Harivamsha Purana
123
अध्याय 123 / 318

Parva 2, Adhyāya 68

40 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ40 श्लोक

अध्याय 123

श्लोक 1

श्रीकृष्णेन पारिजातवृक्षस्य आदातुं नारदस्य माध्यमे इन्द्राय सन्देषप्रेषणम्, दातुं नेच्छुकं इन्द्रं गदया ताडनस्य चेतावनी ततो जिगमिषुं तत्र नारदं मुनिसत्तमम् ।प्रोवाच भगवान् विष्णुरप्रमेयपराक्रमः

śrīkṛṣṇena pārijātavṛkṣasya ādātuṃ nāradasya mādhyame indrāya sandeṣapreṣaṇam, dātuṃ necchukaṃ indraṃ gadayā tāḍanasya cetāvanī tato jigamiṣuṃ tatra nāradaṃ munisattamam | provāca bhagavān viṣṇuraprameyaparākramaḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर अनन्त पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णने इन्द्रलोकको जानेकी इच्छावाले मुनिश्रेष्ठ नारदसे वहाँ इस प्रकार कहा-

अध्याय 123

श्लोक 2

महर्षे धर्मतत्त्वज्ञ स्वर्गं गत्वा त्वयानघ ।दृष्ट्वा सदस्यान् देवस्य त्रिपुरघ्नस्य धीमतः

maharṣe dharmatattvajña svargaṃ gatvā tvayānagha | dṛṣṭvā sadasyān devasya tripuraghnasya dhīmataḥ

श्लोक 2–3 का हिन्दी अर्थ

+ घ्श्श ' धर्मके तत्त्वको जाननेवाले निष्पाप महर्षे! आप रर्गमें जाकर (वहाँ उत्सव देखनेके लिये पधारे हुए) द्धिमान्‌ त्रपुरविनाशक देव रुद्रके सदस्यों ( पार्षदगणों )- ] दर्शन करके मेरे शब्दोंमें पाकशासन इन्द्रसे मेरी एक र्थना सुनाइयेगा। मुने! मुझमें और इन्द्रमें जो पुराना वामनावतारके समयका) श्रातृभाव है, उसे तो आप ननते ही हैं। उसीको सादर सामने रखते हुए उनसे प॒ तरह बात कीजियेगा, जिससे मेरी ओरसे आज्ञा नेका भाव प्रकट न हो

अध्याय 123

श्लोक 3

अनाज्ञया मद्वचनाद् विज्ञाप्यः पाकशासनः ।सम्भावयित्वा भ्रातृत्वं पौराणं वेत्सि यन्मुने

anājñayā madvacanād vijñāpyaḥ pākaśāsanaḥ | sambhāvayitvā bhrātṛtvaṃ paurāṇaṃ vetsi yanmune

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 123

श्लोक 4

यमस्राक्षीन्मुनिश्रेष्ठो भगवान् कश्यपस्तरुम् ।पारिजातं पुरादित्याः सुखार्थं धर्मसत्तमः

yamasrākṣīnmuniśreṣṭho bhagavān kaśyapastarum | pārijātaṃ purādityāḥ sukhārthaṃ dharmasattamaḥ

श्लोक 4–9 का हिन्दी अर्थ

(नारदजीसे ऐसा हकर श्रीकृष्णने अपना संदेश इस प्रकार उपस्थित या—) देवराज ! पूर्वकालमें धर्मात्माओंमें उत्तम मुनि- छठ भगवान्‌ कश्यपने देवमाता अदितिको सुख पहुँचानेके नये जिस पारिजात-वृक्षकी सृष्टि की थी, वह सब क्षोंमें श्रेष्ठ है और दानमें दिये जानेपर अत्यन्त सौभाग्य था पुण्य प्रदान करता है। अमर्श्रेष्ठ ! सुननेमें आया है पहले सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाली अदिति आदि वियोंने धर्मके लिये ही आपके उस उत्तम वृक्षको तपालनपूर्वक (पतिसहित) दान कर दिया था (और से नारदजीने पुन: आपको लौटाया था) । प्रभो! इस ततको सुनकर मेरी पत्नियाँ भी पुण्य, दानधर्म तथा मेरी पन्‍नताकी प्राप्तिक लिये उसका दान करना चाहती हैं । पीलिये आपके इस भाईने उस पारिजात नामक महान्‌ क्षको द्वारकापुरीमें मँगवाया है। यहाँ दानका कार्य म्पन्न हो जानेपर आप पुन: उस वृक्षको स्वर्गलोकमें जा सकते हैं। (अब वे नारदजीको सम्बोधित रके बोले-). भगवन्‌! मुनिश्रेष्ठ ! बलासुरका भेदन रनेवाले ऐश्वर्यशाली इन्द्रको आप मेरा संदेश इसी पमें सुनाइयेगा। इस विषयमें आपको वैसा-ही-वैसा पत्न करना चाहिये, जिससे देवेश्वर इन्द्र वह तसुश्रेष्ठ रिजात मुझे दे दें

अध्याय 123

श्लोक 5

स पुण्यमतिसौभाग्यं ददाति तरुसत्तमः ।तव दत्तं पुरा दानं व्रतेन तरुमुत्तमम्

sa puṇyamatisaubhāgyaṃ dadāti tarusattamaḥ | tava dattaṃ purā dānaṃ vratena tarumuttamam

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 123

श्लोक 6

देवीभिर्धर्मनित्याभिर्धर्मार्थममरोत्तम ।दत्तं श्रुत्वाभिकाङ्क्षन्ति दातुं पत्न्यो मम प्रभो

devībhirdharmanityābhirdharmārthamamarottama | dattaṃ śrutvābhikāṅkṣanti dātuṃ patnyo mama prabho

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 123

श्लोक 7

पुण्यार्थं दानधर्मार्थं मम प्रीत्यर्थमेव च ।आनाययद् द्वारवतीं पारिजातं महाद्रुमम्

puṇyārthaṃ dānadharmārthaṃ mama prītyarthameva ca | ānāyayad dvāravatīṃ pārijātaṃ mahādrumam

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 123

श्लोक 8

दत्ते दाने पुनः स्वर्गं तरुं त्वं नेतुमर्हसि ।स वाच्य एवं भगवान् बलभिद् भगवंस्त्वया

datte dāne punaḥ svargaṃ taruṃ tvaṃ netumarhasi | sa vācya evaṃ bhagavān balabhid bhagavaṃstvayā

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 123

श्लोक 9

तथा तथा प्रयत्नश्च कार्योऽस्मिन्मुनिसत्तम ।यथा तरुवरं दद्यात् पारिजातं सुरेश्वरः

tathā tathā prayatnaśca kāryo'sminmunisattama | yathā taruvaraṃ dadyāt pārijātaṃ sureśvaraḥ

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 123

श्लोक 10

तत्र दूतगुणं तावत् पश्यामस्ते तपोधन ।सम्भाव्या सर्वकृत्यानां सम्पद्धि त्वयि मे मता

tatra dūtaguṇaṃ tāvat paśyāmaste tapodhana | sambhāvyā sarvakṛtyānāṃ sampaddhi tvayi me matā

हिन्दी अर्थ

तपोधन! दूतमें जितने ण होने चाहिये, वे सब मुझे आपके भीतर दिखायी न हैं। मेरे मनमें आपको सौंपे गये सभी कार्योकी प्यकू-रूपसे सिद्धिके लिये निश्चित सम्भावना बनी ई है'

अध्याय 123

श्लोक 11

एवं नारायणेनोक्तो नारदो भगवानृषिः ।प्रहस्योवाच केशिघ्नमिदं वाक्यं तपोधनः

evaṃ nārāyaṇenokto nārado bhagavānṛṣiḥ | prahasyovāca keśighnamidaṃ vākyaṃ tapodhanaḥ

हिन्दी अर्थ

नारायणस्वरूप श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर पोधन भगवान्‌ नारद मुनिने हँसकर केशिनाशन भगवान्‌ कृष्णसे इस प्रकार कहा—

अध्याय 123

श्लोक 12

बाढमेवं प्रवक्ष्यामि यदुमुख्य सुरेश्वरम् ।न तु दास्यति देवेन्द्रः पारिजातं कथञ्चन

bāḍhamevaṃ pravakṣyāmi yadumukhya sureśvaram | na tu dāsyati devendraḥ pārijātaṃ kathañcana

हिन्दी अर्थ

यदुश्रेष्ठ ! मैं स्वी कार रता हूँ। मैं देवराज इन्द्रसे ऐसी ही बात कहूँगा; परंतु झे मालूम है कि देवराज इन्द्र उस पारिजात-वृक्षको सी तरह भी नहीं देंगे

अध्याय 123

श्लोक 13

मन्दरं पर्वतश्रेष्ठं दानवैस्त्रिदशैस्तथा ।निक्षिप्य तोयधौ पूर्वं पारिजातः समाहृतः

mandaraṃ parvataśreṣṭhaṃ dānavaistridaśaistathā | nikṣipya toyadhau pūrvaṃ pārijātaḥ samāhṛtaḥ

श्लोक 13–14 का हिन्दी अर्थ

जनार्दन ! पहलेकी बात है , दानवों और देवताओंने पर्वतश्रेष्ठ मन्दरको क्षीरसागरमें डालकर उसका मन्थन करके पारिजात-वृक्षको वहाँसे निकाला था । तत्पश्चात्‌ पूर्वकालमें गिरिश्रेष्ठ मन्दराचलसे लोककर्ता भगवान्‌शड्ूरने उसी पारिजातकों लेनेके लिये मुझे इन्द्रके पास भेजा था

अध्याय 123

श्लोक 14

मन्दरात् पर्वतश्रेष्ठान्नयितुं प्रेषितः पुरा ।पारिजातं हरेणापि लोककर्त्रा जनार्दन

mandarāt parvataśreṣṭhānnayituṃ preṣitaḥ purā | pārijātaṃ hareṇāpi lokakartrā janārdana

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 123

श्लोक 15

स्वयं विज्ञापितो गत्वा ततः शक्रेण शङ्करः ।आक्रीडद्रुम उद्याने शच्याः स्यादिति याचितः

svayaṃ vijñāpito gatvā tataḥ śakreṇa śaṅkaraḥ | ākrīḍadruma udyāne śacyāḥ syāditi yācitaḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय इन्द्रने स्वयं ही जाकर भगवान्‌ शड्रसे प्रार्थना की और नम्रतापूर्वक यह निवेदन किया कि वह वृक्ष शचीके उद्यानमें क्रीडवृक्षके रूपमें रहे

अध्याय 123

श्लोक 16

तथास्त्विति वरो दत्तो महादेवेन चानघ ।न च नीतः पारिजातो मन्दरं चित्रकन्दरम्

tathāstviti varo datto mahādevena cānagha | na ca nītaḥ pārijāto mandaraṃ citrakandaram

हिन्दी अर्थ

अनघ ! तब महादेवजीने 'तथास्तु' कहकर इन्द्रको उसे रखनेके लिये वरदान दे दिया । फिर वे विचित्र कन्दराओंसे सुशोभित मन्दराचलपर उस पारिजात-वृक्षको नहीं ले गये

अध्याय 123

श्लोक 17

क्रीडावृक्षः स शच्येति व्यपदेशेन मोक्षितः ।महेन्द्रेण महाबाहो पारिजातस्ततः पुरा

krīḍāvṛkṣaḥ sa śacyeti vyapadeśena mokṣitaḥ | mahendreṇa mahābāho pārijātastataḥ purā

हिन्दी अर्थ

महाबाहों ! इस तरह प्राचीनकालमें महेन्द्रने वह शचीका क्रीड़ा-वृक्ष है ' ऐसा बहाना बनाकर पारिजातको शड्रजीके अधिकारसे छुड़ा लिया

अध्याय 123

श्लोक 18

प्रियार्थमुमया साक्षात् पारिजातवनं हरः ।गव्यूतिशतविस्तीर्णं मन्दरस्यैव कन्दरम्

priyārthamumayā sākṣāt pārijātavanaṃ haraḥ | gavyūtiśatavistīrṇaṃ mandarasyaiva kandaram

हिन्दी अर्थ

तब उमादेवीका प्रिय करनेके लिये साक्षात्‌ भगवान्‌ शिवने मन्दराचलकी दो सौ कोस विस्तृत कन्दराको ही पारिजातके वनसे परिपूर्ण कर दिया

अध्याय 123

श्लोक 19

न तत्र सूर्यभाः कृष्ण प्रविशन्ति नगोत्तमे ।न च चन्द्रप्रभा शीता नैव कृष्ण सदागतिः

na tatra sūryabhāḥ kṛṣṇa praviśanti nagottame | na ca candraprabhā śītā naiva kṛṣṇa sadāgatiḥ

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण ! उस श्रेष्ठ पर्वतपर वहाँ न तो सूर्यकी प्रभा पहुँच पाती है, न चन्द्रमाकी शीतल किरणोंका प्रवेश होता है और न वायुकी ही पहुँच हो पाती है

अध्याय 123

श्लोक 20

शीतोष्णे कृतस्तत्र शैलपुत्र्या भवन्ति हि ।स्वयम्प्रभं वनं तद्धि महादेवस्य तेजसा

śītoṣṇe kṛtastatra śailaputryā bhavanti hi | svayamprabhaṃ vanaṃ taddhi mahādevasya tejasā

हिन्दी अर्थ

वहाँ गिरिराजनन्दिनी उमाकी इच्छाके अनुसार सर्दी और गर्मी होती है। महादेवजीके तेजसे वह वन स्वयं ही प्रकाशित होता रहता है

अध्याय 123

श्लोक 21

वर्जयित्वा महादेवौ सगणौ यदुनन्दन ।मां चान्यस्तद्वनं दिव्यं न प्रयाति कथञ्चन

varjayitvā mahādevau sagaṇau yadunandana | māṃ cānyastadvanaṃ divyaṃ na prayāti kathañcana

हिन्दी अर्थ

यदुनन्दन ! महादेवी पार्वती, महादेव शिव, उन दोनोंके गण तथा मुझको छोड़कर दूसरा कोई उस दिव्य वनमें किसी तरह नहीं जाने पाता है

अध्याय 123

श्लोक 22

स्रवन्ति तत्र वार्ष्णेय पारिजाताः समन्ततः ।सर्वरत्नानि मुख्यानि मनसा काङ्क्षितानि वै

sravanti tatra vārṣṇeya pārijātāḥ samantataḥ | sarvaratnāni mukhyāni manasā kāṅkṣitāni vai

हिन्दी अर्थ

वृष्णिनन्दन ! वहाँके परिजात सब ओरसे सम्पूर्ण मनोवाज्छित श्रेष्ठ रत्त टपकाते रहते हैं

अध्याय 123

श्लोक 23

गणास्तान्युपभुञ्जन्ति प्रवराणां महात्मनाम् ।आज्ञया देवदेवस्य लोकनाथस्य केशव

gaṇāstānyupabhuñjanti pravarāṇāṃ mahātmanām | ājñayā devadevasya lokanāthasya keśava

हिन्दी अर्थ

केशव! वहाँ देवाधिदेव विश्वनाथकी आज्ञासे महात्मा प्रमथोंके समूह उन रत्नोंका उपभोग करते हैं

अध्याय 123

श्लोक 24

पारिजाताद् बहुगुणं फलं तेषां तथा वनम् ।अभिमानं प्रभाश्चैव गुणा भूरिगुणास्तथा

pārijātād bahuguṇaṃ phalaṃ teṣāṃ tathā vanam | abhimānaṃ prabhāścaiva guṇā bhūriguṇāstathā

श्लोक 24–25 का हिन्दी अर्थ

स्वर्गीय पारिजातकी अपेक्षा उन मन्दराचलवर्ती पारिजातोंका फल और वन कई गुना अच्छा है। उनमें अभिमान, प्रभा और गुण सभी स्वर्गीय पारिजातसे बढ़कर है। केशव! वहाँके प्रचुर गुणशाली वृक्ष मूर्तिमान्‌ होकर उमासहित भगवान्‌ शड्ूरकी प्रमथगणोंके साथ सदा उपासना करते हैं

अध्याय 123

श्लोक 25

मूर्तिमन्तश्च ते वृक्षाः सोमं देवं वृषध्वजम् ।उपतिष्ठन्ति सततं प्रवरैः सह केशव

mūrtimantaśca te vṛkṣāḥ somaṃ devaṃ vṛṣadhvajam | upatiṣṭhanti satataṃ pravaraiḥ saha keśava

अर्थ श्लोक 24 के साथ

अध्याय 123

श्लोक 26

रौद्रेण तेजसा जुष्टा दुःखैर्हीनाः सुखान्विताः ।तरवो मन्दरे ते हि दयिताः शैलकन्यया

raudreṇa tejasā juṣṭā duḥkhairhīnāḥ sukhānvitāḥ | taravo mandare te hi dayitāḥ śailakanyayā

हिन्दी अर्थ

मन्दराचलपर जो ये परिजातके वृक्ष हैं, वे भगवान्‌ रुद्रके तेजसे युक्त, दुःखरहित और सुखसे सम्पन्न हैं; अतः गिरिराजकुमारी उमाको वे विशेष प्रिय हैं

अध्याय 123

श्लोक 27

प्रविवेशान्धको नाम घोरस्तत्र महाबलः ।दैतेयो वरदानेन दर्पितः पापनिश्चयः

praviveśāndhako nāma ghorastatra mahābalaḥ | daiteyo varadānena darpitaḥ pāpaniścayaḥ

हिन्दी अर्थ

एक समयकी बात है, अन्धक नामसे प्रसिद्ध घोर महाबली और पापपूर्ण निश्चय रखनेवाला दैत्य, जो वरदानसे मदमत्त रहता था, उस पारिजात-वनमें घुस गया

अध्याय 123

श्लोक 28

स हतो देवदेवेन हरेणामित्रघातिना ।अवध्यः सर्वभूतानां वृत्राद् दशगुणं बली

sa hato devadevena hareṇāmitraghātinā | avadhyaḥ sarvabhūtānāṃ vṛtrād daśaguṇaṃ balī

हिन्दी अर्थ

वह वृत्रासुरसे दस गुना बलवान्‌ और समस्त प्राणियोंके लिये अवध्य था तो भी वहाँ शत्रुघाती देवाधिदेव महादेवने उसे मार डाला

अध्याय 123

श्लोक 29

एवं दुःखं न ते देव पारिजातं प्रदास्यति ।पुष्कराक्ष सहस्राक्षः सत्यमेतद् ब्रवीमि ते

evaṃ duḥkhaṃ na te deva pārijātaṃ pradāsyati | puṣkarākṣa sahasrākṣaḥ satyametad bravīmi te

हिन्दी अर्थ

उध्याय: + ध्श्द देव ! कमलनयन! इस प्रकार दुःखके साथ कहना डड़ता है कि सहख्र नेत्रधारी इन्द्र आपको पारिजात नहीं ंगे। यह मैं आपसे सच्ची बात कहता हूँ

अध्याय 123

श्लोक 30

सततं सहितो देव्या शच्या स हि वरद्रुमः ।सर्वकामप्रदः कृष्ण तथेन्द्राय महौजसे

satataṃ sahito devyā śacyā sa hi varadrumaḥ | sarvakāmapradaḥ kṛṣṇa tathendrāya mahaujase

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण ! वह श्रेष्ठ वृक्ष हित-साधनकी शक्तिसे युक्त है। तह शचीदेवी तथा महापराक्रमी इन्द्रको सम्पूर्ण मनोवाज्छित दार्थ देता रहता है

अध्याय 123

श्लोक 31

मुने तद् युज्यते साधु महादेवेन धीमता ।यच्छचीकारणं कृत्वा न नीतः स तरुः पुरा

mune tad yujyate sādhu mahādevena dhīmatā | yacchacīkāraṇaṃ kṛtvā na nītaḥ sa taruḥ purā

हिन्दी अर्थ

श्रीभगवान्‌ बोले—मुने! पूर्वकालमें बुद्धिमान्‌ पहादेवजी शचीके कारण उस वृक्षको जो मन्दराचलपर हीं ले गये, वह उनका कार्य ठीक जँचता है

अध्याय 123

श्लोक 32

स ज्येष्ठः सर्वभूतानां लोककृत् प्रभवोऽव्ययः ।पारावर्यस्य सदृशं कृतवानिति मे मतिः

sa jyeṣṭhaḥ sarvabhūtānāṃ lokakṛt prabhavo'vyayaḥ | pārāvaryasya sadṛśaṃ kṛtavāniti me matiḥ

हिन्दी अर्थ

बे समस्त भूतोंके लिये ज्येष्ठ, लोकस्रष्ट, जगत्‌की त्पत्तिकि कारण और अविनाशी परमात्मा हैं। उन्होंने डड़े-छोटेकी जो लोकमर्यादा है, उसके अनुरूप ही कार्य किया। ऐसा मेरा विश्वास है

अध्याय 123

श्लोक 33

अहं यवीयान् देवस्य सर्वथा बलघातिनः ।लालनीयश्च भगवञ्जयन्त इव सत्तम

ahaṃ yavīyān devasya sarvathā balaghātinaḥ | lālanīyaśca bhagavañjayanta iva sattama

हिन्दी अर्थ

परंतु भगवन्‌ ! ुनिश्रेष्ठ ! मैं तो बलासुर-विनाशन देवेन्द्रका छोटा भाई ँ; अत: जयन्तकी भाँति उनके द्वारा सर्वथा लाड़- यार पाने योग्य हूँ

अध्याय 123

श्लोक 34

सर्वथा भगवांस्तावदुपायैर्बहुविस्तरैः ।करोतु यत्नं प्रीत्यर्थं शक्तो ह्यसि तपोधन

sarvathā bhagavāṃstāvadupāyairbahuvistaraiḥ | karotu yatnaṃ prītyarthaṃ śakto hyasi tapodhana

हिन्दी अर्थ

तपोधन! आप बहुतेरे उपाय करके ऐसा यत्न करें, जिससे हमलोगोंमें प्रेम बना हे; क्योंकि आप ऐसा करनेमें समर्थ हैं

अध्याय 123

श्लोक 35

मया मुने प्रतिज्ञातं पुण्यार्थं सत्यभामया ।स्वर्गादिहानयिष्यामि पारिजातमिति प्रभो

mayā mune pratijñātaṃ puṇyārthaṃ satyabhāmayā | svargādihānayiṣyāmi pārijātamiti prabho

हिन्दी अर्थ

मुने ! भो ! मैंने सत्यभामाके पुण्यकार्यका सम्पादन करनेके लये यह प्रतिज्ञा की है कि मैं पारिजात-वृक्षको स्वर्गसे हाँ ले आउऊँगा

अध्याय 123

श्लोक 36

मया तदनृतं कर्तुं कथं शक्यं तपोधन ।नानृतं हि वचो विप्र प्रोक्तं पूर्वं मयानघ

mayā tadanṛtaṃ kartuṃ kathaṃ śakyaṃ tapodhana | nānṛtaṃ hi vaco vipra proktaṃ pūrvaṃ mayānagha

हिन्दी अर्थ

निष्पाप तपोधन! मैं अपने स वचनको मिथ्या कैसे कर सकता हूँ। विप्रवर ! ने पहले भी कोई मिध्या बात नहीं कही है

अध्याय 123

श्लोक 37

मयि भग्नप्रतिज्ञे वै लोकानां विप्लवो भवेत् ।यन्मया हि मुनिश्रेष्ठ लोकधर्मा गुणान्विताः ।परिधार्याः स्थितौ सर्वे स कथं ह्यनृतं वदेत्

mayi bhagnapratijñe vai lokānāṃ viplavo bhavet | yanmayā hi muniśreṣṭha lokadharmā guṇānvitāḥ | paridhāryāḥ sthitau sarve sa kathaṃ hyanṛtaṃ vadet

हिन्दी अर्थ

निश्रेष्ठ ! मेरी प्रतिज्ञा भड्ध हो जानेपर समस्त लोकोंमें वप्लव मच जायगा (सब लोग झूठ बोलने लगेंगे) । [झे तो जगत्‌की स्थितिके लिये उत्तम गुणसे युक्त मस्त लोकधर्मोको धारण करना चाहिये; जिसपर ऐसा त्तरदायित्व हो, वह झूठ कैसे बोल सकता है ?

अध्याय 123

श्लोक 38

न देवगन्धर्वगणा न राक्षसा न चासुरा नैव च यक्षपन्नगाः ।मम प्रतिज्ञामपहन्तुमुद्यता मुने समर्थाः खलु भद्रमस्तु ते

na devagandharvagaṇā na rākṣasā na cāsurā naiva ca yakṣapannagāḥ | mama pratijñāmapahantumudyatā mune samarthāḥ khalu bhadramastu te

हिन्दी अर्थ

[ने ! आपका कल्याण हो। यदि समस्त देवता, गन्धर्व, क्षस, असुर, यक्ष और नाग भी उद्यत होकर आ तायँँ तो वे मेरी प्रतिज्ञाको नष्ट करनेमें समर्थ नहीं ग सकते, नहीं हो सकते

अध्याय 123

श्लोक 39

स पारिजातं यदि न प्रदास्यति प्रयाच्यमानो भवतामरेश्वरः ।ततः शचीव्यामृदितानुलेपने गदां विमोक्ष्यामि पुरन्दरोरसि

sa pārijātaṃ yadi na pradāsyati prayācyamāno bhavatāmareśvaraḥ | tataḥ śacīvyāmṛditānulepane gadāṃ vimokṣyāmi purandarorasi

हिन्दी अर्थ

यदि आपके याचना रनेपर अमरेश्वर इन्द्र पारिजात नहीं देंगे तो मैं उनके स वक्ष:स्थलपर, जहाँका अनुलेपन शचीके आलिडऑ्नसे पट गया है, अपनी गदाका प्रहार करूँगा

अध्याय 123

श्लोक 40

इति प्रवाच्यो यदि सामपूर्वकं प्रयाच्यमानो न तरुं प्रयच्छति ।सुनिश्चयं मद्गमनाय सर्वथा त्वयापि कार्यः खलु तत्र निश्चयः

iti pravācyo yadi sāmapūrvakaṃ prayācyamāno na taruṃ prayacchati | suniścayaṃ madgamanāya sarvathā tvayāpi kāryaḥ khalu tatra niścayaḥ

हिन्दी अर्थ

यदि वे शान्तिपूर्वक माँगनेसे पारिजात-वृक्ष नहीं देते हैं तो मेरा इन्द्रलोकपर आक्रमण करनेका उत्तम निश्चय पर्वथा अटल है, यह उन्हें बता दीजियेगा तथा उस दशामें आपको भी वहाँ अवश्य यही निश्चय करना चाहिये

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.