Harivamsha Purana
132
अध्याय 132 / 318

Parva 2, Adhyāya 77

28 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ28 श्लोक

अध्याय 132

श्लोक 1

पुण्यकविधिवर्णनस्योपक्रमः पुण्यकानां ममोत्पत्तिं कथयस्व द्विजोत्तम ।द्वैपायनप्रसादेन सर्वं हि विदितं तव

puṇyakavidhivarṇanasyopakramaḥ puṇyakānāṃ mamotpattiṃ kathayasva dvijottama | dvaipāyanaprasādena sarvaṃ hi viditaṃ tava

हिन्दी अर्थ

पो$ध्याय: स्स्‍्स्‍्स्‍्स्‍्स्‍्स्‍्स्‍्स्‍्स्ससाण रणणनका उपक्रम जनमेजयने पूछा—द्विजश्रेष्ठ ! पुण्यकोंकी उत्पत्ति केस प्रकार हुई, यह मुझे बताइये; क्योंकि द्वैपायन यासकी कृपासे आपको सब कुछ विदित है

अध्याय 132

श्लोक 2

उमया पुण्यकविधिर्नरेन्द्रोत्पादितः पुरा ।शृणु येन विधानेन लोके धर्मभृतां वर

umayā puṇyakavidhirnarendrotpāditaḥ purā | śṛṇu yena vidhānena loke dharmabhṛtāṃ vara

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ नरेन्द्र ! ूर्वकालमें भगवती उमाने पुण्यकब्रतकी विधिका प्रतिपादन केया है। उसके अनुसार लोकमें जिस विधानसे ब्रत केया जाता है, उसे बताता हूँ, सुनो

अध्याय 132

श्लोक 3

स्वर्गान्नीते पारिजाते कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा ।ययौ द्वारवतीं धीमान् नारदो मुनिसत्तमः

svargānnīte pārijāte kṛṣṇenākliṣṭakarmaṇā | yayau dvāravatīṃ dhīmān nārado munisattamaḥ

हिन्दी अर्थ

जब अनायास ही महान्‌ कर्म करनेवाले श्रीकृष्ण स्वर्गसे पारिजात वृक्षकों द्वारकामें ले गये, उस समय बुद्धिमान्‌ मुनिश्रेष्ठ गारदजी भी वहाँ पधारे

अध्याय 132

श्लोक 4

देवासुरे नृपश्रेष्ठ सङ्ग्रामे समुपस्थिते ।षट् पुरस्य वधे घोरे महादेवाज्ञयानघ

devāsure nṛpaśreṣṭha saṅgrāme samupasthite | ṣaṭ purasya vadhe ghore mahādevājñayānagha

हिन्दी अर्थ

निष्पाप नृपश्रेष्ठ! जब महादेवजीकी आज्ञासे देवासुरसंग्रामका अवसर उपस्थित था और षट्पुरवासी दानवोंका घोर वध होनेवाला था, उसी समयकी बात है

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श्लोक 5

कृष्णेन सहितं विप्रं नारदं धर्मवित्तमम् ।आसीनं परिपप्रच्छ रुक्मिणी भैष्मिकी नृप

kṛṣṇena sahitaṃ vipraṃ nāradaṃ dharmavittamam | āsīnaṃ paripapraccha rukmiṇī bhaiṣmikī nṛpa

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर ! धर्मज्ोंमें श्रेष्ठ विप्रवर नारदजी श्रीकृष्णके साथ बैठे थे। उस समय भीष्मककुमारी रुक्मिणीने उनसे पूछा

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श्लोक 6

तत्र जाम्बवती देवी सत्यभामा च भामिनी ।गान्धारराजपुत्री च योगयुक्ता नराधिप

tatra jāmbavatī devī satyabhāmā ca bhāminī | gāndhārarājaputrī ca yogayuktā narādhipa

श्लोक 6–7 का हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! वहाँ रुक्मिणीके साथ जाम्बवती देवी, भामिनी सत्यभामा, गान्धारराजकुमारी योगयुक्ता शैब्या तथा श्रीकृष्णकी अन्य बहुत-सी कुलवती, सुशीला, गुणवत्ती, धर्मशीला एवं पतित्रता पत्रियाँ भी आयी हुई थीं

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श्लोक 7

देव्यश्च नृप कृष्णस्य बह्व्योऽन्या वै समागताः ।कुलशीलगुणोपेता धर्मशीलाः पतिव्रताः

devyaśca nṛpa kṛṣṇasya bahvyo'nyā vai samāgatāḥ | kulaśīlaguṇopetā dharmaśīlāḥ pativratāḥ

अर्थ श्लोक 6 के साथ

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श्लोक 8

मुने धर्मभृतां श्रेष्ठ धर्मज्ञानभृतां वर ।उत्पत्तिं पुण्यकानां त्वं वक्तुमर्हस्यशेषतः

mune dharmabhṛtāṃ śreṣṭha dharmajñānabhṛtāṃ vara | utpattiṃ puṇyakānāṃ tvaṃ vaktumarhasyaśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

रुक्मिणीने कहा—धर्मात्माओं और ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ मुने! आप मुझे पुण्यकोंकी उत्पत्तिका वृत्तान्त पूर्णरूपसे बतानेकी कृपा करें

अध्याय 132

श्लोक 9

विधिं च फलयोगं च दानकालं तथैव च ।कौतूहलं नस्तत्सिद्धिं वदस्व वदतां वर

vidhiṃ ca phalayogaṃ ca dānakālaṃ tathaiva ca | kautūhalaṃ nastatsiddhiṃ vadasva vadatāṃ vara

हिन्दी अर्थ

वक्ताओंमें श्रेष्ठ देव्षे ! उस पुण्यकब्रतकी विधि, फलयोग और दानकाल क्या है? उसकी सिद्धि कैसे होती है? यह सब बताइये। हमें उसके विषयमें सुननेके लिये बड़ी उत्कण्ठा है

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श्लोक 10

शृणु वैदर्भि धर्मज्ञे सपत्नीभिः सहानघे ।पुण्यकानां विधिः प्रोक्तो यथा देवि पुरोमया

śṛṇu vaidarbhi dharmajñe sapatnībhiḥ sahānaghe | puṇyakānāṃ vidhiḥ prokto yathā devi puromayā

हिन्दी अर्थ

नारदजीने कहा—धर्मको जाननेवाली निष्पाप विदर्भनन्दिनी! देवि! पूर्वकालमें उमादेवीने पुण्यकोंकी जैसी विधि बतायी थी, उसे तुम अपनी सौतोंके साथ सुनो

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श्लोक 11

चचारोमा व्रतं देवी पुण्यकानां शुचिव्रता ।व्रतावसानेऽथ तया सख्यो देवि निमन्त्रिताः

cacāromā vrataṃ devī puṇyakānāṃ śucivratā | vratāvasāne'tha tayā sakhyo devi nimantritāḥ

हिन्दी अर्थ

देवि ! पवित्र ब्रत धारण करनेवाली उमादेवीने जब पुण्यकोंका व्रत किया था, उस समय ब्रतके अन्तमें उन्होंने अपनी सखियोंको निमन्त्रित किया

अध्याय 132

श्लोक 12

अदित्याद्याः सुताः सर्वा दक्षस्याक्लिष्टकर्मणः ।पौलोमी च शची देवी ख्याता लोके पतिव्रता

adityādyāḥ sutāḥ sarvā dakṣasyākliṣṭakarmaṇaḥ | paulomī ca śacī devī khyātā loke pativratā

श्लोक 12–14 का हिन्दी अर्थ

प्रजानाथ ! कुरुनन्दन! अनायास ही सृष्टिसम्बन्धी महान्‌ कर्म करनेवाले प्रजापति दक्षकी अदिति आदि समस्त पुत्रियाँ, लोकविख्यात पतित्रता पुलोमकुमारी शची देवी, सोमकी प्यारी पत्नी सती साध्वी महाभागा रोहिणी, पूर्वाफाल्गुनी, रेवती, शतभिषा और मघा-ये सब-की-सब निमन्त्रित होकर वहाँ आयी थीं। इन सबने पूर्वकालमें सती महादेवी उमाकी अराधना की थीं

अध्याय 132

श्लोक 13

रोहिणी च महाभागा सोमस्य दयिता सती ।फाल्गुनी च तथा पूर्वा रेवती च विशाम्पते

rohiṇī ca mahābhāgā somasya dayitā satī | phālgunī ca tathā pūrvā revatī ca viśāmpate

अर्थ श्लोक 12 के साथ

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श्लोक 14

तथा शतभिषा चैव मघा च कुरुनन्दन ।एताभिर्हि महादेवी पूर्वमाराधिता सती

tathā śatabhiṣā caiva maghā ca kurunandana | etābhirhi mahādevī pūrvamārādhitā satī

अर्थ श्लोक 12 के साथ

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श्लोक 15

गङ्गा सरस्वती चैव वेणी गोदा च निम्नगा ।तथा वैतरणी चैव गण्डकी या च भारत

gaṅgā sarasvatī caiva veṇī godā ca nimnagā | tathā vaitaraṇī caiva gaṇḍakī yā ca bhārata

श्लोक 15–16 का हिन्दी अर्थ

भारत! गड़ा, सरस्वती, बेणी, गोदावरी, वैतरणी और गण्डकी—ये तथा और भी बहुत-सी रमणीय सरिताएँ वहाँ आयी थीं। लोपामुद्रा और अन्य शुभलक्षणा सती देवियाँ, जो अपने धर्मसे इस जगत्‌को धारण करती हैं, वहाँ उपस्थित थीं

अध्याय 132

श्लोक 16

अन्याश्च सरितो रम्या लोपामुद्रा च भारत ।सत्यश्चान्या जगद्देव्यो धारयन्ति हि ता शुभाः

anyāśca sarito ramyā lopāmudrā ca bhārata | satyaścānyā jagaddevyo dhārayanti hi tā śubhāḥ

अर्थ श्लोक 15 के साथ

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श्लोक 17

शुभाश्च गिरिनन्दिन्यो वह्निकन्याश्च सुव्रताः ।स्वाहा वह्निप्रिया देवी सावित्री च यशस्विनी

śubhāśca girinandinyo vahnikanyāśca suvratāḥ | svāhā vahnipriyā devī sāvitrī ca yaśasvinī

श्लोक 17–18 का हिन्दी अर्थ

सुन्दरी गिरिकन्याएँ, उत्तम बव्रतका पालन करनेवाली अग्निकन्याएँ, अग्रिदेवकी प्यारी पत्नी स्वाहा देवी, यशस्विनी सावित्री देवी, कुबेरकान्ता ऋद्धि, जलके स्वामी वरुणकी रानी, यमराजकी भार्या तथा वसुओंकी पत्नियाँ भी वहाँ उपस्थित हुई थीं

अध्याय 132

श्लोक 18

ऋद्धिः कुबेरकान्ता च जलेशमहिषी तथा ।भार्या पितृपतेश्चैव वसुपत्न्यस्तथा च याः

ṛddhiḥ kuberakāntā ca jaleśamahiṣī tathā | bhāryā pitṛpateścaiva vasupatnyastathā ca yāḥ

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 132

श्लोक 19

ह्रीः श्रीर्धृतिस्तथा कीर्तिराशा मेधा च सुव्रताः ।प्रीतिर्मतिश्च ख्यातिश्च सन्नीतिश्च तपोधनाः

hrīḥ śrīrdhṛtistathā kīrtirāśā medhā ca suvratāḥ | prītirmatiśca khyātiśca sannītiśca tapodhanāḥ

हिन्दी अर्थ

ही, श्री, धृति, कीर्ति, आशा, मेधा, प्रीति, मति, ख्याति और संनीति—ये सब उत्तम ब्रतका पालन करनेवाली तपोधना नारियाँ भी वहाँ एकत्र हुई थीं

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श्लोक 20

देव्यः सत्यस्तथैवान्याः सर्वभूतहिते रताः ।तासां व्रतावसाने च पूजां चक्रेऽम्बिका तदा

devyaḥ satyastathaivānyāḥ sarvabhūtahite ratāḥ | tāsāṃ vratāvasāne ca pūjāṃ cakre'mbikā tadā

हिन्दी अर्थ

इनके सिवा और भी समस्त भूतोंके हितमें तत्पर रहनेवाली सती देवियाँ उपस्थित थीं । अम्बिकाने ब्रतके अन्तमें उन सबका पूजन किया

अध्याय 132

श्लोक 21

तिलरत्नमयं दत्त्वा पर्वतं सर्वधान्यवत् ।वासोभिर्भूषणैर्मुख्यैर्नानारागैः सुमध्यमे

tilaratnamayaṃ dattvā parvataṃ sarvadhānyavat | vāsobhirbhūṣaṇairmukhyairnānārāgaiḥ sumadhyame

हिन्दी अर्थ

सुमध्यमे ! तिल और रत्रोंद्वारा निर्मित हुए सम्पूर्ण धान्योंसे युक्त पर्वतका दान करके उमाने अनेक रंगोंके अच्छे-अच्छे वस्त्रों और श्रेष्ठ आभूषणोंसे उनकी पूजा की

अध्याय 132

श्लोक 22

प्रतिगह्य तु तां पूजां दत्तां देव्या तपोधनाः ।उपविष्टाः कथाश्चित्राः कुर्वन्त्यो भर्तृदेवताः

pratigahya tu tāṃ pūjāṃ dattāṃ devyā tapodhanāḥ | upaviṣṭāḥ kathāścitrāḥ kurvantyo bhartṛdevatāḥ

हिन्दी अर्थ

उमा देवीद्वारा दी गयी उस पूजाको ग्रहण करके वे तपोधना एवं पतित्रता देवियाँ वहाँ बैठकर आपसभें विचित्र क्रथावार्ता करने लगीं

अध्याय 132

श्लोक 23

पुण्यकार्थं कथास्तासामासन् देवी शशंस याः ।विधिं च पुण्यकस्याथ सतीनां भर्तृदेवते

puṇyakārthaṃ kathāstāsāmāsan devī śaśaṃsa yāḥ | vidhiṃ ca puṇyakasyātha satīnāṃ bhartṛdevate

हिन्दी अर्थ

पतिदेवते! उन सब देवियोंकी चर्चाका विषय था पुण्यकब्रत—वे उसके विषयमें जिज्ञासा करती थीं । उस समय देवी उमाने उन पतियोंको पुण्यकव्रत और उसकी विधिका उपदेश दिया था

अध्याय 132

श्लोक 24

तासां मतेन साध्वीनां सर्वासां सोमनन्दिनी ।पर्यपृच्छदुमा देवी पुण्यकानां विधिं वरा

tāsāṃ matena sādhvīnāṃ sarvāsāṃ somanandinī | paryapṛcchadumā devī puṇyakānāṃ vidhiṃ varā

हिन्दी अर्थ

वहाँ जुटी हुई उन सभी साध्वी देवियोंके मतसे श्रेष्ठ पतिव्रता सोमनन्दिनी अरुन्धतीने उमा देवीसे पुण्यकोंकी विधि पूछी

अध्याय 132

श्लोक 25

उमा तासां प्रियार्थं तु पुण्यकान्यब्रवीत् तदा ।समक्षं मम वैदर्भि सर्वभूतहिते रता

umā tāsāṃ priyārthaṃ tu puṇyakānyabravīt tadā | samakṣaṃ mama vaidarbhi sarvabhūtahite ratā

हिन्दी अर्थ

विदर्भ- राजकुमारी ! समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाली उमा देवीने उन सतियोंका प्रिय करनेके लिये मेरे सामने ही उस समय उन्हें पुण्यकोंका उपदेश दिया

अध्याय 132

श्लोक 26

ममैव चोमया दत्तः स तदा रत्नपर्वतः ।प्रतिगृह्य मया चैव कृतो ब्राह्मणसाच्छुभे

mamaiva comayā dattaḥ sa tadā ratnaparvataḥ | pratigṛhya mayā caiva kṛto brāhmaṇasācchubhe

हिन्दी अर्थ

शुभे ! उमा देवीने उस दिन मुझे ही उस रत्रमय पर्वतका दान दिया था। वह दान लेकर मैंने ब्राह्मणोंके अधीन क्र दिया था

अध्याय 132

श्लोक 27

उमा त्वरुन्धतीं साध्वीमामन्त्र्य यदभाषत ।शृणु कल्याणि वक्ष्यामि सर्वाभिः सहिता शुभे

umā tvarundhatīṃ sādhvīmāmantrya yadabhāṣata | śṛṇu kalyāṇi vakṣyāmi sarvābhiḥ sahitā śubhe

हिन्दी अर्थ

शुभे! कल्याणी! उमा देवीने पाध्वी अरुन्धतीको सम्बोधित करके जो भाषण दिया था, उसे मैं बता रहा हूँ। तुम इन सभी रानियोंके पाथ उसे. सुनो

अध्याय 132

श्लोक 28

पुण्यकानां विधिं कृत्स्नं यथावदनुपूर्वशः ।यथा चैव मया दृष्टस्तत एष विधिः शुभे

puṇyakānāṃ vidhiṃ kṛtsnaṃ yathāvadanupūrvaśaḥ | yathā caiva mayā dṛṣṭastata eṣa vidhiḥ śubhe

हिन्दी अर्थ

शुभे! पुण्यकोंकी सम्पूर्ण विधिका जैसा मैंने वर्णन सुना है और जिस रूपमें उसे देखा है, उसी रूपमें मैं क्रमश: इसका यथावत्‌ वर्णन करता हैँ, तुम सुनो

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.