Harivamsha Purana
192
अध्याय 192 / 318

Parva 3, Adhyāya 9

23 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ23 श्लोक

अध्याय 192

श्लोक 1

प्रलयस्योत्तरे एकार्णवस्य जले भगवतः नारायणस्य शयनं भूत्वा नारायणो योगी सप्तमूर्तिर्विभावसुः ।गभस्तिभिः प्रदीप्ताभिः संशोषयति सागरान्

pralayasyottare ekārṇavasya jale bhagavataḥ nārāyaṇasya śayanaṃ bhūtvā nārāyaṇo yogī saptamūrtirvibhāvasuḥ | gabhastibhiḥ pradīptābhiḥ saṃśoṣayati sāgarān

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! योगेश्वर भगवान्‌ नारायण सात मूर्ति (शिखा)-वाले अग्रिदेवका रूप धारण करके अपनी प्रज्वलित किरणोंद्वारा समुद्रॉंका जल सोख लेते हैं

अध्याय 192

श्लोक 2

पीत्वार्णवांश्च सर्वान् स नदीः कूपांश्च सर्वशः ।पर्वतानां च सलिलं सर्वं पीत्वा च रश्मिभिः

pītvārṇavāṃśca sarvān sa nadīḥ kūpāṃśca sarvaśaḥ | parvatānāṃ ca salilaṃ sarvaṃ pītvā ca raśmibhiḥ

श्लोक 2–3 का हिन्दी अर्थ

सारे समुद्रों, नदियों, कूपों और पर्वतोंका सम्पूर्ण जल अपनी किरणोंद्वारा पीकर पृथ्वीके सहस्रों टुकड़े करके उसे रसातलमें ले जाकर वे रसातलका भी सारा उत्तम रस पी लेते हैं

अध्याय 192

श्लोक 3

भित्त्वा सहस्रशश्चैव महीं नीत्वा रसातलम् ।रसातलगतं कृत्स्नं पिबते रसमुत्तमम्

bhittvā sahasraśaścaiva mahīṃ nītvā rasātalam | rasātalagataṃ kṛtsnaṃ pibate rasamuttamam

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 192

श्लोक 4

अप्सु सृजन्क्लेदमन्यद् ददाति प्राणिनां ध्रुवम् ।तत् सर्वमरविन्दाक्ष आदत्ते पुरुषोत्तमः

apsu sṛjankledamanyad dadāti prāṇināṃ dhruvam | tat sarvamaravindākṣa ādatte puruṣottamaḥ

हिन्दी अर्थ

जलमें क्लेद (गीलापन)-की सृष्टि करते हुए वे प्राणियोंको निश्चितरूपसे और जो कुछ देते हैं, वह सब प्रलयकालमें वे ही कमलनयन पुरुषोत्तम उनसे ले लेते हैं

अध्याय 192

श्लोक 5

वायुश्च बलवान्भूत्वा स विधूयाखिलं जगत् ।प्राणोदये सुराणां च वायुना कुरुते हरिः

vāyuśca balavānbhūtvā sa vidhūyākhilaṃ jagat | prāṇodaye surāṇāṃ ca vāyunā kurute hariḥ

हिन्दी अर्थ

वे श्रीहरि बलवान्‌ वायु होकर सम्पूर्ण जगत्‌को कम्पित करते हुए उस वायुके द्वारा ही देवताओंमें प्राणसंचार करते हैं

अध्याय 192

श्लोक 6

ततो देवगणानां च सर्वेषामेव देहिनाम् ।ये चेन्द्रियगणाः सर्वे ये चान्ये च यतोद्भवाः ।पूयं घ्राणं शरीरं च पृथिवीमाश्रिता गुणाः

tato devagaṇānāṃ ca sarveṣāmeva dehinām | ye cendriyagaṇāḥ sarve ye cānye ca yatodbhavāḥ | pūyaṃ ghrāṇaṃ śarīraṃ ca pṛthivīmāśritā guṇāḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर देवताओं तथा समस्त देहधारियोंकी जो सारी इन्द्रियाँ हैं तथा जो अन्य विषय आदि हैं, उनकी जहाँसे उत्पत्ति हुई है, वे उसी कारणतत्त्वमें लीन हो जाते हैं। गन्ध, घ्राणेन्द्रियि और शरीर—ये तीनों गुण पृथ्वीके आश्रित हैं

अध्याय 192

श्लोक 7

जिह्वा रसश्च क्लेदश्च संश्रिताः सलिलं गुणाः ।रूपं चक्षुर्विपाकश्च ज्योतिरेवाश्रिता गुणाः

jihvā rasaśca kledaśca saṃśritāḥ salilaṃ guṇāḥ | rūpaṃ cakṣurvipākaśca jyotirevāśritā guṇāḥ

हिन्दी अर्थ

जिह्ना, रस और क्लेद—ये जलके आश्रित रहनेवाले गुण हैं। रूप, नेत्र और पाक—ये अग्रिके आश्रित रहनेवाले गुण हैं

अध्याय 192

श्लोक 8

स्पर्शः प्राणश्च चेष्टा च पवनं संश्रिता गुणाः ।परमेष्ठिनं वरेण्यं च हृषीकेशं समाश्रिताः

sparśaḥ prāṇaśca ceṣṭā ca pavanaṃ saṃśritā guṇāḥ | parameṣṭhinaṃ vareṇyaṃ ca hṛṣīkeśaṃ samāśritāḥ

हिन्दी अर्थ

स्पर्श, प्राण और चेष्टा—ये वायुके आश्रित रहनेवाले गुण हैं। (शब्द, श्रवणेन्द्रियि और आकाश—ये शब्दके आश्रित रहनेवाले गुण हैं।) ये सब-के-सब परमेष्ठी एवं वरणीय भगवान्‌ हृषीकेशके आश्रित होते हैं

अध्याय 192

श्लोक 9

ततो भगवता तत्र रश्मिभिः परिवारिताः ।वायुना कृष्यमाणाश्च रूपान्योन्यसमाश्रयात्

tato bhagavatā tatra raśmibhiḥ parivāritāḥ | vāyunā kṛṣyamāṇāśca rūpānyonyasamāśrayāt

हिन्दी अर्थ

फिर भगवान्‌की प्रेरणासे उनकी किरणोंसे आवेष्टित हो वे देवगण, इन्द्रियसमुदाय आदि वायुसे आकर्षित हो एक-दूसरेके आश्रित होनेसे परस्पर संघर्ष करने लगे

अध्याय 192

श्लोक 10

तेषां सङ्घर्षजोद्भूतः पावकः शतधा ज्वलन् ।अदहन्निखिलांल्लोकानुग्रः संवर्तकोऽनलः

teṣāṃ saṅgharṣajodbhūtaḥ pāvakaḥ śatadhā jvalan | adahannikhilāṃllokānugraḥ saṃvartako'nalaḥ

हिन्दी अर्थ

उनके संघर्षसे प्रकट हुई अग्नि सौ- सौ स्थानोंमें जल उठी और महाभयंकर संवर्तक अग्रिके रूपमें उद्भासित होने लगी। उसने सम्पूर्ण लोकोंको जलाकर भस्म कर दिया

अध्याय 192

श्लोक 11

सम्पर्वतांस्तरून् गुल्माँल्लतावल्लीस्तृणानि च ।विमानानि च दिव्यानि पुराणि विविधानि च

samparvatāṃstarūn gulmā~llatāvallīstṛṇāni ca | vimānāni ca divyāni purāṇi vividhāni ca

श्लोक 11–12 का हिन्दी अर्थ

उस संवर्तक अग्रिने पर्वत, वृक्ष, गुल्म, लता, बल्ली, तृण, दिव्य विमान, नाना प्रकारके नगर, पुण्य आश्रम, दिव्य शोभासे सम्पन्न मन्दिर तथा अन्य जो-जो आश्रय लेनेयोग्य स्थान थे—उन सबको दग्ध कर डाला

अध्याय 192

श्लोक 12

आश्रमांश्च तथा पुण्यान्दिव्यान्यातनानि च ।यानि चाश्रयणीयानि तानि सर्वाणि सोऽदहत्

āśramāṃśca tathā puṇyāndivyānyātanāni ca | yāni cāśrayaṇīyāni tāni sarvāṇi so'dahat

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 192

श्लोक 13

भस्मीभूतांस्ततः सर्वाँल्लोकाँल्लोकगुरुर्हरिः ।भूयो निर्वापयामास जलयुक्तेन कर्मणा

bhasmībhūtāṃstataḥ sarvā~llokā~llokagururhariḥ | bhūyo nirvāpayāmāsa jalayuktena karmaṇā

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ लोकगुरु श्रीहरिने भस्मीभूत हुए उन समस्त लोकोंको पुन: जलका संयोग करानेवाले उपायसे बुझा दिया

अध्याय 192

श्लोक 14

सहस्रदृङ्महातेजा भूत्वा कृष्णो महाघनः ।दिव्यतोयेन हविषा तर्पयामास मेदिनीम्

sahasradṛṅmahātejā bhūtvā kṛṣṇo mahāghanaḥ | divyatoyena haviṣā tarpayāmāsa medinīm

हिन्दी अर्थ

सहसत्रों नेत्रोंबाले उन महातेजस्वी श्रीकृष्णने महान्‌ मेघ बनकर दिव्य जलरूपी हविष्यसे पृथ्वीको तृप् किया

अध्याय 192

श्लोक 15

ततः क्षीरनिकाशेन स्वादुना परमाम्भसा ।शिवेन पुण्येन महीं निर्वाणमगमत् परम्

tataḥ kṣīranikāśena svādunā paramāmbhasā | śivena puṇyena mahīṃ nirvāṇamagamat param

हिन्दी अर्थ

दूधके समान स्वादिष्ट उत्तम कल्याणकारी एवं पवित्र उस जलसे वह जलती हुई पृथ्वी पूर्णत: शान्त हो गयी

अध्याय 192

श्लोक 16

ते नगा जलसञ्छन्नाः पयसः सर्वतोधराः ।एकार्णवजला भूत्वा सर्वसत्त्वविवर्जिताः

te nagā jalasañchannāḥ payasaḥ sarvatodharāḥ | ekārṇavajalā bhūtvā sarvasattvavivarjitāḥ

हिन्दी अर्थ

वे पर्वत और वृक्ष आदि जलसे आच्छादित हो सब ओरसे जल-ही-जल धारण किये रहे और एकार्णवके जलमें विलीन होकर सब प्रकारके प्राणियोंसे शून्य हो गये

अध्याय 192

श्लोक 17

महाभूतान्यपि च तं प्रविष्टान्यमितौजसम् ।नष्टार्कपवनाकाशे सूक्ष्मे जनविवर्जिते

mahābhūtānyapi ca taṃ praviṣṭānyamitaujasam | naṣṭārkapavanākāśe sūkṣme janavivarjite

श्लोक 17–18 का हिन्दी अर्थ

पाँचों महाभूत भी उन अमित बलशाली भगवान्‌ विष्णुमें प्रविष्ट हो गये। जब सूर्य, वायु और आकाशका भी सूक्ष्म परमात्मतत्त्वमें लय हो गया, जीव-जन्तुओंका सर्वथा अभाव हो गया, तब वे एकमात्र अमित बुद्धिमान्‌ सनातन पुरुष श्रीहरि अपने किसी अनिर्वचनीय पुरातन रूपका आश्रय ले पहलेके जलका शोषण और पान करके उस दिव्य एकार्णवके जलमें निवास करने लगे

अध्याय 192

श्लोक 18

संशोषयित्वा पीत्वा च वसत्येकः सनातनः ।पौराणं रूपमास्थाय किमप्यमितबुद्धिमान्

saṃśoṣayitvā pītvā ca vasatyekaḥ sanātanaḥ | paurāṇaṃ rūpamāsthāya kimapyamitabuddhimān

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 192

श्लोक 19

एकार्णवजले ह्यासीद् योगी योगमुपागतः ।अयुतानां सहस्राणि गतान्येकार्णवेऽम्भसि ।न चैनं कश्चिदव्यक्तं व्यक्तं वेदितुमर्हति

ekārṇavajale hyāsīd yogī yogamupāgataḥ | ayutānāṃ sahasrāṇi gatānyekārṇave'mbhasi | na cainaṃ kaścidavyaktaṃ vyaktaṃ veditumarhati

हिन्दी अर्थ

वे योगी श्रीहरि योगका आश्रय ले एकार्णवके जलमें रहने लगे; वहाँ रहते हुए उनके सहसत्रों अयुतवर्ष व्यतीत हो गये। इन अव्यक्त परमेश्वरको कोई भी व्यक्तरूपसे नहीं जान सकता

अध्याय 192

श्लोक 20

एकार्णवविधिः कोऽयं यश्चैव परिकीर्तितः ।क एष पुरुषो नाम किं योगः कश्च योगवान्

ekārṇavavidhiḥ ko'yaṃ yaścaiva parikīrtitaḥ | ka eṣa puruṣo nāma kiṃ yogaḥ kaśca yogavān

हिन्दी अर्थ

जनमेजयने पूछा—जिसका यहाँ वर्णन किया है, इस एकार्णवकी विधि (अवधि) क्या है? अर्थात्‌ भगवान्‌ उसमें कबतक निवास करते हैं ? यह पुरुष कौन है? इसके योगका स्वरूप क्या है और योगवान्‌ (योगेश्वर) कौन है?

अध्याय 192

श्लोक 21

एतावन्तमसौ कालमेकार्णवविधिं प्रति ।करिष्यतीमं भगवानिति कश्चिन्न बुध्यते

etāvantamasau kālamekārṇavavidhiṃ prati | kariṣyatīmaṃ bhagavāniti kaścinna budhyate

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजीने कहा—वे भगवान्‌ इतने समयतक एकार्णव-विधिका पालन करेंगे अर्थात्‌ इतने समयतक ही एकार्णवके जलमें रहेंगे, यह कोई नहीं जानता

अध्याय 192

श्लोक 22

न वै माता न च द्रष्टा न ज्ञाता नैव पार्श्वगः ।न स्मावगच्छते कश्चिदृते तं देवमीश्वरम्

na vai mātā na ca draṣṭā na jñātā naiva pārśvagaḥ | na smāvagacchate kaścidṛte taṃ devamīśvaram

हिन्दी अर्थ

(यह पुरुष अनिर्वचनीय है) न तो वह प्रमाता है, नद्रष्टा है, न ज्ञाता है और न तटस्थ ही है, इन सबसे सर्वथा विलक्षण है। उसे उस परमेश्वरदेवके सिवा दूसरा कोई नहीं जान सकता (इसलिये उसका योग भी अनिर्वचनीय है)

अध्याय 192

श्लोक 23

नभः क्षितिं पवनमथ प्रकाशयन् प्रजापतिं भुवनचरं सुरेश्वरम् ।पितामहं श्रुतिनिलयं महामुनिं शशास भूः शयनमरोचयत् प्रभुः

nabhaḥ kṣitiṃ pavanamatha prakāśayan prajāpatiṃ bhuvanacaraṃ sureśvaram | pitāmahaṃ śrutinilayaṃ mahāmuniṃ śaśāsa bhūḥ śayanamarocayat prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

जिन्होंने आकाश, पृथ्वी और वायुको प्रकाशित करते हुए समस्त भुवनोंमें विचरनेवाले, सुरे श्वर, प्रजापति वेदनिष्ठ महामुनि पितामह ब्रह्माको भी ज्ञानका उपदेश दिया, वे सबकी उत्पत्तिके कारणभूत भगवान्‌ योगवान्‌ (योगेश्वर) हैं, उन्होंने ही एकार्णवके जलमें शयन करना पसंद किया

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

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पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.