Harivamsha Purana
130
अध्याय 130 / 318

Parva 2, Adhyāya 75

69 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ69 श्लोक

अध्याय 130

श्लोक 1

इन्द्रोपेन्द्रस्य पुनर्युद्धं, उत्पातानां प्राकट्यं, ब्रह्मणः आज्ञातः कश्यपादितिभ्यां मध्ये आगत्वा युद्धस्य निवारणस्य उद्योगम्, तदनन्तरं सर्वेषां स्वर्गगमनम्, अदित्या आज्ञया शच्या उपहारं गृहीत्वा पारिजातसहितं द्वारकागमनम्, पारिजातेन द्वारकावासिनां प्रसन्नता, सत्यभामायाः पुण्यकव्रते प्रतिग्रहाय श्रीकृष्णेन नारदस्य स्मरणं ततो रथवरं कृष्णः समारुह्य महामनाः ।बिल्वोदकेश्वरं देवं नमस्कृत्य ययौ नृप

indropendrasya punaryuddhaṃ, utpātānāṃ prākaṭyaṃ, brahmaṇaḥ ājñātaḥ kaśyapāditibhyāṃ madhye āgatvā yuddhasya nivāraṇasya udyogam, tadanantaraṃ sarveṣāṃ svargagamanam, adityā ājñayā śacyā upahāraṃ gṛhītvā pārijātasahitaṃ dvārakāgamanam, pārijātena dvārakāvāsināṃ prasannatā, satyabhāmāyāḥ puṇyakavrate pratigrahāya śrīkṛṣṇena nāradasya smaraṇaṃ tato rathavaraṃ kṛṣṇaḥ samāruhya mahāmanāḥ | bilvodakeśvaraṃ devaṃ namaskṛtya yayau nṛpa

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—नरेश्वर! तदनन्तर महामनस्वी श्रीकृष्ण बिल्वोदकेश्वरदेवको नमस्कार करके अपने श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो युद्धके लिये चले

अध्याय 130

श्लोक 2

महेन्द्रमाह्वयामास रथस्थो मधुसूदनः ।सत्कृतं पुष्कराभ्याशे सर्वैर्देवगणैः सह

mahendramāhvayāmāsa rathastho madhusūdanaḥ | satkṛtaṃ puṣkarābhyāśe sarvairdevagaṇaiḥ saha

हिन्दी अर्थ

रथपर बैठे हुए मधुसूदनने पुष्करके निकट समस्त देवगणोंके साथ सत्कारपूर्वक खड़े हुए देवराज इन्द्रका युद्धके लिये आह्वान किया

अध्याय 130

श्लोक 3

ततः शक्रो जयन्तोऽथ हरिभिर्युक्तमुत्तमम् ।आरुरोह रथं देवः सर्वकामप्रदः सताम्

tataḥ śakro jayanto'tha haribhiryuktamuttamam | āruroha rathaṃ devaḥ sarvakāmapradaḥ satām

हिन्दी अर्थ

तब साधुओंको समस्त मनोवाज्छित वस्तु प्रदान करनेवाले देवेन्द्र घोड़ोंसे जुते हुए उत्तम रथपर जयन्तसहित आरूढ़ हुए

अध्याय 130

श्लोक 4

ततो रथस्थयोर्युद्धमभवत् कुरुनन्दन ।देवयोर्दैवयोगेन पारिजातकृते तदा

tato rathasthayoryuddhamabhavat kurunandana | devayordaivayogena pārijātakṛte tadā

हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन ! तत्पश्चात्‌ रथपर बैठे हुए उन दोनों देवताओंका दैववश पारिजातके लिये युद्ध आरम्भ हो गया

अध्याय 130

श्लोक 5

ततोऽहनद् रणे विष्णुर्बाणैः शत्रुबलार्दनः ।सैन्यानि देवराजस्य बाणजालैरजिह्मगैः

tato'hanad raṇe viṣṇurbāṇaiḥ śatrubalārdanaḥ | sainyāni devarājasya bāṇajālairajihmagaiḥ

हिन्दी अर्थ

उस रणभूमिमें शत्रुसेनाको पीड़ित करनेवाले श्रीकृष्णने अपने सीधे जानेवाले बाणसमूहोंद्वारा देवराज इन्द्रके सैनिकों का संहार आरम्भ किया

अध्याय 130

श्लोक 6

उपेन्द्रं न महेन्द्रोऽथ नैव विष्णुः सुरेश्वरम् ।ताडयामासतुर्वीरौ शस्त्रैः शक्तावपि प्रभो

upendraṃ na mahendro'tha naiva viṣṇuḥ sureśvaram | tāḍayāmāsaturvīrau śastraiḥ śaktāvapi prabho

हिन्दी अर्थ

प्रभो! वे दोनों वीर शक्तिशाली थे तो भी महेन्द्रने उपेन्द्रपर और उपेन्द्र विष्णुने देवेध्वर इन्द्रपर शस्त्रोंद्वारा प्रहार नहीं किया

अध्याय 130

श्लोक 7

एकैकमश्वं दशभिर्महेन्द्रस्य जनार्दनः ।विव्याध विशिखैस्तीक्ष्णैरस्त्रयुक्तैर्जनेश्वर

ekaikamaśvaṃ daśabhirmahendrasya janārdanaḥ | vivyādha viśikhaistīkṣṇairastrayuktairjaneśvara

हिन्दी अर्थ

जनेश्वर! जनार्दनने महेनद्रके एक-एक अश्वको दिव्यास्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रत दस-दस तीखे बाणोंसे घायल कर दिया

अध्याय 130

श्लोक 8

शैब्याद्यानपि देवेन्द्रः शरैरमरसत्तमः ।छादयामास राजेन्द्र घोरैरस्त्राभिमन्त्रितैः

śaibyādyānapi devendraḥ śarairamarasattamaḥ | chādayāmāsa rājendra ghorairastrābhimantritaiḥ

हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र ! अमरश्रेष्ठ देवेन्द्रने भी दिव्यास्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित भयंकर बाणोंसे श्रीकृष्णके शैव्य आदि चारों घोड़ोंको आच्छादित कर दिया

अध्याय 130

श्लोक 9

स च बाणसहस्रैश्च कृष्णो गजमवाकिरत् ।गरुडं च महातेजा बलभिद्धरिवाहनम्

sa ca bāṇasahasraiśca kṛṣṇo gajamavākirat | garuḍaṃ ca mahātejā balabhiddharivāhanam

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्णने इन्द्रके ऐरावत हाथीपर सहस्त्रों बाण बरसाये तथा महातेजस्वी बल- विनाशन इन्द्रने श्रीहरिकि वाहन गरुड़पर हजारों बाणोंकी वर्षा की

अध्याय 130

श्लोक 10

भूयिष्ठाभ्यां रथाभ्यां तौ तदहः शत्रुदारणौ ।युयुधाते महात्मानौ नारायणसुराधिपौ

bhūyiṣṭhābhyāṃ rathābhyāṃ tau tadahaḥ śatrudāraṇau | yuyudhāte mahātmānau nārāyaṇasurādhipau

हिन्दी अर्थ

शत्रुओंको विदीर्ण करनेवाले महात्मा नारायण और देवेन्द्र उस दिन बड़े-बड़े रथोंद्वारा युद्ध कर रहे थे

अध्याय 130

श्लोक 11

चकम्पे वसुधा कृत्स्ना नौर्जलस्थेव भारत ।दिशां दाहेन दिग्देशाः संवृताश्च समन्ततः

cakampe vasudhā kṛtsnā naurjalastheva bhārata | diśāṃ dāhena digdeśāḥ saṃvṛtāśca samantataḥ

हिन्दी अर्थ

भारत! उस समय जलमें ठहरी हुई नौकाकी भाँति सारी पृथ्वी काँपने लगी । दिशाओंके प्रदेश सब ओरसे दिग्दाहजनित आगकी लपटोंसे व्याप्त दिखायी देते थे

अध्याय 130

श्लोक 12

चेलुर्गिरिवराश्चैव पेतुश्च शतशो द्रुमाः ।पेतुश्च धरणीपृष्ठे मर्त्या धर्मगुणान्विताः

celurgirivarāścaiva petuśca śataśo drumāḥ | petuśca dharaṇīpṛṣṭhe martyā dharmaguṇānvitāḥ

हिन्दी अर्थ

बड़े-बड़े पर्वत हिल गये। सैकड़ों वृक्ष गिर गये और धर्मात्मा मनुष्य भी धराशायी होने लगे

अध्याय 130

श्लोक 13

निर्घाताः शतशश्चैव पेतुस्तत्र नराधिप ।ऊहुश्च सरितः सर्वाः प्रतिस्रोतो विशाम्पते

nirghātāḥ śataśaścaiva petustatra narādhipa | ūhuśca saritaḥ sarvāḥ pratisroto viśāmpate

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर ! वहाँ सैकड़ों बार वज़पात हुआ तथा प्रजानाथ ! समस्त सरिताएँ अपने प्रवाहके प्रतिकूल उलटी दिशामें बहने लगीं

अध्याय 130

श्लोक 14

विष्वग्वाता ववुश्चैव पेतुरुल्काश्च निष्प्रभाः ।मुहुर्मुहुर्भूतसङ्घा रथनादेन मोहिताः

viṣvagvātā vavuścaiva peturulkāśca niṣprabhāḥ | muhurmuhurbhūtasaṅghā rathanādena mohitāḥ

हिन्दी अर्थ

चारों ओर आँधी चलने लगी, प्रभाशून्य उल्काएँ गिरने लगीं और प्राणियोंके समुदाय रथोंकी घर्घराहटसे बारम्बार मोहित होने लगे

अध्याय 130

श्लोक 15

प्रजज्वाल जले चैव वह्निर्जनपदेश्वर ।युयुधुश्च ग्रहैः सार्द्धं ग्रहा नभसि सर्वतः

prajajvāla jale caiva vahnirjanapadeśvara | yuyudhuśca grahaiḥ sārddhaṃ grahā nabhasi sarvataḥ

हिन्दी अर्थ

जनपदेश्वर! पानीमें भी आग जलने लगी। आकाशमें सब ओर ग्रह दूसरे ग्रहोंके साथ युद्ध करने लगे

अध्याय 130

श्लोक 16

ज्योतींषि शतशः पेतुः स्वर्गाच्च धरणीतले ।दिशां गजाः प्रकुपिता नागाश्च धरणीतले

jyotīṃṣi śataśaḥ petuḥ svargācca dharaṇītale | diśāṃ gajāḥ prakupitā nāgāśca dharaṇītale

हिन्दी अर्थ

सैकड़ों तारे टूटकर स्वर्गसे पृथ्वीपर गिर पड़े। दिग्गज और पातालनिवासी नाग अत्यन्त कुपित हो उठे

अध्याय 130

श्लोक 17

गर्दभारुणसंस्थानैश्छिन्नाभ्रैश्चावृतं नभः ।विनदद्भिर्महारावैरुल्काशोणितवर्षिभिः

gardabhāruṇasaṃsthānaiśchinnābhraiścāvṛtaṃ nabhaḥ | vinadadbhirmahārāvairulkāśoṇitavarṣibhiḥ

हिन्दी अर्थ

गदहोंकी भाँति धूसर और अरुण वर्णवाले बादलोंके टुकड़े बड़े जोर-जोरसे गर्जना करते हुए आकाशमें छा गये और उल्कापात तथा रक्तकी वर्षा करने लगे

अध्याय 130

श्लोक 18

न भूर्न द्यौर्न गगनं नरेन्द्रवृषभाभवन् ।स्वस्थानि सुरवीरौ तु दृष्ट्वा युद्धगतौ तदा

na bhūrna dyaurna gaganaṃ narendravṛṣabhābhavan | svasthāni suravīrau tu dṛṣṭvā yuddhagatau tadā

हिन्दी अर्थ

रेन्द्रशिरोमणे ! उस समय उन दोनों देववीरोंको युद्धमें उपस्थित हुआ देख भूमि, अन्तरिक्ष तथा आकाशके प्राणी प्वस्थ न रह सके

अध्याय 130

श्लोक 19

जेपुर्मुनिगणा मन्त्राञ्जगतो हितकाम्यया ।ब्राह्मणाश्च महात्मानो ह्यतिष्ठंस्तेषु सत्वराः

jepurmunigaṇā mantrāñjagato hitakāmyayā | brāhmaṇāśca mahātmāno hyatiṣṭhaṃsteṣu satvarāḥ

हिन्दी अर्थ

मुनिगण जगत्‌के हितकी क्रामनासे मन्त्रोंका जप करने लगे और महात्मा ब्राह्मण भी बड़ी उतावलीके साथ उन्हीं मन्त्रोंके जपमें संलग्र हो ये

अध्याय 130

श्लोक 20

ततो ब्रह्मा महातेजाः कश्यपं वाक्यमब्रवीत् ।गच्छ बध्वा सहादित्या पुत्रौ वारय सुव्रत

tato brahmā mahātejāḥ kaśyapaṃ vākyamabravīt | gaccha badhvā sahādityā putrau vāraya suvrata

हिन्दी अर्थ

तब महातेजस्वी ब्रह्माने कश्यपसे कहा—सुब्रत ! तुम बहू अदितिके साथ जाओ और दोनों पुत्रोंको मना करो '

अध्याय 130

श्लोक 21

स तथेति तदा देवमुक्त्वा पद्मभवं मुनिः ।जगाम रथमास्थाय तस्थौ नरवरान्तिके

sa tatheti tadā devamuktvā padmabhavaṃ muniḥ | jagāma rathamāsthāya tasthau naravarāntike

हिन्दी अर्थ

नर्श्रेष्ठ ! तब ब्रह्माजीसे ' बहुत अच्छा' कहकर मुनिवर कश्यप रथपर बैठकर गये और दोनों पुत्रोंके निकट खड़े हो गये

अध्याय 130

श्लोक 22

स्थितं तु कश्यपं दृष्ट्वा सहादित्या तदन्तरा ।उभौ रथाभ्यां धरणीमवतीर्णौ महाबलौ

sthitaṃ tu kaśyapaṃ dṛṣṭvā sahādityā tadantarā | ubhau rathābhyāṃ dharaṇīmavatīrṇau mahābalau

हिन्दी अर्थ

बीचमें अदितिसहित कश्यपको खड़ा हुआ देख वे दोनों महाबली वीर रथोंसे पृथ्वीपर उतर गये

अध्याय 130

श्लोक 23

न्यस्तशस्त्रौ च तौ वीरौ ववन्दतुररिन्दमौ ।पितरौ धर्मतत्त्वज्ञौ सर्वभूतहिते रतौ

nyastaśastrau ca tau vīrau vavandaturarindamau | pitarau dharmatattvajñau sarvabhūtahite ratau

हिन्दी अर्थ

शत्रु ओंका दमन करनेवाले उन दोनों वीरोंने हथियार नीचे डालकर समस्त भूतोंके हितमें तत्पर रहनेवाले धर्मतत्त्वके ज्ञाता माता-पिताको प्रणाम केया

अध्याय 130

श्लोक 24

उभौ गृहीत्वा हस्ताभ्यामदितिस्त्वब्रवीद् वचः ।असोदराविवैवं किमन्योन्यं हन्तुमिच्छतः

ubhau gṛhītvā hastābhyāmaditistvabravīd vacaḥ | asodarāvivaivaṃ kimanyonyaṃ hantumicchataḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय अदितिने दोनोंको हाथोंसे पकड़कर कहा—' जो एक माताकी कोखसे पैदा न हुए हों, ऐसे दो व्यक्तियोंकी भाँति तुम दोनों एक-दूसरेको पारनेकी इच्छा क्यों करते हो ?

अध्याय 130

श्लोक 25

स्वल्पमर्थं पुरस्कृत्य प्रवृत्तमतिदारुणम् ।सदृशं नेति पश्यामि सर्वथा मम पुत्रयोः

svalpamarthaṃ puraskṛtya pravṛttamatidāruṇam | sadṛśaṃ neti paśyāmi sarvathā mama putrayoḥ

हिन्दी अर्थ

छोटी-सी वस्तुको सामने रखकर यह अत्यन्त दारुण कर्म आरम्भ हो [या। मैं सब प्रकारसे विचार करके देखती हूँ तो यह काम मुझे अपने पुत्रोंके योग्य नहीं दिखायी देता

अध्याय 130

श्लोक 26

श्रोतव्यं यदि मातुश्च पितुश्चैव प्रजापतेः ।न्यस्तशस्त्रौ स्थितौ भूत्वा कुरुतं वचनं मम

śrotavyaṃ yadi mātuśca pituścaiva prajāpateḥ | nyastaśastrau sthitau bhūtvā kurutaṃ vacanaṃ mama

हिन्दी अर्थ

घ५३ “यदि तुम दोनोंको माताकी बात सुननी है और अपने पिता प्रजापतिकी आज्ञाका पालन करना है तो तुम दोनों नीचे हथियार डालकर सामने खड़े हो जाओ और मैं जो कहूँ, उसे मानो

अध्याय 130

श्लोक 27

तथेत्युक्त्वा च तौ देवौ स्नातुकामौ महाबलौ ।गङ्गां जग्मतुरेवाथ प्रजल्पन्तौ परस्परम्

tathetyuktvā ca tau devau snātukāmau mahābalau | gaṅgāṃ jagmaturevātha prajalpantau parasparam

हिन्दी अर्थ

तब “बहुत अच्छा' कहकर दोनों महाबली देवता स्नानकी इच्छासे परस्पर बात करते हुए गड़ातटपर गये

अध्याय 130

श्लोक 28

त्वं प्रभुर्लोककृत् कृत्स्नराज्येऽहं स्थापितस्त्वया ।स्थापयित्वा कथं नाम पुनर्मामवमन्यसे

tvaṃ prabhurlokakṛt kṛtsnarājye'haṃ sthāpitastvayā | sthāpayitvā kathaṃ nāma punarmāmavamanyase

हिन्दी अर्थ

इन्द्रने कहा—(श्रीकृष्ण!) तुम समस्त संसारकी सृष्टि करनेवाले प्रभु हो! तुमने ही सारी त्रिलोकीके राज्यपर मुझे स्थापित किया है। स्थापित करके फिर किसलिये मेरा अपमान करते हो ?

अध्याय 130

श्लोक 29

भ्रातृत्वमुपगम्यैव ज्येष्ठत्वं चाप्यपोह्य च ।कथं कमलपत्राक्ष निर्वाणं कर्तुमिच्छसि

bhrātṛtvamupagamyaiva jyeṣṭhatvaṃ cāpyapohya ca | kathaṃ kamalapatrākṣa nirvāṇaṃ kartumicchasi

हिन्दी अर्थ

कमलनयन ! तुम मेरे भाई होकर भी मेरी ज्येष्ठताको दूर हटाकर उसका कुछ भी ख़याल न करके कैसे मेरे जीवनदीपको सदाके लिये बुझा देना चाहते हो ?

अध्याय 130

श्लोक 30

स्नातौ तु जाह्नवीतोये पुनरभ्यागतौ नृप ।यत्रादितिः कश्यपश्च महात्मानौ दृढव्रतौ

snātau tu jāhnavītoye punarabhyāgatau nṛpa | yatrāditiḥ kaśyapaśca mahātmānau dṛḍhavratau

हिन्दी अर्थ

नरेश्रर! गज्ाजीके जलमें नहाकर दृढ़तापूर्वक उत्तम ब्रतका पालन करनेवाले वे दोनों महात्मा श्रीकृष्ण और इन्द्र जहाँ कश्यप और अदिति विद्यमान थे, वहाँ पुन: आ पहुँचे

अध्याय 130

श्लोक 31

प्रियसङ्गमनं नाम तं देशं मुनयोऽवदन् ।यत्र तौ सङ्गतौ चोभौ पितृभ्यां कमलेक्षणौ

priyasaṅgamanaṃ nāma taṃ deśaṃ munayo'vadan | yatra tau saṅgatau cobhau pitṛbhyāṃ kamalekṣaṇau

हिन्दी अर्थ

मुनिलोग उस स्थानका नाम प्रियसज़्मन बतलाते हैं, जहाँ वे दोनों कमललोचन बन्धु माता-पितासे मिले थे

अध्याय 130

श्लोक 32

ततः शक्रस्य कौरव्य दत्त्वा वाचाभयं तदा ।यत्र देवगणाः सर्वे समेता धर्मचारिणः

tataḥ śakrasya kauravya dattvā vācābhayaṃ tadā | yatra devagaṇāḥ sarve sametā dharmacāriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन! तदनन्तर श्रीकृष्णने इन्द्रको उस स्थानपर अपनी वाणीद्वारा अभयदान दिया; जहाँ समस्त धर्माचारी देवता एकत्र थे

अध्याय 130

श्लोक 33

ततो ययुर्विमानैस्तु देवाः सर्वे त्रिविष्टपम् ।ऋद्ध्या परमया युक्तास्तेषामेवानुरूपया

tato yayurvimānaistu devāḥ sarve triviṣṭapam | ṛddhyā paramayā yuktāsteṣāmevānurūpayā

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ सब देवता उत्तम समृद्धिसे, जो उन्हींके अनुरूप थी, युक्त हो अपने-अपने विमानोंद्वारा स्वर्गलोकको गये

अध्याय 130

श्लोक 34

कश्यपश्चादितिश्चैव तथा शक्रजनार्दनौ ।विमानमेकमारुह्य गता राजंस्त्रिविष्टपम्

kaśyapaścāditiścaiva tathā śakrajanārdanau | vimānamekamāruhya gatā rājaṃstriviṣṭapam

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! कश्यप, अदिति, इन्द्र और श्रीकृष्ण—ये सब लोग एक विमानपर बैठकर स्वर्गलोकको गये

अध्याय 130

श्लोक 35

ते शक्रसदनं प्राप्ता रम्यं सर्वगुणान्वितम् ।ऊषुरेकत्र कौरव्य मुदिता धर्मचारिणः

te śakrasadanaṃ prāptā ramyaṃ sarvaguṇānvitam | ūṣurekatra kauravya muditā dharmacāriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन ! सर्वसद्‌गुण- सम्पन्न रमणीय इन्द्रभवनमें पहुँचकर वे समस्त धर्माचारी महात्मा बड़े आनन्दके साथ एक ही जगह ठहरे

अध्याय 130

श्लोक 36

शची तु कश्यपं पत्न्या सहितं धर्मवत्सला ।उपाचरन्महात्मानं सर्वभूतहिते रतम्

śacī tu kaśyapaṃ patnyā sahitaṃ dharmavatsalā | upācaranmahātmānaṃ sarvabhūtahite ratam

हिन्दी अर्थ

धर्मवत्सला शचीने समस्त भूतोंके हितमें तत्पर रहनेवाले पत्नीसहित महात्मा कश्यपकी परिचर्या की

अध्याय 130

श्लोक 37

ततस्तस्यां प्रभातायां रजन्यामब्रवीद्धरिम् ।अदितिर्धर्मतत्त्वज्ञा सर्वभूतहितं वचः

tatastasyāṃ prabhātāyāṃ rajanyāmabravīddharim | aditirdharmatattvajñā sarvabhūtahitaṃ vacaḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर जब रात बीती और प्रात:काल हुआ, तब धर्मके तत्त्वको जाननेवाली अदितिने श्रीकृष्णसे यह समस्त प्राणियोंके लिये हितकर वचन कहा-

अध्याय 130

श्लोक 38

उपेन्द्र द्वारकां गच्छ पारिजातं नयस्व च ।वध्वा सम्प्रापयस्वेश पुण्यकं हृदये स्थितम्

upendra dvārakāṃ gaccha pārijātaṃ nayasva ca | vadhvā samprāpayasveśa puṇyakaṃ hṛdaye sthitam

हिन्दी अर्थ

उपेन्द्र ! द्वारकाको जाओ और पारिजात भी लेते जाओ। ईश! बहू सत्य- भामाके हृदयमें जो पुण्यक नामक ब्रतका उत्सव करनेकी इच्छा है, उसे पूर्ण कराओ

अध्याय 130

श्लोक 39

पुण्यके सत्यया प्राप्ते पुनरेष त्वया तरुः ।नन्दने पुरुषश्रेष्ठ स्थाप्यः स्थाने यथोचिते

puṇyake satyayā prāpte punareṣa tvayā taruḥ | nandane puruṣaśreṣṭha sthāpyaḥ sthāne yathocite

हिन्दी अर्थ

पुरुषश्रेष्ठ ! सत्यभामाद्वारा पुण्यक-ब्रतका अनुष्ठान पूर्ण हो जानेपर फिर तुम्हीं इस वृक्षको नन्दनवनमें यथोचित स्थानपर स्थापित कर देना'

अध्याय 130

श्लोक 40

एवमस्त्विति कृष्णेन देवमाता यशस्विनी ।उक्ता धर्मगुणैर्युक्ता नारदेन महात्मना

evamastviti kṛṣṇena devamātā yaśasvinī | uktā dharmaguṇairyuktā nāradena mahātmanā

हिन्दी अर्थ

तब श्रीकृष्णने यशस्विनी देवमाता अदितिसे, जिन्हें महात्मा नारदजीने धार्मिक गुणोंसे सम्पन्न बताया था, कहा—' ऐसा ही होगा '

अध्याय 130

श्लोक 41

ततोऽभिवाद्य पितरं मातरं च जनार्दनः ।महेन्द्रं सह शच्याथ प्रतस्थे द्वारकां प्रति

tato'bhivādya pitaraṃ mātaraṃ ca janārdanaḥ | mahendraṃ saha śacyātha pratasthe dvārakāṃ prati

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर पिता-माताको तथा शचीसहित महेन्द्रको प्रणाम करके श्रीकृष्ण द्वारकाकी ओर प्रस्थित हुए

अध्याय 130

श्लोक 42

ददौ कृष्णाय पौलोमी नियोगान् कुरुनन्दन ।सर्वासामेव कृष्णस्य भार्याणां धर्मचारिणी

dadau kṛṣṇāya paulomī niyogān kurunandana | sarvāsāmeva kṛṣṇasya bhāryāṇāṃ dharmacāriṇī

हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन! उस समय धर्मचारिणी शचीने श्रीकृष्णकी सभी पत्रियोंके लिये बहुत-से उपहार दिये

अध्याय 130

श्लोक 43

दिव्यानां सर्वरत्नानां वाससां च मनस्विनी ।नानारागविरक्तानां सदैवारजसामपि

divyānāṃ sarvaratnānāṃ vāsasāṃ ca manasvinī | nānārāgaviraktānāṃ sadaivārajasāmapi

श्लोक 43–44 का हिन्दी अर्थ

मनस्विनी शचीने उनकी सोलह हजार पत्नियोंके लिये सब प्रकारके दिव्य रत्न तथा भाँति-भाँतिके रंगोंमें रैगे हुए और कभी मलिन न होनेवाले बहुत-से वस्त्र श्रीकृष्णको अर्पित किये। महातेजस्वी श्रीकृष्ण वह सब उपहार लेकर द्वारकाको चले

अध्याय 130

श्लोक 44

भार्याणां च सहस्राणि यानि षोडश माधवे ।प्रतिगृह्य महातेजाः प्रययौ द्वारकां प्रति

bhāryāṇāṃ ca sahasrāṇi yāni ṣoḍaśa mādhave | pratigṛhya mahātejāḥ prayayau dvārakāṃ prati

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 130

श्लोक 45

सम्पूज्यमानो द्युतिमान् खेचरैः पुण्यकर्मभिः ।ससात्यकिः सपुत्रश्च प्राप्तो रैवतकं गिरिम्

sampūjyamāno dyutimān khecaraiḥ puṇyakarmabhiḥ | sasātyakiḥ saputraśca prāpto raivatakaṃ girim

हिन्दी अर्थ

पुण्यकर्मा आकाशचारी प्राणियोंसे पूजित होते हुए तेजस्वी श्रीकृष्ण सात्यकि और अपने पुत्र प्रद्युक्नसहित रैवतक पर्वतपर आ पहुँचे

अध्याय 130

श्लोक 46

स तत्र स्थापयित्वा च पारिजातं वरद्रुमम् ।सात्यकं प्रेषयामास द्वारकां द्वारशालिनीम्

sa tatra sthāpayitvā ca pārijātaṃ varadrumam | sātyakaṃ preṣayāmāsa dvārakāṃ dvāraśālinīm

हिन्दी अर्थ

श्रेष्ठ वृक्ष पारिजातको वहीं स्थापित करके श्रीकृष्णने सात्यकिको द्वारशालिनी द्वारकापुरीको भेजा

अध्याय 130

श्लोक 47

पारिजातमिहानीतं महेन्द्रसदनान्मया ।निवेदय महाबाहो भैमानां भैमवर्द्धन

pārijātamihānītaṃ mahendrasadanānmayā | nivedaya mahābāho bhaimānāṃ bhaimavarddhana

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण बोले—भीमवंशी यादवोंमें भीमकुलकी वृद्धि करनेवाले महाबाहो ! तुम द्वारकामें जाकर यह सूचना दे दो कि मैं इन्द्रभवनसे पारिजात वृक्षको यहाँ लाया हूँ

अध्याय 130

श्लोक 48

अद्य द्वारवतीं चैव पारिजातमहं द्रुमम् ।प्रवेशयिष्ये नगरे शोभा प्रक्रियतां शुभा

adya dvāravatīṃ caiva pārijātamahaṃ drumam | praveśayiṣye nagare śobhā prakriyatāṃ śubhā

हिन्दी अर्थ

आज मैं द्वारवतीपुरीमें पारिजात-वृक्षका प्रवेश कराऊँगा; अत: नगरमें सुन्दर ढंगसे सजावट की जाय

अध्याय 130

श्लोक 49

इत्युक्तः सात्यको गत्वा तथोक्त्वा पुनरागतः ।कुमारैर्नागरैः सार्द्धं साम्बप्रभृतिभिः प्रभो

ityuktaḥ sātyako gatvā tathoktvā punarāgataḥ | kumārairnāgaraiḥ sārddhaṃ sāmbaprabhṛtibhiḥ prabho

हिन्दी अर्थ

प्रभो ! श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर सात्यकि नगरमें गये और उनका संदेश सुनाकर साम्ब आदि कुमारों तथा नागरिकोंके साथ फिर वहीं लौट आये

अध्याय 130

श्लोक 50

ततोऽग्रतः पारिजातमारोप्य गरुडे तदा ।प्रद्युम्नो द्वारकां रम्यां विवेश रथिनां वरः

tato'grataḥ pārijātamāropya garuḍe tadā | pradyumno dvārakāṃ ramyāṃ viveśa rathināṃ varaḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर रथियोंमें श्रेष्ठ प्रद्युप्नने पारिजातको अपने आगे गरुड़पर रखकर सबसे पहले रमणीय द्वारकापुरीमें प्रवेश किया

अध्याय 130

श्लोक 51

शैब्यादिहययुक्तेन रथेनानुययौ हरिः ।तस्याथ रथमुख्येन सात्यकः साम्ब एव च

śaibyādihayayuktena rathenānuyayau hariḥ | tasyātha rathamukhyena sātyakaḥ sāmba eva ca

हिन्दी अर्थ

फिर शैब्य आदि घोड़ोंसे जुते हुए रथके द्वारा श्रीकृष्णने पारिजातका अनुसरण किया। उन्हींके श्रेष्ठ रथद्वारा सात्यकि और साम्ब भी गये

अध्याय 130

श्लोक 52

ये त्वन्ये नृप वार्ष्णेया यानैर्बहुविधैस्तथा ।ययुः प्रहृष्टास्तत् कर्म पूजयन्तो महात्मनः

ye tvanye nṛpa vārṣṇeyā yānairbahuvidhaistathā | yayuḥ prahṛṣṭāstat karma pūjayanto mahātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

नरेथ्र! जो अन्य वृष्णिवंशी थे, वे अनेक प्रकारके वाहनोंद्वारा महात्मा श्रीकृष्णके उस कर्मकी प्रशंसा करते हुए बड़े हर्षके साथ पुरीमें प्रविष्ठ हुए

अध्याय 130

श्लोक 53

सात्यकाद् विस्तरं श्रुत्वा यादवा नागरास्तथा ।विस्मयं परमं जग्मुरप्रमेयस्य कर्मणा

sātyakād vistaraṃ śrutvā yādavā nāgarāstathā | vismayaṃ paramaṃ jagmuraprameyasya karmaṇā

हिन्दी अर्थ

सात्यकिसे पारिजात-हरणका विस्तृत समाचार सुनकर यादव तथा नागरिक अप्रमेयस्वरूप श्रीकृष्णके उस कर्मसे बड़े विस्मयको प्राप्त हुए

अध्याय 130

श्लोक 54

तं दिव्यकुसुमं वृक्षं दृष्ट्वाऽऽनर्तनिवासिनः ।राजन् न ततृपुर्हृष्टाः पश्यमाना महोदयम्

taṃ divyakusumaṃ vṛkṣaṃ dṛṣṭvā''nartanivāsinaḥ | rājan na tatṛpurhṛṣṭāḥ paśyamānā mahodayam

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! उस महान्‌ अभ्युदयकारी दिव्य पुष्पवाले वृक्षको देखकर आनर्तनिवासी बड़े प्रसन्न हुए। वे बारम्बार देखनेपर भी तृप्त नहीं होते थे

अध्याय 130

श्लोक 55

तमद्भुतमचिन्त्यं च मदकेलिकलाण्डजम् ।वृक्षोत्तमं पश्यतां वै वृद्धानामगमज्जरा

tamadbhutamacintyaṃ ca madakelikalāṇḍajam | vṛkṣottamaṃ paśyatāṃ vai vṛddhānāmagamajjarā

हिन्दी अर्थ

उस वृक्षपर बहुत-से पक्षी मदमत्त होकर केलिकलामें आसक्त हो रहे थे। उस अद्भुत, अचिन्त्य एवं उत्तम वृक्षका दर्शन करनेवाले तरृद्धोंकी वृद्धावस्था तत्काल दूर हो गयी

अध्याय 130

श्लोक 56

ये त्वन्धचक्षुषः सर्वे तेऽभवन् दिव्यचक्षुषः ।विरोगा रोगिणश्चासन् घ्रात्वा गन्धं वनस्पतेः

ye tvandhacakṣuṣaḥ sarve te'bhavan divyacakṣuṣaḥ | virogā rogiṇaścāsan ghrātvā gandhaṃ vanaspateḥ

हिन्दी अर्थ

उस वनस्पतिकी गन्ध सूँघकर रोगी नीरोग हो गये और जिनकी आँखें पहले अंधी थीं, वे उस समय दिव्य दृष्टिसे सम्पन्न हो गये

अध्याय 130

श्लोक 57

लपन्तः कौकिलाञ्छ्वेताञ्छ्रुत्वाऽऽनर्तनिवासिनः ।बभूवुर्हृष्टमनसो ववन्दुश्च जनार्दनम्

lapantaḥ kaukilāñchvetāñchrutvā''nartanivāsinaḥ | babhūvurhṛṣṭamanaso vavanduśca janārdanam

हिन्दी अर्थ

पारिजात-वृक्षपर सफेद कोकिलोंको मधुर बोली बोलते सुनकर आनर्त देशके निवासी मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और भगवान्‌ जनार्दनकी वन्दना करने लगे

अध्याय 130

श्लोक 58

नानाविधानि तूर्याणि गेयानि मधुराणि च ।शुश्रुवुस्तस्य वृक्षस्य नातिदूरं गता नराः

nānāvidhāni tūryāṇi geyāni madhurāṇi ca | śuśruvustasya vṛkṣasya nātidūraṃ gatā narāḥ

हिन्दी अर्थ

उस वृक्षके समीप गये हुए मनुष्य नाना प्रकारके वाद्य और मीठे-मीठे गीत सुनते थे

अध्याय 130

श्लोक 59

योऽयं सङ्कल्पयामास गन्धं हृद्यं नरस्तथा ।स तदैव तमाजघ्रे पारिजातसमुद्भवम्

yo'yaṃ saṅkalpayāmāsa gandhaṃ hṛdyaṃ narastathā | sa tadaiva tamājaghre pārijātasamudbhavam

हिन्दी अर्थ

मनुष्य अपने मनमें जिस-जिस मनोरम सुगन्धके लिये संकल्प करते थे, वही तत्काल पारिजात- वृक्षसे उनकी ब्राणेन्द्रियमें प्रकट हो जाती थी

अध्याय 130

श्लोक 60

ततः प्रविश्य रम्यां तु द्वारकां यदुनन्दनः ।वसुदेवं महात्मानं ददृशे देवकीं तथा

tataḥ praviśya ramyāṃ tu dvārakāṃ yadunandanaḥ | vasudevaṃ mahātmānaṃ dadṛśe devakīṃ tathā

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर यदुनन्दन श्रीकृष्णने रमणीय द्वारकापुरीमें प्रवेश करके महात्मा वसुदेव तथा माता देवकीका दर्शन किया

अध्याय 130

श्लोक 61

कुकुराधिपतिं चैव बलं भ्रातरमेव च ।वृद्धाश्च यादवानां ये मानार्हानमरोपमान्

kukurādhipatiṃ caiva balaṃ bhrātarameva ca | vṛddhāśca yādavānāṃ ye mānārhānamaropamān

हिन्दी अर्थ

फिर क्रमश: कुकुरवंशके अधिपति उग्रसेन, भैया बलराम तथा यादवोंमें जो बड़े-बूढ़े माननीय देवोपम पुरुष थे, उन सबसे वे मिले

अध्याय 130

श्लोक 62

विसृज्य तान् वै भगवाननादिनिधनोऽच्युतः ।सम्पूज्य च यथान्यायं स्वमेव भवनं गतः

visṛjya tān vai bhagavānanādinidhano'cyutaḥ | sampūjya ca yathānyāyaṃ svameva bhavanaṃ gataḥ

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ उन सबका यथोचित पूजन करके उन्हें विदा करनेके पश्चात्‌ आदि-अन्तसे रहित भगवान अच्युत अपने ही भवनमें चले गये

अध्याय 130

श्लोक 63

स सत्यभामया वासं विवेश मधुसूदनः ।पारिजातं तरुश्रेष्ठं ग्रहाय गदपूर्वजः

sa satyabhāmayā vāsaṃ viveśa madhusūdanaḥ | pārijātaṃ taruśreṣṭhaṃ grahāya gadapūrvajaḥ

हिन्दी अर्थ

गदके बड़े भाई उन मधुसूदनने तस्त्रेषठ पारिजातको लेकर सत्यभामाके भवनमें प्रवेश किया

अध्याय 130

श्लोक 64

सा देवी पूजयामास प्रहृष्टा वासवानुजम् ।प्रतिजग्राह तं चापि पारिजातं महाद्रुमम्

sā devī pūjayāmāsa prahṛṣṭā vāsavānujam | pratijagrāha taṃ cāpi pārijātaṃ mahādrumam

हिन्दी अर्थ

देवी सत्यभामाने अत्यन्त प्रसन्न होकर इन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्णका पूजन किया और उस विशाल वृक्ष पारिजातको ले लिया

अध्याय 130

श्लोक 65

मनीषितेन स तरुरल्पो भवति भारत ।महांश्च वासुदेवस्य तदद्भुतमभून्महत्

manīṣitena sa taruralpo bhavati bhārata | mahāṃśca vāsudevasya tadadbhutamabhūnmahat

हिन्दी अर्थ

भारत ! वह वृक्ष वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी इच्छाके अनुसार कभी छोटा हो जाता था और कभी बहुत बड़ा। यह उसके विषयमें बड़ी ही अद्भुत बात थी

अध्याय 130

श्लोक 66

कदाचिद् द्वारकां सर्वां प्रच्छादयति भारत ।कदाचिद्धस्तधार्यस्तु भवत्यङ्गुष्ठसन्निभः

kadācid dvārakāṃ sarvāṃ pracchādayati bhārata | kadāciddhastadhāryastu bhavatyaṅguṣṭhasannibhaḥ

हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन! कभी तो वह वृक्ष इतना अधिक बढ़ जाता कि सारी द्वारकाको आच्छादित कर लेता था और कभी हाथपर रख लेने योग्य अज्ूठेके बराबर हो जाता था

अध्याय 130

श्लोक 67

ननन्द सत्या कौरव्य देवी प्राप्य मनोरथम् ।पुण्यकार्थं तु सम्भारान् सम्भर्तुमुपचक्रमे

nananda satyā kauravya devī prāpya manoratham | puṇyakārthaṃ tu sambhārān sambhartumupacakrame

हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन ! देवी सत्या उस मनोवाज्छित वृक्षको पाकर बहुत प्रसन्न हुईं। उन्होंने पुण्यकब्रतके लिये सामान जुटाना आरम्भ किया

अध्याय 130

श्लोक 68

यानि द्रव्याणि कौरव्य जम्बूद्वीपे तु कानिचित् ।योग्यानि तानि कृष्णेन सम्भृतानि महात्मना

yāni dravyāṇi kauravya jambūdvīpe tu kānicit | yogyāni tāni kṛṣṇena sambhṛtāni mahātmanā

हिन्दी अर्थ

कुरुकुलभूषण ! जम्बूद्वीपमें जो कोई भी उपयुक्त द्रव्य थे, उन सबका महात्मा श्रीकृष्णने संग्रह कर लिया

अध्याय 130

श्लोक 69

मुनिं तदासस्मृतवान् स नारदं जनार्दनः सर्वगुणोचितं वशी ।प्रतिग्रहार्थं व्रतकस्य सत्यया यथोपदिष्टस्य पुरन्दरानुजः

muniṃ tadāsasmṛtavān sa nāradaṃ janārdanaḥ sarvaguṇocitaṃ vaśī | pratigrahārthaṃ vratakasya satyayā yathopadiṣṭasya purandarānujaḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय इन्द्रके छोटे भाई जितेन्द्रिय जनार्दनने सत्यभामाके बताये और उनके द्वारा आचरणमें लाये गये पुण्यकत्रतमें दिये जानेवाले दानको ग्रहण करनेके लिये सर्वगुणसम्पन्न नारद मुनिका स्मरण किया

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.