Harivamsha Purana
190
अध्याय 190 / 318

Parva 3, Adhyāya 7

25 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ25 श्लोक

अध्याय 190

श्लोक 1

पुष्करप्रादुर्भावस्य विषये जनमेजयस्य प्रश्नं, वैशम्पायनस्य उत्तरं प्रभावं पद्मनाभस्य स्वपतः सागराम्भसि ।पुष्करे वै यथोद्भूता देवाः सर्षिगणाः पुरा

puṣkaraprādurbhāvasya viṣaye janamejayasya praśnaṃ, vaiśampāyanasya uttaraṃ prabhāvaṃ padmanābhasya svapataḥ sāgarāmbhasi | puṣkare vai yathodbhūtā devāḥ sarṣigaṇāḥ purā

श्लोक 1–2 का हिन्दी अर्थ

ध्याय; * ९५५ ध्याय;: -अअााएा यका प्रश्न और वैशम्पायनजीका की महिमाका प्रतिपादन जनमेजयने... पूछा—योगवेत्ताओंके .. स्वामी वैशम्पायनजी ! आप समुद्रके जलमें शयन करनेवाले भगवान्‌ पद्मनाभके प्रभावका वर्णन कीजिये। साथ ही यह भी बताइये कि पुष्करमें—भगवान्‌के नाभिकमलमें पहले देवताओं और ऋषियोंकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई, इस सम्पूर्ण रहस्यपर प्रकाश डालिये; क्योंकि भगवान्‌ श्रीहरिकी कीर्तिका श्रवण करनेसे मुझे तृप्ति नहीं होती है (अधिकाधिक सुननेकी इच्छा बढ़ती है)

अध्याय 190

श्लोक 2

एतदाख्याहि निखिलं योगं योगविदां पते ।शृण्वतस्तस्य मे कीर्तिं न तृप्तिरभिजायते

etadākhyāhi nikhilaṃ yogaṃ yogavidāṃ pate | śṛṇvatastasya me kīrtiṃ na tṛptirabhijāyate

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 190

श्लोक 3

कियन्तं चैव कालं वै शयिता पुरुषोत्तमः ।किमर्थं च तथा शेते कश्च कालस्य सम्भवः

kiyantaṃ caiva kālaṃ vai śayitā puruṣottamaḥ | kimarthaṃ ca tathā śete kaśca kālasya sambhavaḥ

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ पुरुषोत्तम कितने समयतक और किसलिये एकार्णवके जलमें शयन करते हैं तथा कालकी उत्पत्तिका कारण क्या है?

अध्याय 190

श्लोक 4

कियता चैव कालेन प्रबुध्यति सुराधिपः ।कथमुत्थाय भगवानसृजन्निखिलं जगत्

kiyatā caiva kālena prabudhyati surādhipaḥ | kathamutthāya bhagavānasṛjannikhilaṃ jagat

हिन्दी अर्थ

सुरेधर विष्णु कितने समयमें जागते हैं और उस योगनिद्रासे उठकर वे भगवान्‌ किस प्रकार सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि करते हैं ?

अध्याय 190

श्लोक 5

के प्रजापतयस्तात आसन् पूर्वं महामुने ।कथं निर्मितवांश्चैव चित्रं लोकं सनातनः

ke prajāpatayastāta āsan pūrvaṃ mahāmune | kathaṃ nirmitavāṃścaiva citraṃ lokaṃ sanātanaḥ

हिन्दी अर्थ

तात! महामुने! पूर्वकालमें कौन-कौन-से प्रजापति थे और सनातन श्रीहरिने इस विचित्र जगत्‌की सृष्टि किस प्रकार की थी 2

अध्याय 190

श्लोक 6

कथमेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे ।नष्टे देवासुरगणे प्रणष्टोरगराक्षसे

kathamekārṇave ghore naṣṭe sthāvarajaṅgame | naṣṭe devāsuragaṇe praṇaṣṭoragarākṣase

श्लोक 6–8 का हिन्दी अर्थ

मुने ! उस भयानक एकार्णवमें जब कि समस्त चराचर प्राणी नष्ट हो जाते हैं, देवताओं और असुरोंका भी पता नहीं रहता, नाग और राक्षस भी कालके गालमें चले जाते हैं, अग्नि, वायु, आकाश और भूतलका भी कुछ पता नहीं चलता, महाभूतोंमें भारी उलट-फेर हो जाता है और संसार एक गहन गुफाके समान प्रतीत होता है, महाभूतोंके अधिपति महान्‌ कर्म करनेवाले और महातेजस्वी सुरगुरुश्रेष्ठ भगवान्‌ नारायण कैसे और किस विधिका आश्रय लेकर रहते हैं ?

अध्याय 190

श्लोक 7

नष्टानलानिले लोके नष्टाकाशमहीतले ।केवलं गह्वरीभूते महाभूतविपर्यये

naṣṭānalānile loke naṣṭākāśamahītale | kevalaṃ gahvarībhūte mahābhūtaviparyaye

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 190

श्लोक 8

प्रभुर्महाभूतपतिर्महातेजा महाकृतिः ।आस्ते सुरगुरुश्रेष्ठो विधिमादाय कं मुने

prabhurmahābhūtapatirmahātejā mahākṛtiḥ | āste suraguruśreṣṭho vidhimādāya kaṃ mune

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 190

श्लोक 9

तन्मे त्वमुपपन्नाय ब्रह्मन्नेतदसंशयम् ।वक्तुमर्हसि धर्मिष्ठ यशो नारायणात्मकम्

tanme tvamupapannāya brahmannetadasaṃśayam | vaktumarhasi dharmiṣṭha yaśo nārāyaṇātmakam

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मनू! धर्मिष्ट महर्षे! मैं शिष्यभावसे आपकी शरणमें आया हूँ, आप मुझसे भगवान्‌ नारायणके यशका इस प्रकार वर्णन कीजिये कि मेरा सारा संशय दूर हो जाय

अध्याय 190

श्लोक 10

प्रादुर्भावं पुरस्कृत्य भूतं भव्यं महात्मनः ।श्रद्धानामुपविष्टानां भगवन् वक्तुमर्हसि

prādurbhāvaṃ puraskṛtya bhūtaṃ bhavyaṃ mahātmanaḥ | śraddhānāmupaviṣṭānāṃ bhagavan vaktumarhasi

हिन्दी अर्थ

भगवन्‌ ! हमलोग श्रद्धापूर्वक आपकी बातें सुननेके लिये बैठे हैं, आप हमारे समक्ष महात्मा श्रीहरिकि भूत और भविष्य अवतारोंको दृष्टिमें रखकर उनके सुयशका वर्णन कीजिये

अध्याय 190

श्लोक 11

नारायणयशोज्ञाने या भवेद् भवतः स्पृहा ।त्वद्वंशानघ पूतस्य कार्यं कुरुकुलर्षभ

nārāyaṇayaśojñāne yā bhaved bhavataḥ spṛhā | tvadvaṃśānagha pūtasya kāryaṃ kurukularṣabha

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजीने कहा—निष्पाप कुरुकुलश्रेष्ठ जनमेजय ! भगवान्‌ नारायणके यशका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये जो तुम्हें स्पृहा हो रही है, वह तुम्हारे कुलके अनुरूप ही है, ऐसी इच्छाका उदय होना पुण्यकर्मका फल है

अध्याय 190

श्लोक 12

शृणुष्वादिपुराणेभ्यो देवताभ्यो यथाश्रुति ।ब्राह्मणानां च वदतां श्रुतोऽस्माभिर्महात्मनाम्

śṛṇuṣvādipurāṇebhyo devatābhyo yathāśruti | brāhmaṇānāṃ ca vadatāṃ śruto'smābhirmahātmanām

हिन्दी अर्थ

हमने पूर्वकालके पुरातन देवताओं तथा प्रवचन करनेवाले महात्मा ब्राह्मणोंके मुखसे श्रुतिके अनुसार भगवान्‌ पद्मनाभके प्रभावका जैसा वर्णन सुना है, उसे बताता हूँ, सुनो

अध्याय 190

श्लोक 13

यथा च तपसा दृष्टो बृहस्पतिसमद्युतिः ।पाराशर्यस्ततः श्रीमान् गुरुर्द्वैपायनोऽब्रवीत्

yathā ca tapasā dṛṣṭo bṛhaspatisamadyutiḥ | pārāśaryastataḥ śrīmān gururdvaipāyano'bravīt

श्लोक 13–14 का हिन्दी अर्थ

भारत ! जिनका तपस्याके प्रभावसे दर्शन हुआ है, उन बृहस्पतिके समान तेजस्वी श्रीमान्‌ गुरुदेव पराशरनन्दन ट्वैपायन व्यासने इस विषयमें जैसा मुझे उपदेश दिया है और जैसा मैंने सुना है, उसका मैं अपनी बुद्धिकि अनुसार वर्णन करता हूँ। केवल ऋषि होनेमात्रसे उनकी कही हुई बातोंको उन्हींकी भाँति ठीक-ठीक समझ लेना मेरे लिये भी सम्भव नहीं है

अध्याय 190

श्लोक 14

तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि यथाप्रज्ञं यथाश्रुतम् ।न विज्ञातुं मया शक्यमृषिमात्रेण भारत

tat te'haṃ sampravakṣyāmi yathāprajñaṃ yathāśrutam | na vijñātuṃ mayā śakyamṛṣimātreṇa bhārata

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 190

श्लोक 15

कः समुत्सहते ज्ञातुं परं नारायणात्मकम् ।विश्वात्मनो यं ब्रह्मापि न वेदयति तत्त्वतः

kaḥ samutsahate jñātuṃ paraṃ nārāyaṇātmakam | viśvātmano yaṃ brahmāpi na vedayati tattvataḥ

हिन्दी अर्थ

जिन्हें ब्रह्मा भी ठीक-ठीक नहीं जानते, उन विश्वात्माके नारायणनामक परमतत्त्वको कौन जान सकता है

अध्याय 190

श्लोक 16

श्रुतं मे विश्वदेवानां यद् रहस्यं महर्षिणाम् ।तदिदं सर्वदेवानां तत्त्वतस्तत्त्ववादिनाम्

śrutaṃ me viśvadevānāṃ yad rahasyaṃ maharṣiṇām | tadidaṃ sarvadevānāṃ tattvatastattvavādinām

हिन्दी अर्थ

जिनकी दृष्टिमें सब कुछ नारायणदेव ही हैं तथा जो स्वभावसे ही परमतत्त्वका प्रतिपादन करनेवाले हैं, उन विश्वेदेवों और महर्षियोंके मुखसे मैंने जो गोपनीय रहस्य सुना है, वह वास्तवमें यह नारायणका यश ही है

अध्याय 190

श्लोक 17

तदध्यात्मविदां चिन्त्यं कारणं चैव कर्मिणाम् ।अधिदैवं च यद् दैवं तद दैवमिति संज्ञितम्

tadadhyātmavidāṃ cintyaṃ kāraṇaṃ caiva karmiṇām | adhidaivaṃ ca yad daivaṃ tada daivamiti saṃjñitam

हिन्दी अर्थ

वह नारायण-तत्त्व ही अध्यात्मवेत्ता पुरुषोंके लिये चिन्तनीय वस्तु है, वही कर्मपरायण पुरुषोंका कारणतत्त्व है, वही अधिदैव और दैव है तथा उसीको प्रारब्ध या भाग्य नाम दिया गया है

अध्याय 190

श्लोक 18

यद् भूतमधिभूतं च यत्परं च महर्षिणाम् ।यत् सत्यं वेददृष्टं च यत् तद्वेदविदो विदुः

yad bhūtamadhibhūtaṃ ca yatparaṃ ca maharṣiṇām | yat satyaṃ vedadṛṣṭaṃ ca yat tadvedavido viduḥ

हिन्दी अर्थ

जो भूत और अधिभूत है, जो महर्षियोंका परम ज्ञेय तत्त्व है, जो सत्य है तथा जिसे वेदोंद्वारा देखा या जाना गया है, उस परमात्मतत्त्वको जो जानते हैं, वे ही वेदवेत्ता हैं

अध्याय 190

श्लोक 19

यः कर्ता कारको बुद्धिर्मनः क्षेत्रज्ञ एव च ।प्रधानं पुरुषः शास्ता एकस्तदभिशब्द्यते

yaḥ kartā kārako buddhirmanaḥ kṣetrajña eva ca | pradhānaṃ puruṣaḥ śāstā ekastadabhiśabdyate

हिन्दी अर्थ

जो कर्ता, कारक, बुद्धि, मन, क्षेत्रज्ञ, प्रधान पुरुष और शास्ता है, जो अकेला ही इन शब्दोंद्वारा प्रतिपादित होता है, वह एकमात्र परमात्मा ही जानने योग्य है

अध्याय 190

श्लोक 20

कालः कालं स्वपयति द्रष्टा स्वाधीन एव च ।प्राणः पञ्चविधश्चैव ध्रुवमक्षरमेव च

kālaḥ kālaṃ svapayati draṣṭā svādhīna eva ca | prāṇaḥ pañcavidhaścaiva dhruvamakṣarameva ca

हिन्दी अर्थ

वही काल बनकर कालको भी सुलाता है अर्थात्‌ वही कालका भी काल है, वही सबका द्रष्ट तथा सर्वथा स्वतन्त्र है, पाँच प्रकारका प्राण भी वही है, वही ध्रुव एवं अक्षर ब्रह्म है

अध्याय 190

श्लोक 21

उच्यते विविधैर्भावैस्तस्यैवानघ तत्परैः ।स एव भगवान् सर्वं करोति विकरोति च

ucyate vividhairbhāvaistasyaivānagha tatparaiḥ | sa eva bhagavān sarvaṃ karoti vikaroti ca

हिन्दी अर्थ

अनघ! उनकी उपासनामें तत्पर रहनेवाले पुरुषोंद्वारा विविध भावोंसे उन्हींका प्रतिपादन किया जाता है। वे ही भगवान्‌ सबको बनाते और बिगाड़ते हैं

अध्याय 190

श्लोक 22

योऽस्मान्कारयते कर्म तेनास्य व्याकुलीकृताः ।यजामहे तमेवेशं तमेवेच्छाम निर्वृताः

yo'smānkārayate karma tenāsya vyākulīkṛtāḥ | yajāmahe tameveśaṃ tamevecchāma nirvṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

जो हमसे कर्म कराता है, उसीने हमें विधि-निषेधके बन्धनमें बाँधकर व्याकुल कर रखा है। हम उसी ईश्वरका यश्ोंद्वारा यजन करते हैं और शान्तभावसे उन्हींको पाना चाहते हैं

अध्याय 190

श्लोक 23

यो वक्ता यश्च वक्तव्यो यश्चाहं तद्ब्रवीमि वः ।इदं शृणुत यच्छ्रेयो यच्चान्यत् परिजल्पथ

yo vaktā yaśca vaktavyo yaścāhaṃ tadbravīmi vaḥ | idaṃ śṛṇuta yacchreyo yaccānyat parijalpatha

श्लोक 23–24 का हिन्दी अर्थ

जो वक्ता (वाणीका प्रवर्तक) है, जो वक्तव्य विषय है तथा जो वक्तापनका अभिमान रखनेवाले मुझ जीवात्माके रूपमें भी विद्यमान है, उसके स्वरूपका मैं तुम्हारे समक्ष प्रतिपादन करता हूँ, तुम इसे सुनो। जो मुख्य श्रेय (मोक्ष) है तथा तुमलोग जिस स्वर्ग आदि दूसरे श्रेयकी चर्चा करते हो, जो भाँति-भाँतिकी कथाएँ हैं तथा जो गहन श्रुतियाँ हैं, वह सब भगवान्‌ नारायणका स्वरूप ही है। यह विश्व, इस विश्वके पालक तथा देवता सब-के-सब नारायणरूप ही हैं

अध्याय 190

श्लोक 24

याः कथाश्चैव वर्तन्ते श्रुतयो वाथ गह्वराः ।विश्वं विश्वपतिर्देवाः सर्वं नारायणात्मकम्

yāḥ kathāścaiva vartante śrutayo vātha gahvarāḥ | viśvaṃ viśvapatirdevāḥ sarvaṃ nārāyaṇātmakam

अर्थ श्लोक 23 के साथ

अध्याय 190

श्लोक 25

यत् सत्यं यदनृतमादिमक्षरं वै यद्भूतं भवति मिथश्च यद्भविष्यम् ।यत् किञ्चिच्चरमचराव्ययं त्रिलोके तत्सर्वं पुरुषवरः प्रभुर्वरिष्ठः

yat satyaṃ yadanṛtamādimakṣaraṃ vai yadbhūtaṃ bhavati mithaśca yadbhaviṣyam | yat kiñciccaramacarāvyayaṃ triloke tatsarvaṃ puruṣavaraḥ prabhurvariṣṭhaḥ

हिन्दी अर्थ

जो लौकिक सत्य और असत्य है, जो कारण और कार्य है, जो भूत है, जो परस्पर एक-दूसरेके जनक बीज- वृक्ष आदि हैं, जो भविष्य है तथा तीनों लोकोंमें जो कुछ भी चर-अचर और कूटस्थ वस्तु है, वह सब कुछ सर्वश्रेष्ठ पुरुषप्रवर भगवान्‌ नारायण ही हैं

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

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पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.