Harivamsha Purana
142
अध्याय 142 / 318

Parva 2, Adhyāya 87

39 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ39 श्लोक

अध्याय 142

श्लोक 1

मन्दराचलं गतस्य अन्धकासुरस्य महादेवेन वधं अन्धको नारदवचः श्रुत्वा तत्त्वेन भारत ।मन्दरं पर्वतं गन्तुं मनो दध्रे महासुरः

mandarācalaṃ gatasya andhakāsurasya mahādevena vadhaṃ andhako nāradavacaḥ śrutvā tattvena bhārata | mandaraṃ parvataṃ gantuṃ mano dadhre mahāsuraḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—भारत ! नारदजीकी बातको ठीकसे सुनकर महान्‌ असुर अन्धकने मन्दराचलपर जानेका विचार किया

अध्याय 142

श्लोक 2

सोऽसुरान् सुमहातेजाः समानीय महाबलः ।जगाम मन्दरं क्रुद्धो महादेवालयं तदा

so'surān sumahātejāḥ samānīya mahābalaḥ | jagāma mandaraṃ kruddho mahādevālayaṃ tadā

हिन्दी अर्थ

वह महातेजस्वी, महाबली दैत्य बहुत-से असुरोंको एकत्र करके कुपित हो उस समय महादेवजीके निवासस्थान मन्दरपर्वतपर गया

अध्याय 142

श्लोक 3

तं महाभ्रप्रतिच्छन्नं महौषधिसमाकुलम् ।नानासिद्धसमाकीर्णं महर्षिगणसेवितम्

taṃ mahābhrapraticchannaṃ mahauṣadhisamākulam | nānāsiddhasamākīrṇaṃ maharṣigaṇasevitam

हिन्दी अर्थ

वह पर्वत बड़े-बड़े मेघोंसे आच्छादित, महौषधियों से सम्पन्न, नाना प्रकारके सिद्धोंसे भरा हुआ और महर्षियोंके समुदायसे सेवित था

अध्याय 142

श्लोक 4

चन्दनागुरुवृक्षाढ्यं सरलद्रुमसङ्कुलम् ।किन्नरोद्गीतरम्यं च बहुनागकुलाकुलम्

candanāguruvṛkṣāḍhyaṃ saraladrumasaṅkulam | kinnarodgītaramyaṃ ca bahunāgakulākulam

हिन्दी अर्थ

वहाँ सब ओर चन्दन और अगुरुके वृक्ष शोभा पाते थे। सरल (चीड़)-के वृक्ष सर्वत्र फैले हुए थे । किन्नरोंके उच्च स्वरसे गाये जानेवाले मधुर गीतोंसे उसकी रमणीयता बढ़ गयी थी । वह बहुत- से नागकुलों (हाथियों अथवा सर्पों)-से व्याप्त था

अध्याय 142

श्लोक 5

वातोद्भूतैर्वनैः फुल्लैर्नृत्यन्तमिव च क्वचित् ।प्रस्रुतैर्धातुभिश्चित्रैर्विलिप्तमिव च क्वचित्

vātodbhūtairvanaiḥ phullairnṛtyantamiva ca kvacit | prasrutairdhātubhiścitrairviliptamiva ca kvacit

हिन्दी अर्थ

कहीं वायुके वेगसे कम्पित हुए प्रफुल्ल काननोंद्वारा वह नृत्य करता-सा जान पड़ता था। कहीं पिघलकर बहे हुए विचित्र धातुओंके कारण वह चन्दन आदिसे चर्चित हुआ-सा प्रतीत होता था

अध्याय 142

श्लोक 6

पक्षिस्वनैः सुमधुरैर्नदन्तमिव च क्वचित् ।हंसैः शुचिपदैः कीर्णं सम्पतद्भिरितस्ततः

pakṣisvanaiḥ sumadhurairnadantamiva ca kvacit | haṃsaiḥ śucipadaiḥ kīrṇaṃ sampatadbhiritastataḥ

हिन्दी अर्थ

कहीं पक्षियोंके अत्यन्त मधुर शब्दोंसे वह पर्वत गरजता या कोलाहल करता-सा जान पड़ता था। पतित्र स्थानोंपर बैठनेवाले हंस वहाँ इधर-उधर उड़ते-फिरते थे; जिनसे सारा पर्वत व्याप्त प्रतीत होता था

अध्याय 142

श्लोक 7

महाबलैश्च महिषैश्चरद्भिर्दैत्यनाशनैः ।चन्द्रांशुविमलैः सिंहैर्भूषितं हेमसञ्चयम्

mahābalaiśca mahiṣaiścaradbhirdaityanāśanaiḥ | candrāṃśuvimalaiḥ siṃhairbhūṣitaṃ hemasañcayam

हिन्दी अर्थ

वहाँ दैत्योंका विनाश करनेमें समर्थ महाबली भैंसे विचरण करते थे। चन्द्रमाकी किरणोंके समान निर्मल कान्तिवाले सिंह उस पर्वतकी शोभा बढ़ाते थे। वह समस्त शैल सुवर्णकी राशिरूप था

अध्याय 142

श्लोक 8

मृगराजसमाकीर्णं मृगवृन्दनिषेवितम् ।स मन्दरं गिरिं प्राह रूपिणं बलदर्पितः

mṛgarājasamākīrṇaṃ mṛgavṛndaniṣevitam | sa mandaraṃ giriṃ prāha rūpiṇaṃ baladarpitaḥ

हिन्दी अर्थ

वहाँ बहुत-से मृगराज (सिंह ) सब ओर बिखरे हुए थे। झुंड- के-झुंड मृग उस पर्वतका सेवन करते थे। वह मन्दरपर्वत देवतारूपमें मूर्तिमान्‌ होकर अन्धकासुरके सामने प्रकट हुआ। उसे देखकर बलके घमंडमें भरे हुए अन्धकासुरने कहा—

अध्याय 142

श्लोक 9

वेत्सि त्वं हि यथावध्यो वरदानादहं पितुः ।मम चैव वशे सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्

vetsi tvaṃ hi yathāvadhyo varadānādahaṃ pituḥ | mama caiva vaśe sarvaṃ trailokyaṃ sacarācaram

श्लोक 9–10 का हिन्दी अर्थ

महागिरे ! यह तो तुम जानते ही होगे कि मैं किस प्रकार अपने पिताके वरदानसे सबके लिये अवध्य हूँ। चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकी इस समय मेरे वशमें है। कोई भी भयके कारण मुझसे युद्ध करना नहीं चाहता। मुझे पता लगा है कि तुम्हारे शिखर- पर सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाले पुष्पोंसे विभूषित एक पारिजात वन है, जो यहाँका उत्तम रत्र है

अध्याय 142

श्लोक 10

प्रतियोद्धुं न मां कश्चिदिच्छत्यपि गिरे भयात् ।पारिजातवनं चास्ति तव सानौ महागिरे ।सर्वकामप्रदैः पुष्पैर्भूषितं रत्नमुत्तमम्

pratiyoddhuṃ na māṃ kaścidicchatyapi gire bhayāt | pārijātavanaṃ cāsti tava sānau mahāgire | sarvakāmapradaiḥ puṣpairbhūṣitaṃ ratnamuttamam

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 142

श्लोक 11

तदाचक्ष्वोपभोक्ष्यामि तद् वनं तव सानुजम् ।किं करिष्यसि क्रुद्धस्त्वं मनो हि त्वरते मम

tadācakṣvopabhokṣyāmi tad vanaṃ tava sānujam | kiṃ kariṣyasi kruddhastvaṃ mano hi tvarate mama

श्लोक 11–12 का हिन्दी अर्थ

वह कहाँ है, उसे बताओ ? मैं तुम्हारे शिखरपर उत्पन्न हुए उस वनका उपभोग करूँगा। मेरा मन उसमें जानेके लिये उतावला हो उठा है । तुम कुपित होकर मेरा क्या कर लोगे ? मुझे ऐसा कोई पुरुष नहीं दिखायी देता, जो मेरे द्वारा पीड़ित होनेपर तुम्हारी निश्चितरूपसे रक्षा कर सके।' उसके ऐसा कहनेपर मन्दराचलका वह अधिष्ठाता देव वहीं अन्तर्धान हो गया

अध्याय 142

श्लोक 12

त्रातारं नानुपश्यामि मया खल्वर्दितस्य ते ।इत्युक्तो मन्दरस्तेन तत्रैवान्तरधीयत

trātāraṃ nānupaśyāmi mayā khalvarditasya te | ityukto mandarastena tatraivāntaradhīyata

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 142

श्लोक 13

ततोऽन्धकोऽतिरुषितो वरदानेन दर्पितः ।मुमोच नादं सुमहदिदं वचनमब्रवीत्

tato'ndhako'tiruṣito varadānena darpitaḥ | mumoca nādaṃ sumahadidaṃ vacanamabravīt

श्लोक 13–14 का हिन्दी अर्थ

तब वरदानसे घमंडमें भरा हुआ अन्धक अत्यन्त रुष्ट हो बड़े जोरसे सिंहनाद करने लगा और इस प्रकार बोला—सम्मान नहीं दे रहा है, इससे कुपित होकर मैं तुझे अभी चूर्ण किये देता हूँ। देख ले मेरा बल '

अध्याय 142

श्लोक 14

मया वै त्वं याच्यमानो यस्मान्न बहु मन्यसे ।अहं चूर्णीकरोमि त्वां बलं पर्वत पश्य मे

mayā vai tvaṃ yācyamāno yasmānna bahu manyase | ahaṃ cūrṇīkaromi tvāṃ balaṃ parvata paśya me

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 142

श्लोक 15

एवमुक्त्वा गिरेः शृङ्गमुत्पाट्य बहुयोजनम् ।निष्पिपेष गिरेस्तस्य शृङ्गेष्वन्यत्र वीर्यवान्

evamuktvā gireḥ śṛṅgamutpāṭya bahuyojanam | niṣpipeṣa girestasya śṛṅgeṣvanyatra vīryavān

श्लोक 15–18 का हिन्दी अर्थ

ऐसा कहकर वरदानसे दर्पमें भरे हुए उस पराक्रमी दैत्यने उन सब असुरोंके साथ मन्दराचलके एक शिखरको, जो अनेक योजन विस्तृत था, उखाड़ लिया और उसे उसी पर्वतके दूसरे शिखरोंपर पटककर पीस डाला। उस महान्‌ पर्वतने अपनी नदियोंके समुदायको भी छिपा लिया। उसकी परिस्थितिको समझकर भगवान्‌ रुद्रने उस पर्वतपर अनुग्रह किया । वीर! भगवान्‌के अनुग्रहसे पारिजात आदि विशेषतर वनोंसे युक्त, मतवाले हाथियों और मृगोंसे सम्पन्न तथा आकाशसे गिरे हुए बहुसंख्यक नदी समूहोंसे व्याप्त वह विचित्र काननॉंवाला पर्वत जैसा पहले था, उसी रूपमें प्रकाशित होने लगा

अध्याय 142

श्लोक 16

सह तैरसुरैः सर्वैर्वरदानेन दर्पितः ।तं प्रच्छन्ननदीजालं मन्यमानं महागिरिम्

saha tairasuraiḥ sarvairvaradānena darpitaḥ | taṃ pracchannanadījālaṃ manyamānaṃ mahāgirim

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 142

श्लोक 17

विदित्वा भगवान् रुद्रश्चकारानुग्रहं गिरेः ।सविशेषतरं वीर मत्तद्विपमृगायुतम्

viditvā bhagavān rudraścakārānugrahaṃ gireḥ | saviśeṣataraṃ vīra mattadvipamṛgāyutam

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 142

श्लोक 18

नदीजालैर्बहुतरैराचितं चित्रकाननम् ।नभश्च्युतैः पुरा यद्वत्तद्वदेव विराजते

nadījālairbahutarairācitaṃ citrakānanam | nabhaścyutaiḥ purā yadvattadvadeva virājate

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 142

श्लोक 19

अथ देवप्रभावेण शृङ्गाण्युत्पाटितानि तु ।क्षिप्तानि चासुरानेव घ्नन्ति घोराणि भारत

atha devaprabhāveṇa śṛṅgāṇyutpāṭitāni tu | kṣiptāni cāsurāneva ghnanti ghorāṇi bhārata

हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन! उन महादेवजीके प्रभावसे असुरोंद्वारा उखाड़कर फेंके गये उसके घोर शिखर उन असुरोंको ही मार डालते थे

अध्याय 142

श्लोक 20

क्षिप्त्वा ये प्रपलायन्ते शृङ्गाणि तु महासुराः ।शृङ्गैस्तैस्तैः स्म वध्यन्ति पर्वतस्य जनाधिप

kṣiptvā ye prapalāyante śṛṅgāṇi tu mahāsurāḥ | śṛṅgaistaistaiḥ sma vadhyanti parvatasya janādhipa

हिन्दी अर्थ

जनेश्वर ! जो महान्‌ू असुर मन्दराचलके शिखरोंको फेंककर भागते थे, वे उन्हीं शिखरॉंद्वारा मारे जाते थे

अध्याय 142

श्लोक 21

ये स्वस्थास्त्वसुरास्तत्र तिष्ठन्ति गिरिसानुषु ।शृङ्गैस्ते न स्म वध्यन्ते मन्दरस्य महागिरेः

ye svasthāstvasurāstatra tiṣṭhanti girisānuṣu | śṛṅgaiste na sma vadhyante mandarasya mahāgireḥ

हिन्दी अर्थ

जो असुर वहाँ पर्वत-शिखरोंपर स्वस्थभावसे खड़े थे, वे महागिरि मन्दरके उन शिखरोंद्वारा नहीं मारे जाते थे

अध्याय 142

श्लोक 22

ततोऽन्धकस्तदा दृष्ट्वा सेनां तां मर्दितां तथा ।रुषितः सुमहानादं नर्दित्वैवं तदाब्रवीत्

tato'ndhakastadā dṛṣṭvā senāṃ tāṃ marditāṃ tathā | ruṣitaḥ sumahānādaṃ narditvaivaṃ tadābravīt

हिन्दी अर्थ

तब अन्धकने अपनी उस सेनाको कुचली गयी देख उस समय रोषपूर्वक महान्‌ सिंहनाद करके इस प्रकार कहा—

अध्याय 142

श्लोक 23

आह्वये तं वनं यस्य युद्धार्थमुपतिष्ठतु ।किं त्वयाचल युद्धेन हताः स्म च्छद्मना रणे

āhvaye taṃ vanaṃ yasya yuddhārthamupatiṣṭhatu | kiṃ tvayācala yuddhena hatāḥ sma cchadmanā raṇe

हिन्दी अर्थ

अचल! तेरे साथ युद्ध करनेसे क्या लाभ ? तूने रणभूमिमें दैत्योंको छलसे मारा है। अब मैं उस पुरुषको ललकारता हूँ, जिसका यह वन है। वह युद्धके लिये मेरे सामने उपस्थित हो '

अध्याय 142

श्लोक 24

एवमुक्ते त्वन्धकेन वृषभेण महेश्वरः ।सम्प्राप्तः शूलमुद्यम्य देवोऽन्धकजिघांसया

evamukte tvandhakena vṛṣabheṇa maheśvaraḥ | samprāptaḥ śūlamudyamya devo'ndhakajighāṃsayā

हिन्दी अर्थ

अन्धका- सुरके ऐसा कहनेपर उसे मार डालनेकी इच्छासे भगवान्‌ महेश्वरदेव त्रिशूल उठाये अपने वृषभके द्वारा वहाँ आ पहुँचे

अध्याय 142

श्लोक 25

प्रमथानां गणैर्धीमान् वृतो वै बहुलोचनः ।तथा भूतगणैश्चैव धीमान् भूतगणेश्वरः

pramathānāṃ gaṇairdhīmān vṛto vai bahulocanaḥ | tathā bhūtagaṇaiścaiva dhīmān bhūtagaṇeśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

भूतगणोंके स्वामी बुद्धिमान भगवान्‌ त्रिलोचन प्रमथगणों तथा भूत-समूहोंसे घिरे हुए थे

अध्याय 142

श्लोक 26

प्रचकम्पे ततः कृत्स्नं त्रैलोक्यं रुषिते हरे ।सिन्धवश्च प्रतिस्रोतमूहुः प्रज्वलितोदकाः

pracakampe tataḥ kṛtsnaṃ trailokyaṃ ruṣite hare | sindhavaśca pratisrotamūhuḥ prajvalitodakāḥ

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ शड्जरके रुष्ट होनेपर सारी त्रिलोकी काँप उठी । नदियाँ अपने प्रवाहके विपरीत उद्मस्थानकी ओर बहने लगीं। उनका जल खौल उठा

अध्याय 142

श्लोक 27

जग्मुर्दिशोऽग्निदाहाश्च सर्वे ते हरतेजसा ।युयुधुश्च ग्रहाः सर्वे विपरीता जनाधिप

jagmurdiśo'gnidāhāśca sarve te haratejasā | yuyudhuśca grahāḥ sarve viparītā janādhipa

हिन्दी अर्थ

जनेश्वर! महादेवजीके तेजसे सम्पूर्ण दिशाओंमें अग्रिदाह फैल गये और समस्त ग्रह विपरीत होकर परस्पर जूझने लगे

अध्याय 142

श्लोक 28

चेलुश्च गिरयस्तत्र काले कुरुकुलोद्वह ।प्रववर्षाथ पर्जन्यः सधूमाङ्गारवृष्टयः

celuśca girayastatra kāle kurukulodvaha | pravavarṣātha parjanyaḥ sadhūmāṅgāravṛṣṭayaḥ

हिन्दी अर्थ

कुरुकुलधुरंधर वीर! उस समय सारे पर्वत हिलने लगे और उनके ऊपर मेघ धूमयुक्त अद्धारोंकी वर्षा करने लगे

अध्याय 142

श्लोक 29

उष्णभाश्चन्द्रमाश्चासीत् सूर्यः शीतप्रभस्तथा ।न ब्रह्म विविदुस्तत्र मुनयो ब्रह्मवादिनः

uṣṇabhāścandramāścāsīt sūryaḥ śītaprabhastathā | na brahma vividustatra munayo brahmavādinaḥ

हिन्दी अर्थ

चन्द्रमाकी शीतल किरणें गरम हो गयीं। सूर्यकी प्रभा ठंडी पड़ गयी । ब्रह्मवादी मुनियोंका सारा ब्रह्जज्ान भूल गया

अध्याय 142

श्लोक 30

बडवाः सुषुवुर्गाश्च गावोऽश्वानपि चानघ ।पेतुर्वृक्षाश्च मेदिन्यामच्छिन्ना भस्मसात्कृताः

baḍavāḥ suṣuvurgāśca gāvo'śvānapi cānagha | peturvṛkṣāśca medinyāmacchinnā bhasmasātkṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

निष्पाप नरेश्वर! घोड़ियोंके पेटसे गायके बछड़े पैदा होने लगे और गौएँ घोड़ोंको जन्म देने लगीं। पृथ्वीपर बिना काटे ही बहुत-से वृक्ष भस्म होकर गिर पड़े

अध्याय 142

श्लोक 31

बाधन्ते वृषभा गाश्च गावश्चारुरुहुर्वृषान् ।राक्षसा यातुधानाश्च पिशाचाश्चापि सर्वशः

bādhante vṛṣabhā gāśca gāvaścāruruhurvṛṣān | rākṣasā yātudhānāśca piśācāścāpi sarvaśaḥ

हिन्दी अर्थ

साँड़ गौओंको सताने लगे। गौएँ भी सॉडोॉपर चढ़ जाती थीं। राक्षस, यातुधान और पिशाच—ये सब-के-सब (प्राणियोंको कष्ट देने लगे)

अध्याय 142

श्लोक 32

विपरीतं जगद् दृष्ट्वा महादेवस्तथागतम् ।मुमोच भगवाञ्छूलं प्रदीप्ताग्निसमप्रभम्

viparītaṃ jagad dṛṣṭvā mahādevastathāgatam | mumoca bhagavāñchūlaṃ pradīptāgnisamaprabham

हिन्दी अर्थ

संसारकी इस प्रकार विपरीत अवस्था देख भगवान्‌ शड्डरने प्रज्वलित अग्रिके समान तेजस्वी अपना त्रिशूल छोड़ा

अध्याय 142

श्लोक 33

तत् पपात हरोत्सृष्टमन्धकोरसि दुर्द्धरम् ।भस्मसाच्चाकरोद् रौद्रमन्धकं साधुकण्टकम्

tat papāta harotsṛṣṭamandhakorasi durddharam | bhasmasāccākarod raudramandhakaṃ sādhukaṇṭakam

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ शड्टरका छोड़ा हुआ वह दुःसह अस्त्र अन्धकासुरकी छातीपर गिरा। उसने साधुओंके लिये कण्टकरूप भयंकर अन्धकासुरको जलाकर भस्म कर दिया

अध्याय 142

श्लोक 34

ततो देवगणाः सर्वे मुनयश्च तपोधनाः ।शङ्करं तुष्टुवुश्चैव जगच्छत्रौ निबर्हिते

tato devagaṇāḥ sarve munayaśca tapodhanāḥ | śaṅkaraṃ tuṣṭuvuścaiva jagacchatrau nibarhite

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर समस्त देवगण और तपोधन मुनि जगत्‌के शत्रु अन्धकासुरके मारे जानेपर भगवान्‌ शड्रकी स्तुति करने लगे

अध्याय 142

श्लोक 35

देवदुन्दुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिः पपात ह ।त्रैलोक्यं निर्वृतं चासीन्नरेन्द्र विगतज्वरम्

devadundubhayo neduḥ puṣpavṛṣṭiḥ papāta ha | trailokyaṃ nirvṛtaṃ cāsīnnarendra vigatajvaram

हिन्दी अर्थ

नरेन्द्र! देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं । आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी और तीनों लोकोंके प्राणियोंने निश्चिन्त होकर संतोषकी साँस ली

अध्याय 142

श्लोक 36

प्रजगुर्देवगन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः ।जेपुश्च ब्राह्मणा वेदानीजुश्च क्रतुभिस्तदा

prajagurdevagandharvā nanṛtuścāpsarogaṇāḥ | jepuśca brāhmaṇā vedānījuśca kratubhistadā

हिन्दी अर्थ

उस समय देवगन्धर्व गाने और अप्सराएँ नाचने लगीं। ब्राह्मणलोग वेदोंका जप, स्वाध्याय तथा यज्ञोंका अनुष्ठान करने लगे

अध्याय 142

श्लोक 37

ग्रहाः प्रकृतिमापेदुरूहुर्नद्यो यथा पुरा ।न जज्वाल जले वह्निराशाः सर्वाः प्रसेदिरे

grahāḥ prakṛtimāpedurūhurnadyo yathā purā | na jajvāla jale vahnirāśāḥ sarvāḥ prasedire

हिन्दी अर्थ

ग्रह स्वाभाविक स्थितिमें आ गये। नदियाँ पहलेके समान बहने लगीं। जलमें आगका जलना बंद हो गया और सारी दिशाएँ प्रसन्न हो गयीं

अध्याय 142

श्लोक 38

मन्दरः पर्वतश्रेष्ठः पुनरेव रराज ह ।श्रिया परमया जुष्टः सर्वतेजःसमुच्छ्रयात्

mandaraḥ parvataśreṣṭhaḥ punareva rarāja ha | śriyā paramayā juṣṭaḥ sarvatejaḥsamucchrayāt

हिन्दी अर्थ

पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचल अपने सम्पूर्ण तेजकी वृद्धि होनेके कारण परम शोभासे सम्पन्न हो पुनः: पूर्ववत्‌ प्रकाशित होने लगा

अध्याय 142

श्लोक 39

रेमे सोमश्च भगवान् पारिजातवने हरः ।सुप्रचारान्सुरान्कृत्वा शक्रादीन् धर्मतः प्रभुः

reme somaśca bhagavān pārijātavane haraḥ | supracārānsurānkṛtvā śakrādīn dharmataḥ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

सबके प्रभु उमासहित भगवान्‌ श्र इन्द्र आदि देवताओंको धर्मत: सर्वत्र घूमने-फिरने योग्य बनाकर पारिजातवनमें विहार करने लगे

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.