Harivamsha Purana
129
अध्याय 129 / 318

Parva 2, Adhyāya 74

54 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ54 श्लोक

अध्याय 129

श्लोक 1

रात्र्यां युद्धं स्थगितं कृत्वा श्रीकृष्णेन पारियात्रं पर्वतं वरदानम्, गङ्गायाः स्मरणं, बिल्वगङ्गाजलोपरि महादेवस्य आह्वानं कृत्वा बिल्वोदकेश्वरस्य पूजनं स्तुतिकरणं च, महादेवेन तस्मै अभीष्ट वरं प्रदाय दैत्यानां घातनाय आदेशं, पारियात्रपर्वतोपरि भगवतः निवासं, तस्य प्रतिमापूजनस्य महिमा तमारुह्य रथं कृष्णः पारियात्रं गिरिं ययौ ।यत्रैरावतमास्थाय स्थितः सुरपतिः प्रभुः

rātryāṃ yuddhaṃ sthagitaṃ kṛtvā śrīkṛṣṇena pāriyātraṃ parvataṃ varadānam, gaṅgāyāḥ smaraṇaṃ, bilvagaṅgājalopari mahādevasya āhvānaṃ kṛtvā bilvodakeśvarasya pūjanaṃ stutikaraṇaṃ ca, mahādevena tasmai abhīṣṭa varaṃ pradāya daityānāṃ ghātanāya ādeśaṃ, pāriyātraparvatopari bhagavataḥ nivāsaṃ, tasya pratimāpūjanasya mahimā tamāruhya rathaṃ kṛṣṇaḥ pāriyātraṃ giriṃ yayau | yatrairāvatamāsthāya sthitaḥ surapatiḥ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! भगवान्‌ कृष्ण उस रथपर आरूढ़ हो पारियात्र पर्वतकी ओर बले, जहाँ प्रभावशाली देवराज इन्द्र ऐरावतपर आरूढ़ कर खड़े थे

अध्याय 129

श्लोक 2

पारियात्रो गिरिश्रेष्ठो दृष्ट्वा यान्तं जनार्दनम् ।शाणपादसमो भूत्वा प्रविवेश वसुन्धराम्

pāriyātro giriśreṣṭho dṛṣṭvā yāntaṃ janārdanam | śāṇapādasamo bhūtvā praviveśa vasundharām

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ श्रीकृष्णको आते देख वतश्रेष्ठ पारियात्र उड़दके ढेर या सनके बीजकी शिके समान शिथिल होकर धरतीमें समा गया

अध्याय 129

श्लोक 3

प्रियार्थं वासुदेवस्य प्रभावज्ञो महात्मनः ।तस्य प्रीतो हृषीकेशः पर्वतस्य जनाधिप

priyārthaṃ vāsudevasya prabhāvajño mahātmanaḥ | tasya prīto hṛṣīkeśaḥ parvatasya janādhipa

हिन्दी अर्थ

गगवान्‌ वासुदेवकी प्रसननताके लिये ही उसने ऐसा कया था; क्योंकि वह महात्मा श्रीकृष्णके प्रभावको ानता था। नरेश्वर ! उस पर्वतके इस व्यवहारसे इन्द्रियोंके वामी श्रीकृष्णको बड़ी प्रसन्नता हुई

अध्याय 129

श्लोक 4

ततः प्रयातं युद्धार्थमच्युतं कुरुनन्दन ।सपारिजातो गरुडः पृष्ठतोऽनुययौ तदा

tataḥ prayātaṃ yuddhārthamacyutaṃ kurunandana | sapārijāto garuḍaḥ pṛṣṭhato'nuyayau tadā

हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन ! दनन्तर युद्धके लिये जाते हुए श्रीकृष्णके पीछे-पीछे गरिजातसहित गरुड़ भी गये

अध्याय 129

श्लोक 5

प्रयुम्नः सात्यकिश्चापि गरुडस्थौ महाबलौ ।गतावुभौ रक्षणार्थं पारिजातमरिन्दमौ

prayumnaḥ sātyakiścāpi garuḍasthau mahābalau | gatāvubhau rakṣaṇārthaṃ pārijātamarindamau

हिन्दी अर्थ

गरुड़पर बैठे हुए हाबली प्र्युम्न और सात्यकि ये दोनों शत्रु-दमन वीर बी पारिजातकी रक्षाके लिये वहाँ गये

अध्याय 129

श्लोक 6

ततस्त्वस्तं गतः सूर्यः प्रवृत्ता रजनी नृप ।उपस्थितं पुनर्युद्धं शक्रकेशवयोरिह

tatastvastaṃ gataḥ sūryaḥ pravṛttā rajanī nṛpa | upasthitaṃ punaryuddhaṃ śakrakeśavayoriha

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! त्पश्चात्‌ सूर्यदेव अस्त हो गये और सब ओर रात फैल यी तो भी वहाँ इन्द्र और श्रीकृष्णका युद्ध पुनः पस्थित हुआ

अध्याय 129

श्लोक 7

सुप्रहाराहतं दृष्ट्वा विष्णुरैरावतं गजम् ।नातिकल्पं महातेजा देवराजानमब्रवीत्

suprahārāhataṃ dṛṣṭvā viṣṇurairāvataṃ gajam | nātikalpaṃ mahātejā devarājānamabravīt

हिन्दी अर्थ

महातेजस्वी भगवान्‌ श्रीकृष्णने रावत हाथीको गरुड़के प्रहारोंसे अत्यन्त आहत और समर्थ हुआ देख देवराज इन्द्रसे इस प्रकार हहा—

अध्याय 129

श्लोक 8

गरुडाभिहतः पूर्वं नातिकल्पो गजोत्तमः ।ऐरावतो महाबाहो रात्रिश्च समुपोह्यते

garuḍābhihataḥ pūrvaṃ nātikalpo gajottamaḥ | airāvato mahābāho rātriśca samupohyate

श्लोक 8–9 का हिन्दी अर्थ

महाबाहो ! गरुड़द्वारा पहलेसे ही आहत कर आपका यह उत्तम हाथी ऐरावत इस समय छ असमर्थ हो गया है। इधर रात भी आ पहुँची है; मो अत: अब कल सबेरे आपकी जैसी इच्छा हो, उस तरह युद्ध कीजियेगा।' तब प्रभावशाली देवराजने श्रीकृष्णसे कहा, 'एवमस्तु (ऐसा ही हो) '

अध्याय 129

श्लोक 9

श्वः प्रभाते यथाकामं प्रवर्तस्व यथेच्छसि ।एवमस्त्विति कृष्णं तु देवराजोऽब्रवीत् प्रभुः

śvaḥ prabhāte yathākāmaṃ pravartasva yathecchasi | evamastviti kṛṣṇaṃ tu devarājo'bravīt prabhuḥ

अर्थ श्लोक 8 के साथ

अध्याय 129

श्लोक 10

उवास पुष्कराभ्याशे देवराजः पुरन्दरः ।व्रजं गिरिमयं कृत्वा धर्मात्मा नृपसत्तम

uvāsa puṣkarābhyāśe devarājaḥ purandaraḥ | vrajaṃ girimayaṃ kṛtvā dharmātmā nṛpasattama

हिन्दी अर्थ

नृप्रेष्ठ ! इसके बाद धर्मात्मा देवराज इन्द्र अपने लिये पर्वतमय आवरण बनाकर पुष्करके निकट ठहर गये

अध्याय 129

श्लोक 11

ब्रह्मा ततो जगामाथ कश्यपश्च महानृषिः ।अदितिश्चैव सर्वे च देवा मुनय एव च

brahmā tato jagāmātha kaśyapaśca mahānṛṣiḥ | aditiścaiva sarve ca devā munaya eva ca

श्लोक 11–12 का हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन! जनेश्वर! तदनन्तर ब्रह्मा, महर्षि कश्यप, अदितिदेवी, समस्त देवता, मुनि, साध्य, विश्वेदेव, नासत्य नामसे प्रसिद्ध अश्विनीकुमार, आदित्य, रुद्र तथा वसुगण उस स्थानपर गये

अध्याय 129

श्लोक 12

साध्या विश्वे च कौरव्य नासत्यावश्विनौ तथा ।आदित्याश्चैव रुद्राश्च वसवश्च जनेश्वर

sādhyā viśve ca kauravya nāsatyāvaśvinau tathā | ādityāścaiva rudrāśca vasavaśca janeśvara

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 129

श्लोक 13

नारायणश्च पुत्रेण सात्यकेन च भारत ।सहोवास गिरौ रम्ये पारियात्रे प्रहृष्टवत्

nārāyaṇaśca putreṇa sātyakena ca bhārata | sahovāsa girau ramye pāriyātre prahṛṣṭavat

हिन्दी अर्थ

भारत! इधर पुत्र प्र्युम्न तथा भाई सात्यकिके साथ भगवान्‌ श्रीकृष्ण उस रातमें सुरम्य गिरि पारियात्रपर बड़े हर्षके साथ रहे

अध्याय 129

श्लोक 14

यत् स शाणप्रमाणोऽस्य भक्त्या समभवन्नृप ।वरं प्रादात् ततस्तस्य पर्वतस्य महाद्युतिः

yat sa śāṇapramāṇo'sya bhaktyā samabhavannṛpa | varaṃ prādāt tatastasya parvatasya mahādyutiḥ

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! वह पर्वत भगवान्‌के प्रति भक्ति-भावसे नम्र हो जो शाण (उड़द या सनके बीजकी राशि)-के बराबर हो गया था, इससे उस पर्वतपर प्रसन्न हो महातेजस्वी श्रीकृष्णने उस पर्वतको यह वर दिया—

अध्याय 129

श्लोक 15

शाणपाद इति ख्यातो भविष्यसि महागिरे ।पुण्येनार्द्धेन तुल्यो हि पुण्यो हिमवतः शुभः

śāṇapāda iti khyāto bhaviṣyasi mahāgire | puṇyenārddhena tulyo hi puṇyo himavataḥ śubhaḥ

हिन्दी अर्थ

महागिरे! तुम शाणपादके नामसे विख्यात होओगे। जैसे हिमालय पर्वतका ऊपरी आधा भाग परम पवित्र होता है, उसीके समान तुम भी शुभ एवं पवित्र बने रहोगे

अध्याय 129

श्लोक 16

एवमेव च भूयिष्ठो भव पर्वतसत्तम ।मेरुणा स्पर्धमानो हि बहुचित्रमृगैर्युतः ।रमे त्वां पश्यमानोऽहं बहुचित्रनगायुतम्

evameva ca bhūyiṣṭho bhava parvatasattama | meruṇā spardhamāno hi bahucitramṛgairyutaḥ | rame tvāṃ paśyamāno'haṃ bahucitranagāyutam

हिन्दी अर्थ

पर्वतश्रेष्ठ! तुम इसी प्रकार बहुसंख्यक विचित्र मृ्ोंसे युक्त हो मेरुके साथ स्पर्धा रखते हुए बहुत बड़े हो जाओ। तुम्हें अनेक विचित्र वृक्षोंसे सम्पन्न देखकर मैं आनन्दमग्न हो जाता हूँ

अध्याय 129

श्लोक 17

तथा दत्त्वा वरं तस्य पर्वतस्य तु केशवः ।दध्यौ गङ्गां सरिच्छ्रेष्ठां नमस्कृत्वा वृषध्वजम्

tathā dattvā varaṃ tasya parvatasya tu keśavaḥ | dadhyau gaṅgāṃ saricchreṣṭhāṃ namaskṛtvā vṛṣadhvajam

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार उस पर्वतको वर देकर भगवान्‌ श्रीकृष्णने महादेवजीको नमस्कार करके सरिताओंमें श्रेष्ठ गज़्ाजीका चिन्तन किया

अध्याय 129

श्लोक 18

अथाययौ विष्णुपदी स्मृता कृष्णेन भारत ।सम्पूज्यतां ततः कृष्णः कृत्वा स्नानमधोक्षजः

athāyayau viṣṇupadī smṛtā kṛṣṇena bhārata | sampūjyatāṃ tataḥ kṛṣṇaḥ kṛtvā snānamadhokṣajaḥ

हिन्दी अर्थ

भारत ! श्रीकृष्णके स्मरण करनेपर विष्णुपदी गड्रा वहाँ आ गयीं। अधोक्षज श्रीकृष्णने उनकी पूजा करके उनके जलसे स्नान किया

अध्याय 129

श्लोक 19

उदकं च गृहायाथ बिल्वं च हरिरव्ययः ।देवमावाहयामास रुद्रं सर्वेश्वरेश्वरम्

udakaṃ ca gṛhāyātha bilvaṃ ca hariravyayaḥ | devamāvāhayāmāsa rudraṃ sarveśvareśvaram

हिन्दी अर्थ

फिर अविनाशी श्रीहरिने गड्ाजल और बेलका फल लेकर उसीपर सर्वेधरेश्वर रुद्र- देवका आवाहन किया

अध्याय 129

श्लोक 20

ततः प्राप्तो महादेवः सोमः सप्रवरो विभुः ।तस्थावुपरि बिल्वस्य तथा गङ्गोदकस्य च

tataḥ prāpto mahādevaḥ somaḥ sapravaro vibhuḥ | tasthāvupari bilvasya tathā gaṅgodakasya ca

हिन्दी अर्थ

तब, पार्वतीसहित भगवान्‌ महादेव प्रमथगणोंके साथ वहाँ आये और गड्ाजल तथा बेलके ऊपर खड़े हो गये

अध्याय 129

श्लोक 21

तं पारिजातकुसुमैरर्चयामास केशवः ।तुष्टाव वाग्भिरीशेशं सर्वकर्तारमीश्वरम्

taṃ pārijātakusumairarcayāmāsa keśavaḥ | tuṣṭāva vāgbhirīśeśaṃ sarvakartāramīśvaram

हिन्दी अर्थ

तब श्रीकृष्णने उनका पारिजातके फूलोंद्वारा पूजन किया और सबके कर्ता ईश्वरेश्वर भगवान्‌ शिवका वाणीद्वारा स्तवन किया

अध्याय 129

श्लोक 22

रुद्रो देव त्वं रुदनाद् रावणाच्च रोरूयमाणो द्रावणाच्चातिदेवः ।भक्तं भक्तानां वत्सलं वत्सलानां कीर्त्या युङ्क्ष्वेशाद्य प्रपद्ये शरण्यम्

rudro deva tvaṃ rudanād rāvaṇācca rorūyamāṇo drāvaṇāccātidevaḥ | bhaktaṃ bhaktānāṃ vatsalaṃ vatsalānāṃ kīrtyā yuṅkṣveśādya prapadye śaraṇyam

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण बोले—देव! आप ही रोदन (रोना), रावण (रुलाना), अतिशय 'रव' तथा जन्म-मरणरूप संसारका द्रावण (निवारण) करनेके कारण * रुद्र' कहे गये हैं। आप सब देवताओंसे बढ़कर हैं। ईश! मैं आपके भक्तोंका भक्त तथा स्रेहियोंका स्तेही हूँ, आप मुझे विजय-कौर्तिका भागी बनाइये। मैं आज आप शरणागतवत्सल प्रभुकी शरण लेता हूँ

अध्याय 129

श्लोक 23

ग्राम्यारण्यानां त्वं पतिस्त्वं पशूनां ख्यातो देवः पशुपतिः सर्वकर्मा ।नान्यस्त्वत्तः परमो देवदेव जगत्पतिः सुरवीरारिहन्ता

grāmyāraṇyānāṃ tvaṃ patistvaṃ paśūnāṃ khyāto devaḥ paśupatiḥ sarvakarmā | nānyastvattaḥ paramo devadeva jagatpatiḥ suravīrārihantā

हिन्दी अर्थ

देवदेव ! आप ही ग्रामीण और वन्य पशुओं (जीवों) -के पति (पालक) हैं; इसीलिये आप भगवान्‌ पशुपतिके रूपमें विख्यात हैं । यह सारा जगत्‌ आपका ही कर्म है। आपसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है। आप ही जगदीश्वर तथा देववीरोंके शत्रुओंका हनन करनेवाले हैं

अध्याय 129

श्लोक 24

यस्मीदीशो महतामीश्वराणां भवानाद्यः प्रीतिदः प्राणदश्च ।तस्माद्धि त्वामीश्वरं प्राहुरीशं सन्तो विद्वांसः सर्वशास्त्रार्थतज्ज्ञाः

yasmīdīśo mahatāmīśvarāṇāṃ bhavānādyaḥ prītidaḥ prāṇadaśca | tasmāddhi tvāmīśvaraṃ prāhurīśaṃ santo vidvāṃsaḥ sarvaśāstrārthatajjñāḥ

हिन्दी अर्थ

आप बड़े-बड़े ईश्वर-कोटिके पुरुषोंके भी ईश्वर हैं। आप ही आदिपुरुष, प्रीतिदाता तथा प्राणदाता हैं; इसीलिये सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थतत्त्वको जाननेवाले विद्वान्‌ साधुपुरुष आपको ही ईश्वर तथा ईश कहते हैं

अध्याय 129

श्लोक 25

भूतं यस्माज्जगदत्यन्त धीर त्वत्तोऽव्यक्तादक्षरादक्षरेश ।तस्मात् त्वामाहुर्भव इत्येव भूतं सर्वेश्वराणां महतामप्युदारम्

bhūtaṃ yasmājjagadatyanta dhīra tvatto'vyaktādakṣarādakṣareśa | tasmāt tvāmāhurbhava ityeva bhūtaṃ sarveśvarāṇāṃ mahatāmapyudāram

हिन्दी अर्थ

अत्यन्त*! धीर* ! अक्षरश्वर रे ! अत: आप अव्यक्त अविनाशी परमेश्वरसे ही जगत्‌ उत्पन्न हुआ है, अत: विद्वान्‌ पुरुष आपको * भव' कहते हैं। वास्तवमें तो आप 'भूत' (नित्यसिद्ध) हैं। पहान्‌ सर्वेधरोंके लिये भी अत्यन्त उदार हैं (फिर दीन- दुखियोंके लिये तो बात ही क्या है?)

अध्याय 129

श्लोक 26

यस्माज्जितैरभिषिक्तोऽसि सर्वैर्देवासुरैः सर्वभूतैश्च देव ।महेश्वरं विश्वकर्माणमाहुस्त्वां वै सर्वे तेन देवातिदेवम्

yasmājjitairabhiṣikto'si sarvairdevāsuraiḥ sarvabhūtaiśca deva | maheśvaraṃ viśvakarmāṇamāhustvāṃ vai sarve tena devātidevam

हिन्दी अर्थ

देव! अत: पराजित हुए समस्त देवताओं, असुरों तथा सम्पूर्ण प्राणियोंने आपका 'महान्‌ ईश्वर' के पदपर अभिषेक किया है; अत: सभी विद्वान्‌ आप विश्वनिर्माता भगवान्‌को महेश्वर' तथा ' देवातिदेव ' (देवताओंसे बढ़कर महादेव) कहते हैं

अध्याय 129

श्लोक 27

पूज्यो दैवैः पूज्यसे नित्यदा वै शश्वच्छ्रेयः काङ्क्षिभिर्वरदामेयवीर्य ।तस्माद् विख्यातो भगवान् देवदेवः सतामिष्टः सर्वभूतात्मभावी

pūjyo daivaiḥ pūjyase nityadā vai śaśvacchreyaḥ kāṅkṣibhirvaradāmeyavīrya | tasmād vikhyāto bhagavān devadevaḥ satāmiṣṭaḥ sarvabhūtātmabhāvī

हिन्दी अर्थ

अमेय बल-पराक्रमसे सम्पन्न बरदायक पहे श्वर ! अत: सदा कल्याण-प्राप्तिकी इच्छा रखनेवाले देवता आप पूजनीय परमेश्वरकी नित्य पूजा करते हैं; अत: आप ' भगवान्‌ देवदेव' (देवताओंके भी देवता )- करे रूपमें विख्यात हैं । सत्पुरुषोंके इष्टदेव आप ही हैं । आप समस्त भूतोंको अपने भीतर ही उत्पन्न करनेवाले हैं

अध्याय 129

श्लोक 28

भूमित्रयाणां देव यस्मात् प्रतिष्ठा पुनर्लोकानां भावनामेयकीर्तिः ।त्र्यम्बकेति प्रथमं तेन नाम तवाप्रमेय त्रिदशेशनाथ

bhūmitrayāṇāṃ deva yasmāt pratiṣṭhā punarlokānāṃ bhāvanāmeyakīrtiḥ | tryambaketi prathamaṃ tena nāma tavāprameya tridaśeśanātha

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मा आदि देवेश्वरोंके भी स्वामी अप्रमेय- प्वरूप देव ! बारम्बार लोकोंको उत्पन्न करनेवाले लोक- भावन! अत: आप भूलोक, भुवर्लोक और स्वरलॉक—इन तीनों लोकोंकी भूमियोंके आश्रय हैं, अत: आपका प्रथम (प्रमुख) नाम त््यम्बक (त्रिलोकीके आश्रय) है, आपकी कीर्ति अमेय है

अध्याय 129

श्लोक 29

शर्वः शत्रूणां शासनादप्रमेयस्तथा भूयः शासनाच्चेश्वरेण ।सर्वव्यापित्वाच्छङ्करत्वाच्च सद्भिः शब्दस्येशानः श्रीकरार्काग्र्यतेजाः

śarvaḥ śatrūṇāṃ śāsanādaprameyastathā bhūyaḥ śāsanācceśvareṇa | sarvavyāpitvācchaṅkaratvācca sadbhiḥ śabdasyeśānaḥ śrīkarārkāgryatejāḥ

हिन्दी अर्थ

अक्षरों—अविनाशी जीवोंके ईश्वर । पोडध्याय; + ठप आप संहारकारी होनेके कारण शर्व कहलाते हैं, समस्त शत्रुओंका शासन करनेके कारण अप्रमेय शक्तिसे सम्पन्न हैं; फिर ईधररूपसे समस्त जगत्‌का शासन करनेके कारण भी आप अआप्रमेय हैं, सर्वव्यापी तथा सत्पुरुषोंके लिये कल्याणकारी होनेसे भी आपको अप्रमेय कहा गया है, श्री (लक्ष्मी )-की प्राप्ति करानेवाले परमेश्वर ! आप सम्पूर्ण शब्दोंके भी ईश्वर हैं अर्थात्‌ समस्त शब्दोंद्वारा आपका ही प्रतिपादन होता है । आपका उत्तम तेज सूर्यसे भी बढ़कर है

अध्याय 129

श्लोक 30

संसक्तानां नित्यदा यत् करोषि शमं भ्रातृव्यान् यद्यनैषीः समस्तान् ।तस्माद् देवः शङ्करोऽस्यप्रमेयः सद्भिर्द्धर्मज्ञैः कथ्यसे सर्वनाथ

saṃsaktānāṃ nityadā yat karoṣi śamaṃ bhrātṛvyān yadyanaiṣīḥ samastān | tasmād devaḥ śaṅkaro'syaprameyaḥ sadbhirddharmajñaiḥ kathyase sarvanātha

हिन्दी अर्थ

आप भक्तजनोंको जो सदा सुख और शान्ति प्रदान करते हैं तथा शत्रुभाव रखनेवाले समस्त असुरोंको जो दण्ड देते हैं, उसके कारण आप अप्रमेय शक्तिसे सम्पन्न कल्याणकारी देवता श्र कहे जाते हैं । धर्मज्ञ संत आपको सर्वनाथ (सबके स्वामी या संरक्षक) कहते हैं

अध्याय 129

श्लोक 31

दत्तः प्रहारः कुलिशेन पूर्वं तवेशान सुरराज्ञातिवीर्य ।कण्ठे नैल्यं तेन ते यत् प्रवृत्तं तस्मात् ख्यातस्त्वं नीलकण्ठेति कल्पः

dattaḥ prahāraḥ kuliśena pūrvaṃ taveśāna surarājñātivīrya | kaṇṭhe nailyaṃ tena te yat pravṛttaṃ tasmāt khyātastvaṃ nīlakaṇṭheti kalpaḥ

हिन्दी अर्थ

अत्यन्त पराक्रमी ईशान ! पूर्वकालमें देवराज इन्द्रने आपके कण्ठमें जो वज्से प्रहार किया था और उससे जो वहाँ नील चिह्न बन गया था, उसके कारण आप नीलकण्ठ नामसे विख्यात हुए । आप समर्थ होते हुए भी दयावश ऐसे अपराध सह लेते हैं

अध्याय 129

श्लोक 32

यल्लिङ्गाङ्कं यच्च लोके भगाङ्कं सर्वं सोम त्वं स्थावरं जङ्गमं च ।प्राहुर्विप्रास्त्वां गुणिनं तत्त्वविज्ञास्तथा ध्येयामम्बिकां लोकधात्रीम्

yalliṅgāṅkaṃ yacca loke bhagāṅkaṃ sarvaṃ soma tvaṃ sthāvaraṃ jaṅgamaṃ ca | prāhurviprāstvāṃ guṇinaṃ tattvavijñāstathā dhyeyāmambikāṃ lokadhātrīm

हिन्दी अर्थ

उमासहित महे श्वर ! अत: संसारमें सब कुछ लिख और भगके चिह्मसे ही अड्ित है, अत: यह समस्त चराचर जगत्‌ आप दोनोंका ही स्वरूप है। तत्त्वज्ञ ब्राह्मण आपको गुणवान्‌ और ध्येयस्वरूपा लोकजननी अम्बिकाको त्रिगुणरूपा कहते हैं

अध्याय 129

श्लोक 33

वैदैर्गीता सा हि तत् त्वं प्रसूता यज्ञो दीक्षाणां योगिनां चातिरूपः ।नात्यद्भुतं त्वत्समं देव भूतं भूतं भव्यं भवदेवाथ नास्ति

vaidairgītā sā hi tat tvaṃ prasūtā yajño dīkṣāṇāṃ yogināṃ cātirūpaḥ | nātyadbhutaṃ tvatsamaṃ deva bhūtaṃ bhūtaṃ bhavyaṃ bhavadevātha nāsti

हिन्दी अर्थ

वे अम्बिका ही वेदोंमें * अजा' (माया) नामसे वर्णित हैं, वे ही महत्तत्वकी जननी हैं । आप यज्ञकी दीक्षा लेनेवाले यजमानों के द्रव्ययज्ञ तथा योगियोंके योगयज्ञ हैं । लौकिक रूपसे ऊपर उठे हुए दिव्य चिन्मय विग्रह धारी हैं । देव ! आपके समान अत्यन्त अद्भुत भूत (तत्त्व) भूत, वर्तमान और भविष्य कालमें भी दूसरा कोई नहीं है

अध्याय 129

श्लोक 34

अहं ब्रह्मा कपिलो योऽप्यनन्तः पुत्राः सर्वे ब्रह्मणश्चातिवीराः ।त्वत्तः सर्वे देवदेव प्रसूता एवं सर्वेशः कारणात्मा त्वमीड्य

ahaṃ brahmā kapilo yo'pyanantaḥ putrāḥ sarve brahmaṇaścātivīrāḥ | tvattaḥ sarve devadeva prasūtā evaṃ sarveśaḥ kāraṇātmā tvamīḍya

हिन्दी अर्थ

देवदेव ! मैं, ब्रह्मा, कपिल, शेषनाग और आन्तरिक शत्रुओं पर विजय पानेके कारण अत्यन्त वीर (सनक आदि) सभी ब्रह्मपुत्र-ये सब-के-सब आपसे ही उत्पन्न हुए हैं । इस प्रकार आप सबके ईश्वर और कारणरूप होनेके कारण स्तुतिके योग्य हैं '

अध्याय 129

श्लोक 35

इति संस्तूयमानस्तु भगवान् गोवृषध्वजः ।प्रसार्य दक्षिणं हस्तं नारायणमथाब्रवीत्

iti saṃstūyamānastu bhagavān govṛṣadhvajaḥ | prasārya dakṣiṇaṃ hastaṃ nārāyaṇamathābravīt

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीकृष्णने जब स्तुति की, तब भगवान्‌ वृषभध्वज शिवने अपना दाहिना हाथ फैलाकर भगवान्‌ नारायणदेवसे इस प्रकार कहा—

अध्याय 129

श्लोक 36

मनीषितानामर्थानां प्राप्तिस्ते सुरसत्तम ।पारिजातं च हर्तासि मा भूत् ते मनसो व्यथा

manīṣitānāmarthānāṃ prāptiste surasattama | pārijātaṃ ca hartāsi mā bhūt te manaso vyathā

हिन्दी अर्थ

अवश्य ले जाओगे ।इसके लिये तुम्हारे मनमें व्यथा नहीं होनी चाहिये

अध्याय 129

श्लोक 37

यथा मैनाकमाश्रित्य तपस्त्वमकरोः प्रभो ।तथा मम वरं कृष्ण संस्मृत्य स्थैर्यमाप्नुहि

yathā mainākamāśritya tapastvamakaroḥ prabho | tathā mama varaṃ kṛṣṇa saṃsmṛtya sthairyamāpnuhi

हिन्दी अर्थ

प्रभो ! श्रीकृष्ण ! जैसे मैनाकका आश्रय लेकर तुमने तप किया, उसी तरह मेरी ओरसे तुम्हें वर भी मिला। उस वरको याद करके तुम स्थिरता ( धैर्य) धारण करो

अध्याय 129

श्लोक 38

अवध्यस्त्वमजेयश्च मत्तः शूरतरस्तथा ।भवितासीत्यवोचं यत् तत् तथा न तदन्यथा

avadhyastvamajeyaśca mattaḥ śūratarastathā | bhavitāsītyavocaṃ yat tat tathā na tadanyathā

हिन्दी अर्थ

मैंने जो तुमसे कहा था कि तुम अवध्य, अजेय तथा मुझसे भी बढ़कर शूरवीर होओगे, वह बात उसी रूपमें सत्य होगी । उसे कोई अन्यथा नहीं कर सकता!

अध्याय 129

श्लोक 39

यश्च स्तवेन मां भक्त्या स्तोष्यतेऽमरसत्तम ।त्वया कृतेन धर्मज्ञ धर्मभाक् सम्भविष्यति ।समरे च जयं विष्णो प्राप्य पूजां तथोत्तमाम्

yaśca stavena māṃ bhaktyā stoṣyate'marasattama | tvayā kṛtena dharmajña dharmabhāk sambhaviṣyati | samare ca jayaṃ viṣṇo prāpya pūjāṃ tathottamām

हिन्दी अर्थ

धर्मज्ञ ! अमरश्रेष्ठ ! विष्णो ! जो भक्तिभावसे तुम्हारे द्वारा की हुई इस स्तुतिके द्वारा मेरा स्तवन करेगा, तरह समरभूमिमें विजय तथा उत्तम सम्मान पाकर धर्मका भागी होगा

अध्याय 129

श्लोक 40

बिल्वोदकेश्वरो नाम भविताहमिहानघ ।देवेश्वर त्वयास्थापि देव सिद्धोपयाचनः

bilvodakeśvaro nāma bhavitāhamihānagha | deveśvara tvayāsthāpi deva siddhopayācanaḥ

हिन्दी अर्थ

अनघ! देवेश्वर! देव! तुमने जो मेरी यहाँ स्थापना की है, उसके अनुसार मैं बिल्वोदकेश्वर नामसे विख्यात होऊँगा। यहाँ की हुई याचना मेरे द्वारा अवश्य सफल होगी

अध्याय 129

श्लोक 41

इहस्थोपौषितो विद्वान् भक्तिमान् मम केशव ।त्रिरात्रमीप्सिताँल्लोकान् गमिष्यति जनार्दन

ihasthopauṣito vidvān bhaktimān mama keśava | trirātramīpsitā~llokān gamiṣyati janārdana

हिन्दी अर्थ

केशव ! जनार्दन ! जो विद्वान्‌ पुरुष यहाँ उपवासपूर्वक रहकर मुझमें भक्तिभाव रखते हुए तीन रात उपवास करेगा, वह मनोवाज्छित लोकोंमें जायगा

अध्याय 129

श्लोक 42

अविन्ध्या नाम देशेऽस्मिन्गङ्गाचैव भविष्यति ।गङ्गास्नानसमं स्नानं मन्त्रतो भविता तथा

avindhyā nāma deśe'smingaṅgācaiva bhaviṣyati | gaṅgāsnānasamaṃ snānaṃ mantrato bhavitā tathā

हिन्दी अर्थ

इस प्रदेशमें अविन्ध्या नामसे प्रसिद्ध ज़रा प्रवाहित होगी । उसमें गड़ासम्बन्धी मन्त्रोच्चारणपूर्वक केया हुआ स्नान साक्षात्‌ गड़ा-स्रानके समान फलदायक होगा

अध्याय 129

श्लोक 43

षटपुरं नाम नगरं दानवानां जनार्दन ।अत्रान्तर्द्धरणीदेशे पराक्रम्य महाबलाः

ṣaṭapuraṃ nāma nagaraṃ dānavānāṃ janārdana | atrāntarddharaṇīdeśe parākramya mahābalāḥ

हिन्दी अर्थ

जनार्दन! यहाँ धरतीके भीतर दानवोंका षट्पुर' नामक नगर है, जहाँ पराक्रमपूर्वक महाबली नव निवास करते हैं

अध्याय 129

श्लोक 44

एते दैत्या दुरात्मानो जगतो देव कण्टकाः ।छन्ना वसन्ति गोविन्द सानावस्य महागिरेः

ete daityā durātmāno jagato deva kaṇṭakāḥ | channā vasanti govinda sānāvasya mahāgireḥ

हिन्दी अर्थ

देव! ये दुरात्मा दैत्य जगत्‌के लिये कण्टकरूप हैं । गोविन्द ! ये इस महापर्वतके शखरपर छिपे रहते हैं

अध्याय 129

श्लोक 45

अवध्या देवदेवानां वरेण ब्रह्मणोऽनघ ।मानुषान्तरितस्तस्मात् त्वमेताञ्जहि केशव

avadhyā devadevānāṃ vareṇa brahmaṇo'nagha | mānuṣāntaritastasmāt tvametāñjahi keśava

हिन्दी अर्थ

अनघ! ब्रह्माजीके दिये हुए वरके प्रभावसे ये दैत्य देवदेवोंके लिये अवध्य ं; अत: केशव! तुम मानव-शरीरकी आड़ लेकर इन पब दैत्योंको मार डालो

अध्याय 129

श्लोक 46

एवमुक्त्वा महादेवस्तत्रैवान्तरधीयत ।परिष्वज्य महात्मानं वासुदेवं जनाधिप

evamuktvā mahādevastatraivāntaradhīyata | pariṣvajya mahātmānaṃ vāsudevaṃ janādhipa

हिन्दी अर्थ

जनेश्वर ! ऐसा कहकर पहादेवजी महात्मा वासुदेवको हृदयसे लगाकर वहीं पन्तर्धान हो गये

अध्याय 129

श्लोक 47

ततो याते महादेवे प्रभातायां नराधिप ।तस्यां निशायां गोविन्दो भूयः पर्वतमब्रवीत्

tato yāte mahādeve prabhātāyāṃ narādhipa | tasyāṃ niśāyāṃ govindo bhūyaḥ parvatamabravīt

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर ! महादेवजीके चले जानेपर नब रात बीती और प्रभातकाल आया, तब भगवान्‌ पविन्दने पुन: उस पर्वतसे कहा—

अध्याय 129

श्लोक 48

तवाधः पर्वतश्रेष्ठ निवसन्ति महासुराः ।अवध्या देवदेवानां वरेण ब्रह्मणः पुरा

tavādhaḥ parvataśreṣṭha nivasanti mahāsurāḥ | avadhyā devadevānāṃ vareṇa brahmaṇaḥ purā

हिन्दी अर्थ

पर्वतश्रेष्ठ ! म्हारे नीचे बड़े-बड़े असुर निवास करते हैं, जो पूर्वकालमें हह्माजीका वर पानेके कारण देवाधिदेवोंके लिये भी नवध्य हैं

अध्याय 129

श्लोक 49

निर्गमिष्यन्ति ते नैव मया रुद्धा महाबलाः ।द्वारे निरुद्धे तत्रैव विनङ्क्ष्यन्ति ममाज्ञया

nirgamiṣyanti te naiva mayā ruddhā mahābalāḥ | dvāre niruddhe tatraiva vinaṅkṣyanti mamājñayā

हिन्दी अर्थ

मैंने उन महाबली दैत्योंका द्वार बंद ररके उन्हें अवरुद्ध कर दिया है। अब वे नहीं निकल फकेंगे। मेरी आज्ञासे द्वार अवरुद्ध हो जानेपर वहीं नष्ट गो जायूँगे

अध्याय 129

श्लोक 50

त्वयि सन्निहितश्चाहं भविष्यामि महागिरे ।अधिष्ठाय महाघोरान् निवत्स्यामि च पर्वत

tvayi sannihitaścāhaṃ bhaviṣyāmi mahāgire | adhiṣṭhāya mahāghorān nivatsyāmi ca parvata

हिन्दी अर्थ

महागिरे! मैं सदा तुमपर निवास करूँगा । रवत! उन महाभयानक असुरोंको दबाकर मैं यहीं हूँगा

अध्याय 129

श्लोक 51

आरुह्य मूर्ध्नि मद्रूपं दृष्ट्वा पर्वतसत्तम ।गोसहस्रप्रदानस्य फलं प्राप्स्यति शाश्वतम्

āruhya mūrdhni madrūpaṃ dṛṣṭvā parvatasattama | gosahasrapradānasya phalaṃ prāpsyati śāśvatam

हिन्दी अर्थ

पर्वतप्रवर! जो इस पर्वतके शिखरपर मारूढ़ हो मेरे अर्चाविग्रहका दर्शन करेगा, वह सहस्तर दानका शाश्वत (अक्षय) फल प्रात करेगा

अध्याय 129

श्लोक 52

त्वत्तोऽश्मभिश्च प्रतिमां कारयित्वा हि भक्तितः ।शुश्रूषयन्ति ये नित्यं मम यास्यन्ति ते गतिम्

tvatto'śmabhiśca pratimāṃ kārayitvā hi bhaktitaḥ | śuśrūṣayanti ye nityaṃ mama yāsyanti te gatim

हिन्दी अर्थ

मो लोग तुम्हारे प्रस्तरोंसे मेरी प्रतिमा बनवाकर प्रतिदिन क्तिपूर्वक उसकी सेवा करेंगे, वे मेरी गतिको प्राप्त ंगे'

अध्याय 129

श्लोक 53

इति तं पर्वतं कृष्णो वरदोऽनुगृहीतवान् ।तदाप्रभृति देवेशस्तत्र सन्निहितोऽच्युतः

iti taṃ parvataṃ kṛṣṇo varado'nugṛhītavān | tadāprabhṛti deveśastatra sannihito'cyutaḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार वरदायक श्रीकृष्णने उस पर्वतपर ननुग्रह किया और तभीसे देवेश्वर अच्युत्त वहाँ निवास रने लगे

अध्याय 129

श्लोक 54

पाषाणैः प्रतिमां तात कारयित्वा च कौरव ।शुश्रूषन्ति कृतात्मानो विष्णुलोकाभिकाङ्क्षिणः

pāṣāṇaiḥ pratimāṃ tāta kārayitvā ca kaurava | śuśrūṣanti kṛtātmāno viṣṇulokābhikāṅkṣiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

तात कुरुनन्दन ! शुद्ध अन्तःकरणवाले पुरुष विष्णु- लोककी इच्छा रखते हुए पारियात्रके पत्थरोंसे भगवान्‌की प्रतिमा बनवाकर सदा उसकी सेवा करते हैं

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.