Harivamsha Purana
200
अध्याय 200 / 318

Parva 3, Adhyāya 17

69 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ69 श्लोक

अध्याय 200

श्लोक 1

मैनाकस्य स्थितिः, मेरुपृष्ठे परमात्मतः ब्रह्मणः प्राकट्यं, मेरोः विशालत्वं, ब्रह्मणा सृष्टिः, ब्रह्मस्य एवं ब्रह्मणः स्वरूपस्य वर्णनं, गङ्गायाः प्रादुर्भावः, सोमस्य उत्पत्तिः, धर्मस्य पादाः, योगःसाधना, ऐश्वर्यात् हानिः, वेदानां प्राकट्यं, यज्ञपुरुषस्य वर्णनं, योगवेत्तोः महिमा, चित्तस्य उपलब्ध्यां कारणं, मोक्षसम्बन्धि कर्मकरणस्य विधानं, कर्मफलत्यागात् मुक्तिः पृथिव्यां यत् कृतं छिद्रं तपनेन विवर्धता ।तस्मिन्न्यस्तोऽथ मैनाकः स्वभावविहितोऽचलः

mainākasya sthitiḥ, merupṛṣṭhe paramātmataḥ brahmaṇaḥ prākaṭyaṃ, meroḥ viśālatvaṃ, brahmaṇā sṛṣṭiḥ, brahmasya evaṃ brahmaṇaḥ svarūpasya varṇanaṃ, gaṅgāyāḥ prādurbhāvaḥ, somasya utpattiḥ, dharmasya pādāḥ, yogaḥsādhanā, aiśvaryāt hāniḥ, vedānāṃ prākaṭyaṃ, yajñapuruṣasya varṇanaṃ, yogavettoḥ mahimā, cittasya upalabdhyāṃ kāraṇaṃ, mokṣasambandhi karmakaraṇasya vidhānaṃ, karmaphalatyāgāt muktiḥ pṛthivyāṃ yat kṛtaṃ chidraṃ tapanena vivardhatā | tasminnyasto'tha mainākaḥ svabhāvavihito'calaḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! बढ़ते हुए सूर्यने पृथ्वीमें जो छिद्र कर दिया था, उसमें स्वभावत: रचे गये मैनाकपर्वतको स्थापित किया गया

अध्याय 200

श्लोक 2

पर्वभिः पर्वतत्वं च लभते नाम संशितम् ।अचलादचलत्वं च स्वभावान्मेरुरेव सः

parvabhiḥ parvatatvaṃ ca labhate nāma saṃśitam | acalādacalatvaṃ ca svabhāvānmerureva saḥ

हिन्दी अर्थ

उसपर बहुत-से पर्व (कामनापूरक चिन्तामणि, कल्पवृक्ष और कामधेनु आदि) हैं, इसलिये उसे ' पर्वत' संज्ञा प्राप्त हुई है। वह अविचल होनेके कारण *'अचल' कहलाता है तथा स्वभावसे ही मेरुके समान स्थित है

अध्याय 200

श्लोक 3

तस्य पृष्ठे सुविस्तीर्णे नगस्य सुमहर्द्धिमान् ।तस्मिंस्तु पुरुषो व्यक्तो वसति ज्योतिसम्भवः ।विहितश्च स्वभावेन तेनैव परमात्मना

tasya pṛṣṭhe suvistīrṇe nagasya sumaharddhimān | tasmiṃstu puruṣo vyakto vasati jyotisambhavaḥ | vihitaśca svabhāvena tenaiva paramātmanā

हिन्दी अर्थ

उस पर्वतके सुविस्तृत पृष्ठभागपर एक महान्‌ समृद्धिशाली, व्यक्तरूपधारी पुरुष निवास करता है, जो ज्योतिर्मय परमेश्वरसे प्रकट हुआ है। उस परमात्माने स्वभावसे ही इस पुरुषकी सृष्टि की है

अध्याय 200

श्लोक 4

यत्तद् ब्रह्ममयं तेजो निहितं शिरसोऽन्तरे ।तस्य ज्योतिर्मयं रूपं दान्तं पुरुषविग्रहम्

yattad brahmamayaṃ tejo nihitaṃ śiraso'ntare | tasya jyotirmayaṃ rūpaṃ dāntaṃ puruṣavigraham

हिन्दी अर्थ

मस्तकवर्ती सहस्रारचक्रमें जो ब्रह्ममय तेज विराजमान है अथवा वेदान्तमें जिस ब्रह्ममय तेजका प्रतिपादन हुआ है, उसीका ज्योतिर्मयस्वरूप इस पुरुषके रूपमें प्रकट होकर प्रकाशित होता है

अध्याय 200

श्लोक 5

वदनादभिनिष्क्रान्तं ज्वलन्तमिव तेजसा ।चतुर्भिर्वदनैर्युक्तं चतुर्भिश्च द्विजोत्तमैः

vadanādabhiniṣkrāntaṃ jvalantamiva tejasā | caturbhirvadanairyuktaṃ caturbhiśca dvijottamaiḥ

हिन्दी अर्थ

उसी पुरुषके मुखसे चार पुखों और चार श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ ब्रह्माजीका प्राकट्य हुआ, जो अपने तेजसे प्रज्वलितसे हो रहे थे

अध्याय 200

श्लोक 6

वक्त्रं व्रह्म समुद्भूतं ब्रह्मा ब्राह्मणपुङ्गवः ।तदेवं तन्महद्भूतं पुनर्भावत्वमागतम्

vaktraṃ vrahma samudbhūtaṃ brahmā brāhmaṇapuṅgavaḥ | tadevaṃ tanmahadbhūtaṃ punarbhāvatvamāgatam

हिन्दी अर्थ

उनका मुख वेद है, जो परमात्माके नि: श्वासरूपसे प्रकट हुआ है। ब्रह्माजी उस वेदके धारण करनेवाले ब्राह्मण शिरोमणि हैं । इस प्रकार वह महान्‌ भूत पुन: पूज्यतमभावकों प्रात हुआ

अध्याय 200

श्लोक 7

उद्धृता पृथिवी देवी पुरस्तात्सलिलाशयात् ।ब्रह्मत्वं ब्रह्मणः स्थानादलोको लोकतां गतः

uddhṛtā pṛthivī devī purastātsalilāśayāt | brahmatvaṃ brahmaṇaḥ sthānādaloko lokatāṃ gataḥ

हिन्दी अर्थ

जिसने पहले महासागरके भीतरसे पृथ्वीदेवीका उद्धार किया था, वही वह महान्‌ भूत है, वही ब्रह्माजीके स्थान मेरुपृष्ठपर जाकर चतुर्मुख ब्रह्माके रूपमें प्रतिष्ठित हुआ, जो वाराहरूपसे पृथ्वीका उद्धार करके अदृश्य हो गये थे, वे ही भगवान्‌ फिर ब्रह्माजीके रूपमें दृष्टिगोचर होने लगे

अध्याय 200

श्लोक 8

पदसन्धौ ब्रह्मलोकं शृङ्गं मेरोस्तदाभवत् ।उच्छ्रितं योजनशतं सहस्रशतमेव च

padasandhau brahmalokaṃ śṛṅgaṃ merostadābhavat | ucchritaṃ yojanaśataṃ sahasraśatameva ca

श्लोक 8–9 का हिन्दी अर्थ

उस समय उन भगवान्‌के दोनों चरणोंकी संधिमें जो मेरुपर्वतका शिखर था, वही ब्रह्मलोक हुआ। उसकी ऊँचाई एक लाख एक सौ योजनकी है। इसी प्रकार उसका विस्तार भी इससे चौगुना है। अथवा कोई भी प्राणी कई सहस््र वर्षोंमें दिव्य ज्ञानके द्वारा भी उसके विस्तारकी गणना नहीं कर सकता

अध्याय 200

श्लोक 9

एवमेव च विस्तारं चतुर्भिर्गुणितं गुणैः ।अथवा नैव सङ्ख्यातुं शक्यं भूतेन केनचित् ।समाः सहस्रैर्बहुभिरपि दिव्येन तेजसा

evameva ca vistāraṃ caturbhirguṇitaṃ guṇaiḥ | athavā naiva saṅkhyātuṃ śakyaṃ bhūtena kenacit | samāḥ sahasrairbahubhirapi divyena tejasā

अर्थ श्लोक 8 के साथ

अध्याय 200

श्लोक 10

चतुर्भिः पार्श्वविस्तारैः शिलाभिरभिसंवृतैः ।नगस्य यस्य राजेन्द्र विस्तारैः शतयोजनैः

caturbhiḥ pārśvavistāraiḥ śilābhirabhisaṃvṛtaiḥ | nagasya yasya rājendra vistāraiḥ śatayojanaiḥ

श्लोक 10–11 का हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र! उसके चारों किनारोंमें चार बड़ी-बड़ी शिलाएँ हैं, जिनसे उसके विस्तृत पार्धभाग घिरे हुए हैं। उन सबके विस्तार सौ-सौ योजन हैं। मेरुपर्वतका विस्तार उन सबसे कोटि-कोटि शतगुना अधिक है—ऐसा नित्यसिद्ध, नित्यब्रह्मपरायण, योगयुक्त ब्रहमवादी पुरुषोंने निश्चय किया है

अध्याय 200

श्लोक 11

कोटिकोटीशतगुणैर्गुणितं ब्रह्मवादिभिः ।योगयुक्तैः सदा सिद्धैर्नित्यं ब्रह्मपरायणैः

koṭikoṭīśataguṇairguṇitaṃ brahmavādibhiḥ | yogayuktaiḥ sadā siddhairnityaṃ brahmaparāyaṇaiḥ

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 200

श्लोक 12

मरुद्भिः सह देवेन्द्रै रुद्रैर्वसुभिरेव च ।आदित्यैर्विश्वसहितै ररक्ष वसुधाधिपान्

marudbhiḥ saha devendrai rudrairvasubhireva ca | ādityairviśvasahitai rarakṣa vasudhādhipān

श्लोक 12–16 का हिन्दी अर्थ

नरेथ्र! भरतनन्दन ! श्रीविष्णु तथा मरुदृणों, देवेन्द्रों, रुद्रों, वसुओं, आदित्यों, विश्वेदेवों एवं विवस्वान्‌ और वरुणके साथ रहकर भगवान्‌ ब्रह्मा उसी ब्रह्म-प्राप्त ब्राह्म शरीरसे भूमि और भूमिपालोंकी रक्षा करते हैं । ब्रह्माजी जिस ब्रह्मको प्राप्त थे, वह ब्रह्म सर्वत्र समभावसे स्थित है, विष्णुमय तेजके रूपमें प्रकाशमान है। बहुत-से नियमोंने जिन्हें अपना अनुगत बना लिया है तथा जो सत्यभाषण एवं ब्रह्मचर्यब्रतके पालनमें तत्पर रहते हैं, उन वेदके पारज़त विद्वान्‌ ब्राह्मणोंने जिसे ब्रह्मके नामसे बताया और जाना है, वही वह ब्रह्म है। इस प्रकार ये तीनों लोक ब्रह्माके दिनमें स्थित रहते हैं। अव्यक्त ब्रह्म भी ब्रहमाके उस दिनमें प्राणयुक्त शरीरके भीतर जीवात्मारूपसे व्यक्त एवं प्रतिष्ठित होता है

अध्याय 200

श्लोक 13

ररक्ष पृथिवीं चैव भगवान् विष्णुना सह ।विवस्वद्वरुणाभ्यां च सङ्घातं गमितं नृप

rarakṣa pṛthivīṃ caiva bhagavān viṣṇunā saha | vivasvadvaruṇābhyāṃ ca saṅghātaṃ gamitaṃ nṛpa

अर्थ श्लोक 12 के साथ

अध्याय 200

श्लोक 14

तेन ब्राह्मेण वपुषा ब्रह्मप्राप्तेन भारत ।यत्तद् विष्णुमयं तेजः सर्वत्र समतां गतम्

tena brāhmeṇa vapuṣā brahmaprāptena bhārata | yattad viṣṇumayaṃ tejaḥ sarvatra samatāṃ gatam

अर्थ श्लोक 12 के साथ

अध्याय 200

श्लोक 15

यत्तद् ब्रह्मेति वै प्रोक्तं ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ।नियमैर्बहुभिः प्राप्तैः सत्यव्रतपरायणैः

yattad brahmeti vai proktaṃ brāhmaṇairvedapāragaiḥ | niyamairbahubhiḥ prāptaiḥ satyavrataparāyaṇaiḥ

अर्थ श्लोक 12 के साथ

अध्याय 200

श्लोक 16

एवमेते त्रयो लोका ब्राह्मेऽहनि समाहिताः ।अहनि ब्रह्म चाव्यक्तं व्यक्तं प्राणे प्रतिष्ठितम्

evamete trayo lokā brāhme'hani samāhitāḥ | ahani brahma cāvyaktaṃ vyaktaṃ prāṇe pratiṣṭhitam

अर्थ श्लोक 12 के साथ

अध्याय 200

श्लोक 17

ब्रह्मणो नियतं कर्म प्रभावेण प्रचोदितम् ।प्रवर्तमानं भावेन शश्वदच्छलवादिनाम्

brahmaṇo niyataṃ karma prabhāveṇa pracoditam | pravartamānaṃ bhāvena śaśvadacchalavādinām

हिन्दी अर्थ

परब्रह्म परमात्माके प्रभाव (निःश्चासरूप वेद)-से प्रतिपादित जो नियत (नित्य) कर्म है, वह जिनकी वाणीमें भी कपट नहीं है, ऐसे पुरुषोंद्वारा यदि निरन्तर शुद्धभावसे किया जाय तो हितकारक होता है

अध्याय 200

श्लोक 18

एतद्धितमिति प्रोक्तं ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ।यदेकं ब्रह्मणः पादं दिष्टत्वं गमितं पदम्

etaddhitamiti proktaṃ brāhmaṇairvedapāragaiḥ | yadekaṃ brahmaṇaḥ pādaṃ diṣṭatvaṃ gamitaṃ padam

हिन्दी अर्थ

वेदोंके पारडत विद्वान्‌ ब्राह्मणोंने इस तरह निष्कामभावसे किये गये कर्मको ही हितकारक बताया है। जिस पदको दिष्ट—प्रारब्ध या पूर्वकृत कर्मका फल बताया गया है, वह विश्व ब्रह्म (परमात्मा)-का एक पाद (लेशमात्र अंश) है*

अध्याय 200

श्लोक 19

बहुत्वाद् विप्रभावानां विश्वशब्दः प्रयुज्यते ।ब्राह्मणैर्ब्रह्म भूतात्मा सत्यव्रतपरायणैः

bahutvād viprabhāvānāṃ viśvaśabdaḥ prayujyate | brāhmaṇairbrahma bhūtātmā satyavrataparāyaṇaiḥ

हिन्दी अर्थ

विश्वको जिसका एक पाद बताया गया है, वह ब्रह्म सम्पूर्ण भूतोंका नित्यसिद्ध आत्मा है (उसे सकाम कर्मोद्वारा नहीं प्राप्त किया जा सकता) तो भी वेदाभ्यासी विप्रोंकें भावोंकी विविधताके कारण सत्यब्रतमें तत्पर रहनेवाले ब्राह्मण इन्द्र, मित्र, वरुण आदि सारे शब्द जिसमें वाचकरूपसे प्रतिष्ठित हैं, उस विश्व शब्दका यज्ञोंमें विनियोग करते हैं। (उन सकाम यज्ञोंद्वारा इन्द्रादि देवोंके ही लोकोंकी प्राति होती है, जो मोक्ष या भगवत्प्राप्तिके सामने नितान्त तुच्छ है। अतः मुमुश्चु पुरुषोंको निष्काम कर्मोद्वारा ही परमात्माकी आराधना करनी चाहिये।)

अध्याय 200

श्लोक 20

विश्वरूपं मनोरूपं बुद्धिरूपं च मानयन् ।एवं द्वन्द्वं स भगवान् प्रथमं मिथुनं सृजत्

viśvarūpaṃ manorūpaṃ buddhirūpaṃ ca mānayan | evaṃ dvandvaṃ sa bhagavān prathamaṃ mithunaṃ sṛjat

हिन्दी अर्थ

विश्वरूप (स्थूल) और मनोरूप (सूक्ष्म)—ये दोनों केवल बुद्धिमात्ररूप हैं। ऐसा जानते हुए उन भगवान्‌ ब्रह्माने पहले स्त्री-पुरुषरूप जोड़ेकी सृष्टि की

अध्याय 200

श्लोक 21

स एव भगवान् विश्वो देव्या सह सनातनः ।विधाय विपुलान्भोगान्ब्रह्मा चरति सानुगः

sa eva bhagavān viśvo devyā saha sanātanaḥ | vidhāya vipulānbhogānbrahmā carati sānugaḥ

हिन्दी अर्थ

वे ही विश्वरूप सनातन भगवान्‌ ब्रह्मा अपनी शक्तिस्वरूपा देवीके साथ विपुल भोगोंकी रचना करके अपने अनुगामी कश्यप आदिके साथ उन्हें आचरण (उपयोग) -में लाते हैं

अध्याय 200

श्लोक 22

स एष भगवान् ब्रह्मा नित्यं ब्रह्मविदां वरः ।निर्वाणपदगन्तॄणामकिञ्चनपथैषिणाम्

sa eṣa bhagavān brahmā nityaṃ brahmavidāṃ varaḥ | nirvāṇapadagantṝṇāmakiñcanapathaiṣiṇām

हिन्दी अर्थ

अकिंचनपथ (संन्यासमार्ग)-पर जानेकी इच्छावाले जो मोक्षरूपी गन्तव्यपदके यात्री हैं, उन ब्रह्मवेत्ताओंके लिये जो सदा वरणीय परमात्मा हैं, वे यह भगवान्‌ ब्रह्मा ही हैं

अध्याय 200

श्लोक 23

सोमात्सोमः समुत्पन्नो धारासलिलविग्रहात् ।ययाभिषिक्तो भूतानामाधिपत्ये महेश्वरः

somātsomaḥ samutpanno dhārāsalilavigrahāt | yayābhiṣikto bhūtānāmādhipatye maheśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

अलुप्त ज्ञानशक्तिसे सम्पन्न परमेश्वरसे ओषधियोंके स्वामी सोम उत्पन्न हुए। उस समय इस सोमके उत्पादक उस परमेश्वरका स्वरूप ऊर्ध्वलोकसे गिरती हुई जलधारा ही थी, जिसने भगवान्‌ महेश्वरको भूतनाथके पदपर अभिषिक्त किया

अध्याय 200

श्लोक 24

अभिषिच्य च भूतेशं कृत्वा कर्म स्वभावतः ।नदति स्म तदा नादं तेन सा ह्युच्यते नदी

abhiṣicya ca bhūteśaṃ kṛtvā karma svabhāvataḥ | nadati sma tadā nādaṃ tena sā hyucyate nadī

हिन्दी अर्थ

वह जलधारा उस समय स्वाभाविकरूपसे भूतनाथ महेश्वरका अभिषेक करके इस महान्‌ कर्मका सम्पादन करनेके पश्चात्‌ कलकलनाद करने लगी। उसके कारण वह नदी कहलाती है

अध्याय 200

श्लोक 25

सा ब्रह्मलोकं सम्भाव्य अभिभूय सहस्रधा ।गां गता गगनाद् देवी सप्तधा प्रससार च

sā brahmalokaṃ sambhāvya abhibhūya sahasradhā | gāṃ gatā gaganād devī saptadhā prasasāra ca

हिन्दी अर्थ

अर्थात्‌ सम्पूर्ण भूत या समस्त भौतिक जगत्‌ इस परमात्माका ब्रह्मलोकका महत्त्व बढ़ाकर मार्ग रोकनेवाले पर्वतोंके पहसत्रों टुकड़े करके वे देवी गगनसे भूतलपर अवतीर्ण हुईं । अत; 'गां गता' इस व्युत्यत्तिकि अनुसार उनका नाम जा हुआ। वे सोत धाराओंमें विभक्त होकर सब ओर फैलीं

अध्याय 200

श्लोक 26

सहस्रधा च राजेन्द्र बहुधा च पुनः पुनः ।इमं लोकममुं चैव भावयन् क्षरसम्भवम्

sahasradhā ca rājendra bahudhā ca punaḥ punaḥ | imaṃ lokamamuṃ caiva bhāvayan kṣarasambhavam

हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र! वे भगवती गड़़ा अनेकानेक नदियों और तीर्थोंके रूपमें सहस््रोंकी संख्यामें विभक्त हुई हैं और बारम्बार विभूतिभेदसे अनेकानेक रूप धारण क्ररती हैं। उन गड्ाजीसे प्रकट हुए सोमदेव अन्न आदिके पौधोंको बढ़ाकर इस भौतिक लोककी और अपनी सुधामयी किरणोंसे परलोककी भी पुष्टि एवं रक्षा क्ररते हैं

अध्याय 200

श्लोक 27

ततो भूतानि रोहन्ति महाभूतफलानि च ।ततः सर्वे क्रियारम्भाः प्रवर्तन्ते मनीषिणाम्

tato bhūtāni rohanti mahābhūtaphalāni ca | tataḥ sarve kriyārambhāḥ pravartante manīṣiṇām

हिन्दी अर्थ

इस लोककी वृद्धि होनेसे जरायुज आदि प्राणी बढ़ते हैं। पृथ्वी, जल और तेज—इन तीनों महाभूतोंके जो ब्रीहि आदि फल हैं, उनकी भी वृद्धि होती है। फिर उन ब्रीहि आदि फलों और मनुष्य आदि प्राणियोंसे मनीषी पुरुषोंकी समस्त क्रियाओंका यथायोग्य आरम्भ होता है

अध्याय 200

श्लोक 28

चतुर्भिर्वदनैस्तस्य मुखपद्माद् विनिःसृता ।तदाक्षरमयी सिद्धिर्दिशत्वं समुपागता

caturbhirvadanaistasya mukhapadmād viniḥsṛtā | tadākṣaramayī siddhirdiśatvaṃ samupāgatā

हिन्दी अर्थ

उन परमे श्वरके मुखारविन्दसे जो चारों वेदोंके रूपोंमें अक्षर ब्रह्ममयी सिद्धि प्रकट हुई, त्रही उपदेशभावको प्राप्त हुई है

अध्याय 200

श्लोक 29

तस्य ज्ञानमयं पुण्यं चतुष्पादं सनातनम् ।पतित्वेनाभवद् देवो ब्रह्मा चात्र पितामहः

tasya jñānamayaṃ puṇyaṃ catuṣpādaṃ sanātanam | patitvenābhavad devo brahmā cātra pitāmahaḥ

हिन्दी अर्थ

उन परमात्माका जो चिन्मय, पुण्यजनक, (ब्रह्मा, उद्दाता, होता और अध्वर्यु—इन) चार पादोंसे युक्त तथा सनातन ( अनादि)- रूप यज्ञ है, उसके अधिपतिरूपसे यहाँ पितामह ब्रह्माजी ही प्रतिष्ठित हुए हैं

अध्याय 200

श्लोक 30

पादा धर्मस्य चत्वारो यैरिदं धार्यते जगत् ।ब्रह्मचर्येण व्यक्तेन गृहस्थेन च पावने

pādā dharmasya catvāro yairidaṃ dhāryate jagat | brahmacaryeṇa vyaktena gṛhasthena ca pāvane

हिन्दी अर्थ

चारों आश्रम धर्मके चार पाद हैं, जिनके द्वारा यह सम्पूर्ण जगत्‌ धारण किया जाता है। प्वाध्यायरूपसे व्यक्त हुए ब्रह्मचर्याश्रमके द्वारा धर्मका एक पैर पुष्ट होता है। पवित्र गृहका आश्रय लेकर पालित होनेवाले गृहस्थाश्रमके द्वारा धर्मका दूसरा चरण परिपुष्ठ होता है

अध्याय 200

श्लोक 31

गुरुभावेन वाक्येन गुह्यगामिनगामिना ।इत्येते धर्मपादाः स्युः स्वर्गहेतोः प्रचोदिताः

gurubhāvena vākyena guhyagāminagāminā | ityete dharmapādāḥ syuḥ svargahetoḥ pracoditāḥ

हिन्दी अर्थ

तपस्याके भारसे गौरवान्वित हुए ानप्रस्थाश्रमके द्वारा धर्मके तीसरे चरणकी पुष्टि होती है तथा आत्मतत्त्वके प्रतिपादक और कूटस्थ ब्रह्मकी प्राप्ति करनेवाले 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यके विचारसे युक्त पंन्यास आश्रमके द्वारा धर्मका चौथा पाद सुदृढ़ होता है। परे ही धर्मके चार चरण हैं, जो स्वर्ग (दिव्य सुख एवं मोक्ष) -की प्राप्तिके लिये शास्त्रों्वारा प्रतिपादित हुए हैं

अध्याय 200

श्लोक 32

न्यायाद् धर्मेण गुह्येन सोमो वर्धति मण्डले ।ब्रह्मणो ब्रह्मचरणाद् वेदा वर्तन्ति शाश्वताः

nyāyād dharmeṇa guhyena somo vardhati maṇḍale | brahmaṇo brahmacaraṇād vedā vartanti śāśvatāḥ

हिन्दी अर्थ

न्यायपूर्वक गुह्मधर्मके पालनसे सोम (सोमाधिष्टित मन) ब्रह्माण्डमण्डलमें वृद्धिको प्राप्त होता है (अर्थात्‌ शयष्टिकि अभिमानको छोड़कर समष्टिकि अभिमानसे पम्पन्न होता है) । वेदके अनुसार ब्रह्मचर्यव्रतके पालन और स्वाध्यायसे सनातन वेद सदा बने रहते हैं

अध्याय 200

श्लोक 33

गृहस्थामभि वाक्येन तृप्यन्ति पितरस्तथा ।ऋषयोऽपि च धर्मेण नगस्य शिरसि स्थिताः

gṛhasthāmabhi vākyena tṛpyanti pitarastathā | ṛṣayo'pi ca dharmeṇa nagasya śirasi sthitāḥ

हिन्दी अर्थ

करी-ये ही उनकी सात धाराएँ हैं। (वन० ८५। ८८) वेदोक्त धर्मसे युक्त गृहस्थोंको भी देखकर मेरुपर्वतके शिखरपर स्थित हुए पितर तथा ऋषि भी उनके धर्मसे तृप्त होते हैं

अध्याय 200

श्लोक 34

नगस्य तस्य सम्पश्य मेरोः शिखरमुत्तमम् ।पद्भ्यां सम्पीड्य वृषणावृषिभिस्तैर्विचार्यते

nagasya tasya sampaśya meroḥ śikharamuttamam | padbhyāṃ sampīḍya vṛṣaṇāvṛṣibhistairvicāryate

हिन्दी अर्थ

उस मेरुपर्वतके उत्तम शिखरको (जिसे ब्रह्मलोक कहा गया है) देखो—उसकी प्रासतिके लिये प्रयत्न करो। (किस तरह सो बताते हैं) ऋषिगण दोनों पैरोंसे अण्डकोषोंको दबाकर सिद्धांसनसे स्थित हो उसका विचार (चिन्तन) करते हैं

अध्याय 200

श्लोक 35

ग्रीवां निगृह्य पृष्ठं च विनाम्य प्रहसन्निव ।नाभिदेशे करौ न्यस्य सर्वशोऽङ्गानि सङ्क्षिपन्

grīvāṃ nigṛhya pṛṣṭhaṃ ca vināmya prahasanniva | nābhideśe karau nyasya sarvaśo'ṅgāni saṅkṣipan

हिन्दी अर्थ

ग्रीवाको मोड़कर दोनों हँसलियोंकी सन्धिमें अपनी ठोढ़ीको सटा दे और पीठको इस तरह भीतरकी ओर झुका दे कि छातीका भाग कुछ ऊँचा हो जाय। फिर हँसते हुए पुरुषके समान मुद्रामें स्थित हो दाँतोंको परस्पर सटने न दे। दोनों हाथोंको नाभिदेशमें रखकर अज्ञलिकी मुद्रामें कर दे अर्थात्‌ बायें हाथके ऊपर दाहिना हाथ रख ले। फिर सब ओरसे अपने अड्लोंको काबूमें रखता हुआ ध्यान लगावे

अध्याय 200

श्लोक 36

मूर्ध्नि ब्रह्म समुत्क्षिप्य मनसापि पितामहः ।असृजन्मनसा विष्णुं योगाद् योगेश्वरस्य च

mūrdhni brahma samutkṣipya manasāpi pitāmahaḥ | asṛjanmanasā viṣṇuṃ yogād yogeśvarasya ca

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार ध्यान लगाते हुए अधिकारी पितामहने मन:प्रधान प्राणके द्वारा ब्रह्म अर्थात्‌ अपने जीवात्माको मूर्था ( भौंहों और नासिकाके मध्यभाग)- में ले जाकर मानसिक संकल्पके द्वारा विष्णु अर्थात्‌ विश्वरूपकी सृष्टि की। ऐसा उन्होंने योगेश्वरके योगसे किया (चित्तवृत्तियोंके निरोधको योग कहते हैं। वह प्राणरोध या प्राणायामके अधीन है। अत: वही योगेश्वर है ) । उसी प्राणायामके योग अर्थात्‌ अभ्याससे उन्होंने पूर्वोक्त रीतिसे जीवको मूर्थामिं स्थापित करके ऐध्चर्य प्राप्त किया। जिससे वे सम्पूर्ण जगत्‌की रचनामें सफल हुए

अध्याय 200

श्लोक 37

व्यतिरिक्तेन्द्रियो विष्णुर्बिम्बाद्बिम्बमिवोद्धृतः ।तेजोमूर्तिधरो देवो नभसीन्दुरिवोदितः

vyatiriktendriyo viṣṇurbimbādbimbamivoddhṛtaḥ | tejomūrtidharo devo nabhasīndurivoditaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रत्याहारकी साधनासे जिनकी इन्द्रियाँ विषयोंसे पृथक्‌ हो गयी थीं, वे योगी पितामह परिच्छिन्नताके घेरेसे पुक्त एवं व्यापक विष्णुरूप हो बिम्बसे प्रकट हुए बिम्बकी भाँति अपने स्वरूपसे ही तेजोमूर्तिधारी नारायणदेवके ूपमें प्रकट हो गये और आकाशमें उदित हुए घन्द्रमाकी भाँति प्रकाशित होने लगे

अध्याय 200

श्लोक 38

रराज ब्रह्मयोगेन सहस्रांशुरिवापरः ।विराजन्नभसो मध्ये प्रभाभिरतुलं प्रभुः

rarāja brahmayogena sahasrāṃśurivāparaḥ | virājannabhaso madhye prabhābhiratulaṃ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

वे आकाशके मध्यभागमें अपनी प्रभाओंसे अनुपम शोभा पानेवाले रूसरे भगवान्‌ सूर्यकी भाँति ब्रह्मयोग (चैतन्यज्योतिके संयोग) -से उद्धासित होने लगे

अध्याय 200

श्लोक 39

नोपलभ्यति मूढात्मा प्रत्यक्षं ब्रह्म शाश्वतम् ।ललाटमध्ये तिष्ठन्तं द्विधाभूतं क्रियां प्रतिम्

nopalabhyati mūḍhātmā pratyakṣaṃ brahma śāśvatam | lalāṭamadhye tiṣṭhantaṃ dvidhābhūtaṃ kriyāṃ pratim

हिन्दी अर्थ

मूढ़चित्त पुरुष प्रत्येक क्रियाके प्रति नियम्य और नियामकरूपसे दो प्वरूपोंमें स्थित हुए और ललाटके मध्यभाग (भौंहों और नासिकाके संधिस्थान) -में विराजमान सनातन ब्रह्म (विष्णु)-का साक्षात्कार नहीं कर पाता है

अध्याय 200

श्लोक 40

ज्योतिश्चक्षुषि सम्बद्धं बिम्बं भास्करसोमयोः ।बुद्ध्या पूर्वं तु पश्यन्ति अध्यात्मविषये रताः

jyotiścakṣuṣi sambaddhaṃ bimbaṃ bhāskarasomayoḥ | buddhyā pūrvaṃ tu paśyanti adhyātmaviṣaye ratāḥ

श्लोक 40–41 का हिन्दी अर्थ

स्य सिद्धासनमिदं भवेत्‌ ॥ ऊपर दूसरा गुल्फ रखकर बैठे। यह सिद्धासन है। सूर्य और चन्द्रमा जिनके देवता हैं, उन इडा और पिज्नला नामक नाड़ियोंमें बिम्बभूत जो चैतन्य ज्योति है, उसीकी धारणा करनी चाहिये। वह नेत्रेन्द्रियमें प्रतिबिम्बित होती है (उसीके द्वारा नेत्रमें रूपको प्रकाशित करनेकी शक्ति प्राप्त हुई है)। पहलेसे अध्यात्मविषयके चिन्तनमें तत्पर रहनेवाले सत्यब्रत- परायण वेदवेत्ता ब्राह्मण विशुद्ध बुद्धिकि द्वारा उसका साक्षात्कार करते हैं। दूसरे लोग कदापि उसका दर्शन नहीं कर पाते हैं। दूसरोंको तो अध्यात्म-शास्त्रका भी ज्ञान नहीं होता, स्वरूपबोध तो दूरकी बात है

अध्याय 200

श्लोक 41

ब्राह्मणा वेदविद्वांसः सत्यव्रतपरायणाः ।नेतरे जातु पश्यन्ति अध्यात्मं नावबुध्यते

brāhmaṇā vedavidvāṃsaḥ satyavrataparāyaṇāḥ | netare jātu paśyanti adhyātmaṃ nāvabudhyate

अर्थ श्लोक 40 के साथ

अध्याय 200

श्लोक 42

हिंसायोगैरयोगात्मा सर्वप्राणचरैर्नृप ।भूतयो भुवि भूतेशो मोहप्राप्तेन चेतसा

hiṃsāyogairayogātmā sarvaprāṇacarairnṛpa | bhūtayo bhuvi bhūteśo mohaprāptena cetasā

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! जो भूतलपर योगजनित ऐश्वर्यसे समस्त प्राणियोंका निग्रह और अनुग्रह करनेमें समर्थ है, वह योगी यदि अपने चित्तको मोहवश योगमें लगाये न रहे तो वे ऐश्वर्य उसे समस्त प्राणियोंका संहार करनेवाले हिंसायोगमें लगाकर उसका पराभव कर देते हैं

अध्याय 200

श्लोक 43

कर्मभिः कुत्सितैरन्यैः सर्वप्राणिवधैषिणाम् ।नराणां योगमाधाय स्वेषु मात्रेषु भारत

karmabhiḥ kutsitairanyaiḥ sarvaprāṇivadhaiṣiṇām | narāṇāṃ yogamādhāya sveṣu mātreṣu bhārata

हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन! वे विभूतियाँ समस्त प्राणियोंके वधकी इच्छावाले मनुष्योंको अपने भोग्य विषयोंके लिये अन्य कुत्सित कर्मोमें लगाकर उन्हें विनाशके गर्तमें गिरा देती हैं

अध्याय 200

श्लोक 44

समाहितमना ब्रह्मन् मोक्षप्राप्तेन हेतुना ।चन्द्रमण्डलसंस्थानाज्ज्योतिश्चान्द्रं महत् तदा

samāhitamanā brahman mokṣaprāptena hetunā | candramaṇḍalasaṃsthānājjyotiścāndraṃ mahat tadā

श्लोक 44–45 का हिन्दी अर्थ

इसलिये मोक्षकी प्रासिके हेतु परब्रह्म परमात्माके चिन्तनमें चित्तको पूर्णरूपसे लगा दे। चन्द्रमण्डल अर्थात्‌ मनके संस्थान (ईशादिरूप)-का परित्याग करके महान्‌ चान्द्र-ज्योति (चैतन्यमय तेज) - में, जिसका स्थान हृदय है, प्रवेश करे। शीघ्र विश्व आनेकी आशड्ासे गायत्री अर्थात्‌ सगुण ब्रह्मके नेत्रकी भाँति प्रकाशक विशुद्ध तेजके भीतर स्थित हो जाय, जो कि अव्यक्तकी उत्पत्तिका स्थान है। वह अकार, उकार, मकार और अर्धमात्रारूपसे अथवा विश्व, तैजस, प्राज्ञ एवं तुरीयरूपसे चार भेदोंमें विभक्त पुरुषरूप है

अध्याय 200

श्लोक 45

प्रविश्य हृदयं क्षिप्रं गायत्र्या नयनान्तरे ।गर्भस्य सम्भवो यश्च चतुर्धा पुरुषात्मकः

praviśya hṛdayaṃ kṣipraṃ gāyatryā nayanāntare | garbhasya sambhavo yaśca caturdhā puruṣātmakaḥ

अर्थ श्लोक 44 के साथ

अध्याय 200

श्लोक 46

ब्रह्मतेजोमयोऽव्यक्तः शाश्वतोऽथ धुवोऽव्ययः ।न चेन्द्रियगुणैर्युक्तो युक्तस्तेजोगुणेन च

brahmatejomayo'vyaktaḥ śāśvato'tha dhuvo'vyayaḥ | na cendriyaguṇairyukto yuktastejoguṇena ca

श्लोक 46–47 का हिन्दी अर्थ

वह पुरुष ब्रह्मचैतन्यमय है। अव्यक्त अर्थात्‌ इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदिका अविषय है। नित्य, कूटस्थ और अव्यय (विकाररहित) है। इन्द्रियोंद्वारा गृहीत होनेवाले रूप आदि गुणोंसे रहित तथा तेजोगुणसे युक्त है। उसकी कान्ति चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल है। वह सदा सत्स्वरूपसे प्रकाशमान है तथा शरीरके आकारमें परिणत हुए लोहित-शुक्ल आदि वर्णोमें आविर्भूत होकर स्थित है। उस प्रकाशमान देवताने अपने नेत्रोंसे ऋग्वेद और यजुर्वेदको प्रकट किया

अध्याय 200

श्लोक 47

चन्द्रांशुविमलप्रख्यो भ्राजिष्णुर्वर्णसंस्थितः ।नेत्राभ्यां जनयद् देवो ऋग्वेदं यजुषा सह

candrāṃśuvimalaprakhyo bhrājiṣṇurvarṇasaṃsthitaḥ | netrābhyāṃ janayad devo ṛgvedaṃ yajuṣā saha

अर्थ श्लोक 46 के साथ

अध्याय 200

श्लोक 48

सामवेदं च जिह्वाग्रादथर्वाणं च मूर्धतः ।जातमात्रास्तु ते वेदाः क्षेत्रं विन्दन्ति तत्त्वतः

sāmavedaṃ ca jihvāgrādatharvāṇaṃ ca mūrdhataḥ | jātamātrāstu te vedāḥ kṣetraṃ vindanti tattvataḥ

श्लोक 48–52 का हिन्दी अर्थ

जिह्ाके अग्रभागसे सामवेदको और मुर्धा (ललाटप्रान्त)-से अथर्ववेदको प्रकट किया है। वे वेद प्रकट होते ही अपने-अपने क्षेत्रका तत्त्वत: वेदन (उपलब्धि) करते हैं, इसलिये उन्हें ' वेद' संज्ञा प्राप्त हुई है। वे उस ब्रह्मपदका वेदन (लाभ) करते हैं, इसलिये भी 'वेद' कहलाते हैं । उस समय वे वेद पहले उस सनातन ब्रह्मको ही अपने-अपने मानसिक भावोंके अनुसार दिव्य रूप और आभासे युक्त विश्व, तैजस, प्राज्ञ एवं तुरीय पुरुष अथवा यज्ञपुरुषके रूपमें प्रकट करते हैं। अथर्ववेदका जो योग है, वह यज्ञपुरुषका सिर माना गया है। जो ऋग्वेदका भाग है, वह उसकी ग्रीवा और भुजाओंके बीचका आज् है। सामवेदके भागसे उस यज्ञपुरुषके हृदय और पार्शभागका निर्माण हुआ है। इसी तरह जो यह यजुर्वेदका भाग है, उसके द्वारा यज्ञपुरुषके पेड़ू और उसके ऊपरके भाग, कटिप्रदेश, ऊरु, जंघा और चरणोंके साथ शेष शरीरकी कल्पना हुई है। वह दिव्य रूप और मायासे युक्त पुरुष अमर—अविनाशी तुरीय पदसे प्रकट हुआ है

अध्याय 200

श्लोक 49

तेन वेदत्वमापन्ना यस्माद् विन्दन्ति तत्पदम् ।ते सृजन्ति तदा वेदा ब्रह्म पूर्वं सनातनम्

tena vedatvamāpannā yasmād vindanti tatpadam | te sṛjanti tadā vedā brahma pūrvaṃ sanātanam

अर्थ श्लोक 48 के साथ

अध्याय 200

श्लोक 50

पुरुषं दिव्यरूपाभं स्वैः स्वैर्भावैर्मनोभवैः ।अथर्वणस्तु यो योगः शीर्षं यज्ञस्य तत् स्मृतम्

puruṣaṃ divyarūpābhaṃ svaiḥ svairbhāvairmanobhavaiḥ | atharvaṇastu yo yogaḥ śīrṣaṃ yajñasya tat smṛtam

अर्थ श्लोक 48 के साथ

अध्याय 200

श्लोक 51

ग्रीवाबाह्वन्तरं चैव ऋग्भागः स भवेत् ततः ।हृदयं चैव पार्श्वं च सामभागस्तु निर्मितः

grīvābāhvantaraṃ caiva ṛgbhāgaḥ sa bhavet tataḥ | hṛdayaṃ caiva pārśvaṃ ca sāmabhāgastu nirmitaḥ

अर्थ श्लोक 48 के साथ

अध्याय 200

श्लोक 52

बस्तिशीर्षं कटीदेशं जङ्घोरुचरणैः सह ।एवमेष यजुर्भागः सङ्घातो यज्ञकल्पितः ।पुरुषो दिव्यरूपाभः सम्भूतो ह्यमरात्पदात्

bastiśīrṣaṃ kaṭīdeśaṃ jaṅghorucaraṇaiḥ saha | evameṣa yajurbhāgaḥ saṅghāto yajñakalpitaḥ | puruṣo divyarūpābhaḥ sambhūto hyamarātpadāt

अर्थ श्लोक 48 के साथ

अध्याय 200

श्लोक 53

स हि वेदमयो यज्ञः सर्वभूतसुखावहः ।उभयोर्लोकयोस्तात हिंसावर्ज्यः सनातनः

sa hi vedamayo yajñaḥ sarvabhūtasukhāvahaḥ | ubhayorlokayostāta hiṃsāvarjyaḥ sanātanaḥ

हिन्दी अर्थ

तात! वह हिंसारहित सनातन वेदमय यज्ञ इहलोक और परलोकमें समस्त प्राणियोंके लिये सुखदायक होता है

अध्याय 200

श्लोक 54

योगारम्भं कर्मसाध्यं ब्रह्मचर्यं सनातनम् ।प्रभवः सर्वभूतानां यो विन्दति स वेदवित्

yogārambhaṃ karmasādhyaṃ brahmacaryaṃ sanātanam | prabhavaḥ sarvabhūtānāṃ yo vindati sa vedavit

हिन्दी अर्थ

योगका आरम्भ मन:संयमरूपी कर्मसे सिद्ध होनेवाला है। यही सनातन ब्रह्मचर्य है। जो इसे जानता है, वह समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिका कारण एवं वेदवेत्ता है

अध्याय 200

श्लोक 55

स सिद्धः प्रोच्यते लोके सिद्धिरेव न संशयः ।निर्मुक्तैः सर्वकर्मभ्यो मुनिभिर्वेदपारगैः

sa siddhaḥ procyate loke siddhireva na saṃśayaḥ | nirmuktaiḥ sarvakarmabhyo munibhirvedapāragaiḥ

हिन्दी अर्थ

समस्त कर्मोके बन्धनसे मुक्त हुए वेदपारज्ञत मुनियोंने लोकमें उसे सिद्ध बताया है। उसको सिद्धि ही प्राप्त होती है, इसमें संशय नहीं है

अध्याय 200

श्लोक 56

वैष्णवं यज्ञमित्येवं ब्रुवते वेदपारगाः ।ब्राह्मणा नियमश्रान्ता वेदोपनिषदे पदे

vaiṣṇavaṃ yajñamityevaṃ bruvate vedapāragāḥ | brāhmaṇā niyamaśrāntā vedopaniṣade pade

हिन्दी अर्थ

वेडोंके पारज्त ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण, जो मनोनिग्रहका अभ्यास करते-करते थक गये हैं, वेदोपनिषद्‌ (ब्रह्मविद्या ।-द्वारा अधिगत होनेवाले स्वाराज्य पदकी प्रासिकि लिये इस प्रकार वैष्णव यज्ञ (योग )-की आवश्यकता बनाते हैं

अध्याय 200

श्लोक 57

चेतसस्तूपलम्भे हि मनोग्राह्यस्य कामतः ।कारणं श्रोतुमिच्छामि यथा त्वं मन्यसे मुने

cetasastūpalambhe hi manogrāhyasya kāmataḥ | kāraṇaṃ śrotumicchāmi yathā tvaṃ manyase mune

हिन्दी अर्थ

जनमेजयने कहा—मुने ! जो इच्छानुसार मनके द्वारा ग्राह्म है अर्थात्‌ ईंधन जल जानेपर आगकी तरह जो स्वयं अपने-आप ही शान्त हो जानेके योग्य है, उस चित्तकी उपलब्धिमें क्या कर्ण है. यह मैं सुनना चाहता हूँ; इस विषयमें आपको जैसी मान्यता हो, वैसा बताइये

अध्याय 200

श्लोक 58

न ह्यस्य कारणं किञ्चिद् बाह्यं भवति भारत ।अन्तर्गतं कारणं तु शारीरं मानसं नृप

na hyasya kāraṇaṃ kiñcid bāhyaṃ bhavati bhārata | antargataṃ kāraṇaṃ tu śārīraṃ mānasaṃ nṛpa

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजीने कहा—भारत! नरेश्वर ! इसका कोई बाह्य कारण नहीं है। अपने भीतर ही इसका कारण मौजूद है। शरीरके द्वारा किया गया जो कर्म है, वही मनमें संस्काररूपसे स्थित हो उसका उद्बोधक होता है (उस चित्तकी उपलब्धिमें कारण बनता है)

अध्याय 200

श्लोक 59

येन वेद्यं विदुर्मर्त्या ब्राह्मणाः संशितव्रताः ।अवेद्यमपि वेद्यं च शक्यं वेत्तुं न कर्मणा

yena vedyaṃ vidurmartyā brāhmaṇāḥ saṃśitavratāḥ | avedyamapi vedyaṃ ca śakyaṃ vettuṃ na karmaṇā

हिन्दी अर्थ

कठोर ब्रतका पालन करनेवाले ब्रह्मवेत्ता मनुष्य जिस चैतन्यसे समस्त ज्ञेय वस्तुओंको जानते हैं, वह आत्मा होनेके कारण अवेद्य है तो भी शास्त्र और आचार्यके उपदेशके पश्चात्‌ लक्षणाद्वारा उसका ज्ञान होता है; परंतु कर्मसे तो उसको किसी तरह नहीं जाना जा सकता

अध्याय 200

श्लोक 60

ब्राह्मणेन विनीतेन सदा ब्रह्मनिषेविणा ।सदा विदिततत्त्वेन सिद्धिहेतोर्महीपते

brāhmaṇena vinītena sadā brahmaniṣeviṇā | sadā viditatattvena siddhihetormahīpate

हिन्दी अर्थ

पृथ्वीनाथ ! वेदोंका अध्ययन करनेवाले ब्राह्मण आदिको चाहिये कि वह मोक्षकी प्राप्तिक लिये विद्याके अहड्डारका त्याग करके विनीतभावसे रहे, सदा ब्रह्मयज्ञ (स्वाध्याय)- का सेवन करे, प्रतिदिन शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे आत्मा और अनात्माके तत्त्वको जाननेका प्रयत्न करे

अध्याय 200

श्लोक 61

सदा चैव शुचिर्भूत्वा नियतो ब्रह्मकर्मणा ।उपतिष्ठेत स गुरुं बद्धाञ्जलिपुटो द्विजः

sadā caiva śucirbhūtvā niyato brahmakarmaṇā | upatiṣṭheta sa guruṃ baddhāñjalipuṭo dvijaḥ

हिन्दी अर्थ

सदा पवित्र रहकर ब्रह्मार्पणभावसे कर्म करते हुए नियमपूर्वक शम आदिके साधनमें लगा रहे। इस प्रकार द्विज दोनों हाथ जोड़कर गुरुकी सेवामें उपस्थित होवे

अध्याय 200

श्लोक 62

सायं प्रातश्च तत्त्वज्ञो मोक्षकर्माणि कारयेत् ।विनीतो ब्रह्मभावेन समाहितमतिर्मुनिः

sāyaṃ prātaśca tattvajño mokṣakarmāṇi kārayet | vinīto brahmabhāvena samāhitamatirmuniḥ

हिन्दी अर्थ

गुरुतत्त्वका ज्ञाता होकर प्रतिदिन साय॑ और प्रात:काल मोक्षसम्बन्धी कर्म (आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान और धारणा) करे, मनमें योगप्राप्तिकि कारण गर्व न आने देकर विनयशील रहे, निरन्तर ब्रह्मकी भावना करते हुए मनको एकाग्र रखे और मौन रहे

अध्याय 200

श्लोक 63

सम्प्रपद्येत मनसा वैष्णवं पदमुत्तमम् ।ध्यायन्नेव प्रसीदेत समाहितमतिर्द्विजः

samprapadyeta manasā vaiṣṇavaṃ padamuttamam | dhyāyanneva prasīdeta samāhitamatirdvijaḥ

हिन्दी अर्थ

वह मनसे उत्तम वैष्णवपद (शुद्ध ब्रह्म)-का चिन्तन करे। इस तरह एकाग्रचित्त हुआ द्विज ध्यानपरायण होकर ही प्रसन्न रहे

अध्याय 200

श्लोक 64

गच्छते परमं ब्रह्म निर्विकारेण चेतसा ।अपुनर्भवभावज्ञो निर्ममो भावबन्धनात्

gacchate paramaṃ brahma nirvikāreṇa cetasā | apunarbhavabhāvajño nirmamo bhāvabandhanāt

हिन्दी अर्थ

मोक्षके स्वरूपको जाननेवाला ममतारहित वह पुरुष चित्तवृत्तियोंका निरोध करके विकाररहित चित्तसे परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है

अध्याय 200

श्लोक 65

तदेवाक्षरमित्याहुर्यत् तद् ब्रह्म सनातनम् ।तर्हि तत्कर्मयोगेन विद्यायोगेन दर्शितम्

tadevākṣaramityāhuryat tad brahma sanātanam | tarhi tatkarmayogena vidyāyogena darśitam

हिन्दी अर्थ

वह जो सनातन ब्रह्म है, उसीको अक्षर कहते हैं। उसीका शास्त्रोंमें निष्काम कर्मयोग और ज्ञानयोगके द्वारा साक्षात्कार कराया गया है

अध्याय 200

श्लोक 66

ब्राह्मणानां विनीतानां वैष्णवे पदसञ्चये ।सर्वद्रव्यातिरिक्तानां कामयोगविगर्हिणाम्

brāhmaṇānāṃ vinītānāṃ vaiṣṇave padasañcaye | sarvadravyātiriktānāṃ kāmayogavigarhiṇām

हिन्दी अर्थ

जो वैष्णवपदकी प्राप्तिकि लिये सर्वस्वका परित्याग करके कामयोग (स्त्री- पुत्र आदिके सज्ध)-की निन्‍्दा करते हैं, उन विनयशील ब्राह्मणोंको उस अक्षर ब्रह्मका ज्ञान होता है

अध्याय 200

श्लोक 67

अपुनर्भाविनां लोकाः कर्मयोगप्रतिष्ठिताः ।अनादानेन मनसा राजन् कर्मणि कर्मणि

apunarbhāvināṃ lokāḥ karmayogapratiṣṭhitāḥ | anādānena manasā rājan karmaṇi karmaṇi

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! जो प्रत्येक कर्ममें मनसे उसके फलको ग्रहण न करके पुनर्जन्मके बन्धनसे ऊपर उठ गये हैं, उनके लोक निष्काम कर्मयोगमें प्रतिष्ठित हैं

अध्याय 200

श्लोक 68

आदानाद् बध्यते जन्तुर्निरादानात् प्रमुच्यते ।ब्राह्मणेभ्यः क्रियावाप्तिर्जन्तोः पूर्वाज्जनाधिप

ādānād badhyate janturnirādānāt pramucyate | brāhmaṇebhyaḥ kriyāvāptirjantoḥ pūrvājjanādhipa

हिन्दी अर्थ

नरेधर! फलको ग्रहण करनेसे जीव बँधता है और उसका त्याग करनेसे मुक्त होता है। जीवको पूर्वजन्मके संस्कारवश ब्राह्मणादि श्रेष्ठ पुरुषोंसे क्रियाओंकी प्राप्ति होती है

अध्याय 200

श्लोक 69

मुक्तश्चेन्द्रियबन्धेन प्राप्तश्च परमं पदम् ।न भूयः पुनरायाति मानुषं देहविग्रहम्

muktaścendriyabandhena prāptaśca paramaṃ padam | na bhūyaḥ punarāyāti mānuṣaṃ dehavigraham

हिन्दी अर्थ

फलका परित्याग करनेवाला पुरुष इन्द्रियोंके बन्धनसे मुक्त हो परमपदको प्राप्त होता है। वह पुन: इस मानव-शरीरमें नहीं आता है

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.