Harivamsha Purana
143
अध्याय 143 / 318

Parva 2, Adhyāya 88

81 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ81 श्लोक

अध्याय 143

श्लोक 1

पिण्डारकतीर्थान्तर्गते समुद्रे श्रीकृष्णस्य अन्यैः यादवैः सह जलविहारं मुनेऽन्धकवधः श्राव्यः श्रुतोऽयं खलु भो मया ।शक्तिस्त्रयाणां लोकानां कृता देवेन धीमता

piṇḍārakatīrthāntargate samudre śrīkṛṣṇasya anyaiḥ yādavaiḥ saha jalavihāraṃ mune'ndhakavadhaḥ śrāvyaḥ śruto'yaṃ khalu bho mayā | śaktistrayāṇāṃ lokānāṃ kṛtā devena dhīmatā

हिन्दी अर्थ

जनमेजय बोले—मुने! अन्धकवधका प्रसंग अवश्य सुनने योग्य है। मैंने उसे अच्छी तरह सुना है। अन्धकासुरका वध करके बुद्धिमान्‌ महादेवजीने तीनों लोकोंमें शान्ति फैला दी

अध्याय 143

श्लोक 2

निकुम्भस्य हतं देहं द्वितीयं चक्रपाणिना ।यदर्थं च यथा चैव तद् भवान् वक्तुमर्हति

nikumbhasya hataṃ dehaṃ dvitīyaṃ cakrapāṇinā | yadarthaṃ ca yathā caiva tad bhavān vaktumarhati

हिन्दी अर्थ

अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि चक्रपाणि भगवान्‌ श्रीकृष्णने निकुम्भके दूसरे शरीरका किसलिये और किस प्रकार वध किया था। आप उसे बतानेकी कृपा करें

अध्याय 143

श्लोक 3

श्रद्दधानस्य राजेन्द्र वक्तव्यं भवतोऽनघ ।चरितं लोकनाथस्य हरेरमिततेजसः

śraddadhānasya rājendra vaktavyaṃ bhavato'nagha | caritaṃ lokanāthasya hareramitatejasaḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—निष्पाप राजेन्द्र! तुम श्रद्धालु हो; इसलिये तुमसे अमित तेजस्वी जगन्नाथ श्रीहरिके चरित्रका वर्णन करना उचित है

अध्याय 143

श्लोक 4

द्वारवत्यां निवसतो विष्णोरतुलतेजसः ।समुद्रयात्रा सम्प्राप्ता तीर्थे पिण्डारके नृप

dvāravatyāṃ nivasato viṣṇoratulatejasaḥ | samudrayātrā samprāptā tīrthe piṇḍārake nṛpa

हिन्दी अर्थ

नस्थर ! एक समयकी बात है, द्वारकामें रहते समय अतुल तेजस्वी श्रीकृष्णको पिण्डारकतीर्थमें समुद्रयात्राका अवसर प्राप्त हुआ

अध्याय 143

श्लोक 5

उग्रसेनो नरपतिर्वसुदेवश्च भारत ।निक्षिप्तौ नगराध्यक्षौ शेषाः सर्वे विनिर्गताः

ugraseno narapatirvasudevaśca bhārata | nikṣiptau nagarādhyakṣau śeṣāḥ sarve vinirgatāḥ

हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन ! राजा उग्रसेन तथा वसुदेव—इन दोनोंको नगरका अध्यक्ष बनाकर द्वारकापुरीमें ही छोड़ दिया गया । शेष सब लोग यात्राके लिये निकले

अध्याय 143

श्लोक 6

पृथग्बलः पृथग्धीमाँल्लोकनाथो जनार्दनः ।गोष्ठ्यः पृथक्कुमाराणां नृदेवामिततेजसाम्

pṛthagbalaḥ pṛthagdhīmā~llokanātho janārdanaḥ | goṣṭhyaḥ pṛthakkumārāṇāṃ nṛdevāmitatejasām

हिन्दी अर्थ

नरदेव ! बलरामजी अपने परिवारके साथ अलग थे, सम्पूर्ण जगत्‌के स्वामी बुद्धिमान भगवान्‌ जनार्दनका दल अलग था तथा अमित तेजस्वी कुमारोंकी मण्डलियाँ भी अलग-अलग थीं

अध्याय 143

श्लोक 7

गणिकानां सहस्राणि निःसृतानि नराधिप ।कुमारैः सह वार्ष्णेयै रूपवद्भिः स्वलङ्कृतैः

gaṇikānāṃ sahasrāṇi niḥsṛtāni narādhipa | kumāraiḥ saha vārṣṇeyai rūpavadbhiḥ svalaṅkṛtaiḥ

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर ! वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत तथा रूप-सौन्दर्यसे सम्पन्न वृष्णिवंशी कुमारोंके साथ सहस्रों गणिकाएँ भी यात्राके लिये निकलीं

अध्याय 143

श्लोक 8

दैत्याधिवासं निर्जित्य यदुभिर्दृढविक्रमैः ।वेश्या निवेशिता वीर द्वारवत्यां सहस्रशः

daityādhivāsaṃ nirjitya yadubhirdṛḍhavikramaiḥ | veśyā niveśitā vīra dvāravatyāṃ sahasraśaḥ

हिन्दी अर्थ

वीर ! सुदृढ़ पराक्रमी यादववीरोंने दैत्योंके निवास-स्थान समुद्रको जीतकर वहाँ द्वारकापुरीमें सहस्त्रों वेश्याओंको बसा दिया था

अध्याय 143

श्लोक 9

सामान्यास्ताः कुमाराणां क्रीडानार्यो महात्मनाम् ।इच्छाभोग्या गुणैरेव राजन्या वेषयोषितः

sāmānyāstāḥ kumārāṇāṃ krīḍānāryo mahātmanām | icchābhogyā guṇaireva rājanyā veṣayoṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

विविध वेश धारण करनेवाली वे युवतियाँ महामनस्वी यादवकुमारोंके लिये सामान्य क्रीड़ानारियाँ थीं। वे अपने गुणोंद्वारा सभी कुमारोंकी इच्छाके अनुसार उनके उपभोगमें आनेवाली थीं । राजकुमारोंकी उपभोग्या होनेके कारण वे राजन्या कहलाती थीं

अध्याय 143

श्लोक 10

स्थितिरेषा हि भैमानां कृता कृष्णेन धीमता ।स्त्रीनिमित्तं भवेद् वैरं मा यदूनामिति प्रभो

sthitireṣā hi bhaimānāṃ kṛtā kṛṣṇena dhīmatā | strīnimittaṃ bhaved vairaṃ mā yadūnāmiti prabho

हिन्दी अर्थ

प्रभो ! बुद्धिमान्‌ श्रीकृष्णने भीमवंशी यादवोंके लिये ऐसी व्यवस्था कर दी थी, जिससे याददवों में स्त्रीके कारण परस्पर वैर न हो

अध्याय 143

श्लोक 11

रेवत्या चैकया सार्धं बलो रेमेऽनुकूलया ।चक्रवाकानुरागेण यदुश्रेष्ठः प्रतापवान्

revatyā caikayā sārdhaṃ balo reme'nukūlayā | cakravākānurāgeṇa yaduśreṣṭhaḥ pratāpavān

हिन्दी अर्थ

प्रतापी यदुश्रेष्ठ बलरामजी सदा अपने अनुकूल रहनेवाली एकमात्र रेवतीदेवीके साथ चकवा-चकवीके समान परस्पर अनुरागपूर्वक रमण करते थे

अध्याय 143

श्लोक 12

कादम्बरीपानकलो भूषितो वनमालया ।चिक्रीड सागरजले रेवत्या सहितो बलः

kādambarīpānakalo bhūṣito vanamālayā | cikrīḍa sāgarajale revatyā sahito balaḥ

हिन्दी अर्थ

वे कादम्बरी (मधु)-का पान करके मस्त रहते थे। वनमालासे विभूषित हुए बलराम वहाँ रेवतीके साथ समुद्रजलमें क्रीडा करने लगे

अध्याय 143

श्लोक 13

षोडश स्त्रीसहस्राणि जले जलजलोचनः ।रमयामास गोविन्दो विश्वरूपेण सर्वदृक्

ṣoḍaśa strīsahasrāṇi jale jalajalocanaḥ | ramayāmāsa govindo viśvarūpeṇa sarvadṛk

हिन्दी अर्थ

सबके द्रष्ट कमलनयन गोविन्द सर्वरूपसे अर्थात्‌ जितनी स्त्रियाँ थीं, उतने ही रूप धारण करके जलमें अपनी सोलह हजार स्त्रियोंको रमाते थे

अध्याय 143

श्लोक 14

अहमिष्टा मया सार्द्धं जले वसति केशवः ।इति ता मेनिरे सर्वा रात्रौ नारायणस्त्रियः

ahamiṣṭā mayā sārddhaṃ jale vasati keśavaḥ | iti tā menire sarvā rātrau nārāyaṇastriyaḥ

हिन्दी अर्थ

उस रातमें नारायणस्वरूप श्रीकृष्णकी वे सारी रानियाँ यही मानती थीं कि मैं ही इन्हें अधिक प्रिय हूँ; अत: केशव मेरे ही साथ जलमें विहार कर रहे हैं

अध्याय 143

श्लोक 15

सर्वाः सुरतचिह्नाङ्ग्यः सर्वाः सुरततर्पिताः ।मानमूहुश्च ताः सर्वा गोविन्दे बहुमानजम्

sarvāḥ suratacihnāṅgyaḥ sarvāḥ suratatarpitāḥ | mānamūhuśca tāḥ sarvā govinde bahumānajam

हिन्दी अर्थ

सभीके अज्जोंमें सुरतके चिह्न थे। सभी सुरत-सुखका अनुभव करके तृपत हो गयी थीं; अत: वे सब-की-सब गोविन्दके प्रति बहुमानजनित सम्मानका भाव धारण करती थीं

अध्याय 143

श्लोक 16

अहमिष्टाहमिष्टेति स्निग्धे परिजने तदा ।नारायणस्त्रियः सर्वा मुदा शश्लाघिरे शुभाः

ahamiṣṭāhamiṣṭeti snigdhe parijane tadā | nārāyaṇastriyaḥ sarvā mudā śaślāghire śubhāḥ

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्णकी वे सभी सुन्दरी रानियाँ अपने ख्रेही परिजनोंके समीप प्रसन्नतापूर्वक अपने भाग्यकी सराहना करती हुई कहती थीं कि मैं ही अपने प्राणनाथको अधिक प्रिय हूँ। मैं ही उन्हें अधिक प्यारी हूँ

अध्याय 143

श्लोक 17

करजद्विजचिह्नानि कुचाधरगतानि ताः ।दृष्ट्वा दृष्ट्वा जहृषिरे दर्पणे कमलेक्षणाः

karajadvijacihnāni kucādharagatāni tāḥ | dṛṣṭvā dṛṣṭvā jahṛṣire darpaṇe kamalekṣaṇāḥ

हिन्दी अर्थ

वे कमलनयनी सुन्दरियाँ दर्पणमें अपने कुचोंपर श्रीकृष्णके नखक्षत और अधरोंपर दन्तक्षतके चिह्न देख-देखकर हर्षमें भर जाती थीं

अध्याय 143

श्लोक 18

गोत्रमुद्दिश्य कृष्णस्य जगिरे कृष्णयोषितः ।पिबन्त्य इव कृष्णस्य नयनैर्वदनाम्बुजम्

gotramuddiśya kṛṣṇasya jagire kṛṣṇayoṣitaḥ | pibantya iva kṛṣṇasya nayanairvadanāmbujam

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्णकी वे सुन्दरी पत्नियाँ उनके नाम ले-लेकर गीत गातीं और अपने नेत्रपुटोंसे उनके मुखारविन्दका रस पान करती थीं

अध्याय 143

श्लोक 19

कृष्णार्पितमनोदृष्ट्यः कान्ता नारायणस्त्रियः ।मनोहरतरा राजन्नभवन्नेकनिश्चयाः

kṛṣṇārpitamanodṛṣṭyaḥ kāntā nārāyaṇastriyaḥ | manoharatarā rājannabhavannekaniścayāḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! उनके मन और नेत्र श्रीकृष्णमें ही लगे रहते थे। नारायणकी वे कमनीय भार्याएँ अत्यन्त मनोहारिणी और एक निश्चयपर अटल रहनेवाली थीं

अध्याय 143

श्लोक 20

एकार्पितमनोदृष्ट्यो नेर्ष्यां ताश्चक्रिरेऽङ्गनाः ।नारायणेन देवेन तर्प्यमाणमनोरथाः

ekārpitamanodṛṣṭyo nerṣyāṃ tāścakrire'ṅganāḥ | nārāyaṇena devena tarpyamāṇamanorathāḥ

हिन्दी अर्थ

नारायणदेव उनके सारे मनोरथ पूर्ण करके उन्हें तृत रखते थे; अत: वे अज्नाएँ एकको ही अपना हृदय और दृष्टि अर्पित करके भी आपसमें कभी ईर्ष्या नहीं करती थीं

अध्याय 143

श्लोक 21

शिरांसि गर्वितान्यूहुः सर्वा निरवशेषतः ।वाल्लभ्यं केशवमयं वहन्त्यश्चारुदर्शनाः

śirāṃsi garvitānyūhuḥ sarvā niravaśeṣataḥ | vāllabhyaṃ keśavamayaṃ vahantyaścārudarśanāḥ

हिन्दी अर्थ

वे सारी-की-सारी मनोहर दृष्टिवाली (अथवा मनोहर दिखायी देनेवाली) सुन्दरियाँ केशवकी वल्लभा होनेका अथवा केशवको प्राणवल्लभके रूपमें प्राप्त करनेका सौभाग्य वहन करती हुई अपने सिरको बड़े गर्वसे ऊँचा किये रहती थीं

अध्याय 143

श्लोक 22

ताभिस्तु सह चिक्रीड सर्वाभिर्हरिरात्मवान् ।विश्वरूपेण विधिना समुद्रे विमले जले

tābhistu saha cikrīḍa sarvābhirharirātmavān | viśvarūpeṇa vidhinā samudre vimale jale

हिन्दी अर्थ

अपने मनको वशमें रखनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्ण समुद्रके निर्मल जलमें पूर्वोक्त विश्वरूप विधिसे उन सबके साथ क्रीड़ा करते थे

अध्याय 143

श्लोक 23

उवाह सर्वगन्धाढ्यं स्वच्छं वारि महोदधिः ।तोयं विलक्षणं मृष्टं वासुदेवस्य शासनात्

uvāha sarvagandhāḍhyaṃ svacchaṃ vāri mahodadhiḥ | toyaṃ vilakṣaṇaṃ mṛṣṭaṃ vāsudevasya śāsanāt

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ वासुदेवके शासनसे उस समय महासागर समस्त सुगन्धोंसे युक्त, स्वच्छ, लवणरहित और शुद्ध स्वादिष्ट जल धारण करता था

अध्याय 143

श्लोक 24

गुल्फदघ्नं जानुदघ्नमूरुदघ्नमथापि वा ।नार्यस्ताः स्तनदघ्नं वा जलं समभिकाङ्क्षितम्

gulphadaghnaṃ jānudaghnamūrudaghnamathāpi vā | nāryastāḥ stanadaghnaṃ vā jalaṃ samabhikāṅkṣitam

श्लोक 24–25 का हिन्दी अर्थ

समुद्रका वह जल कहीं घुट्ीभर था तो कहीं घुटनोंतक, कहीं जाँघोंतक था तो कहीं स्तनोंतक । उन नारियोंको इतना ही जल अभीष्ट था॥ रढ॥ श्रीकृष्णकी वे रानियाँ उनपर सब ओरसे जल उलीचने लगीं, जैसे नदियोंकी अनेक धाराएँ महासागरको सींचती हैं। भगवान्‌ गोविन्द भी उनपर जल छिड़कने लगे, मानो मेघ खिली हुई लताओंपर जल बरसा रहा हो

अध्याय 143

श्लोक 25

सिषिचुः केशवं पत्न्यो धारा इव महोदधिम् ।सिषेच ताश्च गोविन्दो मेघः फुल्ललता इव

siṣicuḥ keśavaṃ patnyo dhārā iva mahodadhim | siṣeca tāśca govindo meghaḥ phullalatā iva

अर्थ श्लोक 24 के साथ

अध्याय 143

श्लोक 26

अवलम्ब्य पराः कण्ठे हरि हरिणलोचनाः ।उपगूहस्व मां वीर पतामीत्यब्रुवन् स्त्रियः

avalambya parāḥ kaṇṭhe hari hariṇalocanāḥ | upagūhasva māṃ vīra patāmītyabruvan striyaḥ

हिन्दी अर्थ

कितनी ही मृगनयनी नारियाँ श्रीहरिके कण्ठमें अपनी बाँहिं डालकर कहने लरगीं-''वीर! मुझे हृदयसे लगा लो, अपनी भुजाओंमें कस लो; अन्यथा मैं जलमें गिरी जाती हूँ'

अध्याय 143

श्लोक 27

काश्चित् काष्ठमयैस्तेरुः प्लवैः सर्वाङ्गशोभनाः ।क्रौञ्चबर्हिणनागानामाकारसदृशैः स्त्रियः

kāścit kāṣṭhamayaisteruḥ plavaiḥ sarvāṅgaśobhanāḥ | krauñcabarhiṇanāgānāmākārasadṛśaiḥ striyaḥ

हिन्दी अर्थ

कितनी ही सव्धिसुन्दरी स्त्रियाँ क्रौ्न, मोर तथा नागोंके आकारमें बनी हुई काठकी नौकाओंद्वारा जलपर तैरने लगीं

अध्याय 143

श्लोक 28

मकराकृतिभिश्चान्या मीनाभैरपि चापराः ।बहुरूपाकृतिधरैः पुप्लुवुश्चापराः स्त्रियः

makarākṛtibhiścānyā mīnābhairapi cāparāḥ | bahurūpākṛtidharaiḥ pupluvuścāparāḥ striyaḥ

श्लोक 28–29 का हिन्दी अर्थ

दूसरी-दूसरी स्त्रियाँ मगर, मत्स्य तथा अन्यान्य विविध प्राणियोंकी आकृति धारण करनेवाली नौकाओंद्वारा तैरने लगीं। कितनी ही रानियाँ समुद्रके रमणीय जलमें श्रीकृष्णको हर्ष प्रदान करती हुई घटोंके समान अपने स्तनकुम्भोंद्वारा तैर रही थीं

अध्याय 143

श्लोक 29

स्तनकुम्भैस्तथा तेरुः कुम्भैरिव तथापराः ।समुद्रसलिले रम्ये हर्षयन्त्यो जनार्दनम्

stanakumbhaistathā teruḥ kumbhairiva tathāparāḥ | samudrasalile ramye harṣayantyo janārdanam

अर्थ श्लोक 28 के साथ

अध्याय 143

श्लोक 30

रराम सह रुक्मिण्या जले तस्मिन् मुदा युतः ।येनैव कार्ययोगेन रमतेऽमरसत्तमः

rarāma saha rukmiṇyā jale tasmin mudā yutaḥ | yenaiva kāryayogena ramate'marasattamaḥ

श्लोक 30–31 का हिन्दी अर्थ

अमरशिरोमणि श्रीकृष्ण उस जलमें आनन्दपूर्वक महारानी रुक्मिणीके साथ रमण करते थे। वे जिस-जिस कार्य या उपायसे आनन्द मानते, उनकी वे सुन्दरी स्त्रियाँ प्रशंसापूर्वक वही-वही कार्य या उपाय करती थीं। महीन वस्त्रोंसे ढकी हुई दूसरी तन्वज्ञी एवं कमलनयनी स्त्रियाँ भाँति-भाँतिकी लीलाएँ करती हुई जलमें भगवान्‌ श्रीकृष्णके साथ क्रीड़ा करती थीं

अध्याय 143

श्लोक 31

तत् तदेव हि ताश्चकुर्मुदा नारायणस्त्रियः ।तनुवस्त्रावृतास्तन्व्यो लीलयन्त्यस्तथापराः ।चिक्रीडुर्वासुदेवस्य जले जलजलोचनाः

tat tadeva hi tāścakurmudā nārāyaṇastriyaḥ | tanuvastrāvṛtāstanvyo līlayantyastathāparāḥ | cikrīḍurvāsudevasya jale jalajalocanāḥ

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 143

श्लोक 32

यस्या यस्यास्तु यो भावस्तां तां तेनैव केशवः ।अनुप्रविश्य भावज्ञो निनायात्मवशं वशी

yasyā yasyāstu yo bhāvastāṃ tāṃ tenaiva keśavaḥ | anupraviśya bhāvajño nināyātmavaśaṃ vaśī

हिन्दी अर्थ

जिस-जिस रानीके मनमें जो-जो भाव था, सबके भावोंको जानने और मनको वशमें रखनेवाले श्रीकृष्ण उसी-उसी भावसे उस स्त्रीके अन्तरमें प्रवेश करके उसे अपने वशमें कर लेते थे

अध्याय 143

श्लोक 33

हृषीकेशोऽपि भगवान् हृषीकेशः सनातनः ।बभूव देशकालेन कान्तावशगतः प्रभुः

hṛṣīkeśo'pi bhagavān hṛṣīkeśaḥ sanātanaḥ | babhūva deśakālena kāntāvaśagataḥ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

इन्द्रियोंके प्ररेक और सबके स्वामी होकर भी सनातन भगवान्‌ हृषीकेश देश-कालके अनुसार अपनी प्रेयसी पत्नियोंके वशमें हो गये थे

अध्याय 143

श्लोक 34

कुलशीलसमोऽस्माकं योग्योऽयमिति मेनिरे ।वंशरूपेण वर्तन्तमङ्गनास्ता जनार्दनम्

kulaśīlasamo'smākaṃ yogyo'yamiti menire | vaṃśarūpeṇa vartantamaṅganāstā janārdanam

हिन्दी अर्थ

वे समस्त वनिताएँ अपने कुलके अनुरूप बर्ताव करनेवाले जनार्दनको ऐसा समझती थीं कि ये कुल और शीलमें समान होनेके कारण हमारे ही योग्य हैं

अध्याय 143

श्लोक 35

तदा दाक्षिण्ययुक्तं तं स्मितपूर्वाभिभाषिणम् ।कृष्णं भार्याश्चकमिरे भक्त्या च बहु मेनिरे

tadā dākṣiṇyayuktaṃ taṃ smitapūrvābhibhāṣiṇam | kṛṣṇaṃ bhāryāścakamire bhaktyā ca bahu menire

हिन्दी अर्थ

मुसकराकर बात करनेवाले तथा औदार्य-गुणसे सम्पन्न उन प्राणवल्लभ श्रीकृष्णको उस समय उनकी वे पत्नियाँ हदयसे चाहने लगीं तथा भक्ति एवं अनुरागके कारण उनका बहुत सम्मान करने लगीं

अध्याय 143

श्लोक 36

पृथग्गोष्ठ्यः कुमाराणां प्रकाशं स्त्रीगणैः सह ।अलञ्चक्रुर्जलं वीराः सागरस्य गुणाकराः

pṛthaggoṣṭhyaḥ kumārāṇāṃ prakāśaṃ strīgaṇaiḥ saha | alañcakrurjalaṃ vīrāḥ sāgarasya guṇākarāḥ

हिन्दी अर्थ

यादवकुमारोंकी गोष्टियाँ अलग थीं। वे वीर यादवकुमार उत्तम गुणोंकी खान थे और प्रकाशरूपसे स्त्रीसमुदायोंके साथ समुद्रके जलकी शोभा बढ़ा रहे थे

अध्याय 143

श्लोक 37

गीतनृत्यविधिज्ञानां तासां स्त्रीणां जनेश्वर ।तेजसाप्याहृतानां ते दाक्षिण्यात् तस्थिरे वशे

gītanṛtyavidhijñānāṃ tāsāṃ strīṇāṃ janeśvara | tejasāpyāhṛtānāṃ te dākṣiṇyāt tasthire vaśe

हिन्दी अर्थ

जनेधर! वे स्त्रियाँ गीत और नृत्यकी क्रियाको ज्ञाननेवाली थीं तथा उन कुमारोंके तेजसे स्वयं ही इनकी ओर आकृष्ट हुई थीं तो भी वे कुमार उदारताके कारण उनके वशगें स्थित थे

अध्याय 143

श्लोक 38

शृण्वन्तश्चारुगीतानि तथा स्वभिनयान्यपि ।तूर्याण्युत्तमनारीणां मुमुहुर्यदुपुङ्गवाः

śṛṇvantaścārugītāni tathā svabhinayānyapi | tūryāṇyuttamanārīṇāṃ mumuhuryadupuṅgavāḥ

हिन्दी अर्थ

उन उत्तम नारियोंके मनोहर गीत और वाद्य सुनते तथा उनके सुन्दर अभिनय रखते हुए वे यदुपुड़्ववीर उनपर लट्टू हो रहे पे

अध्याय 143

श्लोक 39

पञ्चचूडां ततः कृष्णः कौबेर्यश्च वराप्सराः ।माहेन्द्रीश्चानयामास विश्वरूपेण हेतुना

pañcacūḍāṃ tataḥ kṛṣṇaḥ kauberyaśca varāpsarāḥ | māhendrīścānayāmāsa viśvarūpeṇa hetunā

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर श्रीकृष्णने विश्रूप होनेके कारण वयं ही प्रेरणा देकर पश्चचूड़ा नामवाली अप्सराको था कुबेरभवन और इन्द्रभवनकी भी सुन्दरी अप्सराओंको हाँ बुला मँगाया

अध्याय 143

श्लोक 40

ताः प्रोवाचाप्रमेयात्मा सान्त्वयित्वा जगत्प्रभुः ।उत्थापयित्वा प्रणताः कृताञ्जलिपुटास्तथा

tāḥ provācāprameyātmā sāntvayitvā jagatprabhuḥ | utthāpayitvā praṇatāḥ kṛtāñjalipuṭāstathā

हिन्दी अर्थ

अप्रमेयस्वरूप जगदीश्वर श्रीकृष्णने गाथ जोड़कर चरणोंमें पड़ी हुई उन अप्सराओंको उठाया मौर सान्त्वना देकर कहा—

अध्याय 143

श्लोक 41

क्रीडायुवत्यो भैमानां प्रविशध्वमशङ्किताः ।मत्प्रियार्थं वरारोहा रमयध्वं च यादवान्

krīḍāyuvatyo bhaimānāṃ praviśadhvamaśaṅkitāḥ | matpriyārthaṃ varārohā ramayadhvaṃ ca yādavān

हिन्दी अर्थ

सुन्दरियो ! तुम न:शड्जू होकर भीमवंशी यादवकुमारों की क्रीडायुवतियों में विष्ट हो जाओ और मेरा प्रिय करनेके लिये इन ादवोंको सुख पहुँचाओ

अध्याय 143

श्लोक 42

दर्शयध्वं गुणान् सर्वान् नृत्यगीतै रहःसु च ।तथाभिनययोगेषु वाद्येषु विविधेषु च

darśayadhvaṃ guṇān sarvān nṛtyagītai rahaḥsu ca | tathābhinayayogeṣu vādyeṣu vividheṣu ca

हिन्दी अर्थ

नाच, गान, एकान्त- रिचर्या, अभिनय-योग तथा नाना प्रकारके बाजे बजानेकी ऊलामें तुमलोगोंके पास जितने गुण हों, उन सबको देखाओ

अध्याय 143

श्लोक 43

एवं कृते विधास्यामि श्रेयो वो मनसेप्सितम् ।मच्छरीरसमा ह्येते सर्वे निरवशेषतः

evaṃ kṛte vidhāsyāmi śreyo vo manasepsitam | maccharīrasamā hyete sarve niravaśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

ऐसा करनेपर मैं तुम्हें मनोवाज्छित ल्याण प्रदान करूँगा; क्योंकि ये सब-के-सब यादव रे शरीरके ही समान हैं '

अध्याय 143

श्लोक 44

शिरसाज्ञां तु ताः सर्वाः प्रतिगृह्य हरेस्तदा ।क्रीडायुवत्यो विविशुर्भैमानामप्सरोवराः

śirasājñāṃ tu tāḥ sarvāḥ pratigṛhya harestadā | krīḍāyuvatyo viviśurbhaimānāmapsarovarāḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय श्रीहरिकी स आज्ञाको शिरोधार्य करके वे सब श्रेष्ठ अप्सराएँ दवकुमारोंकी क्रीडा-युवतियोंमें सम्मिलित हो गयीं

अध्याय 143

श्लोक 45

ताभिः प्रविष्टमात्राभिर्द्योतितः स महार्णवः ।सौदामिनीभिर्नभसि घनवृन्दमिवानघ

tābhiḥ praviṣṭamātrābhirdyotitaḥ sa mahārṇavaḥ | saudāminībhirnabhasi ghanavṛndamivānagha

हिन्दी अर्थ

ष्पाप नरेश! उनके प्रवेश करते ही वह महासागर दव्य प्रभासे उद्दीद हो उठा। ठीक उसी तरह, जैसे पाकाशमें मेघोंका समुदाय बिजलियोंके चमकनेसे प्रकाशित उठता है

अध्याय 143

श्लोक 46

ता जले स्थलवत्स्थित्वा जगुश्चाप्यथ वादयन् ।चक्रुश्चाभिनयं सम्यक्स्वर्गावास इवाङ्गनाः

tā jale sthalavatsthitvā jaguścāpyatha vādayan | cakruścābhinayaṃ samyaksvargāvāsa ivāṅganāḥ

हिन्दी अर्थ

वे दिव्य अज्नाएँ जलमें भी थलकी ही भाँति खड़ी हो स्वर्गलोककी ही भाँति तत गाने, बाजे बजाने तथा सुन्दर अभिनय करने गीं

अध्याय 143

श्लोक 47

गन्धैर्माल्यैश्च ता दिव्यैर्वस्त्रैश्चायतलोचनाः ।हेलाभिर्हास्यभावैश्च जह्रुर्भैममनांसि ताः

gandhairmālyaiśca tā divyairvastraiścāyatalocanāḥ | helābhirhāsyabhāvaiśca jahrurbhaimamanāṃsi tāḥ

हिन्दी अर्थ

वे विशाल नेत्रोिंवाली सुन्दरियाँ दिव्य गन्ध, लय तथा वस्त्रोंसे सुशोभित हो अपनी विविध लीलाओं था हास्ययुक्त हाव-भावोंसे यादवकुमारोंके चित्त चुराने गीं

अध्याय 143

श्लोक 48

कटाक्षैरिङ्गितैर्हास्यैः केलिरोषैः प्रसादितैः ।मनोऽनुकूलैर्भैमानां समाजह्रुर्मनांसि ताः

kaṭākṣairiṅgitairhāsyaiḥ keliroṣaiḥ prasāditaiḥ | mano'nukūlairbhaimānāṃ samājahrurmanāṃsi tāḥ

हिन्दी अर्थ

कटाक्षों, संकेतों, क्रीडाजनित रोषों तथा सन्नतासूचक मनोडऊनुकूल भावोंके द्वारा वे भीमवंशियोंके न मोहने लगीं

अध्याय 143

श्लोक 49

उत्क्षिप्योत्क्षिप्य चाकाशं वातस्कन्धान् बहूंश्च तान् ।मदिरावशगा भैमा मानयन्ति वराप्सराः

utkṣipyotkṣipya cākāśaṃ vātaskandhān bahūṃśca tān | madirāvaśagā bhaimā mānayanti varāpsarāḥ

हिन्दी अर्थ

वे अप्सराएँ उन यादवकुमारोंको पर-ऊपर आकाशमें प्रवह आदि वायुके मार्गोमें ले [कर उनके साथ विहार करती थीं, अतः: वे मदमत्त ए भीमवंशीकुमार उन सुन्दरी अप्सराओंका बड़ा म्मान करते थे

अध्याय 143

श्लोक 50

कृष्णोऽपि तेषां प्रीत्यर्थं विजह्रे वियतिं प्रभुः ।सर्वैः षोडशभिः सार्द्धं स्त्रीसहस्रैर्मुदान्वितः

kṛṣṇo'pi teṣāṃ prītyarthaṃ vijahre viyatiṃ prabhuḥ | sarvaiḥ ṣoḍaśabhiḥ sārddhaṃ strīsahasrairmudānvitaḥ

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ श्रीकृष्ण भी उन यादवोंकी प्रसन्नताके लिये आकाशमें स्थित हो अपनी सोलह हजार स््रियोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक विहार करते थे

अध्याय 143

श्लोक 51

प्रभावज्ञास्तु ते वीराः कृष्णस्यामिततेजसः ।न जग्मुर्विस्मयं भैमा गाम्भीर्यं परमास्थिताः

prabhāvajñāstu te vīrāḥ kṛṣṇasyāmitatejasaḥ | na jagmurvismayaṃ bhaimā gāmbhīryaṃ paramāsthitāḥ

हिन्दी अर्थ

वे वीर यादव अमित तेजस्वी श्रीकृष्णका प्रभाव जानते थे; अतः आकाशभें क्रीडा करनेके कारण उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ। वे उस दशामें भी अत्यन्त गम्भीर बने रहे

अध्याय 143

श्लोक 52

केचिद् रैवतकं गत्वा पुनरायान्ति भारत ।गृहान्यन्ये वनान्यन्ये काङ्क्षितान्यरिमर्दन

kecid raivatakaṃ gatvā punarāyānti bhārata | gṛhānyanye vanānyanye kāṅkṣitānyarimardana

हिन्दी अर्थ

शत्रुमर्दन ! भरतनन्दन ! कुछ यादव रैवतक पर्वतपर जाकर फिर लौट आते थे। दूसरे घरोंमें जाकर आ जाते तथा अन्य लोग अभिलषित वनोंमें घूम-फिरकर लौटते थे

अध्याय 143

श्लोक 53

अपेयः पेयसलिलः सागरश्चाभवत् तदा ।आज्ञया लोकनाथस्य विष्णोरतुलतेजसः

apeyaḥ peyasalilaḥ sāgaraścābhavat tadā | ājñayā lokanāthasya viṣṇoratulatejasaḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय अतुल तेजस्वी लोकनाथ भगवान्‌ विष्णु (श्रीकृष्ण )-की आज्ञासे अपेय समुद्रका जल भी पीनेयोग्य हो गया था

अध्याय 143

श्लोक 54

अधावन् स्थलवच्चापि जले जलजलोचनाः ।गृह्य हस्ते तथा नार्यो युक्तामज्जंस्तथापि च

adhāvan sthalavaccāpi jale jalajalocanāḥ | gṛhya haste tathā nāryo yuktāmajjaṃstathāpi ca

हिन्दी अर्थ

वे कमलनयनी नारियाँ जब इच्छा होती, तब जलमें भी स्थलकी भाँति दौड़ती थीं और जब चाहतीं परस्पर हाथ पकड़कर एक साथ ही गोता लगा लेती थीं

अध्याय 143

श्लोक 55

भक्ष्यभोज्यानि पेयानि चोष्यं लेह्यं तथैव च ।बहुप्रकारं मनसा ध्याते तेषां भवत्युत

bhakṣyabhojyāni peyāni coṣyaṃ lehyaṃ tathaiva ca | bahuprakāraṃ manasā dhyāte teṣāṃ bhavatyuta

हिन्दी अर्थ

यादवोंके मनसे चिन्तन करते ही उनके लिये नाना प्रकारके भक्ष्य, भोज्य, पेय, चोष्य और लेह्य पदार्थ प्रस्तुत हो जाते थे

अध्याय 143

श्लोक 56

अम्लानमाल्यधारिण्यस्ताः स्त्रियस्ताननिन्दितान् ।रहःसु रमयाञ्चक्रुः स्वर्गे देवरतानुगाः

amlānamālyadhāriṇyastāḥ striyastānaninditān | rahaḥsu ramayāñcakruḥ svarge devaratānugāḥ

हिन्दी अर्थ

जो कभी कुम्हलाती नहीं थी, ऐसी माला धारण करनेवाली वे दिव्य अप्सराएँ स्वर्गमें देवताओंके साथ की गयी रतिक्रीडाका अनुसरण करती हुई उन श्रेष्ठ यादवकुमारोंको एकान्तमें रमणका अवसर देती थीं

अध्याय 143

श्लोक 57

नौभिर्गृहप्रकाराभिश्चिक्रीडुरपराजिताः ।स्नातानुलिप्तमुदिताः सायाह्नेऽन्धकवृष्णयः

naubhirgṛhaprakārābhiścikrīḍuraparājitāḥ | snātānuliptamuditāḥ sāyāhne'ndhakavṛṣṇayaḥ

हिन्दी अर्थ

किसीसे पराजित न होनेवाले अन्धक और वृष्णिवंशके वीर सायंकालमें स्नानके पश्चात्‌ अनुलेपन धारण करके आनन्दमग्र हो गृहाकार बनी हुई नौकाओंद्वारा क्रीडा करने लगे

अध्याय 143

श्लोक 58

आयताश्चतुरस्राश्च वृत्ताश्च स्वस्तिकास्तथा ।प्रासादा नौषु कौरव्य विहिता विश्वकर्मणा

āyatāścaturasrāśca vṛttāśca svastikāstathā | prāsādā nauṣu kauravya vihitā viśvakarmaṇā

हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन ! विश्वक्मनि नौकाओंमें अनेक प्रकारके महल बनाये थे, जिनमेंसे कुछ लम्बे थे और कुछ चौकोर । कुछ गोलाकार थे और कुछ स्वस्तिकाकार

अध्याय 143

श्लोक 59

कैलासमन्दरच्छन्दा मेरुच्छन्दास्तथैव च ।तथा नानावयश्छन्दास्तथेहामृगरूपिणः

kailāsamandaracchandā merucchandāstathaiva ca | tathā nānāvayaśchandāstathehāmṛgarūpiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

वे महल कैलास, मन्दराचल और मेरुपर्वतकी भाँति इच्छानुसार रूप धारण कर लेते थे। कई नाना प्रकारके पक्षियों और ईहामृगों ( भेड़ियों )- के समान रूप धारण करनेवाले थे

अध्याय 143

श्लोक 60

वैडूर्यतोरणैश्चित्राश्चित्राभिर्मणिभक्तिभिः ।मसारगल्वर्कमयैश्चित्रभक्तिशतैरपि

vaiḍūryatoraṇaiścitrāścitrābhirmaṇibhaktibhiḥ | masāragalvarkamayaiścitrabhaktiśatairapi

हिन्दी अर्थ

उनमें वैदूर्यमणिके तोरण लगे थे, जिनसे उन महलोंकी विचित्र शोभा होती थी। वे विचित्र मणिमय शय्याओंसे सुसज्जित थे । मरकत, चन्द्रकान्त और सूर्यकान्तमणिमय विचित्र रागोंसे वे रज्जित थे तथा नाना प्रकारके सैकड़ों आस्तरण (बिस्तर) उनकी शोभा बढ़ाते थे

अध्याय 143

श्लोक 61

आक्रीडगरुडच्छन्दाश्चित्राः कनकरीतिभिः ।क्रौञ्चच्छन्दाः शुकच्छन्दा गजच्छन्दास्तथापरे

ākrīḍagaruḍacchandāścitrāḥ kanakarītibhiḥ | krauñcacchandāḥ śukacchandā gajacchandāstathāpare

हिन्दी अर्थ

खेलके लिये बनाये गये गरुड़के समान भी उन भवनोंकी आकृति थी। वे विचित्र भवन सुवर्णकी धाराओंसे शोभा पाते थे। कोई क्रौज्के समान, कोई तोतेके तुल्य और कितने ही भवन हाथियोंकी सी आकृति धारण करते थे

अध्याय 143

श्लोक 62

कर्णधारैर्गृहीतास्ता नावः कार्तस्वरोज्ज्वलाः ।सलिलं शोभयामासुः सागरस्य महोर्मिमत्

karṇadhārairgṛhītāstā nāvaḥ kārtasvarojjvalāḥ | salilaṃ śobhayāmāsuḥ sāgarasya mahormimat

हिन्दी अर्थ

सुवर्णसे प्रकाशित होनेवाली वे नौकाएँ कर्णधारों के नेयन्त्रणमें रहकर उत्ताल तरंगोंसे युक्त सागरकी जलराशिको पुशोभित कर रही थीं

अध्याय 143

श्लोक 63

समुच्छ्रितः सितैः पोतैर्यानपात्रैस्तथैव च ।नौभिश्च झिल्लिकाभिश्च शुशुभे वरुणालयः

samucchritaḥ sitaiḥ potairyānapātraistathaiva ca | naubhiśca jhillikābhiśca śuśubhe varuṇālayaḥ

हिन्दी अर्थ

सफेद जलपोतों, यात्रोपयोगी बड़ी -बड़ी नावों, वेगवती नौकाओं और महल आदिसे पुक्त विशाल जहाजोंसे उस वरुणालय (समुद्र ) -की बड़ी शोभा हो रही थी

अध्याय 143

श्लोक 64

पुराण्याकाशगानीव गन्धर्वाणामितस्ततः ।वभ्रमुः सागरजले भैमयानानि सर्वतः

purāṇyākāśagānīva gandharvāṇāmitastataḥ | vabhramuḥ sāgarajale bhaimayānāni sarvataḥ

हिन्दी अर्थ

यादवोंके वे जलयान समुद्रके नलमें सब ओर चक्कर लगा रहे थे। वे ऐसे जान पड़ते पे, मानो गन्धर्वोके नगर आकाशमें विचर रहे हों

अध्याय 143

श्लोक 65

नन्दनच्छन्दयुक्तेषु यानपात्रेषु भारत ।नन्दनप्रतिमं सर्वं विहितं विश्वकर्मणा

nandanacchandayukteṣu yānapātreṣu bhārata | nandanapratimaṃ sarvaṃ vihitaṃ viśvakarmaṇā

हिन्दी अर्थ

भारत ! नन्दनवनकी आकृति और समृद्धियोंसे युक्त यानपात्रोंमें वश्चकर्माने सब कुछ नन्दन-जैसा ही बना दिया था

अध्याय 143

श्लोक 66

उद्यानानि सभावृक्षा दीर्घिकाः स्यन्दनानि च ।निवेशितानि शिल्पानि तादृशान्येव सर्वथा

udyānāni sabhāvṛkṣā dīrghikāḥ syandanāni ca | niveśitāni śilpāni tādṛśānyeva sarvathā

हिन्दी अर्थ

द्यान, सभा, वृक्ष, झील और झरने (या फौवारे) आदि शल्प सर्वथा वैसे ही उनमें समाविष्ट किये गये थे

अध्याय 143

श्लोक 67

स्वर्गच्छन्देषु चान्येषु समासात्स्वर्गसन्निभाः ।नारायणाज्ञया वीर विहिता विश्वकर्मणा

svargacchandeṣu cānyeṣu samāsātsvargasannibhāḥ | nārāyaṇājñayā vīra vihitā viśvakarmaṇā

हिन्दी अर्थ

तीर ! स्वर्ग-जैसे बने हुए दूसरे जलयानोंमें विश्वकर्मानि भगवान्‌ नारायणकी आज्ञासे स्वर्गकी-सी सारी वस्तुएँ ंक्षेपसे रच दी थीं

अध्याय 143

श्लोक 68

वनेषु रुरुवुर्हृद्यं मधुरं चैव पक्षिणः ।मनोहरतरं चैव भैमानामतितेजसाम्

vaneṣu ruruvurhṛdyaṃ madhuraṃ caiva pakṣiṇaḥ | manoharataraṃ caiva bhaimānāmatitejasām

हिन्दी अर्थ

वहाँके वनोंमें पक्षी हदयको प्रय लगनेवाली मधुर बोली बोलते थे। उनकी वह बोली न अत्यन्त तेजस्वी यादवोंको बहुत ही मनोहर प्रतीत हीती थी

अध्याय 143

श्लोक 69

देवलोकोद्भवाः श्वेता विलेपुः कोकिलास्तदा ।मधुराणि विचित्राणि यदूनां काङ्क्षितानि च

devalokodbhavāḥ śvetā vilepuḥ kokilāstadā | madhurāṇi vicitrāṇi yadūnāṃ kāṅkṣitāni ca

हिन्दी अर्थ

देवलोकमें उत्पन्न हुए सफेद कोकिल झस समय यादववीरोंकी इच्छाके अनुसार विचित्र एवं पधुर आलाप छेड़ रहे थे

अध्याय 143

श्लोक 70

चन्द्रांशुसमरूपेषु हर्म्यपृष्ठेषु बर्हिणः ।ननृतुर्मधुरारावाः शिखण्डिगणसंवृताः

candrāṃśusamarūpeṣu harmyapṛṣṭheṣu barhiṇaḥ | nanṛturmadhurārāvāḥ śikhaṇḍigaṇasaṃvṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

चन्द्रमाकी किरणोंके परमान रूपवाली श्वेत अट्टालिकाओपर मीठी बोली बोलनेवाले पोर दूसरे मोरोंसे घिरकर नृत्य करते थे

अध्याय 143

श्लोक 71

पताका यानपात्राणां सर्वाः पक्षिगणायुताः ।भ्रमरैरुपगीताश्च स्रग्दामासक्तवासिभिः

patākā yānapātrāṇāṃ sarvāḥ pakṣigaṇāyutāḥ | bhramarairupagītāśca sragdāmāsaktavāsibhiḥ

हिन्दी अर्थ

विशाल जलयानोंपर लगी हुई सारी पताकाओंपर पश्षियोंके समुदाय बैठे थे। उनमें जो पुष्पमालाओंकी लड़ियाँ बँधी थीं, इनपर आसक्त होकर रहनेवाले भ्रमर वहाँ गुज्ञारव फैला हे थे

अध्याय 143

श्लोक 72

नारायणाज्ञया वृक्षाः पुष्पाणि मुमुचुर्भृशम् ।ऋतवश्चारुरूपाणि विहायसि गतास्तथा

nārāyaṇājñayā vṛkṣāḥ puṣpāṇi mumucurbhṛśam | ṛtavaścārurūpāṇi vihāyasi gatāstathā

हिन्दी अर्थ

नारायण ( श्रीकृष्ण) -की आज्ञासे वृक्ष तथा ऋतुएँ आकाशमें स्थित हो मनोहर रूपवाले पुष्पोंकी अधिक रर्षा करने लगीं

अध्याय 143

श्लोक 73

ववौ मनोहरो वातो रतिखेदहरः सुखः ।रजोभिः सर्वपुष्पाणां पृक्तश्चन्दनशैत्यभृत्

vavau manoharo vāto ratikhedaharaḥ sukhaḥ | rajobhiḥ sarvapuṣpāṇāṃ pṛktaścandanaśaityabhṛt

हिन्दी अर्थ

रतिजनित खेद अथवा श्रमको रर लेनेवाली मनोहर एवं सुखदायिनी हवा चलने लगी, नो सब प्रकारके फूलोंके परागसे संयुक्त तथा चन्दनकी गीतलताको धारण करनेवाली थी

अध्याय 143

श्लोक 74

शीतोष्णमिच्छतां तत्र बभूव वसुधापते ।वासुदेवप्रसादेन भैमानां क्रीडतां तदा

śītoṣṇamicchatāṃ tatra babhūva vasudhāpate | vāsudevaprasādena bhaimānāṃ krīḍatāṃ tadā

हिन्दी अर्थ

पृथ्वीपते ! करीड़ामें तत्पर होकर सर्दी -गरमीकी इच्छा रखनेवाले पादवोंको उस समय वहाँ भगवान्‌ वासुदेवकी कृपासे वह सब उनकी रुचिके अनुकूल प्राप्त होती थी

अध्याय 143

श्लोक 75

न क्षुत्पिपासा न ग्लानिर्न चिन्ता शोक एव च ।आविवेश तदा भैमान् प्रभावाच्चक्रपाणिनः

na kṣutpipāsā na glānirna cintā śoka eva ca | āviveśa tadā bhaimān prabhāvāccakrapāṇinaḥ

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ वक्रपाणिके प्रभावसे उस समय उन भीम-वंशियोंके भीतर ' तो भूख-प्यास, न ग्लानि, न चिन्ता और न शोकका री प्रवेश होता था

अध्याय 143

श्लोक 76

अप्रशान्तमहातूर्या गीतनृत्योपशोभिताः ।बभूवुः सागरक्रीडा भैमानामतितेजसाम्

apraśāntamahātūryā gītanṛtyopaśobhitāḥ | babhūvuḥ sāgarakrīḍā bhaimānāmatitejasām

हिन्दी अर्थ

अत्यन्त तेजस्वी यादवोंकी पमुद्रके जलमें होनेवाली वे क्रीड़ाएँ निरन्तर चल रही थीं । उनमें बड़े-बड़े वाद्योंकी ध्वनि शान्त नहीं होती थी था गीत और नृत्य उनकी शोभा बढ़ा रहे थे

अध्याय 143

श्लोक 77

बहुयोजनविस्तीर्णं समुद्रं सलिलाशयम् ।रुद्धा चिक्रीडुरिन्द्राभा भैमाः कृष्णाभिरक्षिताः

bahuyojanavistīrṇaṃ samudraṃ salilāśayam | ruddhā cikrīḍurindrābhā bhaimāḥ kṛṣṇābhirakṣitāḥ

हिन्दी अर्थ

मोउध्याय: + ७१९ श्रीकृष्णद्वारा सुरक्षित वे इन्द्रतुल्य तेजस्वी यादव अनेक योजन विस्तृत समुद्रके जलाशयको रोककर क्रीड़ा कर रहे थे

अध्याय 143

श्लोक 78

परिच्छदस्यानुरूपं यानपात्रं महात्मनः ।नारायणस्य देवस्य विहितं विश्वकर्मणा

paricchadasyānurūpaṃ yānapātraṃ mahātmanaḥ | nārāyaṇasya devasya vihitaṃ viśvakarmaṇā

हिन्दी अर्थ

विश्वकर्माने महात्मा भगवान्‌ नारायणदेवके लिये उनके विशाल परिवार (सोलह हजार रानियोंके समुदाय) -के अनुरूप ही जहाज बना रखा था

अध्याय 143

श्लोक 79

रत्नानि यानि त्रैलोक्ये विशिष्टानि विशाम्पते ।कृष्णस्य तानि सर्वाणि यानपात्रेऽतितेजसः

ratnāni yāni trailokye viśiṣṭāni viśāmpate | kṛṣṇasya tāni sarvāṇi yānapātre'titejasaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रजानाथ ! तीनों लोकोंमें जो विशिष्ट रत्र थे, वे सभी अत्यन्त तेजस्वी श्रीकृष्णके उस यानपात्रमें लगे थे

अध्याय 143

श्लोक 80

पृथक्पृथङ्निवासाश्च स्त्रीणां कृष्णस्य भारत ।मणिवैडूर्यचित्रास्ताः कार्तस्वरविभूषिताः

pṛthakpṛthaṅnivāsāśca strīṇāṃ kṛṣṇasya bhārata | maṇivaiḍūryacitrāstāḥ kārtasvaravibhūṣitāḥ

हिन्दी अर्थ

भारत! श्रीकृष्णकी स्त्रियोंके लिये उसमें पृथक्‌-पृथक्‌ निवासस्थान बने थे, जो मणि और वैद्दूर्यसे जटित होनेके कारण विचित्र शोभासे सम्पन्न तथा सुवर्णसे विभूषित थे

अध्याय 143

श्लोक 81

सर्वर्तुकुसुमाकीर्णाः सर्वगन्धाधिवासिताः ।यदुसिंहैः शुभैर्जुष्टाः शकुनैः स्वर्गवासिभिः

sarvartukusumākīrṇāḥ sarvagandhādhivāsitāḥ | yadusiṃhaiḥ śubhairjuṣṭāḥ śakunaiḥ svargavāsibhiḥ

हिन्दी अर्थ

उन गृहोंमें सभी ऋतुओंमें खिलनेवाले फूल लगाये गये थे। वहाँ सभी तरहके उत्तम सुगन्ध फैलकर उन भवनोंको सुवासित कर रहे थे। श्रेष्ठ यादव-वीर तथा स्वर्गवासी पक्षी उन निवासस्थानोंका सेवन करते थे

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

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शोध टिप्पणीResearch note

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पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.