अध्याय 190
श्लोक 1
पुष्करप्रादुर्भावस्य विषये जनमेजयस्य प्रश्नं, वैशम्पायनस्य उत्तरं प्रभावं पद्मनाभस्य स्वपतः सागराम्भसि ।पुष्करे वै यथोद्भूता देवाः सर्षिगणाः पुरा
puṣkaraprādurbhāvasya viṣaye janamejayasya praśnaṃ, vaiśampāyanasya uttaraṃ prabhāvaṃ padmanābhasya svapataḥ sāgarāmbhasi | puṣkare vai yathodbhūtā devāḥ sarṣigaṇāḥ purā
श्लोक 1–2 का हिन्दी अर्थ
ध्याय; * ९५५ ध्याय;: -अअााएा यका प्रश्न और वैशम्पायनजीका की महिमाका प्रतिपादन जनमेजयने... पूछा—योगवेत्ताओंके .. स्वामी वैशम्पायनजी ! आप समुद्रके जलमें शयन करनेवाले भगवान् पद्मनाभके प्रभावका वर्णन कीजिये। साथ ही यह भी बताइये कि पुष्करमें—भगवान्के नाभिकमलमें पहले देवताओं और ऋषियोंकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई, इस सम्पूर्ण रहस्यपर प्रकाश डालिये; क्योंकि भगवान् श्रीहरिकी कीर्तिका श्रवण करनेसे मुझे तृप्ति नहीं होती है (अधिकाधिक सुननेकी इच्छा बढ़ती है)