Harivamsha Purana
189
अध्याय 189 / 318

Parva 3, Adhyāya 6

13 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ13 श्लोक

अध्याय 189

श्लोक 1

जनमेजयस्य सन्तुष्टं भूत्वा राज्यशासनकरणं, अस्य ग्रन्थस्य पाठस्य श्रवणस्य च महिमा एवं स विश्वावसुनानुनीतः प्रसादमागम्य वपुष्टमायाः ।चकार मिथ्या व्यतिशङ्कितात्मा शान्तिं परां मानवधर्महृष्टाम्

janamejayasya santuṣṭaṃ bhūtvā rājyaśāsanakaraṇaṃ, asya granthasya pāṭhasya śravaṇasya ca mahimā evaṃ sa viśvāvasunānunītaḥ prasādamāgamya vapuṣṭamāyāḥ | cakāra mithyā vyatiśaṅkitātmā śāntiṃ parāṃ mānavadharmahṛṣṭām

हिन्दी अर्थ

बाय: -सनिाण तथा इस ग्रन्थके पाठ और श्रवणकी महिमा सौति कहते हैं—अकारण ही जिनके मनमें संदेह उत्पन्न हो गया था, उन राजा जनमेजयको जब विश्वावसुने अनुनयपूर्वक समझाया, तब वे रानी वपुष्टमापर प्रसन्न हो गये और उन्होंने मानवधर्मके आचरणसे शान्ति धारण की

अध्याय 189

श्लोक 2

श्रममभिविनिवर्त्य मानसं स समभिलषज्जनमेजयो यशः स्वम् ।विषयमनुशशास धर्मबुद्धि- र्मुदितमना रमयन् वपुष्टमां ताम्

śramamabhivinivartya mānasaṃ sa samabhilaṣajjanamejayo yaśaḥ svam | viṣayamanuśaśāsa dharmabuddhi- rmuditamanā ramayan vapuṣṭamāṃ tām

हिन्दी अर्थ

वे राजा जनमेजय मानसिक श्रमको दूर करके अपने लिये उत्तम यशकी अभिलाषा रखते हुए धर्मबुद्धिसे राज्यका शासन तथा प्रसन्नचित्त होकर वपुष्टमाके साथ रमण करने लगे

English

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अध्याय 189

श्लोक 3

न हि विरमति विप्रपूजना- न्न च विनिवर्तति यज्ञदानशीलात् ।न विषयपरिरक्षणाच्च्युतोऽभू- न्न च परिगर्हति तां वपुष्टमां च

na hi viramati viprapūjanā- nna ca vinivartati yajñadānaśīlāt | na viṣayaparirakṣaṇāccyuto'bhū- nna ca parigarhati tāṃ vapuṣṭamāṃ ca

हिन्दी अर्थ

वे ब्राह्मणोंके पूजन, आदर- सत्कारसे कभी विरत नहीं होते थे, यज्ञ और दानरूप शीलसे कभी पीछे नहीं हटते थे, राज्यके रक्षारूप कर्मसे च्युत नहीं होते थे और अपनी रानी वपुष्ठटमाकी कभी निन्‍्दा नहीं करते थे

अध्याय 189

श्लोक 4

विधिविहितमशक्यमन्यथा हि कर्तुं यदृषिरचिन्त्यतपाः पुराब्रवीत् सः ।इति स नृपतिरात्मवांस्तदासौ तदनुविचिन्त्य बभूव वीतमन्युः

vidhivihitamaśakyamanyathā hi kartuṃ yadṛṣiracintyatapāḥ purābravīt saḥ | iti sa nṛpatirātmavāṃstadāsau tadanuvicintya babhūva vītamanyuḥ

हिन्दी अर्थ

विधाताके विधानको उलट देना सर्वथा असम्भव है' यह बात जो अचिन्त्य तपस्वी महर्षि व्यासने पहले कही थी, उनके इस कथनपर उन मनस्वी नरेशने बारम्बार विचार किया, इससे उनका रोष और खेद जाता रहा

अध्याय 189

श्लोक 5

इदं महाकाव्यमृषेर्महात्मनः पठन्नृणां पूज्यतमो भवेन्नरः ।प्रकृष्टमायुः समवाप्य दुर्लभं लभेच्च सर्वज्ञफलं च केशवम्

idaṃ mahākāvyamṛṣermahātmanaḥ paṭhannṛṇāṃ pūjyatamo bhavennaraḥ | prakṛṣṭamāyuḥ samavāpya durlabhaṃ labhecca sarvajñaphalaṃ ca keśavam

हिन्दी अर्थ

महात्मा महर्षि व्यासजीके इस महाकाव्यका पाठ करनेवाला मानव मनुष्योंमें परम पूजनीय हो जाता है। वह परम उत्तम दुर्लभ आयु पाकर सर्वज्ञतारूप फल और भगवान्‌ श्रीकृष्णको प्राप्त कर लेता है

अध्याय 189

श्लोक 6

शतक्रतोः कल्मषविप्रमोक्षणं पठन्निदं मुच्यति कल्मषान्तरः ।तथैव कामान् विविधान् समश्नुते ह्यवाप्तकामश्च चिराय नन्दति

śatakratoḥ kalmaṣavipramokṣaṇaṃ paṭhannidaṃ mucyati kalmaṣāntaraḥ | tathaiva kāmān vividhān samaśnute hyavāptakāmaśca cirāya nandati

हिन्दी अर्थ

इन्द्रके पापको छुड़ानेवाले इस काव्यका पाठ करनेवाला पुरुष स्वयं भी पापसे मुक्त हो जाता है। पाथ ही नाना प्रकारकी मनोवाज्छित कामनाओंका उपभोग करता और आपकाम होकर चिरकालतक आनन्दमें मग्र रहता है

अध्याय 189

श्लोक 7

यथा हि पुष्पप्रभवं फलं द्रुमाः फलात्प्रजायन्ति पुनश्च पादपाः ।तथा महर्षिप्रभवा इमा गिरः प्रवर्धयन्ते तमृषिं प्रवर्धिताः

yathā hi puṣpaprabhavaṃ phalaṃ drumāḥ phalātprajāyanti punaśca pādapāḥ | tathā maharṣiprabhavā imā giraḥ pravardhayante tamṛṣiṃ pravardhitāḥ

हिन्दी अर्थ

जैसे बढ़े हुए वृक्ष अपने कूलोंसे फलको प्रकट करते हैं और फलसे पुन: वृक्ष उत्पन्न होते एवं बढ़ते हैं, उसी प्रकार महर्षि व्याससे प्रकट हुई उनकी यह वाणी वक्ताओंद्वारा बढ़ायी—्चारमें लायी जानेपर उन महर्षिके ही महत्त्वको बढ़ाती है

अध्याय 189

श्लोक 8

पुत्रानपुत्रो लभते सुवर्चस- श्च्युतः पुनर्विन्दति चात्मनः स्थितिम् ।व्याधिं न चाप्नोति चिरं सबन्धनं क्रियां च पुण्यां लभते गुणान्वितः

putrānaputro labhate suvarcasa- ścyutaḥ punarvindati cātmanaḥ sthitim | vyādhiṃ na cāpnoti ciraṃ sabandhanaṃ kriyāṃ ca puṇyāṃ labhate guṇānvitaḥ

हिन्दी अर्थ

इस ग्रन्थका पाठ अथवा श्रवण करनेवाला गुणवान्‌ पुरुष यदि पुत्रहीन है तो उसे परम तेजस्वी पुत्र प्राप्त होते हैं, यदि वह धन, धर्म अथवा महत्त्वसे प्ष्ट हुआ है तो पुन: अपनी उसी स्थितिको प्राप्त कर नेता है, उसे रोग नहीं होता, वह चिरकालतक बन्धनमें नहीं रहता तथा पुण्यकर्मका फल पाता है

English

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अध्याय 189

श्लोक 9

पतिमभिलभते च सत्सु कन्या श्रवणमुपेत्य शुभा मुनेस्तु वाचः ।जनयति च सुतान् गुणैरुपेतान् रिपुजनमर्दनवीर्यशालिनश्च

patimabhilabhate ca satsu kanyā śravaṇamupetya śubhā munestu vācaḥ | janayati ca sutān guṇairupetān ripujanamardanavīryaśālinaśca

हिन्दी अर्थ

महर्षि यासकी इस मड्लमयी वाणीको सुनकर कुमारी कन्या श्रेष्ठ पुरुषों मेंसे किसी अभीष्ट पतिको पाती है तथा वह उत्तम गुणोंसे सम्पन्न एवं शत्रुओंका मर्दन करनेवाले पराक्रमसे सुशोभित अनेक पुत्रोंको जन्म देती है

अध्याय 189

श्लोक 10

विजयति वसुधां च राजवृत्ति र्धनमतुलं लभते द्विषज्जयं च ।विपुलमपि धनं लभेच्च वैश्यः सुगतिमियाच्छ्रवणाच्च शूद्रजातिः

vijayati vasudhāṃ ca rājavṛtti rdhanamatulaṃ labhate dviṣajjayaṃ ca | vipulamapi dhanaṃ labhecca vaiśyaḥ sugatimiyācchravaṇācca śūdrajātiḥ

हिन्दी अर्थ

कत्रियवृत्तिसे रहनेवाला पुरुष इस ग्रन्थके पाठ और श्रवणसे भूमण्डलपर विजय पाता, अनुपम धनका भागी होता और शत्रुओंको परास्त कर देता है। वैश्य प्रचुर धन प्राप्त करता है और शुूद्र-जातिका पुरुष इसके श्रवणसे उत्तम गति पा लेता है

अध्याय 189

श्लोक 11

पुराणमेतच्चरितं महात्मना- मधीत्यबुद्धिं लभते च नैष्ठिकीम् ।विहाय दुःखानि विमुक्तसङ्गः स वीतरागो विचरेद् वसुन्धराम्

purāṇametaccaritaṃ mahātmanā- madhītyabuddhiṃ labhate ca naiṣṭhikīm | vihāya duḥkhāni vimuktasaṅgaḥ sa vītarāgo vicared vasundharām

हिन्दी अर्थ

महात्माओंके चरित्रसे युक्त इस पुराणका अध्ययन करके मनुष्य नैष्टिकी बुद्धि प्रात कर लेता है तथा वह दुःखोंका परित्याग करके आसक्तिशून्य एवं वीतराग होकर भूमण्डलपर विचरता रहता है

अध्याय 189

श्लोक 12

इत्येतदाख्यानमुदाहृतं वै प्रतिस्मरन्तो द्विजमण्डलेषु ।स्थैर्येण धैर्येण पुनः स्मरन्तः सुखं भवन्तोऽनुचरन्तु लोकम्

ityetadākhyānamudāhṛtaṃ vai pratismaranto dvijamaṇḍaleṣu | sthairyeṇa dhairyeṇa punaḥ smarantaḥ sukhaṃ bhavanto'nucarantu lokam

हिन्दी अर्थ

मेरेद्वारा कहे गये इस आख्यानका ब्राह्मणोंके समाजमें चिन्तन एवं प्रवचन करते हुए आपलोग स्थिरता और धीरतापूर्वक इसका बारम्बार स्मरण करें और संसारमें सुखपूर्वक विचरें

अध्याय 189

श्लोक 13

इति चरितमिदं महात्मना- मृषिकृतमद्भुतवीर्यकर्मणाम् ।कथितमिदं हि समासविस्तरैः किमपरमिच्छसि किं ब्रवीमि ते

iti caritamidaṃ mahātmanā- mṛṣikṛtamadbhutavīryakarmaṇām | kathitamidaṃ hi samāsavistaraiḥ kimaparamicchasi kiṃ bravīmi te

हिन्दी अर्थ

अद्भुत बल-पराक्रमवाले महात्माओंका यह चरित्र, जिसे महर्षि व्यासने ग्रन्थका रूप दिया है, मैंने संक्षेप और विस्तारके साथ कह सुनाया। शौनकजी! अब आप और क्‍या सुनना चाहते हैं? मैं आपसे क्या कहूँ?

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.