Harivamsha Purana
197
अध्याय 197 / 318

Parva 3, Adhyāya 14

65 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ65 श्लोक

अध्याय 197

श्लोक 1

ब्रह्मणः त्रिभिः पुत्रैः परमपदस्य प्राप्तिः, तत्पश्चात् तेन मैथुनीसृष्ट्याः विस्तारं, दक्षकन्यानां सन्ततीनां वर्णनं स्थित्वा तस्मिंस्तु कमले ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः ।ऊर्ध्वबाहुर्महाबाहुस्तपो घोरं समाश्रितः

brahmaṇaḥ tribhiḥ putraiḥ paramapadasya prāptiḥ, tatpaścāt tena maithunīsṛṣṭyāḥ vistāraṃ, dakṣakanyānāṃ santatīnāṃ varṇanaṃ sthitvā tasmiṃstu kamale brahmā brahmavidāṃ varaḥ | ūrdhvabāhurmahābāhustapo ghoraṃ samāśritaḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—उस समय ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महाबाहु ब्रह्माजी उस कमलपर खड़े हो दोनों बहिं ऊपर उठाकर घोर तपस्यामें लग गये

अध्याय 197

श्लोक 2

ज्वलन्निव च तेजस्वी भाभिः स्वाभिस्तमोनुदः ।बभासे सर्वधर्मज्ञः सहस्रांशुरिवांशुमान्

jvalanniva ca tejasvī bhābhiḥ svābhistamonudaḥ | babhāse sarvadharmajñaḥ sahasrāṃśurivāṃśumān

हिन्दी अर्थ

वे तेजसे प्रज्वलित-से हो रहे थे और अपनी प्रभाओंसे अन्धकारका निवारण करते थे। सम्पूर्ण धर्मोके ज्ञाता ब्रह्माजी उस समय सहस्र किरणोंवाले अंशुमाली सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे थे

अध्याय 197

श्लोक 4

अथान्यद्रूमास्थाय शम्भुर्नारायणोऽव्ययः ।द्विधा कृत्वाऽऽत्मनाऽऽत्मानमचिन्त्यात्मा सनातनः।३॥ आजगाम महातेजा योगाचार्यो महायशाः ।साङ्ख्याचार्यश्च मतिमान् कपिलो ब्राह्मणो वरः

athānyadrūmāsthāya śambhurnārāyaṇo'vyayaḥ | dvidhā kṛtvā''tmanā''tmānamacintyātmā sanātanaḥ|3|| ājagāma mahātejā yogācāryo mahāyaśāḥ | sāṅkhyācāryaśca matimān kapilo brāhmaṇo varaḥ

अध्याय 197

श्लोक 5

देवर्षिभिस्तु तावेतौ ब्रह्म ब्रह्मविदां वरौ ।उभावपि महात्मानावूर्जितौ क्षेत्रतत्परौ

devarṣibhistu tāvetau brahma brahmavidāṃ varau | ubhāvapi mahātmānāvūrjitau kṣetratatparau

अध्याय 197

श्लोक 6

तौ प्राप्तावूचतुस्तत्र ब्रह्माणममितौजसम् ।परावरविशेषज्ञौ पूजितौ परमर्षिभिः

tau prāptāvūcatustatra brahmāṇamamitaujasam | parāvaraviśeṣajñau pūjitau paramarṣibhiḥ

अध्याय 197

श्लोक 7

बहुत्वाद् दृढपादश्च विश्वात्मा जगतः स्थितिः ।ग्रामणीः सर्वलोकानां ब्रह्मा लोकगुरुर्वरः

bahutvād dṛḍhapādaśca viśvātmā jagataḥ sthitiḥ | grāmaṇīḥ sarvalokānāṃ brahmā lokagururvaraḥ

हिन्दी अर्थ

उन्होंने इस प्रकार कहा—लोक बहुत हैं, अत: उन समस्त लोकोंके नेता और गुरु ब्रह्माजी सबसे श्रेष्ठ हैं। वे ही सम्पूर्ण विश्वके आत्मा तथा जगत्‌की प्रतिष्ठा हैं। उनके विश, तैजस, प्राज्ञ और तुरीय नामक पाद सुदृढ़ हैं

अध्याय 197

श्लोक 8

तयोस्तद् वचनं श्रुत्वा तिस्रो व्याहृतयो जपन् ।त्रीनिमान्कृतवाँल्लोकान्यथाह ब्राह्मणी श्रुतिः

tayostad vacanaṃ śrutvā tisro vyāhṛtayo japan | trīnimānkṛtavā~llokānyathāha brāhmaṇī śrutiḥ

हिन्दी अर्थ

उन दोनोंकी यह बात सुनकर भू:, भुवः, स्व:—इन तीनों व्याहहतियोंका जप करते हुए ब्रह्माजीने इन तीनों लोकोंकी सृष्टि की, जैसा कि ब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति कहती है

अध्याय 197

श्लोक 9

पुत्रं भूसंज्ञकं चैव समुत्पादितवान् प्रभुः ।ततोऽग्रे तद्गतस्नेहो ब्रह्मा मानसमव्ययम्

putraṃ bhūsaṃjñakaṃ caiva samutpāditavān prabhuḥ | tato'gre tadgatasneho brahmā mānasamavyayam

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ ब्रह्माने पहले भूनामक मानस पुत्रको उत्पन्न किया, जो अव्यय (विकाररहित) था। उनके मनमें उस पुत्रके प्रति बड़ा स्रेह था

अध्याय 197

श्लोक 10

सोत्पन्नस्त्वग्रे ब्रह्माणमुवाच मानसः सुतः ।करोमि किं ते साहाय्यं ब्रवीतु भगवानिति

sotpannastvagre brahmāṇamuvāca mānasaḥ sutaḥ | karomi kiṃ te sāhāyyaṃ bravītu bhagavāniti

हिन्दी अर्थ

पहले उत्पन्न हुए उस मानसिक पुत्रने ब्रह्माजीसे पूछा—' भगवन्‌ ! बताइये! मैं आपकी क्या सहायता करूँ

अध्याय 197

श्लोक 11

ब्रह्मोवाच ।य एष कपिलो नाम ब्रह्मा नारायणस्तथा ।वदते वरदस्त्वां तु तत्कुरुष्व महामते

brahmovāca | ya eṣa kapilo nāma brahmā nārāyaṇastathā | vadate varadastvāṃ tu tatkuruṣva mahāmate

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजीने कहा—महामते! ये जो कपिल नामक ब्रह्मा तथा वरदायक नारायण हैं, ये तुमसे जो कुछ कहें, वही करो

अध्याय 197

श्लोक 12

ब्रह्मणोक्तस्तदा भूयः संशयं समुपस्थितः ।शुश्रूषुरस्मि युवयोः किं कुर्मीति कृताञ्जलिः

brahmaṇoktastadā bhūyaḥ saṃśayaṃ samupasthitaḥ | śuśrūṣurasmi yuvayoḥ kiṃ kurmīti kṛtāñjaliḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उस समय ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेपर भूनामक पुत्रको यह संशय हुआ कि मेरे पिताजीसे भी बढ़कर कौन है ? तथापि उन दोनोंके पास गया और हाथ जोड़कर इस प्रकार बोला—'मैं आप दोनोंका सेवक हूँ, कहिये! क्या सेवा करूँ2'

अध्याय 197

श्लोक 13

परमेश्वरावूचतुः यत् सत्यमक्षरं ब्रह्म ह्यष्टादशनिधं स्मृतम् ।यत् सत्यममृतं चैव परं तत् समनुस्मर

parameśvarāvūcatuḥ yat satyamakṣaraṃ brahma hyaṣṭādaśanidhaṃ smṛtam | yat satyamamṛtaṃ caiva paraṃ tat samanusmara

हिन्दी अर्थ

वे दोनों परमेश्वर बोले—जो सत्य एवं अविनाशी ब्रह्म है, उसके अठारह पाश माने गये हैं। (इन पाशोंसे मुक्त होनेके लिये) जो सत्‌ एवं अमृत परम तत्त्व है, उसका तुम निरन्तर चिन्तन करते रहो

अध्याय 197

श्लोक 14

एतद् वचो निशम्याथ स ययौ दिशमुत्तराम् ।गत्वा च तत्र ब्रह्मत्वमगज्ज्ञानचक्षुषा

etad vaco niśamyātha sa yayau diśamuttarām | gatvā ca tatra brahmatvamagajjñānacakṣuṣā

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उनकी यह बात सुनकर वह ब्रह्माजीका भूनामक मानस पुत्र उत्तर दिशाको चला गया, वहाँ जाकर वह ज्ञानदृष्टिसे विचार करके ब्रह्मभावको प्रात हो गया

अध्याय 197

श्लोक 15

ततो ब्रह्मा भुवर्नाम द्वितीयमसृजत् प्रभुः ।सङ्कल्पयित्वा च पुनर्मनसैव महामनाः

tato brahmā bhuvarnāma dvitīyamasṛjat prabhuḥ | saṅkalpayitvā ca punarmanasaiva mahāmanāḥ

हिन्दी अर्थ

तब महामनस्वी भगवान्‌ ब्रह्माने पुन: मनसे ही संकल्प करके भुवर्‌ नामक दूसरे पुत्रकी सृष्टि की

अध्याय 197

श्लोक 16

ततः सोऽप्यब्रवीद् वाक्यं किं कुर्मीति पितामहम् ।पितामहसमाज्ञप्तो ब्रह्माणौ समुपस्थितः

tataḥ so'pyabravīd vākyaṃ kiṃ kurmīti pitāmaham | pitāmahasamājñapto brahmāṇau samupasthitaḥ

हिन्दी अर्थ

तब उसने भी पितामह ब्रह्माजीसे वही बात कही कि 'मैं आपकी क्या सेवा करूँ?' फिर ब्रह्माजीकी आज्ञा पाकर वह पूर्वोक्त दोनों ब्रह्माओं (कपिल और नारायण)-की सेवामें उपस्थित हुआ

अध्याय 197

श्लोक 17

ब्रह्मभ्यां सहितः सोऽथ भूयो भागवतीं गतः ।प्राप्तश्च परमं स्थानं स तयोः पार्श्वमागतः

brahmabhyāṃ sahitaḥ so'tha bhūyo bhāgavatīṃ gataḥ | prāptaśca paramaṃ sthānaṃ sa tayoḥ pārśvamāgataḥ

हिन्दी अर्थ

ने गये आठ और दस पाशोंको एकत्र करके उनकी अठारह संख्या याँ, २. पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, ३. अन्तःकरणचतुष्टय, ४. पश्चविध प्राण, विद्या । ये पुर्यष्टक कहलाते हैं । इनमेंसे अविद्याको छोड़कर और किये गये हैं। उन दोनोंके पास आकर वह पुनः उनके साथ ही भागवती गति परम पदको प्राप्त हो गया

अध्याय 197

श्लोक 18

तस्मिन्नपि गते पुत्रं तृतीयमसृजत् प्रभुः ।मोक्षोपायेति कुशलं भूर्भुवर्नाम तं विभुः

tasminnapi gate putraṃ tṛtīyamasṛjat prabhuḥ | mokṣopāyeti kuśalaṃ bhūrbhuvarnāma taṃ vibhuḥ

हिन्दी अर्थ

उसके भी चले जानेपर वैभवशाली भगवान्‌ ब्रह्माने ' भूभुवर्‌' नामक तीसरे पुत्रको उत्पन्न किया, जो मोक्षसाधनमें अत्यन्त कुशल था

अध्याय 197

श्लोक 19

आससाद स तद्धर्मं तयोरेवागमद् गतिम् ।एवं पुत्रास्त्रयोऽप्येते उक्ताः शम्भोर्महात्मनः

āsasāda sa taddharmaṃ tayorevāgamad gatim | evaṃ putrāstrayo'pyete uktāḥ śambhormahātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

वह भी अपने पूर्वजोंके ही धर्मको प्राप्त हुआ और उसने भी उन्हींकी गति प्राप्त की। इस प्रकार ब्रह्माजीके इन तीनों पुत्रोंको उन कल्याणकारी महात्मा कपिल एवं नारायणने उपदेश दिया (और मुक्त किया) था

अध्याय 197

श्लोक 20

तान् गृहीत्वा सुतांस्तस्य प्रययौ स्वां गतिं तथा ।नारायणोऽथ भगवान् कपिलश्च यतीश्वरः

tān gṛhītvā sutāṃstasya prayayau svāṃ gatiṃ tathā | nārāyaṇo'tha bhagavān kapilaśca yatīśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजीके उन तीनों मानस पुत्रोंको साथ लेकर वे भगवान्‌ नारायण और यतीश्वर कपिल अपने स्वरूपको प्राप्त हुए

अध्याय 197

श्लोक 21

यं कालं तौ गतौ मुक्तौ ब्रह्मा तत्कालमेव तु ।तेपे घोरतरं भूयः स तपः संशितव्रतः

yaṃ kālaṃ tau gatau muktau brahmā tatkālameva tu | tepe ghorataraṃ bhūyaḥ sa tapaḥ saṃśitavrataḥ

हिन्दी अर्थ

जिस समय वे कपिल और नारायण अपने स्वरूपको प्रात एवं मुक्त हुए, उसी समय कठोर ब्रतका पालन करनेवाले ब्रह्माजीने पुन: घोरतर तपस्या प्रारम्भ की

अध्याय 197

श्लोक 22

न रराम ततो ब्रह्मा प्रभुरेकस्तपश्चरन् ।शरीरार्द्धमथो भार्यां समुत्पादितवाञ्छुभाम्

na rarāma tato brahmā prabhurekastapaścaran | śarīrārddhamatho bhāryāṃ samutpāditavāñchubhām

हिन्दी अर्थ

उस समय अकेले तपस्या करते हुए भगवान्‌ ब्रह्माजी जब उसमें रम न सके, तब उन्होंने एक शुभलक्षणा भार्या उत्पन्न की, जो उनके शरीरका आधा भाग थी

अध्याय 197

श्लोक 23

तपसा तेजसा चैव वर्चसा नियमेन च ।सदृशीमात्मनो भार्यां समर्थां लोकसर्जने

tapasā tejasā caiva varcasā niyamena ca | sadṛśīmātmano bhāryāṃ samarthāṃ lokasarjane

हिन्दी अर्थ

तप, तेज, कान्ति और नियमकी दृष्टिसे उन्होंने सर्वथा अपने अनुरूप भार्याकी सृष्टि की थी, जो लोकोंकी सृष्टि करनेमें समर्थ थी

अध्याय 197

श्लोक 24

तया सह ततस्तत्र रेमे ब्रह्मा तपोमयः ।सृजन् प्रजापतीन् सर्वान्सागरान् सरितस्तथा

tayā saha tatastatra reme brahmā tapomayaḥ | sṛjan prajāpatīn sarvānsāgarān saritastathā

हिन्दी अर्थ

तब तपोमय जीवन व्यतीत करनेवाले ब्रह्माजी वहाँ उसके साथ रमण करने लगे । उस समय उन्होंने समस्त प्रजापतियों, सागरों और सरिताओंकी सृष्टि की थी

अध्याय 197

श्लोक 25

ततोऽसृजद् वै त्रिपदां गायत्रीं वेदमातरम् ।अकरोच्चैव चत्वारो वेदान् गायत्रिसम्भवान्

tato'sṛjad vai tripadāṃ gāyatrīṃ vedamātaram | akaroccaiva catvāro vedān gāyatrisambhavān

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ ब्रह्माजीने नेदमाता त्रिपदा गायत्रीकी सृष्टि की, फिर गायत्रीसे प्रकट हुए. चारों वेदोंका संकलन किया

अध्याय 197

श्लोक 26

आत्मार्थे चासृजत् पुत्राँल्लोककर्तॄन् पितामहः ।विश्वे प्रजानां पतयो येभ्यो लोका विनिःसृताः

ātmārthe cāsṛjat putrā~llokakartṝn pitāmahaḥ | viśve prajānāṃ patayo yebhyo lokā viniḥsṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

इसके बाद पितामह ब्रह्माने अपने लिये भी अनेक लोकस्रष्टा पुत्र उत्पन्न किये। वे सब-के-सब प्रजापति थे, जिनसे पमस्त लोकोंका प्रादुर्भाव हुआ है

अध्याय 197

श्लोक 27

विश्वेशं प्रथमं नाम महातपसमात्मजम् ।सर्वाश्रमतमं पुण्यं नाम्ना धर्मं स सृष्टवान्

viśveśaṃ prathamaṃ nāma mahātapasamātmajam | sarvāśramatamaṃ puṇyaṃ nāmnā dharmaṃ sa sṛṣṭavān

हिन्दी अर्थ

उनके प्रथम पुत्रका नाम विश्वेश था, वह महातपस्वी हुआ। फिर उन्होंने धर्म नामक दूसरे पुत्रकी सृष्टि की, जो सभी आश्रमोंमें श्रेष्ठ और पवित्र माना गया है

अध्याय 197

श्लोक 28

दक्षं मरीचिमत्रिं च पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् ।वसिष्ठं गौतमं चैव भृगुमङ्गिरसं मनुम्

dakṣaṃ marīcimatriṃ ca pulastyaṃ pulahaṃ kratum | vasiṣṭhaṃ gautamaṃ caiva bhṛgumaṅgirasaṃ manum

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ ब्रह्माजीने दक्ष, मरीचि, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, तसिष्ठ, गौतम, भूगु, अज्ञिरा और मनुको उत्पन्न किया

अध्याय 197

श्लोक 29

अथर्वभूता इत्येते ख्याता ब्रह्ममहर्षयः ।त्रयोदशसुतानां तु ये वंशा वै महर्षिणाम्

atharvabhūtā ityete khyātā brahmamaharṣayaḥ | trayodaśasutānāṃ tu ye vaṃśā vai maharṣiṇām

हिन्दी अर्थ

थे विख्यात ब्रहार्षि अथर्वस्वरूप कहे गये हैं । ब्रह्माजीके थे तेरह पुत्र महर्षि हैं। इनके जो वंश हैं (उनका वर्णन किया जाता है)

अध्याय 197

श्लोक 30

अदितिर्दितिर्दनुः काला दनायुः सिंहिका मुनिः ।प्रबोधा सुरसा क्रोधा विनता कद्रुरेव च

aditirditirdanuḥ kālā danāyuḥ siṃhikā muniḥ | prabodhā surasā krodhā vinatā kadrureva ca

श्लोक 30–31 का हिन्दी अर्थ

भारत! तुम्हारा कल्याण हो। अदिति, दिति, दनु, काला, दनायु, सिंहिका, मुनि, प्रबोधा, सुरसा, क्रोधा, विनता और कद्रू-ये दक्षप्रजापतिकी बारह कन्याएँ हैं। जो सत्ताईस तेजस्वी क्षत्र हैं, वे भी दक्षकी ही कन्याएँ हैं

अध्याय 197

श्लोक 31

दक्षस्यैता दुहितरः कन्या द्वादश भारत ।नक्षत्राणि च भद्रं ते सप्तविंशतिरूर्जिताः

dakṣasyaitā duhitaraḥ kanyā dvādaśa bhārata | nakṣatrāṇi ca bhadraṃ te saptaviṃśatirūrjitāḥ

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 197

श्लोक 32

मरीचेः कश्यपः पुत्रस्तपसा निर्मितः प्रभुः ।तस्मै कन्या द्वादशेमा दक्षस्ता अन्वमन्यत

marīceḥ kaśyapaḥ putrastapasā nirmitaḥ prabhuḥ | tasmai kanyā dvādaśemā dakṣastā anvamanyata

हिन्दी अर्थ

मरीचिके पुत्र प्रभावशाली कश्यप हुए, जिनकी पपस्याद्वारा सृष्टि की गयी थी। दक्षने अपनी ये बारह कन्याएँ उम्हींको व्याह दीं

अध्याय 197

श्लोक 33

नक्षत्राख्यानि सोमाय वसवे दत्तवानृषिः ।रोहिण्यादीनि सर्वाणि पुण्यानि जनमेजय

nakṣatrākhyāni somāya vasave dattavānṛṣiḥ | rohiṇyādīni sarvāṇi puṇyāni janamejaya

हिन्दी अर्थ

जनमेजय! रोहिणी आदि जो सारी पुण्य नक्षत्रस्वरूपा कन्याएँ थीं, उन्हें पहर्षि दक्षने सोम नामक वसुको व्याह दिया

अध्याय 197

श्लोक 34

लक्ष्मीः कीर्तिस्तथा साध्या विश्वा कामानुगा शुभा ।देवी मरुत्वती चैव ब्रह्मणा निर्मिता पुरा

lakṣmīḥ kīrtistathā sādhyā viśvā kāmānugā śubhā | devī marutvatī caiva brahmaṇā nirmitā purā

हिन्दी अर्थ

लक्ष्मी, कीर्ति, साध्या, इच्छानुसार विचरनेवाली शुभ लक्षणा विश्वा और देवी मरुत्वती-इन पाँच कन्याओंको ूर्वकालमें ब्रह्माजी (दक्ष प्रजापति)-ने उत्पन्न किया था

अध्याय 197

श्लोक 35

एताः पञ्च वरिष्ठा वै सुरश्रेष्ठाय भारत ।दत्ता धर्माय भद्रं ते ब्रह्मणा दृष्टधर्मणा

etāḥ pañca variṣṭhā vai suraśreṣṭhāya bhārata | dattā dharmāya bhadraṃ te brahmaṇā dṛṣṭadharmaṇā

हिन्दी अर्थ

भारत! तुम्हारा कल्याण हो, धर्मदर्शी ब्रह्मा (दक्ष)-ने ये पाँच श्रेष्ठ कन्याएँ सुरश्रेष्ठ धर्मको दे दीं

अध्याय 197

श्लोक 36

या रूपार्द्धमयी पत्नी ब्रह्मणः कामरूपिणी ।सुरभिः सा तु गौर्भूत्वा ब्रह्माणं समुपस्थिता

yā rūpārddhamayī patnī brahmaṇaḥ kāmarūpiṇī | surabhiḥ sā tu gaurbhūtvā brahmāṇaṃ samupasthitā

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजीकी जो इच्छाके अनुसार रूप धारण करनेवाली अर्द्धाद्भस्वरूपा पत्नी थी, उसका नाम सुरभि था। वह गायका रूप धारण करके ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित हुई

अध्याय 197

श्लोक 37

ततस्तामगमद् ब्रह्मा मैथुने लोकपूजितः ।लोकसर्जनहेतुज्ञो गवामर्थाय भारत

tatastāmagamad brahmā maithune lokapūjitaḥ | lokasarjanahetujño gavāmarthāya bhārata

हिन्दी अर्थ

भारत! तब लोकसृष्टिके हेतुको जाननेवाले लोकपूजित ब्रह्माजीने गौओंकी उत्पत्तिके लिये सुरभिके साथ मैथुन किया

अध्याय 197

श्लोक 38

जज्ञे चैकादश सुतान् विपुलान् धर्मसंहितान् ।रक्तसन्ध्याभ्रसदृशान् दहनोपमतेजसः

jajñe caikādaśa sutān vipulān dharmasaṃhitān | raktasandhyābhrasadṛśān dahanopamatejasaḥ

हिन्दी अर्थ

उसके गर्भसे उन्होंने ग्यारह पुत्र उत्पन्न किये, जो हृष्ट-पुष्ट, धर्मपरायण, संध्याकालके लाल बादलोंके समान कान्तिमान्‌ तथा अग्रिके तुल्य तेजस्वी थे

अध्याय 197

श्लोक 39

ते रुदन्तो द्रवन्तश्च भगवन्तं पितामहम् ।रोदनाद् रावणाच्चैव ततो रुद्रा इति स्मृताः

te rudanto dravantaśca bhagavantaṃ pitāmaham | rodanād rāvaṇāccaiva tato rudrā iti smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

वे रोते और दौड़ते हुए भगवान्‌ ब्रह्माजीके पास गये। रोदन करने और दौड़नेके कारण वे रुद्र कहलाये

अध्याय 197

श्लोक 40

निरृतिश्चैव सर्पश्च तृतीयो ह्यज एकपात् ।मृगव्याधः पिनाकी च दहनोऽथेश्वरश्च वै

nirṛtiścaiva sarpaśca tṛtīyo hyaja ekapāt | mṛgavyādhaḥ pinākī ca dahano'theśvaraśca vai

श्लोक 40–41 का हिन्दी अर्थ

उनके नाम इस प्रकार हैं-निर्ति, सर्प, तीसरे अजैकपात्‌, मृगव्याध, पिनाकी, दहन, ईश्वर, अहिर्बुध््य, भगवान्‌ कपाली, अपराजित तथा महातेजस्वी सेनानी-ये ग्यारह रुद्र माने गये हैं

अध्याय 197

श्लोक 42

अहिर्बुध्न्यश्च भगवान् कपाली चापराजितः ।सेनानीश्च महातेजा रुद्रा एकादश स्मृताः ४१॥ तस्यामेव सुरभ्यां तु जज्ञे गोवृषभस्तथा ।अकृष्टाश्च तथा माषाः सिकताः प्रश्रयोऽक्षताः

ahirbudhnyaśca bhagavān kapālī cāparājitaḥ | senānīśca mahātejā rudrā ekādaśa smṛtāḥ 41|| tasyāmeva surabhyāṃ tu jajñe govṛṣabhastathā | akṛṣṭāśca tathā māṣāḥ sikatāḥ praśrayo'kṣatāḥ

श्लोक 42–43 का हिन्दी अर्थ

उसी सुरभिके गर्भसे साड़का जन्म हुआ। बिना जोते-बोये होनेवाले अनाज, उड़द, सिकता (लोणी शाक), प्रश्रि, अक्षत (धान, जौ आदि); बकरे, बछड़े, उत्तम अमृत तथा श्रेष्ठ ओषधियाँ-इन सबका प्राकट्य सुरभिसे ही हुआ है

अध्याय 197

श्लोक 43

अजाश्चैव तु वत्साश्च तथैवामृतमुत्तमम् ।ओषध्यः प्रवरा याश्च सुरभ्यां ताः समुत्थिताः

ajāścaiva tu vatsāśca tathaivāmṛtamuttamam | oṣadhyaḥ pravarā yāśca surabhyāṃ tāḥ samutthitāḥ

अर्थ श्लोक 42 के साथ

अध्याय 197

श्लोक 44

धर्माल्लक्ष्म्युद्भवः कामः साध्या साध्यान् व्यजायत ।भवं च प्रभवं चैवमीशानं सुरभी तथा

dharmāllakṣmyudbhavaḥ kāmaḥ sādhyā sādhyān vyajāyata | bhavaṃ ca prabhavaṃ caivamīśānaṃ surabhī tathā

श्लोक 44–45 का हिन्दी अर्थ

धर्मसे लक्ष्मीके गर्भसे कामकी उत्पत्ति हुई। साध्याने साध्य देवताओंको जन्म दिया। ब्रह्माजीकी पत्नी सुरभीने भव, प्रभव और ईशानको उत्पन्न किया। अरुन्धती, आरुणी, विधावसु, बलधुव, विज्ञात हृदयवाले, महिष और तनूज, मत्सर और विभूति-ये सब सुरभिकी संतानें हैं

अध्याय 197

श्लोक 45

अरुन्धत्यारुणी चैव विश्वावसुबलध्रुवौ ।महिषश्च तनूजश्च विज्ञातमनसावपि

arundhatyāruṇī caiva viśvāvasubaladhruvau | mahiṣaśca tanūjaśca vijñātamanasāvapi

अर्थ श्लोक 44 के साथ

अध्याय 197

श्लोक 46

मत्सरश्च विभूतिश्च सर्वाः सुरभिसूनवः ।सुपर्वतं विषं नागं साध्या लोकनमस्कृता

matsaraśca vibhūtiśca sarvāḥ surabhisūnavaḥ | suparvataṃ viṣaṃ nāgaṃ sādhyā lokanamaskṛtā

श्लोक 46–49 का हिन्दी अर्थ

(धर्मकी एक पत्नीका नाम सुरभि भी था।) उस सुरभिने प्रथम धर, द्वितीय अविनाशी ध्रुव, तृतीय विधावसु, चतुर्थ सोमेश्वर, पश्चम पर्वत, छठे योगेन्द्र, सातवें वायु और आठवें निरऋति नामक वसुको उत्पन्न किया। इस प्रकार सुरभीसे धर्मकी संतानें उत्पन्न हुईं

अध्याय 197

श्लोक 47

वासवानुगता देवी जनयामास वै सुतान् ।धरं वै प्रथमं देवं द्वितीयं ध्रुवमव्ययम्

vāsavānugatā devī janayāmāsa vai sutān | dharaṃ vai prathamaṃ devaṃ dvitīyaṃ dhruvamavyayam

अर्थ श्लोक 46 के साथ

अध्याय 197

श्लोक 48

विश्वावसुं तृतीयं च चतुर्थं सोममीश्वरम् ।पञ्चमं पर्वतं चैव योगेन्द्रं तदनन्तरम्

viśvāvasuṃ tṛtīyaṃ ca caturthaṃ somamīśvaram | pañcamaṃ parvataṃ caiva yogendraṃ tadanantaram

अर्थ श्लोक 46 के साथ

अध्याय 197

श्लोक 49

सप्तमं च ततो वायुमष्टमं निरृतिं वसुम् ।धर्मस्यापत्यमित्येवं सुरभ्यां समजायत

saptamaṃ ca tato vāyumaṣṭamaṃ nirṛtiṃ vasum | dharmasyāpatyamityevaṃ surabhyāṃ samajāyata

अर्थ श्लोक 46 के साथ

अध्याय 197

श्लोक 50

विश्वेदेवास्तु विश्वायां धर्माज्जाता इति श्रुतिः ।सुधर्मा च महाबाहुः शङ्खपाच्च महाबलः

viśvedevāstu viśvāyāṃ dharmājjātā iti śrutiḥ | sudharmā ca mahābāhuḥ śaṅkhapācca mahābalaḥ

श्लोक 50–51 का हिन्दी अर्थ

सुना जाता है कि धर्मसे विश्वाके गर्भसे विश्वेदेवोंकी उत्पत्ति हुई है। महाबाहु सुधर्मा, महाबली शज्जुपातू, महाबाहु दक्ष, वपुष्मानू, अनन्त तथा महीरण—ये चाक्षुष मनुके पुत्र हैं (जो विश्वेदेव बनकर उत्पन्न हुए थे)

अध्याय 197

श्लोक 51

दक्षश्चैव महाबाहुर्वपुष्मांश्च तथैव च ।चाक्षुषस्य मनोरेते तथानन्तमहीरणौ

dakṣaścaiva mahābāhurvapuṣmāṃśca tathaiva ca | cākṣuṣasya manorete tathānantamahīraṇau

अर्थ श्लोक 50 के साथ

अध्याय 197

श्लोक 52

विश्वावसुसुपर्वाणौ विष्टरश्च महायशाः ।रुरुश्च ऋषिपुत्रो वै भास्करप्रतिमद्युतिः

viśvāvasusuparvāṇau viṣṭaraśca mahāyaśāḥ | ruruśca ṛṣiputro vai bhāskarapratimadyutiḥ

हिन्दी अर्थ

इनके सिवा विश्वावसु, सुपर्वा, महायशस्वी विष्टर तथा सूर्यके समान तेजस्वी ऋषिपुत्र रु भी (विश्वेदेव हुए थे)

अध्याय 197

श्लोक 53

विश्वेदेवान्देवमाता विश्वेशाञ्जनयत्सुतान् ।मरुत्वती मरुत्वत्तो देवानजनयच्छुभान्

viśvedevāndevamātā viśveśāñjanayatsutān | marutvatī marutvatto devānajanayacchubhān

हिन्दी अर्थ

इन सामर्थ्यशाली विश्वेदेवोंको देवमाता विश्वाने पुत्ररूपमें उत्पन्न किया था। मरुत्वतीने मरुत्वानू नामवाले शुभलक्षण देवताओंको जन्म दिया

अध्याय 197

श्लोक 54

अग्निं चक्षुर्हविर्ज्योतिः सावित्रं मित्रमेव च ।अमरं शरवृष्टिं च सङ्क्षयं च महाभुजम्

agniṃ cakṣurhavirjyotiḥ sāvitraṃ mitrameva ca | amaraṃ śaravṛṣṭiṃ ca saṅkṣayaṃ ca mahābhujam

श्लोक 54–56 का हिन्दी अर्थ

उनके नाम इस प्रकार हैं—अग्रि, चक्षु, हवि, ज्योति, सावित्र, मित्र, अमर, शरवृष्टि, महाबाहु संक्षय, विरज, शुक्र, विश्वावसु, विभावसु, अश्मन्त, चित्ररश्मि, राजा निष्कुपित, हूयमान, हृति, चारित्र, बहुपन्नग, बृहन्त, बृहद्रूप तथा परतापन

अध्याय 197

श्लोक 55

विरजं चैव शुक्रं च विश्वावसुविभावसू ।अश्मन्तं चित्ररश्मिं च तथा निष्कुपितं नृपम्

virajaṃ caiva śukraṃ ca viśvāvasuvibhāvasū | aśmantaṃ citraraśmiṃ ca tathā niṣkupitaṃ nṛpam

अर्थ श्लोक 54 के साथ

अध्याय 197

श्लोक 56

हूयमानं च हूतिं च चारित्रं बहुपन्नगम् ।बृहन्तं च बृहद्रूपं तथैव परतापनम्

hūyamānaṃ ca hūtiṃ ca cāritraṃ bahupannagam | bṛhantaṃ ca bṛhadrūpaṃ tathaiva paratāpanam

अर्थ श्लोक 54 के साथ

अध्याय 197

श्लोक 57

मरुत्वत्यां पुरा धर्माज्जज्ञे पुत्रद्वयं शुभम् ।अदित्यां जज्ञिरे राजन्नादित्याः कश्यपादथ ।इन्द्रो विष्णुर्भगस्त्वष्टा वरुणोंऽशोऽर्यमा रविः

marutvatyāṃ purā dharmājjajñe putradvayaṃ śubham | adityāṃ jajñire rājannādityāḥ kaśyapādatha | indro viṣṇurbhagastvaṣṭā varuṇoṃ'śo'ryamā raviḥ

श्लोक 57–58 का हिन्दी अर्थ

पूर्वकालमें धर्मसे मरुत्वतीके गर्भसे दो शुभलक्षण पुत्र और उत्पन्न हुए थे। राजन्‌! कश्यपसे अदितिके गर्भसे बारह आदित्य उत्पन्न हुए, जिनके नाम यों हैं—इन्द्र, विष्णु, भग, त्वष्टा, वरुण, अंश, अर्यमा, रवि, पूषा, मित्र, वरदायक मनु और पर्जन्य—ये बारह आदित्य श्रेष्ठ देवता हैं

अध्याय 197

श्लोक 58

पूषा मित्रश्च वरदो मनुः पर्जन्य एव च ।इत्येते द्वादशादित्या वरिष्ठास्त्रिदिवौकसः

pūṣā mitraśca varado manuḥ parjanya eva ca | ityete dvādaśādityā variṣṭhāstridivaukasaḥ

अर्थ श्लोक 57 के साथ

अध्याय 197

श्लोक 59

आदित्यस्य सरस्वत्यां जज्ञे पुत्रद्वयं शुभम् ।रूपश्रेष्ठं बलश्रेष्ठं त्रिदिवे रूपिणां वरम्

ādityasya sarasvatyāṃ jajñe putradvayaṃ śubham | rūpaśreṣṭhaṃ balaśreṣṭhaṃ tridive rūpiṇāṃ varam

हिन्दी अर्थ

आदित्यके सरस्वतीके गर्भसे दो शुभलक्षण पुत्र उत्पन्न हुए, जो रूप और बलमें श्रेष्ठ थे। वे स्वर्गके रूपवान्‌ पुरुषोंमें सबसे उत्तम थे

अध्याय 197

श्लोक 60

दनुस्तु दानवाञ्जज्ञे दितिर्दैत्यान् व्यजायत ।काला नु कालकेयांश्च ह्यसुरान्राक्षसांस्तथा

danustu dānavāñjajñe ditirdaityān vyajāyata | kālā nu kālakeyāṃśca hyasurānrākṣasāṃstathā

हिन्दी अर्थ

दनुने दानवोंको जन्म दिया। दितिने दैत्योंको उत्पन्न किया। कालाने कालकेयों, असुरों तथा राक्षसोंको पैदा किया

अध्याय 197

श्लोक 61

दनायुषायास्तनया व्याधयश्चाधयस्तथा ।सिंहिका ग्रहमाता च गन्धर्वजननी मुनिः

danāyuṣāyāstanayā vyādhayaścādhayastathā | siṃhikā grahamātā ca gandharvajananī muniḥ

हिन्दी अर्थ

दनायुषाके पुत्र आधि और व्याधि हुए; सिंहिका राहुग्रहकी माता और मुनि गन्धर्वोंकी जननी हुई

अध्याय 197

श्लोक 62

प्रबोधाप्सरसां माता सुरसायां सरीसृपाः ।क्रोधायाः सर्वभूतानि पिशाचाश्चैव भारत

prabodhāpsarasāṃ mātā surasāyāṃ sarīsṛpāḥ | krodhāyāḥ sarvabhūtāni piśācāścaiva bhārata

हिन्दी अर्थ

भारत! प्रबोधा अप्सराओंकी माता हुई। सुरसाके गर्भसे पर्प हुए। क्रोधासे सम्पूर्ण भूतों और पिशाचोंका जन्म दुआ

अध्याय 197

श्लोक 63

तथा यक्षगणाश्चैव गुह्यकाश्च विशाम्पते ।चतुष्पदानि सर्वाणि ऋते गावस्तु सौरभाः

tathā yakṣagaṇāścaiva guhyakāśca viśāmpate | catuṣpadāni sarvāṇi ṛte gāvastu saurabhāḥ

हिन्दी अर्थ

प्रजानाथ! यक्षणण, गुह्मक तथा समस्त नौपाये भी क्रोधाके ही पुत्र हैं। परंतु सुरभिकी संतानभूत हैओंको क्रोधाके पुत्रोंमें नहीं गिनना चाहिये

अध्याय 197

श्लोक 64

अरुणो गरुडश्चैव विनतायां व्यजायत ।महीधरान् सर्पनागान् देवी कद्रूर्व्यजायत

aruṇo garuḍaścaiva vinatāyāṃ vyajāyata | mahīdharān sarpanāgān devī kadrūrvyajāyata

हिन्दी अर्थ

ध्याय: + ९७९ अरुण और गरुड़ विनताके गर्भसे उत्पन्न हुए। देवी कद्रूने पृथ्वीको धारण करनेवाले सर्पों और नागोंको जन्म दिया

अध्याय 197

श्लोक 65

एवं विवृद्धिमगमन् विश्वेलोकाः परस्परम् ।तदा पौष्करके राजन् प्रादुर्भावे महात्मनः

evaṃ vivṛddhimagaman viśvelokāḥ parasparam | tadā pauṣkarake rājan prādurbhāve mahātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! महात्मा श्रीहरिके उस पुष्कर- प्रादर्भावके समय इस प्रकार समस्त लोक एक-दूसरेके सहयोगसे वृद्धिको प्राप्त हुए

अध्याय 197

श्लोक 66

पुराणे पौष्करं चैव मया द्वैपायनाच्छ्रुतम् ।कथितं तेन पूर्वेण यत् कृतं परमर्षिभिः

purāṇe pauṣkaraṃ caiva mayā dvaipāyanācchrutam | kathitaṃ tena pūrveṇa yat kṛtaṃ paramarṣibhiḥ

हिन्दी अर्थ

मैंने गुरुदेव द्वैपायनके मुखसे पुराणमें यह पुष्कर-प्रादुर्भावका प्रसंग सुना है। पहले महर्षियोंने जो कुछ किया था, वह सब उन्होंने मुझसे कहा था

अध्याय 197

श्लोक 67

यश्चेदमग्र्यं प्रथमं पुराणं सदाप्रमत्तः पठते महात्मा ।अवाप्य कामानिह वीतशोकः परत्र स स्वर्गफलानि भुङ्क्ते

yaścedamagryaṃ prathamaṃ purāṇaṃ sadāpramattaḥ paṭhate mahātmā | avāpya kāmāniha vītaśokaḥ paratra sa svargaphalāni bhuṅkte

हिन्दी अर्थ

जो महात्मा पुरुष सावधान होकर इस श्रेष्ठ एवं प्रथम पुराणका सदा पाठ करता है, वह इस जगतमें सम्पूर्ण मनोवाज्छित कामनाओंको प्राप्त करके शोकरहित हो परलोकमें स्वर्गीय फलोंका उपभोग करता है

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.