Harivamsha Purana
191
अध्याय 191 / 318

Parva 3, Adhyāya 8

26 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ26 श्लोक

अध्याय 191

श्लोक 1

सत्ययुगादीनां परिमाणानां वर्णनं चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तु कृतं युगम् ।तस्य तावच्छती सन्ध्या द्विगुणा जनमेजय

satyayugādīnāṃ parimāṇānāṃ varṇanaṃ catvāryāhuḥ sahasrāṇi varṣāṇāṃ tu kṛtaṃ yugam | tasya tāvacchatī sandhyā dviguṇā janamejaya

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! विद्वान्‌ पुरुष सत्ययुगकी आयुका प्रमाण चार हजार दिव्य वर्ष बताते हैं। उससे दूने सौ अर्थात्‌ आठ सौ वर्षोकी उसकी संध्या होती है

अध्याय 191

श्लोक 2

तत्र धर्मश्चतुष्पादो ह्यधर्मः पादविग्रहः ।स्वधर्मनिरताः सन्तो यजन्ते चैव मानवाः

tatra dharmaścatuṣpādo hyadharmaḥ pādavigrahaḥ | svadharmaniratāḥ santo yajante caiva mānavāḥ

हिन्दी अर्थ

उस युगमें धर्म अपने चारों चरणोंसे* सम्पन्न होता है तथा अधर्मका सारा शरीर एक ही पैरपर स्थित होता है। उस समय अपने धर्ममें तत्पर रहनेवाले साधु पुरुष प्राय: यज्ञोंद्वारा भगवान्‌का यजन किया करते हैं

अध्याय 191

श्लोक 3

स्थिता धर्मपरा विप्रा राजवृत्तौ स्थिता नृपाः ।कृष्यामभिरता वैश्याः शूद्राः शुश्रूषवस्तथा

sthitā dharmaparā viprā rājavṛttau sthitā nṛpāḥ | kṛṣyāmabhiratā vaiśyāḥ śūdrāḥ śuśrūṣavastathā

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मण स्वधर्मपालनमें तत्पर रहते हैं, राजालोग राजोचित वृत्तिमें स्थित होते हैं, वैश्य कृषिकर्ममें लगे रहते हैं और शूद्र तीनों वर्णोंकी सेवा करते हैं

अध्याय 191

श्लोक 4

सदा सत्यं तपश्चैव धर्मश्चैव विवर्धते ।सद्भिराचरितं यच्च क्रियते ख्यायते च यत्

sadā satyaṃ tapaścaiva dharmaścaiva vivardhate | sadbhirācaritaṃ yacca kriyate khyāyate ca yat

हिन्दी अर्थ

उस युगमें सत्य, तप और धर्मकी सदा ही वृद्धि होती है। साधु पुरुष जिसका आचरण करते हैं, उसीका दूसरोंको उपदेश देते हैं

अध्याय 191

श्लोक 5

एतत् कृतयुगे वृत्तं सर्वेषामेव भारत ।प्राणिनां धर्मबुद्धीनामपि चेन्नीचयोनिनाम्

etat kṛtayuge vṛttaṃ sarveṣāmeva bhārata | prāṇināṃ dharmabuddhīnāmapi cennīcayoninām

हिन्दी अर्थ

भारत ! सत्ययुगमें सभी धर्मबुद्धि प्राणियोंका, वे नीच योनि या नीच कुलमें क्यों न उत्पन्न हुए हों, ऐसा ही बर्ताव होता है

अध्याय 191

श्लोक 6

त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेतायुगमिहोच्यते ।तस्य तावच्छती सन्ध्या द्विगुणा परिकीर्तिता

trīṇi varṣasahasrāṇi tretāyugamihocyate | tasya tāvacchatī sandhyā dviguṇā parikīrtitā

हिन्दी अर्थ

यहाँ तीन हजार दिव्य वर्षोका त्रेतायुग बताया जाता है। उसकी संध्या उससे दुगुने सौ (अर्थात्‌ छः: सौ) वर्षोकी बतायी गयी है

अध्याय 191

श्लोक 7

द्वाभ्यामधर्मः पादाभ्यां त्रिभिर्धर्मो व्यवस्थितः ।तत्र सत्यं च सत्त्वं च कृते सर्वं प्रवर्तते

dvābhyāmadharmaḥ pādābhyāṃ tribhirdharmo vyavasthitaḥ | tatra satyaṃ ca sattvaṃ ca kṛte sarvaṃ pravartate

हिन्दी अर्थ

उस युगमें धर्म तीन पैरोंसे और अधर्म दो पैरोंसे स्थित होता है। सत्ययुगमें सत्य और सत्त्वगुण सब अविकलरूपसे विद्यमान रहते हैं

अध्याय 191

श्लोक 8

त्रेतायां विकृतिं यान्ति वर्णा लौल्येन संयुताः ।चातुर्वर्ण्यस्य वैकृत्याद्यान्ति दौर्बल्यमाश्रिताः

tretāyāṃ vikṛtiṃ yānti varṇā laulyena saṃyutāḥ | cāturvarṇyasya vaikṛtyādyānti daurbalyamāśritāḥ

हिन्दी अर्थ

परंतु त्रेतामें लोलुपता (कर्मफलकी स्पृहा)- से युक्त होनेके कारण सभी वर्ण विकारको प्राप्त होते हैं और चारों वर्णोमें विकृति आनेसे सब लोग दुर्बल हो जाते हैं

अध्याय 191

श्लोक 9

एष त्रेतायुगविधिर्विहितो देवनिर्मितः ।द्वापरस्यापि या चेष्टा तामपि श्रोतुमर्हसि

eṣa tretāyugavidhirvihito devanirmitaḥ | dvāparasyāpi yā ceṣṭā tāmapi śrotumarhasi

हिन्दी अर्थ

यह त्रेतायुगकी स्थिति बतायी गयी, जिसका निर्माण साक्षात्‌ भगवानूने ही किया है। अब द्वापरकी जो चेष्टा है, उसको भी तुम्हें सुन लेना चाहिये

अध्याय 191

श्लोक 10

द्वापरं द्वे सहस्रे तु वर्षाणां कुरुसत्तम ।तस्य तावच्छती सन्ध्या द्विगुणा परिकीर्तिता

dvāparaṃ dve sahasre tu varṣāṇāṃ kurusattama | tasya tāvacchatī sandhyā dviguṇā parikīrtitā

हिन्दी अर्थ

कुरुश्रेष्ठ ! द्वापरयुग दो हजार दिव्य वर्षोका होता है और उसकी संध्या चार सौ वर्षोकी बतायी गयी है

अध्याय 191

श्लोक 11

तत्राप्यर्थपरा विप्रा ज्ञानिनो रजसाऽऽवृताः ।शठा नैष्कृतिकाः क्षुद्रा जायन्ते कुरुपुङ्गव

tatrāpyarthaparā viprā jñānino rajasā''vṛtāḥ | śaṭhā naiṣkṛtikāḥ kṣudrā jāyante kurupuṅgava

हिन्दी अर्थ

कुरुपुज्ञव! उस युगमें भी अर्थपरायण, ज्ञानी, रजोगुणसे आच्छन्न, शठ, दुष्टता करनेवाले और क्षुद्र ब्राह्मण आदि पैदा होते हैं

अध्याय 191

श्लोक 12

द्वाभ्यां धर्मः स्थितः पद्भ्यामधर्मस्त्रिभिरुत्थितः ।विपर्ययं शनैर्यान्ति कृते ये धर्मसेतवः

dvābhyāṃ dharmaḥ sthitaḥ padbhyāmadharmastribhirutthitaḥ | viparyayaṃ śanairyānti kṛte ye dharmasetavaḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय धर्म दो ही पैरोंसे स्थित होता है, किंतु अधर्म तीन पैरोंसे खड़ा होकर क्रमशः उत्थान करने लगता है। सत्ययुगमें जो धर्मकी मर्यादाएँ बँधी होती हैं, वे धीरे- धीरे इस युगमें आकर उलट जाती हैं

अध्याय 191

श्लोक 13

ब्राह्मण्यभावा नश्यन्ति तथास्तिक्यं विशीर्यते ।व्रतोपवासास्त्यज्यन्ते द्वापरे युगपर्यये

brāhmaṇyabhāvā naśyanti tathāstikyaṃ viśīryate | vratopavāsāstyajyante dvāpare yugaparyaye

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मणत्वके भाव नष्ट हो जाते हैं, आस्तिकताकी दीवार ढह जाती है, द्वापरयुगके अन्तमें कलिधर्मका सम्मिश्रण हो जानेके कारण लोग ब्रत और उपवास छोड़ देते हैं

अध्याय 191

श्लोक 14

तथा वर्षसहस्रं तु वर्षाणां द्वे शते तथा ।सन्ध्यया सह सङ्ख्यातं क्रूरं कलियुगं स्मृतम्

tathā varṣasahasraṃ tu varṣāṇāṃ dve śate tathā | sandhyayā saha saṅkhyātaṃ krūraṃ kaliyugaṃ smṛtam

श्लोक 14–15 का हिन्दी अर्थ

उस युगमें अधर्म अपने चारों पैरोंसे सम्पन्न होता है, किंतु धर्मका शरीर एक ही पैरसे टिका रहता है। उस युगके मनुष्य प्राय: कामपरायण और तमोगुणसे आच्छन्न होते हैं

अध्याय 191

श्लोक 15

तत्राधर्मश्चतुष्पादः स्याद् धर्मः पादविग्रहः ।कामनिष्ठास्तमश्छन्ना जायन्ते तत्र मानवाः

tatrādharmaścatuṣpādaḥ syād dharmaḥ pādavigrahaḥ | kāmaniṣṭhāstamaśchannā jāyante tatra mānavāḥ

अर्थ श्लोक 14 के साथ

अध्याय 191

श्लोक 16

नैवोपवासकृत् कश्चिन्न च साधुर्न सत्यवाक् ।आस्तिको ब्रह्मवक्ता वा नरो भवति वै तदा

naivopavāsakṛt kaścinna ca sādhurna satyavāk | āstiko brahmavaktā vā naro bhavati vai tadā

हिन्दी अर्थ

कलिकालमें प्राय: कोई मनुष्य उपवास करनेवाला, साधु, सत्यवादी, आस्तिक तथा ब्रह्जज्ञाका उपदेश करनेवाला नहीं होता है

अध्याय 191

श्लोक 17

अहङ्कारगृहीताश्च प्रक्षीणस्नेहबन्धनाः ।विप्राः शूद्रसमाचाराः शूद्रास्त्वाचारलक्षणाः

ahaṅkāragṛhītāśca prakṣīṇasnehabandhanāḥ | viprāḥ śūdrasamācārāḥ śūdrāstvācāralakṣaṇāḥ

हिन्दी अर्थ

कलियुगके ब्राह्मण अहंकारके वशी भूत तथा स्रेहबन्धनसे शून्य हो शूद्रॉकें समान आचारवाले हो जायँगे और शूद्र सदाचारका पालन करेंगे

अध्याय 191

श्लोक 18

दूषकास्त्वाश्रमाणां च वर्णानां चैव सङ्कराः ।अगम्यास्वभिरंस्यन्ते वर्तन्त्येवं कलौ युगे

dūṣakāstvāśramāṇāṃ ca varṇānāṃ caiva saṅkarāḥ | agamyāsvabhiraṃsyante vartantyevaṃ kalau yuge

हिन्दी अर्थ

लोग आश्रमोंको कलड्ित करेंगे, वर्णसड्टर उत्पन्न होकर अगम्या स्त्रियोंके साथ रमण करेंगे, कलियुगमें प्राय: लोगोंका ऐसा ही बर्ताव होता है

अध्याय 191

श्लोक 19

एवं द्वादशसाहस्रं तदेकं युगमुच्यते ।तदेकसप्ततिगुणं मन्वन्तरमिहोच्यते

evaṃ dvādaśasāhasraṃ tadekaṃ yugamucyate | tadekasaptatiguṇaṃ manvantaramihocyate

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार बारह हजार दिव्य वर्षोका एक चतुर्युग कहलाता है। यहाँ इकहत्तर चतुर्युगोंका एक मन्वन्तर कहा जाता है (इतने समयके बाद एक मनु नष्ट हो जाते हैं)

अध्याय 191

श्लोक 20

त्रय्यां चैव न सन्देहो युगान्ते जनमेजय ।दिव्यं द्वादशसाहस्रं युगं तु कवयो विदुः ।एतत्सहस्रपर्यन्तं तदहो ब्राह्ममुच्यते

trayyāṃ caiva na sandeho yugānte janamejaya | divyaṃ dvādaśasāhasraṃ yugaṃ tu kavayo viduḥ | etatsahasraparyantaṃ tadaho brāhmamucyate

हिन्दी अर्थ

जनमेजय ! युगान्त (प्रलय)-कालमें समस्त चराचर जगत्‌का नाश हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है। तीनों वेदोंमें भी इसका वर्णन मिलता है। ज्ञानी पुरुष बारह हजार दिव्य वर्षोका एक चतुर्युग मानते हैं। इस चतुर्युगकी जब एक सहस््र आवृत्ति हो जाती है, तब उसे ब्रह्माका एक दिन कहते हैं

अध्याय 191

श्लोक 21

ततोऽहनि गते तस्मिन् सर्वेषामेव देहिनाम् ।शरीरनिर्वृतिं दृष्ट्वा रुद्रः संहारबुद्धिमान्

tato'hani gate tasmin sarveṣāmeva dehinām | śarīranirvṛtiṃ dṛṣṭvā rudraḥ saṃhārabuddhimān

श्लोक 21–25 का हिन्दी अर्थ

पृथ्वीनाथ ! तदनन्तर ब्रह्माजीका वह दिन बीतनेपर समस्त देहधारियोंकी शारीरिक सुखमें आसक्ति देखकर संहारकुशल रुद्रदेव समस्त देवताओं, ब्राह्मणों, दैत्यों, मनुष्यों, यक्षों, गन्धर्वों, राक्षसों, देवर्षियों, ब्रह्मर्षियों, राजर्षियों, किन्नरों, अप्सराओं, सर्पों, पर्वतों, नदियों, पशुओं, तिर्यकूयोनिमें पड़े हुए जीवों, मृगों तथा पक्षियोंका भी महान्‌ संहार करते हैं, महाभूतोंके पति वे भूतस्रष्टा भगवान्‌ सारे भूतों एवं जगत्‌का संहार करनेके लिये ही उनकी सृष्टि करते हैं

अध्याय 191

श्लोक 22

देवतानां च सर्वेषां ब्राह्मणानां महीपते ।दैत्यानां मानवानां च यक्षगन्धर्वरक्षसाम्

devatānāṃ ca sarveṣāṃ brāhmaṇānāṃ mahīpate | daityānāṃ mānavānāṃ ca yakṣagandharvarakṣasām

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 191

श्लोक 23

देवर्षीणां ब्रह्मर्षीणां तथा राजर्षिणामपि ।किन्नराणामप्सरसां भुजङ्गानां तथैव च

devarṣīṇāṃ brahmarṣīṇāṃ tathā rājarṣiṇāmapi | kinnarāṇāmapsarasāṃ bhujaṅgānāṃ tathaiva ca

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 191

श्लोक 24

पर्वतानां नदीनां च पशूनां चैव भारत ।तिर्यग्योनिगतानां च सत्त्वानां मृगपक्षिणाम्

parvatānāṃ nadīnāṃ ca paśūnāṃ caiva bhārata | tiryagyonigatānāṃ ca sattvānāṃ mṛgapakṣiṇām

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 191

श्लोक 25

महाभूतपतिर्देवः पञ्चभूतानि भूतकृत् ।जगत्संहरणार्थाय कुरुते वैशसं महत्

mahābhūtapatirdevaḥ pañcabhūtāni bhūtakṛt | jagatsaṃharaṇārthāya kurute vaiśasaṃ mahat

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 191

श्लोक 26

भूत्वा सूर्यश्चक्षुषी चाददानो भूत्वा वायुः संहरन् प्राणिजातम् ।भूत्वा वह्निर्दह्यते सर्वलोकान् मेघो भूत्वा भूय एवाभ्यवर्षत्

bhūtvā sūryaścakṣuṣī cādadāno bhūtvā vāyuḥ saṃharan prāṇijātam | bhūtvā vahnirdahyate sarvalokān megho bhūtvā bhūya evābhyavarṣat

हिन्दी अर्थ

अपने दिनके अन्तमें रुद्रस्वरूप भगवान्‌ ब्रह्मा सूर्य होकर समस्त लोकोंके नेत्र छीन लेते हैं, वायु होकर समस्त प्राणियोंके प्राण हर लेते हैं, अग्नि होकर समस्त लोकोंको दग्ध कर देते और मेघ बनकर पुन: बड़ी भारी वर्षा करते हैं (जिससे सब कुछ एकार्णवमें निमग्र हो जाता है)

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.