Harivamsha Purana
128
अध्याय 128 / 318

Parva 2, Adhyāya 73

104 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ104 श्लोक

अध्याय 128

श्लोक 1

इन्द्रश्रीकृष्णयोः, जयन्तप्रद्युम्नयोः, प्रवरसात्यक्योः एवं ऐरावतगरुडयोः युद्धं अथ विष्णुर्महातेजा मुहूर्ताभ्युदिते रवौ ।मृगयाव्यपदेशेन ययौ रैवतकं गिरिम्

indraśrīkṛṣṇayoḥ, jayantapradyumnayoḥ, pravarasātyakyoḥ evaṃ airāvatagaruḍayoḥ yuddhaṃ atha viṣṇurmahātejā muhūrtābhyudite ravau | mṛgayāvyapadeśena yayau raivatakaṃ girim

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर सूर्योदयके बाद दो घड़ी बीत जानेपर महातेजस्वी श्रीकृष्ण हिंसक जन्तुओंका शिकार खेलनेके बहाने रैवतक पर्वतपर गये

अध्याय 128

श्लोक 2

आरोप्यैकरथे देवः सात्यकिं नरपुङ्गवम् ।प्रद्युम्नमनुगच्छेति प्रोक्त्वा कुरुकुलोद्वह

āropyaikarathe devaḥ sātyakiṃ narapuṅgavam | pradyumnamanugaccheti proktvā kurukulodvaha

श्लोक 2–4 का हिन्दी अर्थ

कुरुकुलभूषण ! भगवान्‌ श्रीकृष्णने एक रथपर नस्श्रेष्ठ सात्यकिको चढ़ाकर और प्रद्युम्रको भी अपने पीछे आनेकी आज्ञा देकर जब रैवतक पर्वतपर पहुँचे, तब अपने सारथि दारुकसे बोले-'सौम्य दारुक! तुम मेरे इस रथको लेकर यहीं आधे दिनतक इन घोड़ोंको काबूमें रखते हुए मेरी प्रतीक्षा करो। सूतशिरोमणे ! मैं रथके द्वारा ही द्वारकापुरीमें प्रवेश करूँगा'

अध्याय 128

श्लोक 3

रैवतं च गिरिं देवो गत्वा दारुकमब्रवीत् ।मदीयं रथमेनं त्वं ग्रहायेहैव दारुक

raivataṃ ca giriṃ devo gatvā dārukamabravīt | madīyaṃ rathamenaṃ tvaṃ grahāyehaiva dāruka

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 128

श्लोक 4

प्रतिपालय मां सौम्य दिनार्द्धे वारयन् हरीन् ।रथेनैव प्रवेष्टाहं द्वारकां सूतसत्तम

pratipālaya māṃ saumya dinārddhe vārayan harīn | rathenaiva praveṣṭāhaṃ dvārakāṃ sūtasattama

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 128

श्लोक 5

इति सन्दिश्य भगवानारुरोह जयोद्यतः ।तार्क्ष्यं ससात्यको धीमानप्रमेयपराक्रमः

iti sandiśya bhagavānāruroha jayodyataḥ | tārkṣyaṃ sasātyako dhīmānaprameyaparākramaḥ

हिन्दी अर्थ

दारुकको यह संदेश देकर विजयके लिये उद्यत हुए अप्रमेय पराक्रमी बुद्धिमानू भगवान्‌ श्रीकृष्ण सात्यकिके साथ गरुड़पर आरूढ़ हुए

अध्याय 128

श्लोक 6

पृथग् रथेन कौरव्य प्रद्युम्नः शत्रुसूदनः ।आकाशगामिना राजन्पृष्ठतः कृष्णमन्वयात्

pṛthag rathena kauravya pradyumnaḥ śatrusūdanaḥ | ākāśagāminā rājanpṛṣṭhataḥ kṛṣṇamanvayāt

हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन ! राजन्‌! शत्रुसूदन प्र्युप्न भी एक पृथक आकाशचारी रथके द्वारा श्रीकृष्णके पीछे-पीछे गये

अध्याय 128

श्लोक 7

निमेषान्तरमात्रेण नन्दनं काननं हरिः ।देवोद्यानं ययौ धीमान् पारिजातजिहीर्षया

nimeṣāntaramātreṇa nandanaṃ kānanaṃ hariḥ | devodyānaṃ yayau dhīmān pārijātajihīrṣayā

हिन्दी अर्थ

बुद्धिमान्‌ श्रीकृष्ण पारिजातको हर लेनेकी इच्छासे पलक मारते-मारते देवताओंके उद्यान नन्दनवनमें जा पहुँचे

अध्याय 128

श्लोक 8

ददर्श तत्र भगवान् देवयोधान् दुरासदान् ।नानायुधधरान् वीरान् नन्दनस्थानधोक्षजः

dadarśa tatra bhagavān devayodhān durāsadān | nānāyudhadharān vīrān nandanasthānadhokṣajaḥ

श्लोक 8–11 का हिन्दी अर्थ

वहाँ भगवान्‌ अधोक्षजने नन्दनवनमें स्थित हुए देवताओंके दुर्जय वीर योद्धाओंको देखा, जो नाना प्रकारके आयुध धारण किये हुए थे। भरतनन्दन! सत्पुरुषोंके आश्रयदाता महाबली श्रीकृष्णने उन योद्धाओंके देखते-देखते विशेष प्रयत्नके बिना ही पारिजातको उखाड़कर पक्षिराज गरुड़की पीठपर रख लिया। पारिजात-वृक्ष मूर्तिमान्‌ होकर श्रीकृष्णकी सेवामें उपस्थित हुआ। भारत! उस समय वसुदेवनन्दन महात्मा केशवने पारिजातको सान्त्वना देते हुए कहा-' वृक्ष! तुम डरो मत'

अध्याय 128

श्लोक 9

तेषां सम्पश्यतामेव पारिजातं महाबलः ।उत्पाट्यारोपयामास पारिजातं सतां गतिः

teṣāṃ sampaśyatāmeva pārijātaṃ mahābalaḥ | utpāṭyāropayāmāsa pārijātaṃ satāṃ gatiḥ

अर्थ श्लोक 8 के साथ

अध्याय 128

श्लोक 10

गरुडं पक्षिराजानमयत्नेनैव भारत ।उपस्थितो विग्रहवान् पारिजातः स केशवम्

garuḍaṃ pakṣirājānamayatnenaiva bhārata | upasthito vigrahavān pārijātaḥ sa keśavam

अर्थ श्लोक 8 के साथ

अध्याय 128

श्लोक 11

सान्त्वितो वासुदेवेन पारिजातश्च भारत ।उक्तश्च वृक्ष मा भैस्त्वं केशवेन महात्मना

sāntvito vāsudevena pārijātaśca bhārata | uktaśca vṛkṣa mā bhaistvaṃ keśavena mahātmanā

अर्थ श्लोक 8 के साथ

अध्याय 128

श्लोक 12

तं प्रस्थितं तरुं दृष्ट्वा पारिजातमधोक्षजः ।अमरावतीं पुरीं श्रेष्ठां ततश्चक्रे प्रदक्षिणाम्

taṃ prasthitaṃ taruṃ dṛṣṭvā pārijātamadhokṣajaḥ | amarāvatīṃ purīṃ śreṣṭhāṃ tataścakre pradakṣiṇām

हिन्दी अर्थ

पारिजात-वृक्षको अपने साथ प्रस्थान करते देख भगवान्‌ अधोक्षजने श्रेष्ठ अमरावतीपुरीकी परिक्रमा की

अध्याय 128

श्लोक 13

ते तु नन्दनगोप्तारः पारिजातो द्रुमोत्तमः ।ह्रियतीति महेन्द्राय गत्वा नृप शशंसिरे

te tu nandanagoptāraḥ pārijāto drumottamaḥ | hriyatīti mahendrāya gatvā nṛpa śaśaṃsire

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! नन्दनवनके उन रक्षकोंने जाकर महेन्द्रसे कहा—' देवराज ! वृक्षोंमें उत्तम पारिजातका अपहरण हो रहा है'

अध्याय 128

श्लोक 14

अथैरावतमारुह्य निर्ययौ पाकशासनः ।जयन्तेन रथस्थेन पृष्ठतोऽनुगतः प्रभुः

athairāvatamāruhya niryayau pākaśāsanaḥ | jayantena rathasthena pṛṣṭhato'nugataḥ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

यह सुनकर प्रभावशाली पाकशासन इन्द्र ऐरावतपर आरूढ़ हो निकले। उनके पीछे-पीछे रथपर बैठा हुआ जयन्त भी आया

अध्याय 128

श्लोक 15

पूर्वमभ्यागतं द्वारं केशवं शत्रुनाशनम् ।दृष्ट्वोवाच प्रवृत्तं भोः किमिदं मधुसूदन

pūrvamabhyāgataṃ dvāraṃ keśavaṃ śatrunāśanam | dṛṣṭvovāca pravṛttaṃ bhoḥ kimidaṃ madhusūdana

हिन्दी अर्थ

जब शत्रुनाशन केशव इन्द्रपुरीके पूर्वद्वारपर आये, तब उन्हें देखकर इन्द्रने कहा—' हे मधुसूदन ! यह तुमने क्या किया है ?'

अध्याय 128

श्लोक 16

प्रणम्य गरुडस्थोऽथ केशवः शक्रमब्रवीत् ।वध्वास्ते पुण्यकार्याय नीयतेऽयं वरद्रुमः

praṇamya garuḍastho'tha keśavaḥ śakramabravīt | vadhvāste puṇyakāryāya nīyate'yaṃ varadrumaḥ

हिन्दी अर्थ

तब गरुड़पर बैठे हुए केशव इन्द्रको प्रणाम करके बोले-'देवराज ! आपकी बहूरानीके पुण्यकार्यका सम्पादन करनेके लिये यह श्रेष्ठ वृक्ष यहाँसे ले जाया जाता है'

अध्याय 128

श्लोक 17

तमुवाच ततः शक्रो मा मैवं पुष्करेक्षण ।अयोधयित्वा न तरुर्नयितव्यस्त्वयाच्युत

tamuvāca tataḥ śakro mā maivaṃ puṣkarekṣaṇa | ayodhayitvā na tarurnayitavyastvayācyuta

हिन्दी अर्थ

तब इन्द्रने उनसे कहा—कमलनयन अच्युत! नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। बिना युद्ध किये तुम्हें इस वृक्षको नहीं ले जाना चाहिये

अध्याय 128

श्लोक 18

प्रहरस्व महाबाहो प्रथमं मयि केशव ।प्रतिज्ञा सफला तेऽस्तु मुक्त्वा कौमोदकी मयि

praharasva mahābāho prathamaṃ mayi keśava | pratijñā saphalā te'stu muktvā kaumodakī mayi

हिन्दी अर्थ

महाबाहु केशव! पहले मुझपर प्रहार करो। मेरे ऊपर कौमोदकी गदा छोड़कर तुम्हारी प्रतिज्ञा सफल हो'

अध्याय 128

श्लोक 19

ततः कृष्णः शरैस्तीक्ष्णैर्देवराजगजोत्तमम् ।बिभेदाशनिसङ्काशैः प्रहसन्निव भारत

tataḥ kṛṣṇaḥ śaraistīkṣṇairdevarājagajottamam | bibhedāśanisaṅkāśaiḥ prahasanniva bhārata

हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन ! तब श्रीकृष्णने हँसते हुए-से अपने वज़सदृश तीखे बाणोंद्वारा देवराजके गजश्रेष्ठ ऐरावतको बींधना आरम्भ किया

अध्याय 128

श्लोक 20

विव्याध गरुडं वज्री दिव्यैः शरवरैस्तथा ।बाणांश्चिच्छेद सहसा केशवस्य तरस्विनः

vivyādha garuḍaṃ vajrī divyaiḥ śaravaraistathā | bāṇāṃściccheda sahasā keśavasya tarasvinaḥ

हिन्दी अर्थ

फिर वद्धारी इन्द्रने भी अपने दिव्य उत्तम बाणोंद्वारा गरुड़को घायल किया और वेगशाली केशवके बाणोंको सहसा काट डाला

अध्याय 128

श्लोक 21

यान् यान् मुमोच देवेन्द्रस्तांस्तांश्चिच्छेद माधवः ।माधवेन प्रयुक्तांश्च चिच्छेद बलवृत्रहा

yān yān mumoca devendrastāṃstāṃściccheda mādhavaḥ | mādhavena prayuktāṃśca ciccheda balavṛtrahā

हिन्दी अर्थ

देवेन्द्रने जो-जो बाण छोड़े, उन्हें माधवने काट दिया और माधवके चलाये हुए बाणोंको बल-वृत्रविनाशक इन्द्रने खण्डित कर दिया

अध्याय 128

श्लोक 22

महेन्द्रस्य च शब्देन धनुषः कुरुनन्दन ।शार्ङ्गस्य च निनादेन मुमुहुः स्वर्गवासिनः

mahendrasya ca śabdena dhanuṣaḥ kurunandana | śārṅgasya ca ninādena mumuhuḥ svargavāsinaḥ

हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन! इन्द्रधनुष तथा शाधनुषकी टड्टारोंसे सारे स्वर्गवासी मोहित-से हो गये

अध्याय 128

श्लोक 23

तयोर्वर्तति सङ्ग्रामे गरुडस्थं महाबलः ।पारिजातं जयन्तोऽथ हर्तुमभ्युद्यतो बली

tayorvartati saṅgrāme garuḍasthaṃ mahābalaḥ | pārijātaṃ jayanto'tha hartumabhyudyato balī

हिन्दी अर्थ

जब उन दोनोंका संग्राम चल रहा था, उसी समय महापराक्रमी एवं बलशाली जयन्त गरुड़की पीठपर रखे हुए पारिजातको हर ले जानेके लिये उद्यत हुआ

अध्याय 128

श्लोक 24

प्रद्युम्नमथ कंसघ्नो वारयेति तदाब्रवीत् ।ततस्तं वारयामास रौक्मिणेयः प्रतापवान्

pradyumnamatha kaṃsaghno vārayeti tadābravīt | tatastaṃ vārayāmāsa raukmiṇeyaḥ pratāpavān

हिन्दी अर्थ

तब कंसविनाशन श्रीकृष्णने प्रद्युम्नसे कहा—'रोको उसे।' आज्ञा पाकर प्रतापी रुक्मिणीकुमारने जयन्तको रोक दिया

अध्याय 128

श्लोक 25

जयन्तो जयतां श्रेष्ठो रौक्मिणेयमथेषुभिः ।सर्वगात्रेषु विहसन्नाजघान रथे स्थितः

jayanto jayatāṃ śreṣṭho raukmiṇeyamatheṣubhiḥ | sarvagātreṣu vihasannājaghāna rathe sthitaḥ

हिन्दी अर्थ

विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ जयन्त उस समय रथपर बैठा था। उसने हँसते हुए बाण मारकर प्रद्युप्रके समस्त अज्लोंमें चोट पहुँचायी

अध्याय 128

श्लोक 26

रथस्थ एव रथिनं कामस्तु कमलेक्षणः ।ऐन्द्रिमभ्यर्दयामास बाणैराशीविषोपमैः

rathastha eva rathinaṃ kāmastu kamalekṣaṇaḥ | aindrimabhyardayāmāsa bāṇairāśīviṣopamaiḥ

हिन्दी अर्थ

कामावतार कमलनयन प्र्यु्म भी रथपर ही बैठे थे। उन्होंने विषधर सर्पके समान भयंकर बाणोंद्वारा रथारूढ़ इन्द्रकुमार जयन्तकों पीड़ित कर दिया

अध्याय 128

श्लोक 27

स सन्निपातस्तुमुलो बभूव कुरुनन्दन ।जयन्तस्य च वीरस्य रौक्मिणेयस्य चोभयोः

sa sannipātastumulo babhūva kurunandana | jayantasya ca vīrasya raukmiṇeyasya cobhayoḥ

हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन! जयन्त तथा वीर रुक्मिणीकुमार उन दोनोंका वह युद्ध बड़ा भयंकर हुआ

अध्याय 128

श्लोक 28

कृतप्रतिकृतं युद्धे चक्रतुस्तौ महाबलौ ।महेन्द्रोपेन्द्रतनयौ जगत्यस्त्रभृतां वरौ

kṛtapratikṛtaṃ yuddhe cakratustau mahābalau | mahendropendratanayau jagatyastrabhṛtāṃ varau

हिन्दी अर्थ

एक महेन्द्रका बेटा था तो दूसरा उपेन्द्रका । दोनों ही संसारके अस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ एवं महान्‌ बलशाली थे। अत: दोनों एक-दूसरेके छोड़े हुए अस्त्र-शस्त्रोंका निवारण कर देते थे

अध्याय 128

श्लोक 29

देवाश्च मुनयश्चैव ददृशुर्विस्मयान्विताः ।तं सङ्ग्रामं महाघोरं सिद्धाश्चैव सचारणाः

devāśca munayaścaiva dadṛśurvismayānvitāḥ | taṃ saṅgrāmaṃ mahāghoraṃ siddhāścaiva sacāraṇāḥ

हिन्दी अर्थ

देवता, मुनि, सिद्ध और चारण सभी आश्चर्यचकित होकर उस महाभयंकर संग्रामको देखने लगे

अध्याय 128

श्लोक 30

ततस्तु प्रवरो नाम देवदूतो महाबलः ।पारिजातं पुनर्हर्तुमियेष कुरुनन्दन

tatastu pravaro nāma devadūto mahābalaḥ | pārijātaṃ punarhartumiyeṣa kurunandana

हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन! तब प्रवर नामक महाबली देवदूतने पुन: पारिजात-वृक्षको हर ले जानेकी इच्छा की

अध्याय 128

श्लोक 31

सखा स देवराजस्य महास्त्रविदरिन्दमः ।अवध्यो वरदानेन ब्रह्मणः कुरुनन्दन

sakhā sa devarājasya mahāstravidarindamaḥ | avadhyo varadānena brahmaṇaḥ kurunandana

हिन्दी अर्थ

+ द्डश कुरुकुलनन्दन! शत्रुओंका दमन करनेवाला प्रवर पहानू अस्त्रवेत्ता तथा देवराज इन्द्रका सखा था। वह प्रह्माजीके वरदानसे अवध्य हो गया था

अध्याय 128

श्लोक 32

ब्राह्मणस्तपसा सिद्धौ जम्बूद्वीपाद् दिवं गतः ।स्वशक्त्या नृप संयातः सखित्वं बलघातिना

brāhmaṇastapasā siddhau jambūdvīpād divaṃ gataḥ | svaśaktyā nṛpa saṃyātaḥ sakhitvaṃ balaghātinā

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर ! तरह तप:सिद्ध ब्राह्मण जम्बूदीपसे स्वर्गमें गया था और अपनी शक्तिके प्रभावसे बलघाती इन्द्रका मित्र हो गया था

अध्याय 128

श्लोक 33

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य कृष्णः सात्यकिमब्रवीत् ।अत्रस्थ एव प्रवरं शरैर्वारय सात्यके

tamāpatantaṃ samprekṣya kṛṣṇaḥ sātyakimabravīt | atrastha eva pravaraṃ śarairvāraya sātyake

हिन्दी अर्थ

उसे आते देख श्रीकृष्णने सात्यकिसे कहा—सात्यके! तुम यहीं बैठे-बैठे अपने बाणोंद्वारा इस प्रवरको रोको

अध्याय 128

श्लोक 35

ततः षष्ट्या रथेषूणां गरुडस्थं द्विजस्तदा ।आजघान महाबाहो सात्यकिं प्रवरो भृशम्

tataḥ ṣaṣṭyā ratheṣūṇāṃ garuḍasthaṃ dvijastadā | ājaghāna mahābāho sātyakiṃ pravaro bhṛśam

हिन्दी अर्थ

महाबाहो ! तदनन्तर प्रवर नामक ब्राह्मणने साठ बाणोंद्वारा रुड्पर बैठे हुए सात्यकिको गहरी चोट पहुँचायी

अध्याय 128

श्लोक 36

शिनेर्नप्ता धनुस्तस्य क्षिपतः सायकान् नृप ।चिच्छेद पुरुषव्याघ्रो वचनं चेदमब्रवीत्

śinernaptā dhanustasya kṣipataḥ sāyakān nṛpa | ciccheda puruṣavyāghro vacanaṃ cedamabravīt

हिन्दी अर्थ

रिधर ! तब पुरुषसिंह शिनि-पौत्र सात्यकिने बाण चलाते हुए ब्राह्मणके धनुष और बाणोंको भी काट डाला और रस प्रकार कहा—

अध्याय 128

श्लोक 37

ब्राह्मणो नाभिहन्तव्यस्तिष्ठ तिष्ठ स्ववर्त्मनि ।अवध्या यादवानां हि स्वापराधेऽपि हि द्विजाः

brāhmaṇo nābhihantavyastiṣṭha tiṣṭha svavartmani | avadhyā yādavānāṃ hi svāparādhe'pi hi dvijāḥ

हिन्दी अर्थ

प्रवर ! ब्राह्मण मेरे द्वारा मारे जाने योग्य नहीं हैं; अत: तुम अपने मार्गपर डटे रहो। अपना अपराध करनेपर भी ब्राह्मणोंको यदुवंशी वीर भवध्य ही मानते हैं'

अध्याय 128

श्लोक 38

प्रवरस्तु प्रहस्यैनमुवाच कुरुनन्दन ।अलं क्षान्त्या नृणां शूर युद्ध्य सर्वात्मना रणे

pravarastu prahasyainamuvāca kurunandana | alaṃ kṣāntyā nṛṇāṃ śūra yuddhya sarvātmanā raṇe

हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन! तब प्रवरने रँसकर सात्यकिसे कहा—' मनुष्योंमें शूर सात्यके ! क्षमा करनेकी आवश्यकता नहीं है। तुम रणभूमिमें सारी शक्ति लगाकर युद्ध करो

अध्याय 128

श्लोक 39

जामदग्न्यस्य रामस्य शिष्योऽहमपि यादव ।नामतः प्रवरो नाम सखा शक्रस्य धीमतः

jāmadagnyasya rāmasya śiṣyo'hamapi yādava | nāmataḥ pravaro nāma sakhā śakrasya dhīmataḥ

हिन्दी अर्थ

यादववीर! मैं भी जमदग्निनन्दन परशुरामका शिष्य हूँ। मेरा नाम प्रवर है और मैं बुद्धिमान्‌ इन्द्रका सखा हूँ

अध्याय 128

श्लोक 40

न देवा योद्धुमिच्छन्ति मन्यन्तो मधुसूदनम् ।आनृण्यं सौहृदस्याहमधिगन्तास्मि माधव

na devā yoddhumicchanti manyanto madhusūdanam | ānṛṇyaṃ sauhṛdasyāhamadhigantāsmi mādhava

हिन्दी अर्थ

मधुवंशी वीर ! रैवतालोग मधुसूदनका सम्मान करते हैं; अत: उनसे पुद्ध करना नहीं चाहते हैं; इसलिये मैं आज इन्द्रके पौहार्दका ऋण चुकानेके लिये आया हूँ!

अध्याय 128

श्लोक 41

ततस्तयोस्तदा रौद्रः सङ्ग्रामो ववृधे नृप ।अस्त्रैर्दिव्यैर्नरव्याघ्र शैनेयद्विजमुख्ययोः

tatastayostadā raudraḥ saṅgrāmo vavṛdhe nṛpa | astrairdivyairnaravyāghra śaineyadvijamukhyayoḥ

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर ! पुरुषसिंह ! तदनन्तर सात्यकि और उस श्रेष्ठ ब्राह्मणमें उस समय दिव्य अस्त्रोंद्वारा बड़ा भयंकर संग्राम हुआ, तो बढ़ता ही चला गया

अध्याय 128

श्लोक 42

द्यौश्चचाल तदा राजन् द्युचराश्च सहस्रशः ।तस्मिन् वर्तति सङ्ग्रामे तेषामतिमहात्मनाम्

dyauścacāla tadā rājan dyucarāśca sahasraśaḥ | tasmin vartati saṅgrāme teṣāmatimahātmanām

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! उन अत्यन्त पहात्मा वीरोंका वह संग्राम चालू होनेपर उस समय '्वर्गलोक विचलित हो उठा। सहसख्रों आकाशचारी ाणी कम्पित हो उठे

अध्याय 128

श्लोक 43

नातिशिष्ये रणे कार्ष्णिरैन्द्रिमस्त्रभृतां वरम् ।ऐन्द्रिः कार्ष्णि महात्मानं मायिनं शूरसत्तमम्

nātiśiṣye raṇe kārṣṇiraindrimastrabhṛtāṃ varam | aindriḥ kārṣṇi mahātmānaṃ māyinaṃ śūrasattamam

हिन्दी अर्थ

रणभूमिमें श्रीकृष्णकुमार द्युम्न अस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ जयन्तसे आगे न बढ़ सके। सी प्रकार इन्द्रकुमार जयन्त भी शूरशिरोमणि मायाविशारद श्रीकृष्णकुमार महात्मा प्रद्युप्नसे अधिक पराक्रम न दिखा पका

अध्याय 128

श्लोक 44

हन्त गृह्ण प्रतीच्छेति तावुभौ योधसत्तमौ ।युयुधाते नरश्रेष्ठ परस्परजयैषिणौ

hanta gṛhṇa pratīccheti tāvubhau yodhasattamau | yuyudhāte naraśreṣṭha parasparajayaiṣiṇau

हिन्दी अर्थ

नर्श्रेष्ठ! परस्पर एक-दूसरेको जीतनेकी च्छावाले वे दोनों श्रेष्ठ योद्धा ' अरे, यह लो, दो मेरे इस पहारका उत्तर' आदि बातें कहते हुए युद्ध करने लगे

अध्याय 128

श्लोक 45

अथ शार्ङ्गायुधसुतं शचीपुत्रः प्रतापवान् ।विभाष्याभ्यहनद्राजन् दिव्येनास्त्रेण सत्वरः

atha śārṅgāyudhasutaṃ śacīputraḥ pratāpavān | vibhāṣyābhyahanadrājan divyenāstreṇa satvaraḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! तदनन्तर प्रतापी शचीपुत्र जयन्तने श्रीकृष्ण- कुमारको सम्बोधित करके उनपर बड़ी उतावलीके साथ दिव्यास्त्रद्वारा आघात किया

अध्याय 128

श्लोक 46

सोऽस्त्रं तदभिदीप्यन्तमापतन्तं शितैः शरैः ।तस्तम्भे बाणजालेन तदद्भुतमिवाभवत्

so'straṃ tadabhidīpyantamāpatantaṃ śitaiḥ śaraiḥ | tastambhe bāṇajālena tadadbhutamivābhavat

हिन्दी अर्थ

अपनी ओर आते हुए उस तेजस्वी अस्त्रको पैने बाणोंका जाल-सा फैलाकर प्र्ुप्नने बीचमें ही रोक दिया। वह एक अद्धुत-सी बात हुई

अध्याय 128

श्लोक 47

ततस्तद् दीप्यमानं तु पपात रणमूर्द्धनि ।रौक्मिणेयस्य कौरव्य घोरं दानवमर्दनम्

tatastad dīpyamānaṃ tu papāta raṇamūrddhani | raukmiṇeyasya kauravya ghoraṃ dānavamardanam

हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन! तदनन्तर युद्धके मुहानेपर रक्मिणीनन्दन प्रद्युप् के लिये भी दुस्सह प्रतीत होनेवाला वह दीप्िमान्‌ दानव-मर्दन दिव्यास्त्र उनके रथपर गिरा

अध्याय 128

श्लोक 48

तेनास्त्रेण रथो दग्धः प्रद्युम्नस्य महात्मनः ।नादहत् तत् सुघोरं तं रौक्मिणेयं नराधिप

tenāstreṇa ratho dagdhaḥ pradyumnasya mahātmanaḥ | nādahat tat sughoraṃ taṃ raukmiṇeyaṃ narādhipa

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर ! उस अस्त्रके द्वारा महात्मा प्रद्युप्रका रथ जलकर भस्म हो गया तो भी वह भयंकर अस्त्र रुक्मिणीकुमार प्र्ुप्रको दग्ध न कर सका

अध्याय 128

श्लोक 49

दहत्यग्निं न खल्वग्निरुद्धतोऽपि विशाम्पते ।दग्धाद् रथान्महाबाहु रौक्मिणेयः प्रचक्रमे

dahatyagniṃ na khalvagniruddhato'pi viśāmpate | dagdhād rathānmahābāhu raukmiṇeyaḥ pracakrame

हिन्दी अर्थ

प्रजानाथ! अग्नि कितना ही प्रचण्ड रूप क्यों न धारण करे, वह दूसरी अग्निको नहीं जला सकती (उसी तरह उस अस्त्रकी अग्निसे आग्नितुल्य तेजस्वी रुक्मिणीकुमार प्रद्युम्रके शरीरकों कोई हानि नहीं पहुँची ) । महाबाहु रुक्मिणीनन्दन प्र्ुम्न उस जले हुए रथको छोड़कर अलग हो गये

अध्याय 128

श्लोक 50

अथ नारायणसुतो विरथो रथिनां वरः ।स्थितो धनुष्मानाकाशे जयन्तमिदमब्रवीत्

atha nārāyaṇasuto viratho rathināṃ varaḥ | sthito dhanuṣmānākāśe jayantamidamabravīt

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर रथहीन हुए रथियोंमें श्रेष्ठ नारायणकुमार प्रद्युम्न आकाशमें धनुष लिये खड़े हो गये और जयन्तसे इस प्रकार बोले—

अध्याय 128

श्लोक 51

महेन्द्रपुत्र दिव्यं त्वं यदस्त्रं मुक्तवानसि ।नाहमीदृशरूपाणां शक्यो हन्तुं शतैरपि

mahendraputra divyaṃ tvaṃ yadastraṃ muktavānasi | nāhamīdṛśarūpāṇāṃ śakyo hantuṃ śatairapi

हिन्दी अर्थ

महेन्द्रकुमार ! तुमने मेरे ऊपर जो देव्यास्त्र छोड़ा है ऐसे सैकड़ों दिव्यास्त्र मुझे मार नहीं पकते हैं

अध्याय 128

श्लोक 52

प्रयत्नं कुरु शिक्षाणां यत्नं मेऽद्य प्रदर्शय ।नास्ति मेऽतिशयं कर्ता सङ्ग्रामेऽमरनन्दन

prayatnaṃ kuru śikṣāṇāṃ yatnaṃ me'dya pradarśaya | nāsti me'tiśayaṃ kartā saṅgrāme'maranandana

हिन्दी अर्थ

अमरनन्दन ! तुम अपनी शिक्षाके अनुसार प्रयत्न करो और सारा यत्र आज मुझे दिखाओ। संग्राममें पुझसे बढ़कर पराक्रम प्रकट करनेवाला कोई वीर नहीं है

अध्याय 128

श्लोक 53

आसीन्मे साध्वसं दृष्ट्वा रथस्थं त्वां धृतायुधम् ।बिभेमि तव नेदानीं युद्धे दृष्टबलोऽबलम्

āsīnme sādhvasaṃ dṛṣṭvā rathasthaṃ tvāṃ dhṛtāyudham | bibhemi tava nedānīṃ yuddhe dṛṣṭabalo'balam

हिन्दी अर्थ

तुम रथपर बैठकर हाथमें आयुध लिये जब पहाँ आये थे, तब तुम्हें देखकर मुझे कुछ भय हुआ था; परंतु अब युद्धमें तुम्हारा सारा बल मैंने देख लिया है। तुममें बहुत थोड़ा बल है, अत: इस समय मैं तुमसे भय तहीं मानता हूँ

अध्याय 128

श्लोक 54

मनसा स्मर्यतां सैष पारिजातस्त्वया तरुः ।शक्यं न खलु हस्ताभ्यां स्प्रष्टव्यो यस्त्वया ह्यसौ

manasā smaryatāṃ saiṣa pārijātastvayā taruḥ | śakyaṃ na khalu hastābhyāṃ spraṣṭavyo yastvayā hyasau

हिन्दी अर्थ

तुम इस पारिजात-वृक्षका केवल पनसे स्मरण कर लो; क्योंकि इस समय दोनों हाथोंसे सका स्पर्श करना तुम्हारे लिये निश्चय ही असम्भव दे

अध्याय 128

श्लोक 55

रथो मायामयो दग्धस्त्वया यो ह्यस्त्रतेजसा ।ईदृशानां सहस्राणि स्रष्टुं शक्तोऽस्मि मायया

ratho māyāmayo dagdhastvayā yo hyastratejasā | īdṛśānāṃ sahasrāṇi sraṣṭuṃ śakto'smi māyayā

हिन्दी अर्थ

तुमने अपने अस्त्रके तेजसे मेरे जिस मायामय (थको जलाया है, ऐसे हजारों रथ मैं मायाद्वारा बना पकता हूँ'

अध्याय 128

श्लोक 56

एवमुक्तो जयन्तश्च मुमोचास्त्रं महाबलः ।तपसोपचितं तेन स्वयमेवातितेजसा

evamukto jayantaśca mumocāstraṃ mahābalaḥ | tapasopacitaṃ tena svayamevātitejasā

हिन्दी अर्थ

प्रद्युप्के ऐसा कहनेपर महाबली जयन्तने स्वयं ही अत्यन्त तेजस्वी तपसे पुष्ट हुए महान्‌ भस्त्रको उनपर चलाया

अध्याय 128

श्लोक 57

तत् प्रद्युम्नो महावेगं शरजालैरवारयत् ।चत्वार्यस्त्राणि दिव्यानि मुमुचे चापराणि सः

tat pradyumno mahāvegaṃ śarajālairavārayat | catvāryastrāṇi divyāni mumuce cāparāṇi saḥ

हिन्दी अर्थ

उस महान्‌ वेगशाली भस्त्रको प्रद्युम्नने अपने बाणसमूहोंसे रोक दिया, तब जयन्तने चार दिव्यास्त्र और छोड़े

अध्याय 128

श्लोक 58

दिक्षु सर्वासु रुरुधुस्तान्यस्त्राण्यथ भारत ।रौक्मिणेयं महात्मानमन्तरिक्षे च पञ्चमम्

dikṣu sarvāsu rurudhustānyastrāṇyatha bhārata | raukmiṇeyaṃ mahātmānamantarikṣe ca pañcamam

हिन्दी अर्थ

डे भरतनन्दन! उन अस्त्रोंने महात्मा रुक्मिणीकुमार द्यु्नको सम्पूर्ण दिशाओंकी ओरसे घेर लिया तथा पीछे लाये हुए पाँचवें बाणने आकाशमें भी उनकी गति रोक ी

अध्याय 128

श्लोक 59

भरतनन्दन! उन अस्त्रोन्ने महात्मा रुक्मिगीकुमार महोल्कासदृशान् बाणानस्त्राण्यमरसत्तमः ।मुमोच यानि घोराणि प्रद्युम्नं प्रति सर्वतः

bharatanandana! una astronne mahātmā rukmigīkumāra maholkāsadṛśān bāṇānastrāṇyamarasattamaḥ | mumoca yāni ghorāṇi pradyumnaṃ prati sarvataḥ

श्लोक 59–60 का हिन्दी अर्थ

अमरश्रेष्ठ जयन्तने बड़ी भारी उल्काके समान मो बाण और भयंकर अस्त्र प्र्ुम्नपर सब ओरसे छोड़े गे, उन सबका श्रीकृष्णकुमारने अपने बाणसमूहों द्वारा निवारण कर दिया तथा दूसरे-दूसरे तीखे बाणोंके द्वारा यन्तको घायल कर दिया

अध्याय 128

श्लोक 60

तानि सर्वाणि बाणौघैः कार्ष्णिरस्त्राण्यवारयत् ।जयन्तं चापरैर्बाणैर्विध्याध निशितैस्तदा

tāni sarvāṇi bāṇaughaiḥ kārṣṇirastrāṇyavārayat | jayantaṃ cāparairbāṇairvidhyādha niśitaistadā

अर्थ श्लोक 59 के साथ

अध्याय 128

श्लोक 61

ततो नादः समुत्सृष्टो ह्यमरैः पुण्यकर्मभिः ।दृष्ट्वा स्थैर्यं च शैघ्र्यं च प्रद्युम्नस्य महात्मनः

tato nādaḥ samutsṛṣṭo hyamaraiḥ puṇyakarmabhiḥ | dṛṣṭvā sthairyaṃ ca śaighryaṃ ca pradyumnasya mahātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय महात्मा द्युम्नकी स्थिरता और फुर्ती देखकर पुण्यकर्मा देवताओंने ड़े जोरसे हर्षध्वनि की

अध्याय 128

श्लोक 62

प्रवरस्यापि बाणेन शितेन शिनिपुङ्गवः ।चिच्छेदेष्वासनं वीरो हस्तावापं च भारत

pravarasyāpi bāṇena śitena śinipuṅgavaḥ | cicchedeṣvāsanaṃ vīro hastāvāpaṃ ca bhārata

हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन ! शिनिवंशविभूषण गर सात्यकिने एक पैने बाणसे प्रवरके भी धनुष और स्तानेको काट दिया

अध्याय 128

श्लोक 63

ततौऽन्यत्स तु जग्राह महत् तद्धनुरुत्तमम् ।महेन्द्रदत्तं प्रवरो महाशनिसमस्वनम्

tatau'nyatsa tu jagrāha mahat taddhanuruttamam | mahendradattaṃ pravaro mahāśanisamasvanam

हिन्दी अर्थ

तब प्रवरने महान्‌ वज़के मान टट्लार ध्वनि करनेवाले एक-दूसरे विशाल एवं त्तम धनुषको हाथमें लिया, जिसे इन्द्रने दे रखा था

अध्याय 128

श्लोक 64

स तेन वीरो महता धनुषा विप्रसत्तमः ।शरान् मुमोच विविधानर्करश्मिनिभांस्तदा

sa tena vīro mahatā dhanuṣā viprasattamaḥ | śarān mumoca vividhānarkaraśminibhāṃstadā

हिन्दी अर्थ

स वीर ब्राह्मणशिरोमणिने उस विशाल धनुषके द्वारा उस मय ऐसे-ऐसे नाना प्रकारके बाण छोड़े, जो सूर्यकी कररणोंके समान तेजस्वी थे

अध्याय 128

श्लोक 65

चकर्त च धनुश्चित्रं शैनेयस्यामितौजसः ।विव्याध सर्वगात्रेषु बाणैरपि च सात्यकिम्

cakarta ca dhanuścitraṃ śaineyasyāmitaujasaḥ | vivyādha sarvagātreṣu bāṇairapi ca sātyakim

हिन्दी अर्थ

उसने अमित तेजस्वी एत्यकिके विचित्र धनुषको काट डाला और उनके सारे ज्ओों में बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी

अध्याय 128

श्लोक 66

धनुरादाय शैनेयस्ततोऽन्यत् कुरुनन्दन ।दृढं भारसहं धीमान् विव्याध प्रवरं रणे

dhanurādāya śaineyastato'nyat kurunandana | dṛḍhaṃ bhārasahaṃ dhīmān vivyādha pravaraṃ raṇe

हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन ! ब बुद्धिमान सात्यकिने दूसरा भार सहन करनेमें समर्थ दृढ़ धनुष हाथमें लेकर रणभूमिमें प्रवरको बींधना मारम्भ किया

अध्याय 128

श्लोक 67

उच्चकर्ततुरन्योन्यवर्मणी तौ शितैः शरैः ।गात्रेभ्यश्चैव मांसानि मर्मभिद्भिः शरोद्यमैः

uccakartaturanyonyavarmaṇī tau śitaiḥ śaraiḥ | gātrebhyaścaiva māṃsāni marmabhidbhiḥ śarodyamaiḥ

हिन्दी अर्थ

उन दोनोंने तीखे बाणोंद्वारा परस्परके वच काट डाले तथा मर्मभेदी उत्तम बाणोंद्वारा प्रयत्रपूर्वक | एक-दूसरेके शरीरोंसे मांस काटने लगे

अध्याय 128

श्लोक 68

अथाष्टधारबाणेन पुनरिष्वासनं द्विधा ।चिच्छेद प्रवरो वीरस्त्रिभिश्चैनमताडयत्

athāṣṭadhārabāṇena punariṣvāsanaṃ dvidhā | ciccheda pravaro vīrastribhiścainamatāḍayat

हिन्दी अर्थ

इसी मय वीर प्रवरने एक आठ धारवाले बाणसे सात्यकिके नुषके पुन: दो टुकड़े कर डाले और तीन बाणोंद्वारा उन्हें ायल कर दिया

अध्याय 128

श्लोक 69

अन्यदिष्वासनं तं तु ग्रहीतुमनसं द्विजः ।गदया ताडयामास क्षेप्यया लघुहस्तवान्

anyadiṣvāsanaṃ taṃ tu grahītumanasaṃ dvijaḥ | gadayā tāḍayāmāsa kṣepyayā laghuhastavān

हिन्दी अर्थ

सात्यकि दूसरा धनुष लेना ही आाहते थे कि फुर्तीले हाथवाले ब्राह्मण प्रवरने फेंकने योग्य दाके द्वारा उनपर प्रहार किया

अध्याय 128

श्लोक 70

सोऽसिं चर्म च जग्राह सात्यकिः प्रहसन्निव ।न जग्राह धनुर्धीमान् गदयाभिहतो भृशम्

so'siṃ carma ca jagrāha sātyakiḥ prahasanniva | na jagrāha dhanurdhīmān gadayābhihato bhṛśam

हिन्दी अर्थ

तब सात्यकिने सते हुए-से ढाल और तलवार हाथमें ले ली । वे गदासे पधिक आहत हो चुके थे; अत: उन बुद्धिमान्‌ वीरने नुष नहीं उठाया

अध्याय 128

श्लोक 71

ततः शरशतान्येव मुमोच प्रवरस्तदा ।विहस्तमिव विज्ञाय सात्यकिं यदुनन्दनम्

tataḥ śaraśatānyeva mumoca pravarastadā | vihastamiva vijñāya sātyakiṃ yadunandanam

हिन्दी अर्थ

इसके बाद युदनन्दन सात्यकिको हत्था-सा जानकर प्रवरने उनपर सैकड़ों बाण छोड़े

अध्याय 128

श्लोक 72

प्रद्युम्नोऽस्य ददौ खड्गं निर्मलाकाशसन्निभम् ।तस्य चिच्छेद भल्लेन निस्त्रिंशं प्रवरस्तदा

pradyumno'sya dadau khaḍgaṃ nirmalākāśasannibham | tasya ciccheda bhallena nistriṃśaṃ pravarastadā

हिन्दी अर्थ

स समय प्रद्युम्नने उन्हें निर्मल आकाशके समान एक तडूग दिया, परंतु प्रवरने तत्काल एक भल्ल मारकर नके खड्गको काट डाला

अध्याय 128

श्लोक 73

त्सरुदेशेऽपातयच्च प्रवरः प्रहसन्निव ।व्यधमच्च तथा चर्म शितैर्बाणैरजिह्मगैः

tsarudeśe'pātayacca pravaraḥ prahasanniva | vyadhamacca tathā carma śitairbāṇairajihmagaiḥ

हिन्दी अर्थ

प्रवरने हँसते हुए- | उस खड्गको मूठ पकड़नेकी जगहसे काटकर गिरा या और सीधे जानेवाले पैने बाणोंसे उनकी ढालकी भी जिजियाँ उड़ा दीं

अध्याय 128

श्लोक 74

आजघान च शक्त्यैनं हृदि विप्रो ननाद च ।तं विक्लवमिव ज्ञात्वा पारिजातजिहीर्षया ।तार्क्ष्याभ्याशे रथेनैव स तस्थौ प्रवरस्तदा

ājaghāna ca śaktyainaṃ hṛdi vipro nanāda ca | taṃ viklavamiva jñātvā pārijātajihīrṣayā | tārkṣyābhyāśe rathenaiva sa tasthau pravarastadā

हिन्दी अर्थ

फिर उस ब्राह्मणने शक्तिके द्वारा उनकी छातीपर आघात किया । इसके बाद वह सिंहके समान गर्जना करने नगा। उन्हें व्याकुल-सा जानकर प्रवर पारिजात हड़प नेनेकी इच्छासे रथके द्वारा ही गरुड़के निकट आकर खड़ा हो गया

अध्याय 128

श्लोक 75

तं पक्षपुटवेगेन चिक्षेप गरुडस्तथा ।गव्यूतिमेकां सरथः स पपात मुमोह च

taṃ pakṣapuṭavegena cikṣepa garuḍastathā | gavyūtimekāṃ sarathaḥ sa papāta mumoha ca

हिन्दी अर्थ

उस समय गरुड़ने अपने पंखोंके वेगसे प्रवरको दो कोस दूर फेंक दिया । प्रवर रथसहित वहाँ गिरा और मूर्च्छित हो गया

अध्याय 128

श्लोक 76

तं जयन्तो निपत्याथ पतितं ब्राह्मणं नृप ।समाश्वास्य रथं शीघ्रं समारोपितवांस्तदा

taṃ jayanto nipatyātha patitaṃ brāhmaṇaṃ nṛpa | samāśvāsya rathaṃ śīghraṃ samāropitavāṃstadā

हिन्दी अर्थ

नरेधर ! तब जयन्त दौड़कर त्रहाँ जा पहुँचा और गिरे हुए ब्राह्मणकों सान्त्वना देकर उसे गीघ्र ही रथपर चढ़ा दिया

अध्याय 128

श्लोक 77

शैनेयमपि मुह्यन्तं पतन्तं च मुहुर्मुहुः ।आश्वासयानः प्रद्युम्नः पितृव्यं परिषस्वजे

śaineyamapi muhyantaṃ patantaṃ ca muhurmuhuḥ | āśvāsayānaḥ pradyumnaḥ pitṛvyaṃ pariṣasvaje

हिन्दी अर्थ

सात्यकि भी बारम्बार पूर्च्छित हो-होकर गिरने लगे। उस समय प्रद्युप्नने चाचा पात्यकिको आश्वासन देते हुए उन्हें हदयसे लगा लिया

अध्याय 128

श्लोक 78

तं हि पस्पर्श हस्तेन सव्येन मधुसूदनः ।विरुजः स्पर्शमात्रेण सात्यकिः समपद्यत

taṃ hi pasparśa hastena savyena madhusūdanaḥ | virujaḥ sparśamātreṇa sātyakiḥ samapadyata

हिन्दी अर्थ

उस समय मधुसूदन श्रीकृष्णने बायें हाथसे उनका स्पर्श केया। उनके स्पर्शमात्रसे सात्यकिकी सारी पीड़ा दूर हो गयी

अध्याय 128

श्लोक 79

प्रद्युम्नो दक्षिणे पार्श्वे वामे तु शिनिपुङ्गवः ।तस्थतुः पारिजातस्य युद्धशौण्डतरावुभौ

pradyumno dakṣiṇe pārśve vāme tu śinipuṅgavaḥ | tasthatuḥ pārijātasya yuddhaśauṇḍatarāvubhau

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर पारिजातके दाहिने भागमें प्रद्युम् और बायें पार्थमें सात्यकि खड़े हो गये । ये दोनों ही युद्धमें अत्यन्त कुशल थे

अध्याय 128

श्लोक 80

जयन्तः प्रवरश्चैव रथेनैकेन भारत ।सम्पतन्तौ महेन्द्रेण प्रहस्योक्तौ महात्मना

jayantaḥ pravaraścaiva rathenaikena bhārata | sampatantau mahendreṇa prahasyoktau mahātmanā

हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन! इतनेमें ही जयन्त और प्रवर भी एक ही रथसे दौड़ते हुए वहाँ आ पहुँचे। उस समय महात्मा महेन्द्रने उन दोनोंसे हँसकर कहा—

अध्याय 128

श्लोक 81

नासन्नमभिगन्तव्यं गरुडस्य कथञ्चन ।बलवानेष पततां राजा च विनतासुतः

nāsannamabhigantavyaṃ garuḍasya kathañcana | balavāneṣa patatāṃ rājā ca vinatāsutaḥ

हिन्दी अर्थ

तुम दोनों किसी तरह गरुड़के निकट न जाना। पह पक्षियोंका राजा विनतानन्दन गरुड़ बड़ा बलवान्‌ है

अध्याय 128

श्लोक 82

दक्षिणे चैव सव्ये च पार्श्वे मम धृतायुधौ ।उभौ स्थितौ युद्ध्यमानं मामेव हि प्रपश्यतम्

dakṣiṇe caiva savye ca pārśve mama dhṛtāyudhau | ubhau sthitau yuddhyamānaṃ māmeva hi prapaśyatam

हिन्दी अर्थ

तुम दोनों मेरे दायें और बायें भागमें धनुष धारण करके खड़े हो जाओ और युद्ध करते समय मेरी ही देख- भाल करो'

अध्याय 128

श्लोक 83

एवमुक्तौ स्थितौ वीरौ ततः शक्रस्य पार्श्वयोः ।ददृशाते युद्धद्यमानौ देवराजजनार्दनौ

evamuktau sthitau vīrau tataḥ śakrasya pārśvayoḥ | dadṛśāte yuddhadyamānau devarājajanārdanau

हिन्दी अर्थ

इन्द्रके ऐसा कहनेपर वे दोनों वीर उनके दोनों बगलमें खड़े हो गये और देवराज इन्द्र तथा श्रीकृष्णका युद्ध देखने लगे

अध्याय 128

श्लोक 84

अथेन्द्रो गरुडं बाणैर्महाशनिसमस्वनैः ।विव्याध सर्वगात्रेषु महास्त्रप्रवरैस्तथा

athendro garuḍaṃ bāṇairmahāśanisamasvanaiḥ | vivyādha sarvagātreṣu mahāstrapravaraistathā

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर इन्द्र महान्‌ तरज़के समान शब्द करनेवाले बाणों तथा बड़े-बड़े अस्त्रोंद्वारा रुड़के सारे अड्ोंमें चोट पहुँचाने लगे

अध्याय 128

श्लोक 85

स तान् बाणानगणयन् वैनतेयः प्रतापवान् ।ससाराभिमुखो वीरः शक्रनागमरिन्दमः

sa tān bāṇānagaṇayan vainateyaḥ pratāpavān | sasārābhimukho vīraḥ śakranāgamarindamaḥ

हिन्दी अर्थ

तब उनके उन बाणोंको कुछ भी न गिनते हुए शत्रुओंका दमन करनेवाले प्रतापी वीर विनतानन्दन गरुड़ इन्द्रके हाथी ऐरावतकी ओर बढ़े

अध्याय 128

श्लोक 86

उभौ तौ सहसा राजन् बलिनौ गजपक्षिणौ ।प्रयुद्धौ वीर्यसम्पन्नौ महाप्राणौ दुरासदौ

ubhau tau sahasā rājan balinau gajapakṣiṇau | prayuddhau vīryasampannau mahāprāṇau durāsadau

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! वे बलवान्‌ हाथी और पक्षी सहसा एक-दूसरेके साथ जूझने लगे। वे दोनों ही बल-पराक्रमसे सम्पन्न, महान्‌ प्राणशक्तिसे युक्त और दुर्जय थे

अध्याय 128

श्लोक 87

रदनैः पन्नगरिपुं करेण शिरसा तदा ।ऐरावतो गजपतिराजघान नदंस्तथा

radanaiḥ pannagaripuṃ kareṇa śirasā tadā | airāvato gajapatirājaghāna nadaṃstathā

हिन्दी अर्थ

उस समय गर्जते हुए गजराज ऐरावतने अपनी सूँड़, मस्तक और दाँतोंसे सर्पशन्नु गरुड़ृपर गहरा आघात किया

अध्याय 128

श्लोक 88

तथा नखाङ्कुशैस्तीक्ष्णैर्वैनतेयो बलोत्कटः ।तथा पक्षनिपातैश्च शक्रनागं जघान ह

tathā nakhāṅkuśaistīkṣṇairvainateyo balotkaṭaḥ | tathā pakṣanipātaiśca śakranāgaṃ jaghāna ha

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार उत्कट बलशाली विनतानन्दन गरुड़ने तीखे नखरूपी अंकुशों और पंखोंसे इन्द्रके हाथीपर चोट की

अध्याय 128

श्लोक 89

मुहूर्तं सुमहानासीत् सम्पातो गजपक्षिणोः ।विस्मापनीयो जगतः प्रेक्षितॄणां भयावहः

muhūrtaṃ sumahānāsīt sampāto gajapakṣiṇoḥ | vismāpanīyo jagataḥ prekṣitṝṇāṃ bhayāvahaḥ

हिन्दी अर्थ

दो घड़ीतक हाथी और पक्षीमें महान्‌ युद्ध होता रहा, जो जगत्‌के लिये आश्चर्यजनक और दर्शकोंके लिये भयावह था

अध्याय 128

श्लोक 90

मूर्ध्न्यथैरावतं तार्क्ष्यस्ताडयामास भारत ।नखाङ्कुशकरालेन चरणेन महाबलः

mūrdhnyathairāvataṃ tārkṣyastāḍayāmāsa bhārata | nakhāṅkuśakarālena caraṇena mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

घढ५ भारत! महाबली गरुड़ने नखरूपी अंकुशोंके द्वारा वेकराल प्रतीत होनेवाले अपने पैरसे ऐरावतके मस्तकपर प्रहार किया

अध्याय 128

श्लोक 91

सम्प्रहाराभिसन्तप्तो निपपात त्रिविष्टपात् ।पारियात्रे गिरिश्रेष्ठे द्वीपेऽस्मिञ्जनमेजय

samprahārābhisantapto nipapāta triviṣṭapāt | pāriyātre giriśreṣṭhe dvīpe'smiñjanamejaya

हिन्दी अर्थ

जनमेजय ! उस प्रहारसे पीड़ित हो रावत स्वर्गसे नीचे इस जम्बूद्दीपमें पर्वतश्रेष्ठ पारियात्रपर गर पड़ा

अध्याय 128

श्लोक 92

पतन्तमपि तं शक्रो न मुमोच महाबलः ।कारुण्यादथ सौहार्दात् पूर्वाभ्युपगमादपि

patantamapi taṃ śakro na mumoca mahābalaḥ | kāruṇyādatha sauhārdāt pūrvābhyupagamādapi

हिन्दी अर्थ

महाबली इन्द्र करुणा, सौहार्द तथा पाथ न छोड़नेके लिये पहले की हुई प्रतिज्ञाके कारण भी उस गिरते हुए हाथीको छोड़ न सके

अध्याय 128

श्लोक 93

कृष्णोऽप्यन्वगमच्चैनं पृष्ठतः प्रभवोऽव्ययः ।पारिजातवता धीमान् गरुडेन महाबलः

kṛṣṇo'pyanvagamaccainaṃ pṛṣṭhataḥ prabhavo'vyayaḥ | pārijātavatā dhīmān garuḍena mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

जगत्‌की उत्पत्तिके कारणभूत अविनाशी महाबली बुद्धिमान्‌ श्रीकृष्ण भी पारिजातयुक्त गरुड़के द्वारा इन्द्रके पीछे-पीछे त्रहाँतक गये

अध्याय 128

श्लोक 94

स तस्थौ पर्वतश्रेष्ठे पारियात्रे तु वृत्रहा ।ऐरावते समाश्वस्ते सङ्ग्रामो ववृधे पुनः

sa tasthau parvataśreṣṭhe pāriyātre tu vṛtrahā | airāvate samāśvaste saṅgrāmo vavṛdhe punaḥ

श्लोक 94–95 का हिन्दी अर्थ

वृत्रासुरविनाशक इन्द्र पर्वतश्रेष्ठ पारियात्रपर पहुँचकर खड़े हो गये। कुरुश्रेष्ठ ! ऐरावतके पुस्ता लेनेपर इन्द्र और श्रीकृष्णका वह महान्‌ युद्ध पुन: बढ़ चला। दोनों ओरसे एक-दूसरेपर तेज किये हुए, त्नयुक्त एवं विषधर सर्पोंकि तुल्य भयंकर बाणोंके प्रहार होने लगे

अध्याय 128

श्लोक 95

शरैराशीविषप्रख्यै रत्नयुक्तैः सुतेजितैः ।अन्योन्यं कुरुशार्दूल शक्रकेशवयोर्महान्

śarairāśīviṣaprakhyai ratnayuktaiḥ sutejitaiḥ | anyonyaṃ kuruśārdūla śakrakeśavayormahān

अर्थ श्लोक 94 के साथ

अध्याय 128

श्लोक 96

ततो वज्रायुधो वज्रमशनिं च पुनः पुनः ।मुमोच गरुडे राजन्नैरावतरिपौ नृप

tato vajrāyudho vajramaśaniṃ ca punaḥ punaḥ | mumoca garuḍe rājannairāvataripau nṛpa

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! नरेश्वर ! तदनन्तर वज़धारी न्द्रने ऐरावतशत्रु गरुड़पर बारम्बार वर तथा अशनिका प्रहार किया

अध्याय 128

श्लोक 97

वज्राशनिनिपातांस्तान् सेहे शक्रस्य पक्षिराट् ।अवध्यो बलिनां श्रेष्ठो निसर्गेण तपोबलात्

vajrāśaninipātāṃstān sehe śakrasya pakṣirāṭ | avadhyo balināṃ śreṣṭho nisargeṇa tapobalāt

हिन्दी अर्थ

अवध्य एवं बलवानोंमें श्रेष्ठ पक्षिराज रुड़ने इन्द्रके उन व्र और अशनिद्वारा किये गये प्रहारोंको नैसर्गिक शक्ति तथा तपस्याके बलसे सह लिया

अध्याय 128

श्लोक 98

मुमोच पक्षमेकैकं मानयन्नशनिं सदा ।वज्रं च देवराज्ञोऽथ भ्रातुः कश्यपसम्भवः

mumoca pakṣamekaikaṃ mānayannaśaniṃ sadā | vajraṃ ca devarājño'tha bhrātuḥ kaśyapasambhavaḥ

हिन्दी अर्थ

उन कश्यपकुमार गरुड़ने अपने भाई देवराज इन्द्रके वज्र और अशनिका मान रखते हुए प्रत्येक प्रहारपर अपनी एक-एक पाँख तोड़कर गिरा दी

अध्याय 128

श्लोक 99

आक्रम्यमाणस्तार्क्ष्येण न्यमज्जन्नृपते गिरिः ।विवेश धरणीं राजञ्च्छीर्यमाणः समन्ततः

ākramyamāṇastārkṣyeṇa nyamajjannṛpate giriḥ | viveśa dharaṇīṃ rājañcchīryamāṇaḥ samantataḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! गरुड़के आक्रमण करनेपर वह पारियात्र पर्वत सब ओरसे बिखरकर धरतीमें धँस गया

अध्याय 128

श्लोक 100

चुकूज बहुमानेन कृष्णस्य स तु पर्वतः ।तं चाद्राक्षीत्ततः कृष्णः किञ्चिच्छेषमधोक्षजः

cukūja bahumānena kṛṣṇasya sa tu parvataḥ | taṃ cādrākṣīttataḥ kṛṣṇaḥ kiñciccheṣamadhokṣajaḥ

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्णके भारी भारसे वह पर्वत आर्तनाद- पा करने लगा। तब अधोक्षज श्रीकृष्णने उसकी ओर देखा। उस पर्वतका कुछ ही भाग धरतीके ऊपर शेष ह गया था

अध्याय 128

श्लोक 101

तं मुक्त्वा गरुडेनाथ तस्थौ देवो विहायसि ।प्रद्युम्नं च तदोवाच सर्वकृल्लोकभावनः

taṃ muktvā garuḍenātha tasthau devo vihāyasi | pradyumnaṃ ca tadovāca sarvakṛllokabhāvanaḥ

हिन्दी अर्थ

यह देख सबके ख्ष्टा लोकभावन भगवान्‌ श्रीकृष्ण उस पर्वतको छोड़कर गरुड़के द्वारा आकाशमें खड़े हो गये और. उस समय प्रद्युम्नसे तोले—

अध्याय 128

श्लोक 102

इतो द्वारवतीं गत्वा रथमानय मा चिरम् ।सदारुकं महाबाहो मत्तेजोबलमाश्रितः

ito dvāravatīṃ gatvā rathamānaya mā ciram | sadārukaṃ mahābāho mattejobalamāśritaḥ

हिन्दी अर्थ

महाबाहो ! यहाँसे द्वारका जाकर मेरे तेज और बलका आश्रय ले दारुकसहित मेरे रथको शीघ्र यहाँ ले आओ

अध्याय 128

श्लोक 103

वक्तव्यो बलभद्रश्च राजा च कुकुराधिपः ।श्वो जित्वेन्द्रं त्वागमिष्ये द्वारकामिति मानद

vaktavyo balabhadraśca rājā ca kukurādhipaḥ | śvo jitvendraṃ tvāgamiṣye dvārakāmiti mānada

हिन्दी अर्थ

मानद ! वहाँ भैया बलभद्र तथा कुकुरवंशके अधिपति राजा उग्रसेनसे कह देना कि क्रल इन्द्रको जीतकर मैं द्वारकापुरीको आऊँगा'

अध्याय 128

श्लोक 104

तथेत्युक्त्वा तु धर्मात्मा प्रद्युम्नः पितरं विभुः ।गत्वा यथोक्तमुक्त्वा च यादवेन्द्रबलावुभौ

tathetyuktvā tu dharmātmā pradyumnaḥ pitaraṃ vibhuḥ | gatvā yathoktamuktvā ca yādavendrabalāvubhau

हिन्दी अर्थ

भारत! तब अपने पितासे ' बहुत अच्छा' कहकर पभावशाली धर्मात्मा प्रद्यु्न द्वारकामें गये और यादवराज ग्रसेन तथा बलराम दोनोंसे उनका यथावत्‌ संदेश कहकर वे दारुकके द्वारा जोते गये रथपर आरूढ़ हो बड़ी भरमें फिर उस स्थानपर लौट आये

अध्याय 128

श्लोक 105

नाडिकान्तरमात्रेण पुनस्तं देशमाययौ ।दारुकेण समायुक्तं रथमास्थाय भारत

nāḍikāntaramātreṇa punastaṃ deśamāyayau | dārukeṇa samāyuktaṃ rathamāsthāya bhārata

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.