Harivamsha Purana
131
अध्याय 131 / 318

Parva 2, Adhyāya 76

35 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ35 श्लोक

अध्याय 131

श्लोक 1

सत्यभामया पुण्यकव्रते श्रीकृष्णस्य नारदाय दानम्, नारदेन निष्क्रयं गृहीत्वा श्रीकृष्णस्य मोचनं एवं तस्मात् वरप्राप्तिः, श्रीकृष्णेन सम्बन्धिभ्यः पारिजातं दर्शयित्वा पुनः स्वर्गे प्रेषणं अथ कृष्णस्य कौरव्य ध्यातमात्रस्तपोधनः ।आजगाम मुनिश्रेष्ठो नारदो वदतां वरः

satyabhāmayā puṇyakavrate śrīkṛṣṇasya nāradāya dānam, nāradena niṣkrayaṃ gṛhītvā śrīkṛṣṇasya mocanaṃ evaṃ tasmāt varaprāptiḥ, śrīkṛṣṇena sambandhibhyaḥ pārijātaṃ darśayitvā punaḥ svarge preṣaṇaṃ atha kṛṣṇasya kauravya dhyātamātrastapodhanaḥ | ājagāma muniśreṣṭho nārado vadatāṃ varaḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—कुरुनन्दन ! श्रीकृष्णके चिन्तन करते ही तपस्याके धनी, वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुनिवर नारदजी वहाँ आ पहुँचे

अध्याय 131

श्लोक 2

सम्पूजयित्वा विधिवद् वासुदेवो विशाम्पते ।प्रतिग्रहार्थं विधिवच्छ्रीमान् भक्त्या न्यमन्त्रयत्

sampūjayitvā vidhivad vāsudevo viśāmpate | pratigrahārthaṃ vidhivacchrīmān bhaktyā nyamantrayat

हिन्दी अर्थ

प्रजानाथ! वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने विधिपूर्वक नारदजीकी पूजा करके भक्तिभावसे प्रतिग्रह लेनेके लिये उन्हें सविधि निमन्त्रण दिया

अध्याय 131

श्लोक 3

ततः काले च सम्प्राप्ते स्नातं देवो महामुनिम् ।सम्पूज्य माल्यैर्गन्धैश्च भोजयामास भारत

tataḥ kāle ca samprāpte snātaṃ devo mahāmunim | sampūjya mālyairgandhaiśca bhojayāmāsa bhārata

श्लोक 3–4 का हिन्दी अर्थ

भारत! तदनन्तर भोजनका समय प्राप्त होनेपर स्नान किये हुए महामुनि नारदका गन्ध और माल्य आदिके द्वारा पूजन करके सर्वभूतस्रष्टा सर्वव्यापी भगवान्‌ श्रीकृष्णने अपनी प्यारी पत्नी सत्याके साथ अत्यन्त प्रसन्न मनसे उन्हें सबकी रुचिके अनुकूल भोजन कराया ॥ इ-

अध्याय 131

श्लोक 4

सार्वकामिकमन्नाद्यं सर्वभूतकृदन्वयः ।सत्यया प्रियया सार्द्धं प्रहृष्टेनान्तरात्मना

sārvakāmikamannādyaṃ sarvabhūtakṛdanvayaḥ | satyayā priyayā sārddhaṃ prahṛṣṭenāntarātmanā

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 131

श्लोक 5

पुष्पदामावसृज्याथ कण्ठे कृष्णस्य भाविनी ।बबन्ध कृष्णं सुभगा पारिजाते वनस्पतौ

puṣpadāmāvasṛjyātha kaṇṭhe kṛṣṇasya bhāvinī | babandha kṛṣṇaṃ subhagā pārijāte vanaspatau

हिन्दी अर्थ

सौभाग्यशालिनी भामिनी सत्यभामाने श्रीकृष्णके कण्ठमें फूलकी माला डालकर उन्हें पारिजात-वृक्षमें बाँध दिया

अध्याय 131

श्लोक 6

अद्भिर्ददौ नारदाय ततोऽनुज्ञाप्य केशवम् ।देवी धेनुसहस्रं च काञ्चनस्य च पर्वतम्

adbhirdadau nāradāya tato'nujñāpya keśavam | devī dhenusahasraṃ ca kāñcanasya ca parvatam

श्लोक 6–7 का हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ श्रीकृष्णकी आज्ञा लेकर देवी सत्याने नारदजीको जलके द्वारा श्रीकृष्णका दान कर दिया। साथ ही एक सहस््र धेनु तथा सोनेका पर्वत भी दिया। वह पर्वत मणि एवं रत्नोंकी प्रभासे युक्त था। उसमें तिलका भी सम्मिश्रण किया गया था तथा अन्य प्रकारके धान्योंसे भी वह पम्पन्न था। उस काश्चन पर्वतके साथ सोने और चाँदीका भी संयोग था

अध्याय 131

श्लोक 7

हिरण्यरूप्यमिश्रं च मणिरत्नप्रभस्य च ।तिलमिश्रस्य च तथा धान्यैरन्यैर्युतस्य च

hiraṇyarūpyamiśraṃ ca maṇiratnaprabhasya ca | tilamiśrasya ca tathā dhānyairanyairyutasya ca

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 131

श्लोक 8

प्रतिगृह्य तु तत् सर्वं नारदो मुनिसत्तमः ।स सम्प्रहृष्टो भुक्त्वाथ भूयः केशवमब्रवीत्

pratigṛhya tu tat sarvaṃ nārado munisattamaḥ | sa samprahṛṣṭo bhuktvātha bhūyaḥ keśavamabravīt

हिन्दी अर्थ

मुनिश्रेष्ठ नारद वह सारा दान प्रहण करके बड़े प्रसन्न हुए और भोजन करके पुनः श्रीकृष्णसे बोले—

अध्याय 131

श्लोक 9

भोः केशव मदीयस्त्वमद्भिर्दत्तोऽसि सत्यया ।स त्वं मामनुगच्छस्व कुरु यद्यद् ब्रवीम्यहम्

bhoḥ keśava madīyastvamadbhirdatto'si satyayā | sa tvaṃ māmanugacchasva kuru yadyad bravīmyaham

हिन्दी अर्थ

हे केशव! अब आप मेरे हो गये; क्योंकि सत्याने जलके साथ आपका दान कर दिया है; अत: आप मेरे पीछे-पीछे आइये और मैं जो आज्ञा हूँ, उसका पालन कीजिये '

अध्याय 131

श्लोक 10

प्रथमः पक्ष इत्येवमब्रवीन्मधुसूदनः ।व्रजन्तमनुवव्राज नारदं च जनार्दनः

prathamaḥ pakṣa ityevamabravīnmadhusūdanaḥ | vrajantamanuvavrāja nāradaṃ ca janārdanaḥ

हिन्दी अर्थ

तब जनार्दन भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा—“यही मुख्य पक्ष है।' ऐसा कहकर वे जाते हुए नारदजीके पीछे-पीछे चले

अध्याय 131

श्लोक 11

परिहासं बहुविधं कृत्वा मुनिवरस्तदा ।तिष्ठस्व गच्छामीत्युक्त्वा परिहासविचक्षणः

parihāsaṃ bahuvidhaṃ kṛtvā munivarastadā | tiṣṭhasva gacchāmītyuktvā parihāsavicakṣaṇaḥ

श्लोक 11–12 का हिन्दी अर्थ

तब परिहासमें कुशल मुनिवर नारदजीने नाना प्रकारका परिहास करके क्रहा—' अच्छा, अब आप रहिये। मैं जाता हूँ।' ऐसा कहकर उनके कण्ठसे फूलकी माला हटाकर उन्होंने श्रीकृष्णसे कहा—' मुझे निष्क्रयके लिये बछड़ेसहित क्रपिला गौका दान कीजिये

अध्याय 131

श्लोक 12

अपनीय ततः कण्ठात् पुष्पदामैनमब्रवीत् ।कपिलां गां सवत्सां भो निष्क्रयार्थं प्रयच्छ मे

apanīya tataḥ kaṇṭhāt puṣpadāmainamabravīt | kapilāṃ gāṃ savatsāṃ bho niṣkrayārthaṃ prayaccha me

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 131

श्लोक 13

कृष्णाजिनं तिलैः पूर्णं प्रयच्छ च सकाञ्चनम् ।एषोऽत्र निष्क्रयः कृष्ण विहितो वृषकेतुना

kṛṣṇājinaṃ tilaiḥ pūrṇaṃ prayaccha ca sakāñcanam | eṣo'tra niṣkrayaḥ kṛṣṇa vihito vṛṣaketunā

हिन्दी अर्थ

द५७ भी दीजिये। भगवान्‌ शड्रने यहाँ यही निष्क्रय नियत किया है'

अध्याय 131

श्लोक 14

तथेत्युक्त्वा हृषीकेशस्तथा चक्रे जनाधिप ।स उवाच मुनिश्रेष्ठं हसित्वा मधुसूदनः

tathetyuktvā hṛṣīkeśastathā cakre janādhipa | sa uvāca muniśreṣṭhaṃ hasitvā madhusūdanaḥ

हिन्दी अर्थ

जनेश्वर! तब ' तथास्तु' कहकर हषीकेश मधुसूदनने वैसा ही किया। फिर हँसकर वे मुनिश्रेषठ नारदसे बोले—

अध्याय 131

श्लोक 15

वरं वरय धर्मज्ञ यस्ते नारद काङ्क्षितः ।तत्ते दातास्मि धर्मज्ञ परा प्रीतिर्हि मे त्वयि

varaṃ varaya dharmajña yaste nārada kāṅkṣitaḥ | tatte dātāsmi dharmajña parā prītirhi me tvayi

हिन्दी अर्थ

धर्मज्ञ नारद! तुम्हें जो अभीष्ट हो, वह वर मुझसे माँगो। मैं तुम्हें वह अवश्य दूँगा; क्योंकि तुम्हारे ऊपर मेरा बहुत प्रेम है'

अध्याय 131

श्लोक 16

नित्यमेवास्तु मे प्रीतो भवान् विष्णो सनातन ।त्वत्प्रसादात्तु सालोक्यं व्रजेयं ते महामते

nityamevāstu me prīto bhavān viṣṇo sanātana | tvatprasādāttu sālokyaṃ vrajeyaṃ te mahāmate

हिन्दी अर्थ

नारदजीने कहा—सनातन विष्णो! महामते! आप मुझपर सदा ही प्रसन्न रहें और आपकी कृपासे मुझे आपहीका सालोक्य प्राप्त हो

अध्याय 131

श्लोक 17

अयोनिजो भवेयं ते नारायण सतां गते ।भवेयं ब्राह्मणश्चैव पुनर्जात्यन्तरेष्वपि

ayonijo bhaveyaṃ te nārāyaṇa satāṃ gate | bhaveyaṃ brāhmaṇaścaiva punarjātyantareṣvapi

हिन्दी अर्थ

सत्पुरुषोंके आश्रयभूत नारायण! मैं आपकी कृपासे अयोनिज होऊँ और जन्मान्तरोंमें भी पुन: ब्राह्मण ही होऊँ

अध्याय 131

श्लोक 18

एवमस्त्विति तं देवो विष्णुः प्रोवाच भारत ।तुतोष च ततो धीमान् नारदो मुनिसत्तमः

evamastviti taṃ devo viṣṇuḥ provāca bhārata | tutoṣa ca tato dhīmān nārado munisattamaḥ

हिन्दी अर्थ

भारत! तब भगवान्‌ विष्णुने उनसे कहा-एवमस्तु (ऐसा ही हो) ।' यह वरदान पाकर बुद्धिमान्‌ मुनिश्रेष्ठ नारद बहुत संतुष्ट हुए

अध्याय 131

श्लोक 19

षोडश स्त्रीसहस्राणि विष्णोरतुलतेजसः ।निमन्त्रितानि कौरव्य सत्यया हरिक्रान्तया

ṣoḍaśa strīsahasrāṇi viṣṇoratulatejasaḥ | nimantritāni kauravya satyayā harikrāntayā

हिन्दी अर्थ

कुरुकुलनन्दन ! श्रीकृष्णप्रिया सत्याने अतुल तेजस्वी श्रीहरिकी सोलह हजार स्त्रियोंको अपने भवनमें निममन्त्रिति किया

अध्याय 131

श्लोक 20

तासां ददौ सन्नियोगमेकैकं हरिवल्लभा ।शच्या यो वासुदेवस्य पुरा दत्तो नराधिप

tāsāṃ dadau sanniyogamekaikaṃ harivallabhā | śacyā yo vāsudevasya purā datto narādhipa

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! पहले शचीने भगवान्‌ वासुदेवको जो भेंटसामग्री दी थी, श्रीकृष्णवल्लभा सत्यभामाने उसमेंसे एक-एक वस्तुको लेकर उन सबको दिया

अध्याय 131

श्लोक 21

पारिजातो वसंस्तत्र ततः प्रववृते तदा ।आज्ञया वासुदेवस्य नारदेन महात्मना

pārijāto vasaṃstatra tataḥ pravavṛte tadā | ājñayā vāsudevasya nāradena mahātmanā

श्लोक 21–23 का हिन्दी अर्थ

महातेजस्वी श्रीहरिने कुन्ती, द्रौपदी और सुभद्राके साथ पाण्डवोंको भी द्वारकामें बुलवाया

अध्याय 131

श्लोक 22

निमन्त्रिता गणाः सर्वे केशवेन महात्मना ।विभूतिं पारिजातस्य ददृशुः कुरुनन्दन

nimantritā gaṇāḥ sarve keśavena mahātmanā | vibhūtiṃ pārijātasya dadṛśuḥ kurunandana

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 131

श्लोक 23

पाण्डवांश्चानयामास सहैव पृथया हरिः ।द्रौपद्या च महातेजास्तथैव च सुभद्रया

pāṇḍavāṃścānayāmāsa sahaiva pṛthayā hariḥ | draupadyā ca mahātejāstathaiva ca subhadrayā

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 131

श्लोक 24

श्रुतश्रवां च ससुतां भीष्मकं ससुतं तदा ।अन्यानपि च कौरव्य मित्रसम्बन्धिबान्धवान्

śrutaśravāṃ ca sasutāṃ bhīṣmakaṃ sasutaṃ tadā | anyānapi ca kauravya mitrasambandhibāndhavān

हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन! श्रुतश्रवा और उसके पुत्र शिशुपालको, भीष्मक और उसके पुत्र रुक्मीको तथा अन्यान्य मित्रों, सम्बन्धियों एवं बन्धु- बान्धवोंको श्रीकृष्णने वहाँ बुलवाया था

अध्याय 131

श्लोक 25

रेमे च सह पार्थेन फाल्गुनेन जनार्दनः ।सान्तःपुरो महातेजाः परमर्द्ध्यावसन्नृप

reme ca saha pārthena phālgunena janārdanaḥ | sāntaḥpuro mahātejāḥ paramarddhyāvasannṛpa

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर ! महातेजस्वी जनार्दन कुन्ती पुत्र अर्जुनके साथ रनवाससहित वहाँ क्रीड़ाविनोद पूर्वक बड़े आनन्दसे रहे। वे उच्चकोटिकी समृद्धिसे सम्पन्न होकर द्वारकामें निवास करते थे

अध्याय 131

श्लोक 26

संवत्सरे ततो याते केशिहामरसत्तमः ।पारिजातं पुनः स्वर्गमानयत् सर्वभावनः

saṃvatsare tato yāte keśihāmarasattamaḥ | pārijātaṃ punaḥ svargamānayat sarvabhāvanaḥ

हिन्दी अर्थ

एक वर्ष बीत जानेपर सबको उत्पन्न करनेवाले अमरशिरोमणि केशिहन्ता श्रीकृष्णने पारिजात-वृक्षको पुन: स्वर्गलोकमें पहुँचा दिया

अध्याय 131

श्लोक 27

तत्रादितिं कश्यपं च दृष्ट्वा स्वजननीं प्रभुः ।शक्रेण सहितो धीमानप्रमेयपराक्रमः

tatrāditiṃ kaśyapaṃ ca dṛṣṭvā svajananīṃ prabhuḥ | śakreṇa sahito dhīmānaprameyaparākramaḥ

हिन्दी अर्थ

अप्रमेय पराक्रमशाली बुद्धिमान भगवान्‌ श्रीकृष्णने वहाँ इन्द्रसहित जाकर पिता कश्यप तथा अपनी माता अदितिका दर्शन किया

अध्याय 131

श्लोक 28

तमुवाचादितिर्माता प्रणतं मधुसूदनम् ।सौभ्रात्रमस्तु वामेवं नित्यं चामरसत्तम

tamuvācāditirmātā praṇataṃ madhusūdanam | saubhrātramastu vāmevaṃ nityaṃ cāmarasattama

श्लोक 28–30 का हिन्दी अर्थ

उस समय अपने चरणोंमें पड़े हुए मधुसूदनसे पाता अदितिने कहा-' अमरश्रेष्ठ ! तुम दोनोंमें सदा ही अच्छा शभ्रातृभाव बना रहे। जनार्दन! तुम मेरे इसी पनोरथको पूर्ण करो'। तब मनस्वी श्रीकृष्णने माता अदितिसे कहा-' बहुत अच्छा, ऐसा ही करूँगा।' तत्पश्चात्‌ पिता-मातासे विदा ले महातेजस्वी वासुदेवने रेवराज इन्द्रसे यह समयोचित बात कही—

अध्याय 131

श्लोक 29

मनोरथं मम त्वं च पूरयस्व जनार्दन ।तथेत्येवाब्रवीत्कृष्णस्ततो मातरमात्मवान्

manorathaṃ mama tvaṃ ca pūrayasva janārdana | tathetyevābravītkṛṣṇastato mātaramātmavān

अर्थ श्लोक 28 के साथ

अध्याय 131

श्लोक 30

आमन्त्रयित्वा पितरौ देवराजानमब्रवीत् ।वासुदेवो महातेजाः कालप्राप्तमिदं वचः

āmantrayitvā pitarau devarājānamabravīt | vāsudevo mahātejāḥ kālaprāptamidaṃ vacaḥ

अर्थ श्लोक 28 के साथ

अध्याय 131

श्लोक 31

महादेवेन देवेश सन्दिष्टोऽस्मि महात्मना ।भन्तर्भूमितलेऽवध्यानसुरान् प्रति मानद

mahādevena deveśa sandiṣṭo'smi mahātmanā | bhantarbhūmitale'vadhyānasurān prati mānada

हिन्दी अर्थ

दूसरोंको मान देनेवाले देवेन्द्र ! महात्मा महादेवजीने भूमिके भीतर निवास करनेवाले अवध्य असुरोंका वध करनेके लिये मुझे आदेश दिया है

अध्याय 131

श्लोक 32

तदितो दशरात्रेण हन्ताहमसुरोत्तमान् ।तत्रोपविष्टान् स्थातव्यं प्रवरेण महात्मना

tadito daśarātreṇa hantāhamasurottamān | tatropaviṣṭān sthātavyaṃ pravareṇa mahātmanā

हिन्दी अर्थ

अत: मैं आजसे लेकर दस रातके भीतर भूमिके भीतर बैठे हुए उन बड़े-बड़े असुरोंका वध कर डालूँगा। वहाँ दवानवोंके वधकी इच्छासे महात्मा प्रवर तथा वीर जयन्तको भी मेरे साथ रहना चाहिये

अध्याय 131

श्लोक 33

जयन्तेन च वीरेण दानवानां जिघांसया ।एकोऽत्र मानुषो देवो देवपुत्रस्तथा परः

jayantena ca vīreṇa dānavānāṃ jighāṃsayā | eko'tra mānuṣo devo devaputrastathā paraḥ

श्लोक 33–34 का हिन्दी अर्थ

इनमेंसे एक (प्रवर) तो मनुष्य देव है और दूसरा (जयन्त) देवपुत्र ! ब्रह्माजीके वरसे मदमत्त हुए वे दैत्य देवताओंके लिये अवध्य हैं; परंतु मनुष्यभावको प्राप्त हुए हमलोग उन्हें अवश्य मार डालेंगे

अध्याय 131

श्लोक 34

अवध्याः किल ते देवैर्ब्रह्मणो वरदर्पिताः ।अस्माभिः किल हन्तव्या मानुषत्वमुपागतैः

avadhyāḥ kila te devairbrahmaṇo varadarpitāḥ | asmābhiḥ kila hantavyā mānuṣatvamupāgataiḥ

अर्थ श्लोक 33 के साथ

अध्याय 131

श्लोक 35

तथेति कृष्णं स हरिः प्रीतरूपस्तथाव्रवीत् ।सस्वजाते ततो देवावन्योन्यं जनमेजय

tatheti kṛṣṇaṃ sa hariḥ prītarūpastathāvravīt | sasvajāte tato devāvanyonyaṃ janamejaya

हिन्दी अर्थ

जनमेजय! तब न्द्रने प्रसन्न होकर श्रीकृष्णसे कहा—ऐसा ही होगा।' फिर वे दोनों देवता एक-दूसरेसे गले मिले

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

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शोध टिप्पणीResearch note

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पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.