Harivamsha Purana
199
अध्याय 199 / 318

Parva 3, Adhyāya 16

46 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ46 श्लोक

अध्याय 199

श्लोक 1

सृष्टिविषयकवर्णनस्य प्रसङ्गे ज्ञानस्य योगस्य च विचारः शृणुष्वैकमना राजन् पञ्चेन्द्रियसमाहितः ।कथां कथयतो राजन् निर्विकारेण चेतसा

sṛṣṭiviṣayakavarṇanasya prasaṅge jñānasya yogasya ca vicāraḥ śṛṇuṣvaikamanā rājan pañcendriyasamāhitaḥ | kathāṃ kathayato rājan nirvikāreṇa cetasā

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्‌ ! तुम पाँचों इन्द्रियों तथा मनको एकाग्र करके निर्विकार चित्तसे मेरी कही हुई कथा सुनो

अध्याय 199

श्लोक 2

ब्रह्मसम्बन्धसम्बद्धमबद्धं कर्मभिर्नृप ।पुरस्ताद् ब्रह्म सम्पन्नं ब्रह्मणो यददक्षिणम्

brahmasambandhasambaddhamabaddhaṃ karmabhirnṛpa | purastād brahma sampannaṃ brahmaṇo yadadakṣiṇam

श्लोक 2–3 का हिन्दी अर्थ

नरेश्रर! जो वेदके सम्बन्धसे अर्थात्‌ वेदमूलक होनेके कारण सबसे सम्बन्ध रखता है, तथापि जो किसीके कर्मोसे बँधा हुआ नहीं है, ब्रह्मा या ब्रह्मवेत्तासे पहलेसे ही जो सबमें अनुगत, नित्यसिद्ध है, दक्षिणाप्रधान यज्ञ आदिसे ऊपर उठा हुआ है और जो अव्यक्त, सबका कारण, नित्य तथा सदसत्स्वरूप है, वह परब्रह्म परमात्मा ही निष्कल पुरुष है, उसीसे स्वयम्भू ब्रह्माजी प्रकट हुए

अध्याय 199

श्लोक 3

अव्यक्तं कारणं यत्तन्नित्यं सदसदात्मकम् ।निष्कलः पुरुषस्तस्मात् सम्बभूवात्मयोनिजः

avyaktaṃ kāraṇaṃ yattannityaṃ sadasadātmakam | niṣkalaḥ puruṣastasmāt sambabhūvātmayonijaḥ

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 199

श्लोक 4

दिव्यो दिव्येन वपुषा सर्वभूतपतिर्विभुः ।अचिन्त्यश्चाव्ययश्चैव युगानां प्रभवोऽव्ययः

divyo divyena vapuṣā sarvabhūtapatirvibhuḥ | acintyaścāvyayaścaiva yugānāṃ prabhavo'vyayaḥ

हिन्दी अर्थ

वे ब्रह्माजी स्वयं तो दिव्य हैं ही, दिव्य शरीरसे भी संयुक्त हैं। वे समस्त प्राणियोंके पालक, प्रभु, अचिन्त्य, निर्विकार, युगोंकी उत्पत्तिकि कारण और अविनाशी हैं

अध्याय 199

श्लोक 5

अभूतश्चाप्यजातश्च सर्वत्र समतां गतः ।अव्यक्तात् परमं यत् तन्नारायणविदो विदुः

abhūtaścāpyajātaśca sarvatra samatāṃ gataḥ | avyaktāt paramaṃ yat tannārāyaṇavido viduḥ

हिन्दी अर्थ

वे अभूत अर्थात्‌ स्वयम्भू हैं, उनका किसी दूसरेसे जन्म नहीं हुआ है—इसलिये अजन्मा हैं, उनका सर्वत्र समानभाव है। जो अव्यक्तसे परे परमात्मतत्त्व है, उसे नारायणके स्वरूपको जाननेवाले उनके उपासक ही जानते हैं

अध्याय 199

श्लोक 6

सर्वतः पाणिपादं तं सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति

sarvataḥ pāṇipādaṃ taṃ sarvato'kṣiśiromukham | sarvataḥ śrutimalloke sarvamāvṛtya tiṣṭhati

हिन्दी अर्थ

उसके सब ओर हाथ और पैर हैं, सब ओर नेत्र, मस्तक और मुख हैं तथा उसके सब ओर कान हैं, वह लोकमें सबको व्याप्त करके स्थित है

अध्याय 199

श्लोक 7

असतश्च सतश्चैव विज्ञेयं तत्र कारणम् ।अव्यक्तो व्यक्तरूपस्थश्चरन्नपि न दृश्यते

asataśca sataścaiva vijñeyaṃ tatra kāraṇam | avyakto vyaktarūpasthaścarannapi na dṛśyate

हिन्दी अर्थ

उसीको असत्‌ और सतूका कारण जानना चाहिये, वह अव्यक्त है; व्यक्त रूपोंमें स्थित होकर विचर रहा है तो भी किसीको दिखायी नहीं देता है

अध्याय 199

श्लोक 8

विकारपुरुषोऽब्यक्तो ह्यरूपी रूपमाश्रितः ।चरत्यचिन्त्यः सर्वेषु गूढोऽग्निरिव दारुषु

vikārapuruṣo'byakto hyarūpī rūpamāśritaḥ | caratyacintyaḥ sarveṣu gūḍho'gniriva dāruṣu

हिन्दी अर्थ

विकारयुक्त अर्थात्‌ क्षर पुरुष रूपवान्‌ है, जिसका अव्यक्त एवं रूपहीन चिन्मय पुरुष परमात्माने आश्रय ले रखा है। जैसे लकड़ियोंमें आग गूढुरूपसे छिपी हुई है, उसी प्रकार वे अचिन्त्य परमात्मा समस्त भूतोंमें गूढ़रूपसे स्थित होकर विचरते हैं

अध्याय 199

श्लोक 9

भूतभव्योद्भवो नाथः परमेष्ठी प्रजापतिः ।प्रभुः सर्वस्य लोकस्य नाम चास्येति तत्त्वतः

bhūtabhavyodbhavo nāthaḥ parameṣṭhī prajāpatiḥ | prabhuḥ sarvasya lokasya nāma cāsyeti tattvataḥ

हिन्दी अर्थ

वे ही भूत, भविष्य और वर्तमानकी उत्पत्तिकि कारण हैं, सबके स्वामी एवं संरक्षक हैं, परमेष्ठी प्रजापति तथा सर्वलोकप्रभु आदि इनके यथार्थ नाम हैं

अध्याय 199

श्लोक 10

अपदात्तु पदो जातस्तस्मान्नारायणोऽभवत् ।अव्यक्तो व्यक्तिमापन्नो ब्रह्मयोगेन कामतः

apadāttu pado jātastasmānnārāyaṇo'bhavat | avyakto vyaktimāpanno brahmayogena kāmataḥ

हिन्दी अर्थ

अपद अर्थात्‌ निर्गुण निराकारसे पद अर्थात्‌ सगुण साकार रूपमें प्रकट हुए वे परमात्मा नार अर्थात्‌ जलको अयन अर्थात्‌ निवासस्थान बनानेके कारण नारायण नामसे प्रसिद्ध हुए। वे पहले अव्यक्त थे, फिर ब्रह्मयोगसे इच्छानुसार संकल्प करके व्यक्तभावको प्राप्त हुए

अध्याय 199

श्लोक 11

ब्रह्मभावे च तं विद्धि सशब्दं लब्धवान् प्रभुः ।प्रभुः सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्येतरस्य च

brahmabhāve ca taṃ viddhi saśabdaṃ labdhavān prabhuḥ | prabhuḥ sarvasya lokasya sthāvarasyetarasya ca

हिन्दी अर्थ

उन्हींको ब्रह्मारूपमें स्थित हुआ समझो । उन्हीं प्रभुने ब्रह्मा नाम प्राप्त किया। वे स्थावर-जड़मरूप सम्पूर्ण जगत्‌के स्वामी हैं

अध्याय 199

श्लोक 12

अहं त्विति स होवाच प्रजा स्रक्ष्यामि भारत ।प्रभवः सर्वभूतानां यस्य तन्तुरिमाः प्रजाः

ahaṃ tviti sa hovāca prajā srakṣyāmi bhārata | prabhavaḥ sarvabhūtānāṃ yasya tanturimāḥ prajāḥ

हिन्दी अर्थ

भारत! उन्होंने पहले-पहल यह संकल्प प्रकट करते हुए कहा कि मैं प्रजाकी सृष्टि करूँगा, अत: वे ही सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिके कारण हैं। यह सारी प्रजा उन्हींकी संतान है

अध्याय 199

श्लोक 13

स्वभावाज्जायते सर्वं स्वभावाच्च तथाभवत् ।अहङ्कारः स्वभावाच्च तथा सर्वमिदं जगत्

svabhāvājjāyate sarvaṃ svabhāvācca tathābhavat | ahaṅkāraḥ svabhāvācca tathā sarvamidaṃ jagat

हिन्दी अर्थ

स्वभावसे ही सबकी उत्पत्ति होती है, स्वभावसे ही परमात्मा पूर्वोक्तरूपमें प्रकट हुआ, स्वभावसे ही अहंकार तथा यह सारा जगत्‌ प्रकट हुआ है

अध्याय 199

श्लोक 14

सर्वव्यापी निरालम्बो ह्यग्राह्योऽथ जयो ध्रुवः ।एष ब्रह्ममयो ज्योतिर्ब्रह्मशब्देन शब्दितः

sarvavyāpī nirālambo hyagrāhyo'tha jayo dhruvaḥ | eṣa brahmamayo jyotirbrahmaśabdena śabditaḥ

हिन्दी अर्थ

यह सर्वव्यापी, आश्रयरहित, इन्द्रियातीत, जयस्वरूप, अविनाशी ज्योतिर्मय ब्रह्मरूप परमात्मा ही ब्रह्मा नामसे प्रतिपादित होता है

अध्याय 199

श्लोक 15

अव्यक्तो व्यक्तिमापन्नः पञ्चभिः क्रतुलक्षणैः ।धारयन्ब्रह्मणो व्यक्तं विविधं चिन्तितं त्वरन्

avyakto vyaktimāpannaḥ pañcabhiḥ kratulakṣaṇaiḥ | dhārayanbrahmaṇo vyaktaṃ vividhaṃ cintitaṃ tvaran

हिन्दी अर्थ

वह स्वरूपसे अव्यक्त होनेपर भी संकल्पसे प्रकट हुए पाँच सूक्ष्मभूतरूप उपाधियोंसे व्यक्तभाव (पुरुषशरीर)-को प्राप्त हुआ और वेदसे ज्ञात हुए विविध संकल्पित जगत्‌को हृदयमें धारण करके उसकी सृष्टिके लिये उतावला हो उठा

अध्याय 199

श्लोक 16

अथ मूर्तिं समाधाय स्वभावाद् ब्रह्मचोदितः ।ससर्ज सलिलं ब्रह्म येन सर्वमिदं ततम्

atha mūrtiṃ samādhāya svabhāvād brahmacoditaḥ | sasarja salilaṃ brahma yena sarvamidaṃ tatam

हिन्दी अर्थ

जिसने इस सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त कर रखा है, उस ब्रह्म तथा स्वभावसे प्रेरित हो शरीर धारण करके ब्रह्माने जलकी सृष्टि की

अध्याय 199

श्लोक 17

वायुं पूर्वमथो दृष्ट्वा यो धातुर्धातृसत्तमः ।धरणाद्धातृशब्दं च लभते लोकसंज्ञितम्

vāyuṃ pūrvamatho dṛṣṭvā yo dhāturdhātṛsattamaḥ | dharaṇāddhātṛśabdaṃ ca labhate lokasaṃjñitam

हिन्दी अर्थ

जलकी सृष्टिसे पहले वायुको स्थित देख जगदूधाता परमेश्वरके अधीन रहनेवाले जो मरीचि आदि धाता हैं, उनमें सबसे श्रेष्ठ ब्रह्माने सबको धारण करनेके कारण लोकप्रसिद्ध धाता नाम प्रात किया

अध्याय 199

श्लोक 18

तदेतद् वायुसम्भूतं कृत्स्नं जगदभूत् पुरा ।एतद् देवैरतिक्रान्तं पूर्वमेव सरस्वति

tadetad vāyusambhūtaṃ kṛtsnaṃ jagadabhūt purā | etad devairatikrāntaṃ pūrvameva sarasvati

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार यह सारा जगत्‌ पहले वायुसे ही प्रकट हुआ और पहलेसे ही समुद्रमें स्थित है, देवता इसे लॉघकर ऊपरको उठ चुके हैं

अध्याय 199

श्लोक 19

पृथक्त्वं गमितं तोयं पृथिवीशब्दमिच्छता ।घनत्वाच्च द्रवत्वाच्च निखिलेनोपलभ्यते

pṛthaktvaṃ gamitaṃ toyaṃ pṛthivīśabdamicchatā | ghanatvācca dravatvācca nikhilenopalabhyate

हिन्दी अर्थ

पृथ्वी शब्दके वाच्यार्थ भूमिकी (उसपर सम्पूर्ण जगत्‌की स्थितिके लिये) अभिलाषा करनेवाले ब्रह्माजीने जलको उससे भिन्न अवस्थामें पहुँचा दिया। एक (जल) -के द्रव पदार्थ होनेसे और दूसरी (पृथ्वी )-के घनीभूत होनेसे दोनोंका भेद स्पष्ट है। पृथ्वी और जलके इस अन्तरको प्रत्यक्ष देखते हैं

अध्याय 199

श्लोक 20

फलत्वात्सीदमाना च सलिले सलिलोद्भवा ।व्याजहार शुभां वाणीं समन्तात्पूरयन्निव

phalatvātsīdamānā ca salile salilodbhavā | vyājahāra śubhāṃ vāṇīṃ samantātpūrayanniva

हिन्दी अर्थ

जलसे प्रकट हुई पृथ्वी उसका फल था कार्यरूप होनेके कारण अपने कारणभूत जलमें जब दूबने और गलने लगी, तब उसकी अधिष्ठात्री देवीने पब ओरके आकाशको गुँजाते हुए-से यह शुभ वाणी कही—

अध्याय 199

श्लोक 21

ऊर्ध्वेऽहं स्थातुमिच्छामि संसीदाम्युद्धरस्व माम् ।गम्भीरे तोयविवरे मूर्तिविक्षोभितान्तरम्

ūrdhve'haṃ sthātumicchāmi saṃsīdāmyuddharasva mām | gambhīre toyavivare mūrtivikṣobhitāntaram

हिन्दी अर्थ

अहो! जलकी इस गहरी गुफामें मैं डूबती और गलती जा रही हूँ। अपने शरीरकी कठोरता था घनीभूततासे मेरा अन्त:करण अत्यन्त क्षुब्ध हो उठा है, अत: मैं जलके ऊपर स्थित होना चाहती हूँ, कोई आकर मेरा उद्धार करो

अध्याय 199

श्लोक 22

ततो मूर्तिधरा देवी सर्वभूतप्ररोहिणी ।यथायोगेन सम्भूता सर्वत्र विषयैषिणी

tato mūrtidharā devī sarvabhūtaprarohiṇī | yathāyogena sambhūtā sarvatra viṣayaiṣiṇī

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर समस्त भूतोंको अड्धुरित करनेवाली पृथ्वीदेवी मूर्तिमती होकर प्रकट हुई और अपने ठहरनेके लिये स्थान चाहती हुई पूर्वोक्त कारणसे सब ओर मुँह करके अपनी रक्षाके लिये पुकारने लगी

अध्याय 199

श्लोक 23

श्रुत्वा च गदितं तस्या गिरं तां च सुभाषिताम् ।वराहरूपमास्थाय निपपात महार्णवे

śrutvā ca gaditaṃ tasyā giraṃ tāṃ ca subhāṣitām | varāharūpamāsthāya nipapāta mahārṇave

हिन्दी अर्थ

उसके मुखसे निकली हुई उस सुभाषित वाणीको सुनकर भगवान्‌ श्रीहरि वाराहरूप धारण करके उस महासागरमें कूद पड़े

अध्याय 199

श्लोक 24

उद्धृत्य सोऽवनिं तोयात्कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ।समाधौ प्रलयं गत्वा प्रलीनो न च दृश्यते

uddhṛtya so'vaniṃ toyātkṛtvā karma suduṣkaram | samādhau pralayaṃ gatvā pralīno na ca dṛśyate

हिन्दी अर्थ

जलसे पृथ्वीको ऊपर उठाकर वह अत्यन्त दुष्कर कर्म करके वे भगवान्‌ समाधिमें लयको प्राप्त अथवा लीन हो अदृश्य हो गये, अपने मूलस्वरूपमें प्रतिष्ठित हो गये

अध्याय 199

श्लोक 25

यत्तद् ब्रह्ममयं ज्योतिराकाशमिति संज्ञितम् ।तत्र ब्रह्मा समुद्भूतः सर्वभूतपितामहः

yattad brahmamayaṃ jyotirākāśamiti saṃjñitam | tatra brahmā samudbhūtaḥ sarvabhūtapitāmahaḥ

हिन्दी अर्थ

श्रीहरिका वह स्वरूप परब्रह्म एवं चिन्मय प्रकाशरूप है, श्रुतिमें उसे आकाश नाम दिया गया है, उसीसे सम्पूर्ण भूतोंके पितामह ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव हुआ है

अध्याय 199

श्लोक 26

अद्यापि मनसा धात्रा धार्यते सर्वयोनिना ।ज्ञानयोगेन सूक्ष्मेण प्रजानां हितकाम्यया

adyāpi manasā dhātrā dhāryate sarvayoninā | jñānayogena sūkṣmeṇa prajānāṃ hitakāmyayā

हिन्दी अर्थ

आज भी सबकी उत्पत्तिके स्थानभूत वे जगदाधार परमेश्वर प्रजाजनोंके हितकी कामनासे सूक्ष्म ज्ञानयोगद्वारा मनसे (शेष, कूर्म आदि रूपसे) इस पृथ्वीको धारण करते हैं

अध्याय 199

श्लोक 27

भित्त्वा तु पृथिवीमध्यमुपयाति समुद्भवम् ।तपनस्तूर्ध्वमातिष्ठन् रश्मिभिः स हसन्निव

bhittvā tu pṛthivīmadhyamupayāti samudbhavam | tapanastūrdhvamātiṣṭhan raśmibhiḥ sa hasanniva

हिन्दी अर्थ

ऊपर रहकर सबको ताप देनेवाले सूर्यदेव अपनी सब ओर फैली हुई किरणोंद्वारा हँसते हुए-से पृथ्वीके मध्यभागका भेदन करके उसके उत्पादक जलके पासतक पहुँच जाते हैं

अध्याय 199

श्लोक 28

तस्य मण्डलमध्यात् तु निःसृतं सोममण्डलम् ।स सनातनजो ब्रह्मा सौम्यं सोमत्वमन्वगात्

tasya maṇḍalamadhyāt tu niḥsṛtaṃ somamaṇḍalam | sa sanātanajo brahmā saumyaṃ somatvamanvagāt

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार अत्यन्त तापके कारण सूर्यमण्डलके मध्य भागसे सोममण्डलका प्रादुर्भाव हुआ । सनातन परमात्मासे प्रकट हुआ वह सोममण्डलका अभिमानी चेतन ब्राह्मण है और सौम्यभाव एवं सोमत्वको प्राप्त है

अध्याय 199

श्लोक 29

सोममण्डलपर्यन्तात् पवनः समजायत ।तदक्षरमयं ज्योतिस्तेजोभिरभिवर्द्धयन्

somamaṇḍalaparyantāt pavanaḥ samajāyata | tadakṣaramayaṃ jyotistejobhirabhivarddhayan

हिन्दी अर्थ

उक्त सोममण्डलके मुखसे जो निःश्वास वायु प्रकट हुई वही अक्षरमय वेदरूप ज्योति है, जो अपने ज्ञानमय प्रकाशसे समस्त जगत्‌की वृद्धि अथवा विस्तार करता हुआ सब अ्थोंका प्रकाशक है

अध्याय 199

श्लोक 30

स तु योगमयाज्ज्ञानात्स्वभावाद्ब्रह्मसम्भवात् ।सृजते पुरुषं दिव्यं ब्रह्मयोनिं सनातनम्

sa tu yogamayājjñānātsvabhāvādbrahmasambhavāt | sṛjate puruṣaṃ divyaṃ brahmayoniṃ sanātanam

हिन्दी अर्थ

वह ख्रष्टा पुरुष योगमय ज्ञान एवं ब्रह्जजनित स्वभावसे सनातन ब्रह्मयोनिरूप दिव्य पुरुषकी सृष्टि करता है

अध्याय 199

श्लोक 31

द्रवं यत्सलिलं तस्य घनं यत्पृथिवी भवत् ।छिद्रं यच्च तदाकाशं ज्योतिर्यच्चक्षुरेव तत्

dravaṃ yatsalilaṃ tasya ghanaṃ yatpṛthivī bhavat | chidraṃ yacca tadākāśaṃ jyotiryaccakṣureva tat

हिन्दी अर्थ

उस पुरुषका जो द्रव है, वही जल है। उसका घनीभाव ही पृथ्वीरूपमें परिणत होता है। उसका जो छिद्र है, वही आकाश है तथा जो नेत्र है; वही तेज है

अध्याय 199

श्लोक 32

वायुना स्पन्दते चैनं सङ्घाताज्ज्योतिसम्भवः ।पुरुषात्पुरुषो भावः पञ्चभूतमयो महान्

vāyunā spandate cainaṃ saṅghātājjyotisambhavaḥ | puruṣātpuruṣo bhāvaḥ pañcabhūtamayo mahān

श्लोक 32–33 का हिन्दी अर्थ

पुरुष अर्थात्‌ ईश्वरसे प्राप्त हुआ जो पुरुषभाव (चैतन्य) है, वही वायुके सहयोगसे इस शरीरको चेष्टाशील बनाता है । इस प्रकार पाँच भूतोंके संघातरूप शरीरको प्राप्त होकर जब चेतन उसमें निवास करता है, तब वहाँ इन्द्रियरूपी ज्योतियों और जठरानलका प्राकट्य होता है। पाँचों भूतोंसे निर्मित जो विराट शरीर है, उसमें भी वही अन्तर्यामी भूतात्मा निवास करता है । विभिन्न प्रकारके जो शरीर हैं, वे सभी उसके लिये सम हैं, अत: वह सनातन परमात्मा उन सबमें अनादि कालसे विराजमान है। वह ज्ञानस्वरूप ब्रह्म सबकी बुद्धिरूप गुहामें स्थित है तथा वह सनातन परमेश्रर ही योगबलसे अपने स्वरूपभूत उस ज्ञानका साक्षात्कार करनेवाला है

अध्याय 199

श्लोक 33

भूतात्मा वै समे तस्मिंस्तस्मिन् देहे सनातनः ।गुहायां निहितं ज्ञानं योगाद् यज्ज्ञः सनातनः

bhūtātmā vai same tasmiṃstasmin dehe sanātanaḥ | guhāyāṃ nihitaṃ jñānaṃ yogād yajjñaḥ sanātanaḥ

अर्थ श्लोक 32 के साथ

अध्याय 199

श्लोक 34

तपनस्यैव तद्रूपं योऽग्निर्वसति देहिनाम् ।शरीरे नित्यशो युक्तं धातुभिः सह सङ्गतः

tapanasyaiva tadrūpaṃ yo'gnirvasati dehinām | śarīre nityaśo yuktaṃ dhātubhiḥ saha saṅgataḥ

हिन्दी अर्थ

देहधारियोंके शरीरमें जो अप्रिका वास है, वह अग्रि सूर्यका ही स्वरूप है। इसी प्रकार पाँचों भूतोंसे सदा संयुक्त रहनेवाले शरीरमें उन भूतोंसे मिला हुआ जो जीवात्मा है, वह उस सनातन परमात्माका ही अंश है

अध्याय 199

श्लोक 35

स्वभावात्क्षयमायाति स्वभावाद् भयमेति च ।स्वभावाद्विन्दते शान्तिं स्वभावाच्चन विन्दति

svabhāvātkṣayamāyāti svabhāvād bhayameti ca | svabhāvādvindate śāntiṃ svabhāvāccana vindati

हिन्दी अर्थ

वह जीवात्मा क्षयशील धातुओंके साथ संगत है, अत: अपने स्वरूपको भूलकर उस मोहयुक्त स्वभावसे ही क्षयको प्राप्त होता है (वह नित्य अक्षय होनेपर भी अज्ञानवश देहके क्षयसे अपनेको क्षयशील मानता है)। उस स्वभावसें ही उसे अपने स्वरूप और ऐश्वर्यके नाशका भय प्राप्त होता है। स्वभावसे ही वह शरीरकी स्वस्थतासे शान्तिका अनुभव करता है और उसके अस्वस्थ हो जानेपर स्वभावत: उसे शान्ति नहीं मिलती है

अध्याय 199

श्लोक 36

इन्द्रियैरतिमूढात्मा मोहितो ब्रह्मणः पदे ।सम्भवं निधनं चैव कर्मभिः प्रतिपद्यते

indriyairatimūḍhātmā mohito brahmaṇaḥ pade | sambhavaṃ nidhanaṃ caiva karmabhiḥ pratipadyate

हिन्दी अर्थ

इन्द्रियोंके वेगसे अत्यन्त मूढचित्त हुआ मानव ब्रह्मपद (परमात्माके स्वरूप)- की ओरसे मोहित (ज्ञानशून्य) हो जाता है और कर्मोंसे बँधा रहकर जन्म-मरणको प्राप्त होता रहता है

अध्याय 199

श्लोक 37

यावत् तद् ब्रह्मविषयं नोपयाति ह तत्त्वतः ।तावत् संसारमाप्नोति सम्भवांश्च पुनः पुनः

yāvat tad brahmaviṣayaṃ nopayāti ha tattvataḥ | tāvat saṃsāramāpnoti sambhavāṃśca punaḥ punaḥ

हिन्दी अर्थ

जबतक तत्त्वज्ञानके द्वारा वह ब्रह्मानन्दके साम्राज्यमें नहीं पहुँच जाता, तबतक उसे संसार तथा उसमें बारम्बार जन्म-मरणकी प्राप्ति होती रहती है

अध्याय 199

श्लोक 38

इन्द्रियैर्व्यतिरिक्तो वै यदा भवति योगवित् ।तदा ब्रह्मत्वमापन्नः प्रलयाग्रे प्रतिष्ठति

indriyairvyatirikto vai yadā bhavati yogavit | tadā brahmatvamāpannaḥ pralayāgre pratiṣṭhati

हिन्दी अर्थ

जब योगवेत्ता पुरुष योगबलसे अपनेको इन्द्रियोंसे पृथक्‌ उनका नियन्ता समझ लेता है, तब वह ब्रह्मभावको प्राप्त होकर अपने स्वरूपभूत आनन्दमें प्रतिष्ठित हो जाता है

अध्याय 199

श्लोक 39

प्रतिषिद्धममुं लोकं ब्रह्मवान् स भवत्युत ।न च रागव्ययैर्याति न च सज्जति कर्हिचित्

pratiṣiddhamamuṃ lokaṃ brahmavān sa bhavatyuta | na ca rāgavyayairyāti na ca sajjati karhicit

हिन्दी अर्थ

वह पुरुष परलोकके भी सुखका परित्याग करके ब्रह्मानन्दसे सम्पन्न होता है, फिर तो वह राग-द्वेषादिके कारण हीनावस्थाको नहीं प्राप्त होता और न कहीं उसकी आसक्ति ही होती है

अध्याय 199

श्लोक 40

आगतिं च गतिं चैव निधनं सम्भवं तथा ।भूतेभ्यो वेत्ति सर्वज्ञः परां सिद्धिमुपागतः

āgatiṃ ca gatiṃ caiva nidhanaṃ sambhavaṃ tathā | bhūtebhyo vetti sarvajñaḥ parāṃ siddhimupāgataḥ

हिन्दी अर्थ

वह सर्वज्ञ एवं परम सिद्धिको प्राप्त होकर समस्त प्राणियों को प्राप्त होनेवाले आवागमन और जन्म-मरणको जानता है, परंतु स्वयं उनके चक्करमें नहीं पड़ता है

अध्याय 199

श्लोक 41

आत्मनो गतयश्चैव तथा विषयगोचरम् ।पुरस्तात्कर्मनिर्वृत्तेः पदे ब्रह्मा प्रतिष्ठितः

ātmano gatayaścaiva tathā viṣayagocaram | purastātkarmanirvṛtteḥ pade brahmā pratiṣṭhitaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मवेत्ता पुरुष अपनी गतियों (मुक्तिके उपायों )-को तथा भूत, वर्तमान और भविष्यके विषयोंको भी जानता है और कर्मोके भावी फलभोगोंकी निवृत्ति हो जानेसे परमपदमें प्रतिष्ठित हो जाता है

अध्याय 199

श्लोक 42

चित्तग्रन्थींश्च मनसा रुन्ध्यात्पूर्वाश्च यातनाः ।भिद्यमानाः प्रलोभेन वायुभिन्नमिवार्णवम्

cittagranthīṃśca manasā rundhyātpūrvāśca yātanāḥ | bhidyamānāḥ pralobhena vāyubhinnamivārṇavam

हिन्दी अर्थ

अत: विवेकी पुरुषको चाहिये कि वह चित्तको बाँधनेवाले काम आदि दोषों तथा प्रबल लोभसे अनेक शाखाओंमें विभक्त होनेवाली उन पूर्ववासनाओंका भी निरोध करे, जो वायुसे विश्वुब्ध होनेवाले समुद्रकी भाँति मनुष्यको क्षोभमें डाल देती हैं

अध्याय 199

श्लोक 43

पच्यते हृदयं नीलं परेभ्यो ज्ञानचक्षुषा ।ब्रह्मप्रोक्तमिवात्मा वै विमुक्तो देहबन्धनात्

pacyate hṛdayaṃ nīlaṃ parebhyo jñānacakṣuṣā | brahmaproktamivātmā vai vimukto dehabandhanāt

हिन्दी अर्थ

ध्याय: + ९८५ इस प्रकार वासनाओंका निरोध करनेवाले पुरुषकी काम आदि दोषोंसे मलिन हुई बुद्धि ज्ञानाग्रिसे तपकर शुद्ध हो जाती है। वह ज्ञान वेदोंमें बताया गया है। जिससे जीवात्मा इस शरीरमें रहते हुए ही उसके बन्धनसे मुक्त हो जाता है

अध्याय 199

श्लोक 44

सृजेदपि परं लोकं संहरेदपि विद्यया ।तेजोमूर्तिरिवाविद्धमिह लोकं च संसृजेत्

sṛjedapi paraṃ lokaṃ saṃharedapi vidyayā | tejomūrtirivāviddhamiha lokaṃ ca saṃsṛjet

हिन्दी अर्थ

तेजोमूर्ति योगी स्वाभिमानी पुरुषकी भाँति योगविद्याके प्रभावसे दूसरे लोककी सृष्टि और संहार भी कर सकता है। वह विश्वामित्र आदिकी भाँति इस लोकका भी पूर्णरूपसे निर्माण कर सकता है

अध्याय 199

श्लोक 45

तिर्यग्योनौ गतांश्चैव कर्मभिर्नियमोपमैः ।तान्यपि प्रतिमुच्येत ब्रह्मयुक्तेन चेतसा

tiryagyonau gatāṃścaiva karmabhirniyamopamaiḥ | tānyapi pratimucyeta brahmayuktena cetasā

हिन्दी अर्थ

वह योगी बेड़ीके समान बाँधनेवाले कर्मोके कारण पशु-पक्षी आदिकी योनियोंमें पड़े हुए जीवोंको भी ब्रह्ममें लगाये हुए अपने चित्तके संकल्पमात्रसे मुक्त कर सकता है तथा उन कर्मॉका बन्धन भी खोल सकता है

अध्याय 199

श्लोक 46

अक्षरं च क्षरं चैव योगकर्माभिविद्यते ।न क्षरं विद्यते तत्र यद् ब्रह्म कर्मभिर्ध्रुवम्

akṣaraṃ ca kṣaraṃ caiva yogakarmābhividyate | na kṣaraṃ vidyate tatra yad brahma karmabhirdhruvam

हिन्दी अर्थ

योग नामक साधना क्षर और अक्षर (भोग और मोक्ष) दोनोंको व्याप्त करके स्थित होती है अर्थात्‌ योगीको भोग और मोक्ष दोनों सुलभ होते हैं। परंतु जो अविनाशी ब्रह्म है, उसमें कर्मोद्वारा उपलक्षित क्षर (क्षणभज्जुर जगत्‌ एवं उसके भोग)-की सत्ता नहीं है

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.