गरणमें आती हूँ

अध्याय 217

श्लोक 25

तावन्मेऽस्ति भयं भूयो यावन्न त्वां ककुद्मिनम् ।शरणं यामि मनसा शतशोऽप्युपलक्षये

tāvanme'sti bhayaṃ bhūyo yāvanna tvāṃ kakudminam | śaraṇaṃ yāmi manasā śataśo'pyupalakṣaye

हिन्दी अर्थ

मैं सैकड़ों बार यह देख चुकी ूँ कि जबतक मैं विशाल वृषभके समान पुष्ट कंधोंवाले भाप भगवानूकी शरण नहीं लेती हूँ, तभीतक मुझे मधिक भय प्राप्त होता रहता है

अध्याय 217

श्लोक 26

मा भैर्धरणि कल्याणि शान्तिं व्रज समाहिता ।एष त्वामुचितं स्थानमानयामि मनीषितम्

mā bhairdharaṇi kalyāṇi śāntiṃ vraja samāhitā | eṣa tvāmucitaṃ sthānamānayāmi manīṣitam

हिन्दी अर्थ

श्रीभगवान्‌ू बोले—धरणि ! भयभीत न हो। कल्याणि! ननको एकाग्र करके शान्ति धारण कर । यह मैं तुझे अभी चित एवं मनोवाज्छित स्थानपर ले आता हूँ

अध्याय 217

श्लोक 27

ततो महात्मा मनसा दिव्यं रूपमचिन्तयत् ।किं नु रूपमहं कृत्वा उद्धरामि वसुन्धराम्

tato mahātmā manasā divyaṃ rūpamacintayat | kiṃ nu rūpamahaṃ kṛtvā uddharāmi vasundharām

श्लोक 27–30 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्‌! ऐसा कहकर महात्मा श्रीहरिने मन-ही-मन किसी दिव्यरूपके विषयमें चिन्तन किया। वे सोचने लगे, कौन-सा रूप धारण करके मैं इस पृथ्वीका उद्धार करूँ। वह रूप ऐसा होना चाहिये, जिसके द्वारा मैं जलमें डूबी हुई पृथ्वीको ऊपर उठा सकूँ । ऐसा सोचते हुए भगवान्‌ने उस रूपको धारण करनेका विचार किया। उस समय जलमें क्रीड़ा करनेके लिये उनकी रुचि हुई; अतः: उन्होंने वाराह रूपका स्मरण किया। पृथ्वीको धारण करनेवाले श्रीहरि उसका उद्धार करनेके लिये उद्यत हो गये। उस समय उनका रूप दस योजन विस्तृत और सौ योजन ऊँचा हो गया। वह वेटट्ल्द सम्मानित भगवान्‌का वाड्मयस्वरूप समस्त प्राप्यिंऊ लिये अजेय था

अध्याय 217

श्लोक 28

जले निमग्नां धरणीं येनाहं वै समुद्धरे ।इत्येवं चिन्तयित्वा तु देवस्त्वत्करणे मतिम्

jale nimagnāṃ dharaṇīṃ yenāhaṃ vai samuddhare | ityevaṃ cintayitvā tu devastvatkaraṇe matim

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 217

श्लोक 29

जलक्रीडारुचिस्तस्माद् वाराहं रूपमस्मरत् ।हरिरुद्धरणे युक्तस्तदाभूदस्य भूमिभृत्

jalakrīḍārucistasmād vārāhaṃ rūpamasmarat | hariruddharaṇe yuktastadābhūdasya bhūmibhṛt

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 217

श्लोक 30

अधृष्यं सर्वभूतानां वाङ्मयं ब्रह्मसम्मितम् ।दशयोजनविस्तारमुच्छ्रितं शतयोजनम्

adhṛṣyaṃ sarvabhūtānāṃ vāṅmayaṃ brahmasammitam | daśayojanavistāramucchritaṃ śatayojanam

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 217

श्लोक 31

नीलमेघप्रतीकाशं मेघस्तनितनिःस्वनम् ।महागिरेः संहननं श्वेतदीप्तोग्रदंष्ट्रिणम्

nīlameghapratīkāśaṃ meghastanitaniḥsvanam | mahāgireḥ saṃhananaṃ śvetadīptogradaṃṣṭriṇam

हिन्दी अर्थ

उसकी अड्कान्टि नल मेघके समान श्याम थी। उसका शब्द मेघकी गम्भर गर्जनाको तिरस्कृत किये देता था। भगवान्‌का वह ठिद्रद महान्‌ पर्वतकी आकृतिके समान प्रतीत होता था ! उसको दाढ़ें श्वेत, चमकीली और भयड्र थीं

अध्याय 217

श्लोक 32

विद्युदग्निप्रतीकाशमादित्यसमतेजसम् ।पीनवृत्तायतस्कन्धं दृप्तशार्दूलगामिनम्

vidyudagnipratīkāśamādityasamatejasam | pīnavṛttāyataskandhaṃ dṛptaśārdūlagāminam

श्लोक 32–35 का हिन्दी अर्थ

उसका नेउ बिजली और अग्रिके समान था। उसकी प्रभा दृचंज सदूृश थी | उसके कंधे मोटे, गोलाकार और चौड़े थे उच बलके घमंडमें भरे हुए सिंहके समान चलता था . उसजा करटिप्रदेश ऊँचा और मांसल था। वह वृषभके लक्षण सम्मानित था। ऐसे अमित और विशाल वाराहरूपको धारण कर श्रीहरिने पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये गसतलरें प्रवेश किया । उन भगवान्‌ यज्ञवाराहके चारों पैर चर उेद ही थे। यूप उनकी दाढ़ थे। क्रतु (यज्ञ) ही दाँत और चिति ही (इष्टिका चयन) मुख थे। अग्ि उनकी जि. डर उनके रोम तथा ब्रह्म (प्रणव) उनका मस्तक था। डे सदन तपसे सम्पन्न थे। दिन और रातको ही वे दोनों नेज्रेऊ रूपमें धारण करते थे। वेदके छहों अज् उनके ऊनऊे कुण्डल थे

अध्याय 217

श्लोक 33

पीनोन्ततकटीदेशं वृषलक्षणपूजितम् ।रूपमास्थाय विपुलं वाराहममितं हरिः

pīnontatakaṭīdeśaṃ vṛṣalakṣaṇapūjitam | rūpamāsthāya vipulaṃ vārāhamamitaṃ hariḥ

अर्थ श्लोक 32 के साथ

अध्याय 217

श्लोक 34

पृथिव्युद्धरणार्थाय प्रविवेश रसातलम् ।वेदपादो यूपदंष्ट्रः क्रतुदन्तश्चितीमुखः

pṛthivyuddharaṇārthāya praviveśa rasātalam | vedapādo yūpadaṃṣṭraḥ kratudantaścitīmukhaḥ

अर्थ श्लोक 32 के साथ

अध्याय 217

श्लोक 35

अग्निजिह्वो दर्भरोमा ब्रह्मशीर्षो महातपाः ।अहोरात्रेक्षणधरो वेदाङ्गश्रुतिभूषणः

agnijihvo darbharomā brahmaśīrṣo mahātapāḥ | ahorātrekṣaṇadharo vedāṅgaśrutibhūṣaṇaḥ

अर्थ श्लोक 32 के साथ

अध्याय 217

श्लोक 36

आज्यनासः स्रुवातुण्डः सामघोषस्वरो महान् ।सत्यधर्ममयः श्रीमान् क्रमविक्रमसत्कृतः

ājyanāsaḥ sruvātuṇḍaḥ sāmaghoṣasvaro mahān | satyadharmamayaḥ śrīmān kramavikramasatkṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

घी उनकी नासिक. ना उनकी थूथुन और सामवेदका स्वर ही उनको भष्ण गर्जना थी। उनका शरीर बहुत बड़ा था। उनका जिग्रह सत्य-धर्ममय था। वे अलौकिक शोभासे सम्पन्न थे, वे क्रम (गति) और विक्रम (पराक्रम) दोनोंसे सम्ननित थे (अथवा वेदके क्रम-पाठ और व्युत्क्रम-पाट हो यहाँ क्रम-विक्रम हैं, जिनसे भगवान्‌ यज्ञवाराह सत्कृत थे)

अध्याय 217

श्लोक 37

क्रियासत्रमहाघोणः पशुजानुर्मखाकृतिः ।उद्गात्रान्त्रो होमलिङ्गो बीजौषधिमहाफलः

kriyāsatramahāghoṇaḥ paśujānurmakhākṛtiḥ | udgātrāntro homaliṅgo bījauṣadhimahāphalaḥ

श्लोक 37–38 का हिन्दी अर्थ

क्रियामय सत्र उनके बड़े-बड़े नथुने थे । पशु घुटने और यज्ञ ही उनकी आकृति थे। उद्बाता ही उनका आँत था। होमरूप कर्म उनका लिख था। बीज और | ओषधियाँ उनसे प्राप्त होनेवाले महानू फल थीं ॥ ३3॥ वायु उनकी अन्तरात्मा थी। मन्त्र नितम्ब था। वे विक्रमस्वरूप थे। सोमरस उनका रक्त था। यज्ञकी वेदी उनके कंधे, हविष्य सुगन्ध और हव्य-कव्य ही उनके अतिशय वेग थे

अध्याय 217

श्लोक 38

वाय्वन्तरात्मा मन्त्रस्पृग् विक्रमः सोमशोणितः ।वेदीस्कन्धो हविर्गन्धो हव्यकव्यातिवेगवान्

vāyvantarātmā mantraspṛg vikramaḥ somaśoṇitaḥ | vedīskandho havirgandho havyakavyātivegavān

अर्थ श्लोक 37 के साथ

अध्याय 217

श्लोक 39

प्राग्वंशकायो द्युतिमान् नानादीक्षाभिरर्चितः ।दक्षिणाहृदयो योगी महासत्रमयो महान्

prāgvaṃśakāyo dyutimān nānādīkṣābhirarcitaḥ | dakṣiṇāhṛdayo yogī mahāsatramayo mahān

हिन्दी अर्थ

प्राग्वंश (पत्नीशाला या यजमान- गृह) उनका शरीर कहा गया है। वे तेजस्वी तथा नाना प्रकारकी दीक्षाओंसे पूजित थे। दक्षिणा उनके हृदयके स्थानमें थी। वे महान्‌ योगी और महासत्रमय थे

अध्याय 217

श्लोक 40

उपाकर्मोष्ठरुचकः प्रवर्ग्यावर्तभूषणः ।नानाछन्दोगतिपथो गुह्योपनिषदासनः

upākarmoṣṭharucakaḥ pravargyāvartabhūṣaṇaḥ | nānāchandogatipatho guhyopaniṣadāsanaḥ

हिन्दी अर्थ

उपाकर्म उनके ओष्टका भूषण था और प्रवर्ग्यकर्म ही उनकी नाभिको विभूषित करनेवाले थे। नाना प्रकारके छन्द उनके चलनेके मार्ग थे और गूढ़ उपनिषद्‌ उनके आसन थे

अध्याय 217

श्लोक 41

छायापत्नीसहायो वै मणिशृङ्ग इवोच्छ्रितः ।भूत्वा यज्ञवराहोऽसौ युगपत्प्राविशद् गुरुः

chāyāpatnīsahāyo vai maṇiśṛṅga ivocchritaḥ | bhūtvā yajñavarāho'sau yugapatprāviśad guruḥ

हिन्दी अर्थ

जलमें पड़नेवाली छाया (परछाईं) ही पत्नीकी भाँति उनकी सहायिका थी | वे मणिमय पर्वतशिखरके समान ऊँचे थे। इस प्रकार यज्ञमय वाराहरूप धारण करके उन जगदुरु भगवान्‌ने पृथ्वीके रसातलमें जानेके साथ ही स्वयं भी वहाँ प्रवेश किया

अध्याय 217

श्लोक 42

अद्भिः सञ्छादितामुर्वीं स तामार्च्छत् प्रजापतिः ।रसातलतले मग्नां पातालान्तरसंश्रयाम्

adbhiḥ sañchāditāmurvīṃ sa tāmārcchat prajāpatiḥ | rasātalatale magnāṃ pātālāntarasaṃśrayām

हिन्दी अर्थ

जलमें छिपी हुई तथा रसातलमें डूबकर दूसरे पातालमें पहुँची हुई उस पृथ्वीके पास वे भगवान्‌ प्रजापति स्वयं भी जा पहुँचे

अध्याय 217

श्लोक 43

प्रभुर्लोकहितार्थाय दंष्ट्राग्रेणोज्जहार गाम् ।ततः स्वस्थानमानीय पृथिवीं पृथिवीधरः

prabhurlokahitārthāya daṃṣṭrāgreṇojjahāra gām | tataḥ svasthānamānīya pṛthivīṃ pṛthivīdharaḥ

हिन्दी अर्थ

पृथ्वीको धारण करनेवाले उन प्रभुने लोकहितके लिये अपनी दाढ़के अग्रभागसे पृथ्वीको ऊपर उठाया और अपनी जगहपर लाकर रख दिया

अध्याय 217

श्लोक 44

मुमोच पूर्वं सहसा धारयित्वा धराधरः ।ततो जगाम निर्वाणं मेदिनी तस्य धारणात्

mumoca pūrvaṃ sahasā dhārayitvā dharādharaḥ | tato jagāma nirvāṇaṃ medinī tasya dhāraṇāt

श्लोक 44–47 का हिन्दी अर्थ

धराको धारण करनेवाले भगवान्‌ वाराहने पहले स्वयं पृथ्वीको धारण करके उसे सहसा जलके ऊपर छोड़ दिया। उनके धारण करनेसे पृथ्वीको बड़ी शान्ति मिली। उसने उन कल्याणकारी देवता यज्ञवाराहको नमस्कार किया। इस प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका हित चाहनेवाले भगवानूने यज्ञवाराह होकर लोकहितकी कामनासे पृथ्वीदेवीका उद्धार किया। तदनन्तर कमलनयन सुरश्रेष्ठदेव श्रीहरिने इस तरह रसातल गयी हुई पृथ्वीके विषयमें विचार करके जगत्‌को स्थापित करनेकी इच्छासे उसे ऊपरको उठाया और उसके विभाग करनेके लिये मनमें विचार किया

अध्याय 217

श्लोक 45

चकार च नमस्कारं तस्मै देवाय शम्भवे ।एवं यज्ञवराहेण भूत्वा भूतहितार्थिना

cakāra ca namaskāraṃ tasmai devāya śambhave | evaṃ yajñavarāheṇa bhūtvā bhūtahitārthinā

अर्थ श्लोक 44 के साथ

अध्याय 217

श्लोक 46

उद्धृता पृथिवी देवी लोकानां हितकाम्यया ।अथोद्धृत्य क्षितिं देवो जगतः स्थापनेच्छया

uddhṛtā pṛthivī devī lokānāṃ hitakāmyayā | athoddhṛtya kṣitiṃ devo jagataḥ sthāpanecchayā

अर्थ श्लोक 44 के साथ

अध्याय 217

श्लोक 47

पृथिवीप्रविभागाय मनश्चक्रेऽम्बुजेक्षणः ।रसातलगतामेवं विचिन्त्य स सुरोत्तमः

pṛthivīpravibhāgāya manaścakre'mbujekṣaṇaḥ | rasātalagatāmevaṃ vicintya sa surottamaḥ

अर्थ श्लोक 44 के साथ

अध्याय 217

श्लोक 48

ततो विभुः प्रवरवराहरूपधृग् वृषाकपिः प्रसभमथैकदंष्ट्रया ।समुद्धरन् धरणिमतुल्यविक्रमो महायशाः सकलहितार्थमच्युतः

tato vibhuḥ pravaravarāharūpadhṛg vṛṣākapiḥ prasabhamathaikadaṃṣṭrayā | samuddharan dharaṇimatulyavikramo mahāyaśāḥ sakalahitārthamacyutaḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! इस तरह उस समय श्रेष्ठ त्राहरूप धारण करके सर्वव्यापी हरिहररूप अनुपम पराक्रमी महायशस्वी अच्युतने सबके हितके लिये पृथ्वीको बलपूर्वक एक दाँतसे ऊपरको उठाया था

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.