Harivamsha Purana
198
अध्याय 198 / 318

Parva 3, Adhyāya 15

12 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ12 श्लोक

अध्याय 198

श्लोक 1

जनमेजयेन महाभारतवर्णितस्य चरित्रस्य प्रशंसा श्रुतं नः परमं ब्रह्मन् स्ववंशचरितं महत् ।दिव्यमन्योन्यसम्भूतं मानितं बहुभिर्गुणैः

janamejayena mahābhāratavarṇitasya caritrasya praśaṃsā śrutaṃ naḥ paramaṃ brahman svavaṃśacaritaṃ mahat | divyamanyonyasambhūtaṃ mānitaṃ bahubhirguṇaiḥ

हिन्दी अर्थ

5ध्याय:————अ-अशााााण -वर्णित चरित्रकी प्रशंसा जनमेजयने कहा—ब्रह्मनू! मैंने अपने वंशके उत्तम, महान्‌ एवं दिव्य चरित्रका वर्णन सुना, जो हमारे पूर्वजोंके परस्पर सहयोगसे सम्भव हुआ था। वह चरित्र अनेक गुणोंसे सम्मानित है

अध्याय 198

श्लोक 2

छन्दोभिर्वृत्तसञ्जातैः समासैश्च सविस्तरैः ।लघुभिर्मधुराभाषैर्ग्रथितं पदविग्रहैः

chandobhirvṛttasañjātaiḥ samāsaiśca savistaraiḥ | laghubhirmadhurābhāṣairgrathitaṃ padavigrahaiḥ

हिन्दी अर्थ

वह छन्द:शास्त्रोक्त छन्दों, संक्षेप और विस्तारयुक्त छोटे- छोटे पदों तथा मधुर भाषामें ग्रथित किया गया है

अध्याय 198

श्लोक 3

त्रिवर्गेणाभिसम्पन्नं धर्मेणार्थेन भोगिनाम् ।कामेन बहुरूपेण शरीरान्तर्गतेन च

trivargeṇābhisampannaṃ dharmeṇārthena bhoginām | kāmena bahurūpeṇa śarīrāntargatena ca

हिन्दी अर्थ

उसमें धर्म, अर्थ और भोगी पुरुषोंके शरीरके भीतर अनेक रूपसे निवास करनेवाले काम नामक त्रिवर्का भी वर्णन है

अध्याय 198

श्लोक 4

ब्राह्मणानां प्रभावैश्च योधानां च पराक्रमैः ।वैरनिर्यातनैश्चैव प्रतिज्ञानां च पारगैः

brāhmaṇānāṃ prabhāvaiśca yodhānāṃ ca parākramaiḥ | vairaniryātanaiścaiva pratijñānāṃ ca pāragaiḥ

हिन्दी अर्थ

इस चरित्रमें ब्राह्मणोंके प्रभावों, योद्धाओंके पराक्रमों, वैरका बदला लेनेकी घटनाओं तथा प्रतिज्ञाके पारगामी पुरुषोंके तदनुरूप प्रयह्नोंका भी उल्लेख है

अध्याय 198

श्लोक 5

रिपुस्तवसुसम्पन्नैर्नानुबन्धः प्रचोदितः ।वंशयोर्निर्विनाशाय नृपेण द्विज विग्रहात्

ripustavasusampannairnānubandhaḥ pracoditaḥ | vaṃśayornirvināśāya nṛpeṇa dvija vigrahāt

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मनू! जिन लोगोंकी शत्रु भी स्तुति करते थे ऐसे वीर पुरुषोंके चरित्रोंका भी इसमें वर्णन है। राजा (दुर्योधन)-ने पाण्डवोंके साथ जो विग्रह छोड़कर प्रेमपूर्ण सम्बन्ध नहीं स्थापित होने दिया, वही दोनों कुलोंके विनाशका कारण हुआ

अध्याय 198

श्लोक 6

ये च तस्मिन् महारौद्रे सङ्ग्रामे निहता नृपाः ।तेषां सर्वाणि राष्ट्राणि पुत्राः सर्वे प्रपेदिरे

ye ca tasmin mahāraudre saṅgrāme nihatā nṛpāḥ | teṣāṃ sarvāṇi rāṣṭrāṇi putrāḥ sarve prapedire

हिन्दी अर्थ

उस महाभयंकर संग्राममें जो-जो राजा मारे गये थे, उनके समस्त राष्ट्रोंको उन्हींके सभी पुत्रोंने प्राप्त किया

अध्याय 198

श्लोक 7

कौरवः प्रथितो राजा भगवच्छासनानुगः ।धर्मश्च बहुधा प्रोक्तस्त्रयाणां वर्णसम्पदाम् ।शूराणामपि विख्यातः स्वर्गहेतुर्द्विजर्षभ

kauravaḥ prathito rājā bhagavacchāsanānugaḥ | dharmaśca bahudhā proktastrayāṇāṃ varṇasampadām | śūrāṇāmapi vikhyātaḥ svargaheturdvijarṣabha

हिन्दी अर्थ

द्विजश्रेष्ठ! कुरुवंशके सुविख्यात राजा युधिष्ठिर भगवान्‌की आज्ञाके अनुकूल चलते थे। उन्होंने तीनों वर्णोके लिये धर्मका बारम्बार वर्णन किया है। वे शूरवीरोंको स्वर्गकी प्राप्ति करानेके प्रधान हेतुके रूपमें विख्यात हैं

अध्याय 198

श्लोक 8

अनुग्रहार्थं भूतानां नोत्सेकाय कथञ्चन ।चतुर्णां वर्णसंज्ञानां पृयक्पृथगनेकधा

anugrahārthaṃ bhūtānāṃ notsekāya kathañcana | caturṇāṃ varṇasaṃjñānāṃ pṛyakpṛthaganekadhā

हिन्दी अर्थ

उन्होंने किसी तरह अहंकार प्रकट करनेके लिये नहीं, समस्त प्राणियोंपर कृपा करनेके लिये ही चारों वर्णोके पृथक्‌-पृथक्‌ अनेक धर्म बताये हैं

अध्याय 198

श्लोक 9

गर्भवासं पतन्तश्च भूतानां सम्प्रबोधिताः ।पृच्छन्तो देवसञ्चारं क्षीणे पुण्ये च कर्मणि

garbhavāsaṃ patantaśca bhūtānāṃ samprabodhitāḥ | pṛcchanto devasañcāraṃ kṣīṇe puṇye ca karmaṇi

हिन्दी अर्थ

प्राणियोंमेंसे जो लोग गर्भवासमें गिर रहे थे और पुण्यकर्मके क्षीण हो जानेपर पुनः देवलोकमें प्रवेशका उपाय पूछते थे (उन सबके लिये वे पृथक्‌-पृथक्‌ धर्मका उपदेश देते थे)

अध्याय 198

श्लोक 10

दाने यश्चापि संयोगः स चापि बहुधा कृतः ।द्वयोः संयोगविहितं मधु वाग्वचनं तयोः

dāne yaścāpi saṃyogaḥ sa cāpi bahudhā kṛtaḥ | dvayoḥ saṃyogavihitaṃ madhu vāgvacanaṃ tayoḥ

हिन्दी अर्थ

दानमें जो स्वयं लगने और दूसरे लोगोंको भी लगानेका कार्य है, वह भी उन्होंने बहुत बार किया है। जब पाण्डव और श्रीकृष्ण दोनोंका संयोग प्राप्त होता था, तब उनमें बड़ा मधुर वार्तालाप (सत्संग) आरम्भ हो जाता था

अध्याय 198

श्लोक 11

न तच्छक्यं मयाऽऽख्यातुं भारताध्ययनं महत् ।एकाहेन महान् ब्रह्मन्नपि दिव्येन चक्षुषा

na tacchakyaṃ mayā''khyātuṃ bhāratādhyayanaṃ mahat | ekāhena mahān brahmannapi divyena cakṣuṣā

हिन्दी अर्थ

महान्‌ ब्राह्मणदेव ! महाभारतका जो विशाल अध्ययन है, उसका एक दिनमें दिव्य दृष्टिसि भी महत्त्व बताना मेरे लिये असम्भव है

अध्याय 198

श्लोक 12

ब्रह्मणोऽह्नस्तु विस्तारं सङ्क्षेपं च सुसङ्ग्रहम् ।श्रोतुमिच्छामि भगवन्महत्कौतूहलं हि मे

brahmaṇo'hnastu vistāraṃ saṅkṣepaṃ ca susaṅgraham | śrotumicchāmi bhagavanmahatkautūhalaṃ hi me

हिन्दी अर्थ

भगवन्‌! मैं ब्रह्माजीके दिन (या यज्ञ)-का विस्तार, संक्षेप और उत्तम संग्रह सुनना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे हृदयमें बड़ा कौतूहल है

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.