Harivamsha Purana
124
अध्याय 124 / 318

Parva 2, Adhyāya 69

73 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ73 श्लोक

अध्याय 124

श्लोक 1

स्वर्गे महादेवस्य परिचर्याहेतु नृत्यगीतादिकं उत्सवं, नारदेन इन्द्रं प्रति श्रीकृष्णस्य पारिजातविषयकं प्रार्थनारूपं सन्देशस्य कथनम्, इन्द्रेण अनेकानि कारणानि कथयित्वा पारिजातस्य अदानस्य विचारप्रकटनं नारदोऽथ मुनिर्गत्वा महेन्द्रसदनं प्रति ।तां रात्रिमवसत् तत्र ददृशे च महोत्सवम्

svarge mahādevasya paricaryāhetu nṛtyagītādikaṃ utsavaṃ, nāradena indraṃ prati śrīkṛṣṇasya pārijātaviṣayakaṃ prārthanārūpaṃ sandeśasya kathanam, indreṇa anekāni kāraṇāni kathayitvā pārijātasya adānasya vicāraprakaṭanaṃ nārado'tha munirgatvā mahendrasadanaṃ prati | tāṃ rātrimavasat tatra dadṛśe ca mahotsavam

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर नारद मुनिने महेन्द्रभवनमें जाकर उस रातमें वहीं निवास किया और पूर्वोक्त महोत्सवको भी देखा

अध्याय 124

श्लोक 2

तत्रादित्या महात्मानो वसवश्च सुरोत्तमाः ।राजर्षयश्च विद्वांसः स्वर्गताः कर्मभिः शुभैः

tatrādityā mahātmāno vasavaśca surottamāḥ | rājarṣayaśca vidvāṃsaḥ svargatāḥ karmabhiḥ śubhaiḥ

श्लोक 2–4 का हिन्दी अर्थ

वहाँ महात्मा आदित्यगण, सुरश्रेष्ठ बसुगण, अपने शुभ कर्मोसे स्वर्गमें गये हुए विद्वान्‌ राजर्षिगण, नाग, यक्ष, सिद्ध, चारण, तपोधन ब्रह्मर्षि, सैकड़ों देवर्षि और मनु, महामना गरुड़ पक्षी, महाबली मरुद्रण तथा देवताओंके जो अन्य सैकड़ों समुदाय हैं, वे सब उस उत्सवमें पधारे थे

अध्याय 124

श्लोक 3

नागा यक्षाश्च सिद्धाश्च चारणाश्च तपोधनाः ।ब्रह्मर्षयश्च शतशो देवर्षिमनवस्तथा

nāgā yakṣāśca siddhāśca cāraṇāśca tapodhanāḥ | brahmarṣayaśca śataśo devarṣimanavastathā

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 124

श्लोक 4

सुपर्णाश्च महात्मानो मरुतश्च महाबलाः ।दिवौकसां निकायाश्च शतशोऽन्ये समागताः

suparṇāśca mahātmāno marutaśca mahābalāḥ | divaukasāṃ nikāyāśca śataśo'nye samāgatāḥ

अर्थ श्लोक 2 के साथ

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श्लोक 5

उपर्युपरि सर्वेषां सोमो देवो महेश्वरः ।तस्थावमितविक्रान्तः स्वैर्गणैः परिवारितः

uparyupari sarveṣāṃ somo devo maheśvaraḥ | tasthāvamitavikrāntaḥ svairgaṇaiḥ parivāritaḥ

श्लोक 5–6 का हिन्दी अर्थ

सबके ऊपर उमासहित अमित पराक्रमी भगवान्‌ महेश्वर अपने प्रमथगणोंसे घिरे हुए खड़े थे । वे सर्वभावन भगवान्‌ शिव उन मुनिश्रेष्ठ देवर्षियोंसे घिरे हुए थे, जिनका सहसों कल्पान्तरोंमें भी विनाश नहीं होता है

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श्लोक 6

देवर्षिँभिर्मुनिश्रेष्ठैः संवृतः सर्वभावनः ।कल्पान्तरसहस्रेषु क्षयो येषां न विद्यते

devarṣi~bhirmuniśreṣṭhaiḥ saṃvṛtaḥ sarvabhāvanaḥ | kalpāntarasahasreṣu kṣayo yeṣāṃ na vidyate

अर्थ श्लोक 5 के साथ

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श्लोक 7

यानर्चयन्ति सततं देवा देवेश्वरोपमाः ।आत्मना नावलेपान्धा ये च धर्मपथि स्थिताः

yānarcayanti satataṃ devā deveśvaropamāḥ | ātmanā nāvalepāndhā ye ca dharmapathi sthitāḥ

हिन्दी अर्थ

जो अभिमानसे अन्धे नहीं हुए हैं तथा जो धर्मके मार्गपर स्थित रहनेवाले हैं, वे देवेश्वरोंके समान प्रभावशाली आत्मज्ञानी देवता भी उन देवर्षियोंकी सतत आराधना करते हैं

अध्याय 124

श्लोक 8

रुद्राश्च काश्यपा देवमध्युपासन्त भारत ।स्कन्दश्च भगवानग्निर्गङ्गा च सरितां वरा

rudrāśca kāśyapā devamadhyupāsanta bhārata | skandaśca bhagavānagnirgaṅgā ca saritāṃ varā

श्लोक 8–10 का हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन ! रुद्रगण, कश्यपजीके पुत्र (देवगण), भगवान्‌ स्कन्द, अग्निदेव, सरिताओंमें श्रेष्ठ गड़ा तथा अ्चिष्मानू, तुम्बुरु और वक्ताओंमें श्रेष्ठ भारि (ये तीनों गन्धर्व ) वहाँ महादेव- जीकी सेवामें उनके पास ही खड़े थे। ये सब-के-सब तपोबलसे सम्पन्न होनेके कारण देवाधिदेवोंके भी नेता हैं (उनका नेतृत्व करनेमें समर्थ हैं ) । नरेश्वर ! जो नित्य- निरन्तर धर्म और तपमें संलग्न रहकर सत्पुरुषोंके मार्गका आश्रय ले चुके हैं, वे समस्त देवगण इन रुद्र आदिका अनुसरण करते हैं

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श्लोक 9

अर्चिष्मांस्तुम्बुरुश्चैव भारिश्च वदतां वरः ।नेतारो देवदेवानामेते हि तपसान्विताः

arciṣmāṃstumburuścaiva bhāriśca vadatāṃ varaḥ | netāro devadevānāmete hi tapasānvitāḥ

अर्थ श्लोक 8 के साथ

अध्याय 124

श्लोक 10

एताननुविधीयन्ते सर्वदेवगणा नृप ।धर्मनित्यास्तपोनित्याः सतां मार्गमुपाश्रिताः

etānanuvidhīyante sarvadevagaṇā nṛpa | dharmanityāstaponityāḥ satāṃ mārgamupāśritāḥ

अर्थ श्लोक 8 के साथ

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श्लोक 11

ये त्विमे मानुषा देवानर्चयन्ति शुभार्थिनः ।तानर्चयन्ति ह्यमरास्तथा राजञ्छुभार्थिनः

ye tvime mānuṣā devānarcayanti śubhārthinaḥ | tānarcayanti hyamarāstathā rājañchubhārthinaḥ

हिन्दी अर्थ

द्श्५ राजन्‌! जो ये मनुष्य मज़लकी कामना रखकर न देवताओंकी पूजा करते हैं, वे देवता भी उन शुभार्थी नुष्योंको अभीष्ट फल देकर उनका सत्कार करते

अध्याय 124

श्लोक 12

पितृकृत्येषु देवानां संन्यासं ये त्वनुष्ठिताः ।स्वाध्यायवन्तः कौरव्य सदा नियमचारिणः

pitṛkṛtyeṣu devānāṃ saṃnyāsaṃ ye tvanuṣṭhitāḥ | svādhyāyavantaḥ kauravya sadā niyamacāriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन ! जो देवताओं और पितरोंके कृत्योंमें गे रहते हैं, जिन्होंने संन्यासधर्मका अनुष्ठान किया है, सदा स्वाध्यायशील तथा नियमोंके पालनमें तत्पर ते हैं (उन मनुष्योंको भी अभीष्ट फल देकर वे देवता नका सत्कार करते हैं)

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श्लोक 13

गन्धर्वाधिपतिः श्रीमांस्तत्र चित्ररथो नृप ।सपुत्रो वादयामास देववाद्यानि हृष्टवत्

gandharvādhipatiḥ śrīmāṃstatra citraratho nṛpa | saputro vādayāmāsa devavādyāni hṛṣṭavat

हिन्दी अर्थ

नरेध्वर! उस उत्सवके मय वहाँ श्रीमान्‌ गन्धर्वराज चित्ररथ पुत्रसहित प्रसन्नतापूर्वक वसम्बन्धी वाद्य बजा रहे थे

अध्याय 124

श्लोक 14

ऊर्णायुश्चित्रसेनश्च हाहा हूहूस्तथैव च ।डुम्बरस्तुम्बुरुश्चैव जगुरन्ये च षड्गुणान्

ūrṇāyuścitrasenaśca hāhā hūhūstathaiva ca | ḍumbarastumburuścaiva jaguranye ca ṣaḍguṇān

हिन्दी अर्थ

ऊर्णायु, चित्रसेन, हहा, हूहू, डुम्बर, तुम्बुरु तथा अन्य गन्धर्व छः * गुणोंसे क्त गीत गा रहे थे

अध्याय 124

श्लोक 15

उर्वशी विप्रचित्तिश्च हेमा रम्भा च भारत ।हेमदन्ता घृताची च सहजन्या तथैव च

urvaśī vipracittiśca hemā rambhā ca bhārata | hemadantā ghṛtācī ca sahajanyā tathaiva ca

हिन्दी अर्थ

भारत! उर्वशी, विप्रचित्ति, मा, रम्भा, हेमदन्ता, घृताची और सहजन्या—ये अप्सराएँ ही अपने नृत्य और गीत-कलाका प्रदर्शन करती थीं

अध्याय 124

श्लोक 16

जुजोष भगवान् देवस्तदुपस्थानमात्मवान् ।वृत्तेन तुष्टः शक्रस्य जगाम जगतो गतिः

jujoṣa bhagavān devastadupasthānamātmavān | vṛttena tuṣṭaḥ śakrasya jagāma jagato gatiḥ

हिन्दी अर्थ

पत्मसंयमशील जगदाधार भगवान्‌ महादेव अपनी गराधनासे सम्बन्ध रखनेवाले उस नृत्य-गीत आदिको सन्नतापूर्वक ग्रहण करते-उसका आनन्द लेते थे। द्रके उस बर्ताव एवं व्यवहारसे संतुष्ट हो वे भगवान्‌ शव पुन: अपने स्थानको चले गये

अध्याय 124

श्लोक 17

गते भूतपतौ सर्वे नृपा जग्मुर्यथागतम् ।महेन्द्रेणार्चिता देवाः स्वानेव निलयान्गताः

gate bhūtapatau sarve nṛpā jagmuryathāgatam | mahendreṇārcitā devāḥ svāneva nilayāngatāḥ

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ तनाथके चले जानेपर समस्त राजर्षि (जो अपने पुण्यफलसे वर्गमें आये थे, ) वहाँसे अपने-अपने स्थानको लौट गये था देवता भी देवराज इन्द्रसे सम्मानित हो अपने ववनोंको ही चले गये

अध्याय 124

श्लोक 18

ततः सर्वेषु यातेषु सुखासीनं पुरन्दरम् ।सदस्यैः स्वैः सहासीनं नारदोऽभिययौ मुनिः

tataḥ sarveṣu yāteṣu sukhāsīnaṃ purandaram | sadasyaiḥ svaiḥ sahāsīnaṃ nārado'bhiyayau muniḥ

हिन्दी अर्थ

जब सब लोग विदा हो ये और देवराज इन्द्र सुखपूर्वक सिंहासनपर बैठ गये, स समय अपने सदस्योंके साथ बैठे हुए इन्द्रके पास रद मुनि गये

अध्याय 124

श्लोक 19

तमिन्द्रः पूजयामास समुत्थाय तपोधनम् ।दिदेश कुशगर्भे च पीठमात्मासनोपमम्

tamindraḥ pūjayāmāsa samutthāya tapodhanam | dideśa kuśagarbhe ca pīṭhamātmāsanopamam

हिन्दी अर्थ

इन्द्रने उठकर उन तपोधनका जन किया और अपने आसनके समान ही एक पीठ न्हें बैठनेके लिये दिया, जिसके भीतर कुश बिछा आ था

अध्याय 124

श्लोक 20

नारदोऽथ महातेजा महेन्द्रमिदमब्रवीत् ।दूतोऽहममरश्रेष्ठ विष्णोरतुलतेजसः

nārado'tha mahātejā mahendramidamabravīt | dūto'hamamaraśreṣṭha viṣṇoratulatejasaḥ

हिन्दी अर्थ

किंतु महातेजस्वी नारदने (खड़े-खड़े ) महेन्रसे कहा—' अमस्त्रेष्ठ! मैं इस समय अनुपम तेजस्वी गगवानू विष्णुका दूत हूँ

अध्याय 124

श्लोक 21

किञ्चित्कार्यं पुरस्कृत्य प्रेषितोऽस्मि महात्मना ।आनर्तादार्तिहरणं तस्यैवानघतेजसः

kiñcitkāryaṃ puraskṛtya preṣito'smi mahātmanā | ānartādārtiharaṇaṃ tasyaivānaghatejasaḥ

हिन्दी अर्थ

उन महात्मा श्रीकृष्णने छ कार्य सामने रखकर मुझे आनर्तदेश (द्वारकापुरी )- । यहाँ भेजा है । उन निर्मल तेजस्वी श्रीकृष्णका ही कष्ट र्‌ करना आजका मुख्य कार्य है( जिसके लिये मैं यहाँ माया हूँ) '

अध्याय 124

श्लोक 22

प्रीतिवाक्यानि हृद्यानि प्रयुज्य मुनये तदा ।ततः प्रहृष्टो भगवानब्रवीत् पाकशासनः

prītivākyāni hṛdyāni prayujya munaye tadā | tataḥ prahṛṣṭo bhagavānabravīt pākaśāsanaḥ

हिन्दी अर्थ

तब हर्षमें भरे हुए भगवान्‌ इन्द्रने वर्षि नारदके प्रति मनको प्रिय लगनेवाले प्रेमपूर्ण चनोंका प्रयोग करके इस प्रकार पूछा—

अध्याय 124

श्लोक 23

किमाह पुरुषश्रेष्ठः शीघ्रमाचक्ष्व मे मुने ।चिरस्य खलु कृष्णेन संस्मृतोऽस्मि महात्मना

kimāha puruṣaśreṣṭhaḥ śīghramācakṣva me mune | cirasya khalu kṛṣṇena saṃsmṛto'smi mahātmanā

हिन्दी अर्थ

गीतके छ: गुण हैं। (नीलकण्ठीसे ) “मुने! पुरुषोत्तम श्रीकृष्णका कौन-सा संदेश है, यह मुझे शीघ्र बताइये। निश्चय ही महात्मा श्रीकृष्णने चिरकालके पश्चात्‌ मेरा स्मरण किया है'

अध्याय 124

श्लोक 24

महेन्द्रेन्द्रानुजं द्रष्टुं गतोऽहं भ्रातरं तव ।कथञ्चिद्द्वारकां तत्र काश्यपानां यशस्करम्

mahendrendrānujaṃ draṣṭuṃ gato'haṃ bhrātaraṃ tava | kathañciddvārakāṃ tatra kāśyapānāṃ yaśaskaram

हिन्दी अर्थ

नारदजीने कहा—महेन्द्र! मैं तुम्हारे छोटे भाई श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये किसी तरह द्वारका जा पहुँचा था, जो वहाँ रहकर कश्यपकी संतानों (देवताओं )- के यशका विस्तार करते हैं

अध्याय 124

श्लोक 25

तं तु रैवतकेऽद्राक्षं तदासीनमरिन्दमम् ।रुक्मिण्या सहितं वीरमुमयेव वृषध्वजम्

taṃ tu raivatake'drākṣaṃ tadāsīnamarindamam | rukmiṇyā sahitaṃ vīramumayeva vṛṣadhvajam

हिन्दी अर्थ

वे शत्रुदमन वीर उस समय (द्वारकापुरीके निकटवर्ती ) रैवतक पर्वतपर रुक्मिणी देवीके साथ उसी तरह विराजमान थे, जैसे भगवान्‌ शड्ूर उमा देवीके साथ (कैलास या मन्दराचलपर) विराज रहे हों

अध्याय 124

श्लोक 26

पारिजाततरोः पुष्पं तस्य दत्तं मयानघ ।विस्मापनार्थं देवेश पत्नीनामुरुतेजसः

pārijātataroḥ puṣpaṃ tasya dattaṃ mayānagha | vismāpanārthaṃ deveśa patnīnāmurutejasaḥ

हिन्दी अर्थ

निष्पाप देवेश्वर! वहाँ मैंने उन महातेजस्वी श्रीकृष्णके हाथमें उनकी पत्नियोंको विस्मयमें डालनेके लिये पारिजात-वृक्षका एक फूल दिया

अध्याय 124

श्लोक 27

तद् दृष्ट्वा तस्य पत्न्यस्तु विस्मयं परमं ययुः ।बहुकामप्रदं पुष्पं वृक्षराजसमुद्भवम्

tad dṛṣṭvā tasya patnyastu vismayaṃ paramaṃ yayuḥ | bahukāmapradaṃ puṣpaṃ vṛkṣarājasamudbhavam

हिन्दी अर्थ

वृक्षराज पारिजातके उस पुष्पको, जो बहुत-सी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है, देखकर उनकी पत्नियोंको बड़ा आश्चर्य हुआ

अध्याय 124

श्लोक 28

गुणास्तासां मया ख्यातास्तस्य पुष्पस्य मानद ।सृष्टिश्च पारिजातस्य कश्यपेन महात्मना

guṇāstāsāṃ mayā khyātāstasya puṣpasya mānada | sṛṣṭiśca pārijātasya kaśyapena mahātmanā

हिन्दी अर्थ

मानद! वहाँ मैंने उनकी पत्नियोंको उस फूलके गुण भी बताये और यह भी कहा कि महात्मा कश्यपने पारिजातकी सृष्टि की है

अध्याय 124

श्लोक 29

अदित्या कश्यपो दत्तः पुण्यार्थं च यथा मम ।पुष्पदाम्ना वेष्टयित्वा कण्ठे पुण्यार्थमात्मवान्

adityā kaśyapo dattaḥ puṇyārthaṃ ca yathā mama | puṣpadāmnā veṣṭayitvā kaṇṭhe puṇyārthamātmavān

श्लोक 29–30 का हिन्दी अर्थ

सुरेधर! फिर अदितिने पुण्यकी प्राप्तिके लिये आत्मसंयमी महर्षि कश्यपके गलेमें फूलोंकी माला लपेटकर जिस तरह मेरे हाथमें उनका दान कर दिया था तथा शचीने जिस प्रकार तुम्हारा दान किया था और अन्य देवता भी जिस प्रकार अपनी 'पत्नियोंद्वारा दानमें दिये गये थे एवं कश्यप आदि महर्षियोंने जिस प्रकार मुझे अपना निष्क्रय (मूल्य) दिया था, (वह सारा प्रसद्ध मैंने वहाँ सुनाया)

अध्याय 124

श्लोक 30

त्वं च दत्तो यथा शच्या देवाश्चान्ये सुरेश्वर ।निष्क्रयश्च यथा दत्तः कश्यपाद्यैर्महर्षिभिः

tvaṃ ca datto yathā śacyā devāścānye sureśvara | niṣkrayaśca yathā dattaḥ kaśyapādyairmaharṣibhiḥ

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 124

श्लोक 31

तच्छ्रुत्वा तस्य पत्न्येका सत्यभामेति विश्रुता ।पुण्यकार्यं मनश्चक्रे दयिता ते यवीयसः

tacchrutvā tasya patnyekā satyabhāmeti viśrutā | puṇyakāryaṃ manaścakre dayitā te yavīyasaḥ

हिन्दी अर्थ

वह सुनकर उनकी एक पत्नीने, जिसका नाम सत्यभामा है तथा जो तुम्हारे छोटे भाईको बहुत ही प्रिय है, अपने मनमें वह दानरूप पुण्यकार्य करनेका विचार किया

अध्याय 124

श्लोक 32

तया चाभ्यर्थितो भर्ता देव देव्या गणेश्वरः ।प्रतिजज्ञे स धर्मार्थं यवीयांस्तव मानद

tayā cābhyarthito bhartā deva devyā gaṇeśvaraḥ | pratijajñe sa dharmārthaṃ yavīyāṃstava mānada

हिन्दी अर्थ

दूसरोंको मान देनेवाले देव! जैसे देवी पार्वती प्रमथगणोंके स्वामी भगवान्‌ शिवसे कोई बात कहती हैं, उसी प्रकार सत्यभामाने अपने पतिसे पारिजात-वृक्षके लिये प्रार्थना की और तुम्हारे छोटे भाईने उसके धर्मकार्यकी सिद्धिके लिये उस वृक्षको ला देनेकी प्रतिज्ञा कर दी

अध्याय 124

श्लोक 33

ततो मामुक्तवान् वीरो विष्णुर्बलवतां वरः ।यथावत्सुरमुख्येश ब्रुवतः शृणु भावतः

tato māmuktavān vīro viṣṇurbalavatāṃ varaḥ | yathāvatsuramukhyeśa bruvataḥ śṛṇu bhāvataḥ

हिन्दी अर्थ

देवप्रमुख ! _ देवेश्वर! तदनन्तर बलवानोंमें श्रेष्ठ वीर श्रीकृष्णने तुमसे कहनेके लिये मुझसे जो बात कही थी, उसे ज्यों-की- त्यों सुना रहा हूँ; तुम ध्यान देकर सुनो

अध्याय 124

श्लोक 34

लालनीयो यवीयांस्तु प्रणिपत्याच्युतोऽब्रवीत् ।आनयेयं सुरश्रेष्ठ पारिजातं वरद्रुमम्

lālanīyo yavīyāṃstu praṇipatyācyuto'bravīt | ānayeyaṃ suraśreṣṭha pārijātaṃ varadrumam

हिन्दी अर्थ

तुम्हारे छोटे भाई अच्युतने, जो तुमसे लाड़-प्यार पानेके योग्य हैं, तुम्हें प्रणाम करके इस प्रकार कहा है—' सुरश्रेष्ठ ! मैं उत्तम वृक्ष पारिजातकों यहाँ लाना चाहता हूँ!

अध्याय 124

श्लोक 35

मनोरथोऽस्तु सफलो वध्वास्तेऽसुरसूदन ।धर्मकृत्ये विशेषेण वध्वास्ते सुरसत्तम

manoratho'stu saphalo vadhvāste'surasūdana | dharmakṛtye viśeṣeṇa vadhvāste surasattama

हिन्दी अर्थ

# घ१७ यह मनोरथ, जो विशेषत: धर्मकार्यसे सम्बन्ध रखता है, सफल होना चाहिये

अध्याय 124

श्लोक 36

अयं दर्शितकल्याणो लोको लोकगणेश्वर ।पश्यन्त्यमरकल्याणं मत्प्रभावाच्च मानवाः

ayaṃ darśitakalyāṇo loko lokagaṇeśvara | paśyantyamarakalyāṇaṃ matprabhāvācca mānavāḥ

हिन्दी अर्थ

लोकगणेश्वर ! यह मनुष्यलोक भी उस कल्याणमय वृक्षका दर्शन कर सके (ऐसी कृपा कीजिये) । मेरे प्रभावसे मनुष्य भी देवताओंके लिये कल्याणकारी वृक्ष पारिजातका दर्शन कर लें (ऐसा अवसर दीजिये) '

अध्याय 124

श्लोक 37

वासुदेववचः श्रुत्वा महेन्द्रः कुरुनन्दन ।नारदं वदतां श्रेष्ठमिदं वाक्यमथाब्रवीत्

vāsudevavacaḥ śrutvā mahendraḥ kurunandana | nāradaṃ vadatāṃ śreṣṭhamidaṃ vākyamathābravīt

श्लोक 37–38 का हिन्दी अर्थ

द्विजश्रेष्ठ ! पहले आसन तो ग्रहण कीजिये । ब्रह्मन्‌! आपने उचित बात कही है। मैं अनुपम तेजस्वी विष्णुके लिये संदेशका उत्तर दूँगा

अध्याय 124

श्लोक 38

भजासनं द्विजश्रेष्ठ युक्तमुक्तं त्वया द्विज ।सन्देशं प्रतिदास्यामि विष्णोरतुलतेजसः

bhajāsanaṃ dvijaśreṣṭha yuktamuktaṃ tvayā dvija | sandeśaṃ pratidāsyāmi viṣṇoratulatejasaḥ

अर्थ श्लोक 37 के साथ

अध्याय 124

श्लोक 39

आसीने नारदे शक्रो लब्धानुज्ञोऽथ नारदात् ।स्वमासनं ततो भेजे तस्यैव सदृशं प्रभो

āsīne nārade śakro labdhānujño'tha nāradāt | svamāsanaṃ tato bheje tasyaiva sadṛśaṃ prabho

हिन्दी अर्थ

प्रभो! जब नारदजी बैठ गये, तब उन्हींसे आज्ञा लेकर इन्द्र अपने सिंहासनपर बैठे, जो उन्हींके अनुरूप था

अध्याय 124

श्लोक 40

उपविष्टः सुरपतिरथोबाच तपोधनम् ।निरीक्ष्य स्वबलं वीर्यं हर्षदं वृत्रनाशनः

upaviṣṭaḥ surapatirathobāca tapodhanam | nirīkṣya svabalaṃ vīryaṃ harṣadaṃ vṛtranāśanaḥ

हिन्दी अर्थ

सिंहासनपर बैठकर वृत्रासुरका विनाश करनेवाले देवराज इन्द्रने अपने हर्षदायक बल और पराक्रमकी ओर दृष्टिपात करके तपोधन नारदजीसे कहा

अध्याय 124

श्लोक 41

महर्षे कुशलं पृष्ट्वा वक्तव्यस्ते जनार्दनः ।वचनान्मम धर्मज्ञ सर्वभूतसुखावहः

maharṣe kuśalaṃ pṛṣṭvā vaktavyaste janārdanaḥ | vacanānmama dharmajña sarvabhūtasukhāvahaḥ

हिन्दी अर्थ

इन्द्र बोले—धर्मज्ञ महर्षे ! आप मेरी ओरसे कुशल पूछकर समस्त प्राणियोंको सुख देनेवाले जनार्दनसे मेरे ही शब्दोंमें इस प्रकार कहियेगा—

अध्याय 124

श्लोक 42

मदनन्तरमीशस्त्वं जगतो नात्र संशयः ।त्वदीयः पारिजातश्च रत्नान्यन्यानि चाच्युत

madanantaramīśastvaṃ jagato nātra saṃśayaḥ | tvadīyaḥ pārijātaśca ratnānyanyāni cācyuta

हिन्दी अर्थ

अच्युत! मेरे बाद तुम्हीं इस जगत्‌के ईश्वर हो, इसमें संशय नहीं है। इस दृष्टिसे पारिजात तथा दूसरे-दूसरे रत्न भी तुम्हारे ही हैं

अध्याय 124

श्लोक 43

त्वं तु भारावतरणं कर्तुं देव महीं गतः ।मानुष्यं सर्ववृत्तानां स्थितः कार्यस्य सिद्धये

tvaṃ tu bhārāvataraṇaṃ kartuṃ deva mahīṃ gataḥ | mānuṣyaṃ sarvavṛttānāṃ sthitaḥ kāryasya siddhaye

हिन्दी अर्थ

परंतु देव! तुम पृथ्वीका भार उतारनेके लिये भूतलपर गये हो और अभीष्ट कार्यकी सिद्धिके लिये सभी बर्तावों और व्यवहारोंमें मानवीय मर्यादाका ही आश्रय लेते हो

अध्याय 124

श्लोक 44

त्वयि तीर्णप्रतिज्ञे हि पुनः प्राप्ते त्रिविष्टपम् ।पूरयिष्यामि वध्वास्ते इष्टान् कामानधोक्षज

tvayi tīrṇapratijñe hi punaḥ prāpte triviṣṭapam | pūrayiṣyāmi vadhvāste iṣṭān kāmānadhokṣaja

हिन्दी अर्थ

अधोक्षज ! जब तुम भूभारहरणकी प्रतिज्ञा पूरी करके पुनः स्वर्गलोकमें आओगे, उस समय मैं तुम्हारी पत्नी सत्यभामाके सभी अभीष्ट मनोरथोंको पूर्ण करूँगा

अध्याय 124

श्लोक 45

स्वर्गीयानि च रत्नानि न नेतव्यानि केशव ।स्वल्पार्थे मानुषं लोकमिति पूर्वकृता स्थितिः

svargīyāni ca ratnāni na netavyāni keśava | svalpārthe mānuṣaṃ lokamiti pūrvakṛtā sthitiḥ

हिन्दी अर्थ

केशव! किसी छोटे-मोटे कार्यके लिये स्वर्गीय रत्नोंको मनुष्यलोकमें नहीं ले जाना चाहिये। यह पूर्वकालकी ही बाँधी गयी मर्यादा है

अध्याय 124

श्लोक 46

उत्क्रम्य हि स्थितिं दैवीं प्रवर्तामि महाबल ।यद्यहं किं प्रवक्ष्यन्ति प्रजापतिगणाः प्रभो

utkramya hi sthitiṃ daivīṃ pravartāmi mahābala | yadyahaṃ kiṃ pravakṣyanti prajāpatigaṇāḥ prabho

हिन्दी अर्थ

महान्‌ बलशाली प्रभो ! यदि मैं देवलोककी मर्यादाका उल्लड्ढन करके कोई नया बर्ताव करूँ तो प्रजापतिगण मुझे क्या कहेंगे

अध्याय 124

श्लोक 47

ब्रह्मणा सह पुत्रेण सपौत्रेण महात्मना ।नियमाः सर्वकृत्यानां स्थापिता जगतो ध्रुवाः

brahmaṇā saha putreṇa sapautreṇa mahātmanā | niyamāḥ sarvakṛtyānāṃ sthāpitā jagato dhruvāḥ

हिन्दी अर्थ

पुत्र और पौत्रोंसहित महात्मा ब्रह्माजीने जगत्‌के समस्त कार्योके लिये कुछ अटल नियम निश्चित कर दिये हैं

अध्याय 124

श्लोक 48

प्रजापतिकृतं मार्गमपास्य व्रजतो मम ।श्रुत्वा प्रजापतिर्धीमाञ्च्छापमप्युत्सृजेत् प्रभुः

prajāpatikṛtaṃ mārgamapāsya vrajato mama | śrutvā prajāpatirdhīmāñcchāpamapyutsṛjet prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

यदि मैं प्रजापति ब्रह्माद्वारा नियत किये गये मार्गको छोड़कर चलूँ तो इसे सुनकर बुद्धिमान्‌ भगवान्‌ प्रजापति मुझे शाप भी दे सकते हैं '

अध्याय 124

श्लोक 49

अस्माभिर्भिद्यमानं हि मर्यादासेतुबन्धनम् ।भेत्स्यन्त्यशङ्किता दैत्या दैत्यपक्षास्तथापरे

asmābhirbhidyamānaṃ hi maryādāsetubandhanam | bhetsyantyaśaṅkitā daityā daityapakṣāstathāpare

हिन्दी अर्थ

यदि हमलोग ही प्राचीन मर्यादारूपी सेतुका बन्धन तोड़ दें तब तो दैत्य तथा दैत्यपक्षके दूसरे लोग निःशड्ू होकर उन मर्यादाओंका भेदन करने लगेंगे

अध्याय 124

श्लोक 50

स्त्रीनिमित्तमितो नीते पारिजाते द्रुमेश्वरे ।स्वर्गौकसो भविष्यन्ति विमनस्काश्च मानद

strīnimittamito nīte pārijāte drumeśvare | svargaukaso bhaviṣyanti vimanaskāśca mānada

हिन्दी अर्थ

मानद! यदि केवल एक स्त्रीको संतुष्ट करनेके लिये स्वर्गसे वृक्षराज पारिजातको भूतलपर पहुँचा दिया जाय तो स्वर्गलोकके निवासियोंका मन उदास हो जायगा

अध्याय 124

श्लोक 51

उपभोगा मनुष्याणां विहिता ये स्वयम्भुवा ।तैस्तु तुष्यतु मे भ्राता सम्पश्यन्कालपर्ययम्

upabhogā manuṣyāṇāṃ vihitā ye svayambhuvā | taistu tuṣyatu me bhrātā sampaśyankālaparyayam

हिन्दी अर्थ

स्वयम्भू ब्रह्माने मनुष्योंके लिये जो उपभोगकी वस्तुएँ बनायी हैं, समयके परिवर्तनको देखते हुए मेरे भाईको उन्हींसे संतोष करना चाहिये

अध्याय 124

श्लोक 52

इहापि तात त्रिदिवे मम यः स्यात्परिग्रहः ।त्रिदिवस्थोऽपि तं कृष्णः सर्वं भोक्तुमिहार्हति

ihāpi tāta tridive mama yaḥ syātparigrahaḥ | tridivastho'pi taṃ kṛṣṇaḥ sarvaṃ bhoktumihārhati

हिन्दी अर्थ

तात ! इस स्वर्गलोकमें मेरे पास जो भोग-सामग्रियोंका संग्रह है, वह सब श्रीकृष्ण यहाँ रहकर भी तो भोग सकते हैं

अध्याय 124

श्लोक 53

हृष्टो ह्यामिषभोज्यानामभिमानाज्जनार्दनः ।ततो धर्मं समुत्सृज्य पापमेवानुवर्तते

hṛṣṭo hyāmiṣabhojyānāmabhimānājjanārdanaḥ | tato dharmaṃ samutsṛjya pāpamevānuvartate

हिन्दी अर्थ

मर्त्यलोककी भोग्य वस्तुओंसे हृष्ट-पुष्ठ होनेके कारण जनार्दन श्रीकृष्णको कुछ अभिमान हो गया है। उस अभिमानके कारण ही वे धर्मका परित्याग करके पापका ही अनुसरण कर रहे हैं

अध्याय 124

श्लोक 54

स्त्रीवश्यता ख्याप्यमाना कृष्णस्य हि महात्मनः ।जगत्यथशसा योगं जनयेदिति मे मतिः

strīvaśyatā khyāpyamānā kṛṣṇasya hi mahātmanaḥ | jagatyathaśasā yogaṃ janayediti me matiḥ

हिन्दी अर्थ

महात्मा श्रीकृष्ण स्त्रीके वशीभूत रहते हैं, इस बातकी प्रसिद्धि तो उनके लिये संसारमें अयश या कलड्डकी ही प्राप्ति करायेगी; ऐसा मेरा विश्वास है

अध्याय 124

श्लोक 55

मानुष्यं मानुषे प्राप्तो यदेतन्मधुसूदनः ।कुर्यान्निर्बन्धनीयं यद् भ्रात्रा ज्येष्ठेन नारद

mānuṣyaṃ mānuṣe prāpto yadetanmadhusūdanaḥ | kuryānnirbandhanīyaṃ yad bhrātrā jyeṣṭhena nārada

हिन्दी अर्थ

नारद! मनुष्यलोकमें मानव-शरीरको प्राप्त हुए मधुसूदन यदि मुझ बड़े भाईके साथ दुराग्रहपूर्ण बर्ताव करें तो यह उनके लिये उचित नहीं है

अध्याय 124

श्लोक 56

स्वर्ग्यरत्नविलोपेन धर्षणा स्यान्ममानघ ।ज्ञातितो धर्षणा चैव विशेषेणैव गर्हिता

svargyaratnavilopena dharṣaṇā syānmamānagha | jñātito dharṣaṇā caiva viśeṣeṇaiva garhitā

हिन्दी अर्थ

निष्पाप देवर्षे ! स्वर्गीय रत्नके विलोप होने-उसके लूटे जानेसे मेरा तिरस्कार होगा और अपने भाई-बन्धुसे तिरस्कार पाना तो बहुत ही निन्दित है

अध्याय 124

श्लोक 57

धर्ममर्थं च कामं च क्रमेण मधुसूदनः ।सेवत्वेष सतां धर्मान्स्थापितान् पद्मयोनिना

dharmamarthaṃ ca kāmaṃ ca krameṇa madhusūdanaḥ | sevatveṣa satāṃ dharmānsthāpitān padmayoninā

हिन्दी अर्थ

ये मधुसूदन क्रमश: धर्म, अर्थ और कामका सेवन करें । ब्रह्माजीके द्वारा स्थापित किये हुए सत्पुरुषोंके धर्मोका आश्रय लें

अध्याय 124

श्लोक 58

महीतलं पारिजातमर्पयिष्याम्यहं यदि ।पौलोमीमादितः कृत्वा को नु मां बहु मंस्यते

mahītalaṃ pārijātamarpayiṣyāmyahaṃ yadi | paulomīmāditaḥ kṛtvā ko nu māṃ bahu maṃsyate

हिन्दी अर्थ

यदि मैं पारिजातकों भूतलपर भेज दूँगा तो शचीसे लेकर कौन ऐसा स्वर्गवासी होगा,जो मुझे अधिक आदरकी दृष्टिसे देखेगा

अध्याय 124

श्लोक 59

पारिजातं महीपृष्ठे दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा च मानुषाः ।स्वर्गार्थे नोद्यमिष्यन्ति दृष्ट्वा स्वर्गफलं क्षितौ

pārijātaṃ mahīpṛṣṭhe dṛṣṭvā spṛṣṭvā ca mānuṣāḥ | svargārthe nodyamiṣyanti dṛṣṭvā svargaphalaṃ kṣitau

हिन्दी अर्थ

भूतलपर पारिजातका दर्शन और स्पर्श करके मनुष्य पृथ्वीपर ही स्वर्गका फल उपलब्ध हुआ देख स्वर्गकी प्राप्तिकि लिये उद्यम ही नहीं करेंगे

अध्याय 124

श्लोक 60

पारिजातगुणान् मर्त्या जुषन्ति यदि नारद ।देवतानां मनुष्याणां न विशेषो भविष्यति

pārijātaguṇān martyā juṣanti yadi nārada | devatānāṃ manuṣyāṇāṃ na viśeṣo bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

नारद! यदि मनुष्य पारिजातके गुणों (और उससे मिलनेवाले लागभों )- का सेवन करने लगेंगे तो देवताओं और मनुष्योंमें कोई अन्तर ही नहीं रह जायगा

अध्याय 124

श्लोक 61

तत्र यत् क्रियते कर्म इह तद् भुज्यते नरैः ।स्वर्गार्थं न यतिष्यन्ति पारिजातगुणान्विताः

tatra yat kriyate karma iha tad bhujyate naraiḥ | svargārthaṃ na yatiṣyanti pārijātaguṇānvitāḥ

हिन्दी अर्थ

मर्त्यलोकमें जो शुभकर्म किया जाता है,उसका फल मनुष्य यहाँ स्वर्गमें आकर भोगते हैं । जब उन्हें भूतलपर ही पारिजातके गुण (लाभ) प्राप्त होने लगेंगे, तब वे स्वर्गके लिये यत्न नहीं करेंगे

अध्याय 124

श्लोक 62

सर्वरत्नवरः स्वर्गे पारिजातस्तपोधन ।तुल्यं देवसमैर्मर्त्यैः सर्वदैव जगद् भवेत्

sarvaratnavaraḥ svarge pārijātastapodhana | tulyaṃ devasamairmartyaiḥ sarvadaiva jagad bhavet

हिन्दी अर्थ

तपोधन ! पारिजात स्वर्गके सब रलनोंमें श्रेष्ठ है। यदि यह भूतलपर चला गया तो मनुष्य देवताओंके समान हो जायँगे और (उनसे भरा हुआ) सारा जगत्‌ सदा ही (स्वर्गके) तुल्य हो जायगा'

अध्याय 124

श्लोक 63

यज्ञैर्मर्त्या न यक्ष्यन्ति लब्धस्वर्गफला भुवि ।न पूर्तानि प्रदास्यन्ति तुल्यत्वममरैर्गताः

yajñairmartyā na yakṣyanti labdhasvargaphalā bhuvi | na pūrtāni pradāsyanti tulyatvamamarairgatāḥ

हिन्दी अर्थ

प्राप्त हुए मनुष्य न तो यज्ञोंद्वारा देवताओंका यजन करेंगे और न पूर्तकर्मोमें ही धन लगायेंगे

अध्याय 124

श्लोक 64

यज्ञैर्जप्याह्निकैश्चैव नित्यमाप्याययन्ति नः ।मानुषाः स्वर्गमिच्छन्तः श्रद्दधानास्तपोधन

yajñairjapyāhnikaiścaiva nityamāpyāyayanti naḥ | mānuṣāḥ svargamicchantaḥ śraddadhānāstapodhana

हिन्दी अर्थ

तपोधन ! श्रद्धालु मनुष्य स्वर्गकी अभिलाषा रखकर यज्ञ, जप तथा नित्य कर्मेंकि द्वारा सदा हमलोगोंको तृप्त एवं पुष्ठ करते हैं

अध्याय 124

श्लोक 65

तत् सर्वं न करिष्यन्ति पारिजातगुणान्विताः ।निस्तेजसो भविष्याम ते गतास्तद्विहीनताम्

tat sarvaṃ na kariṣyanti pārijātaguṇānvitāḥ | nistejaso bhaviṣyāma te gatāstadvihīnatām

हिन्दी अर्थ

परंतु पारिजातका लाभ मिल जानेपर मनुष्य वह सब कुछ नहीं करेंगे; फिर तो उन यज्ञ आदिसे वल्चित होकर हम सब देवता निस्तेज हो जायूँगे

अध्याय 124

श्लोक 66

इतः सुवृष्ट्या सस्यैस्ते जीवन्ति पुरुषा भुवि ।आप्याययन्तस्तेऽप्यस्मान् दानैर्यज्ञैस्तथैव च

itaḥ suvṛṣṭyā sasyaiste jīvanti puruṣā bhuvi | āpyāyayantaste'pyasmān dānairyajñaistathaiva ca

हिन्दी अर्थ

स्वर्गकी ओरसे जब अच्छी वर्षा की जाती है, तब उससे पैदा होनेवाले सस्यों (अनाजों )-द्वारा भूतलके मनुष्य जीवन-निर्वाह करते हैं और वे भी दान एवं यज्ोंद्वारा हम देवताओंका पोषण करते हैं

अध्याय 124

श्लोक 67

न बुभुक्षा पिपासा वा बाधते यदि मानुषान् ।रोगो जरा वा मृत्युर्वा धर्मज्ञारतिरेव च

na bubhukṣā pipāsā vā bādhate yadi mānuṣān | rogo jarā vā mṛtyurvā dharmajñāratireva ca

श्लोक 67–68 का हिन्दी अर्थ

धर्मज्ञ नारद! पारिजातका लाभ मिल जानेपर यदि मनुष्योंको भूख-प्यास नहीं सतायेगी, रोग, बुढ़ापा, अरति (असंतोष या दुःख-शोक) अथवा मृत्युकी प्राप्ति नहीं होगी, उनमें दुर्गन्ध नहीं रहेगा और कर्मजनित भयंकर ईतियाँ* उन्हें बाधा नहीं देंगी तो वे स्वर्गके लिये क्यों उद्योग करेंगे

अध्याय 124

श्लोक 68

दौर्गन्ध्यं वा सुघोरा वा ईतयः कर्मसम्भवाः ।किमुद्योगं करिष्यन्ति पारिजातगुणान्विताः

daurgandhyaṃ vā sughorā vā ītayaḥ karmasambhavāḥ | kimudyogaṃ kariṣyanti pārijātaguṇānvitāḥ

अर्थ श्लोक 67 के साथ

अध्याय 124

श्लोक 69

सर्वथा नयनं तत्र पारिजातस्य न क्षमम् ।इति वाच्यस्त्वया विप्र विष्णुरक्लिष्टकर्मकृत्

sarvathā nayanaṃ tatra pārijātasya na kṣamam | iti vācyastvayā vipra viṣṇurakliṣṭakarmakṛt

हिन्दी अर्थ

विप्रवर ! पारिजातका मर्त्यलोकमें ले जाया जाना सर्वथा अनुचित है। यह बात आप अनायास ही महान्‌ कर्म करनेवाले भगवान्‌ विष्णु (श्रीकृष्ण)-से कह दीजियेगा

अध्याय 124

श्लोक 70

यथा यथा च मे भ्राता तुष्यत्येतद् विचारयन् ।तथा तथा त्वया कार्यं कार्यं मत्प्रीतिमिच्छता

yathā yathā ca me bhrātā tuṣyatyetad vicārayan | tathā tathā tvayā kāryaṃ kāryaṃ matprītimicchatā

हिन्दी अर्थ

मुने! मेरी प्रसन्नतनाकी इच्छा रखकर आपको वहाँ वैसा ही कार्य या प्रयत्ल करना चाहिये, जिससे मेरे इस कथनपर विचार करके मेरे भाई श्रीकृष्ण संतुष्ट हो जायेँ

अध्याय 124

श्लोक 71

हाराश्च मणयश्चैव चन्दनान्यगुरूणि च ।वस्त्राणि च विचित्राणि वध्वास्त्वं द्वारकां नय

hārāśca maṇayaścaiva candanānyagurūṇi ca | vastrāṇi ca vicitrāṇi vadhvāstvaṃ dvārakāṃ naya

हिन्दी अर्थ

देवर्षे ! आप बहू सत्यभामाके लिये यहाँसे हार, मणि, चन्दन, अगुरु और विचित्र वस्त्र द्वारकाको ले जाइये

अध्याय 124

श्लोक 72

योग्यानि यानि मर्त्यानां यावदिच्छति केशवः ।न स्वर्गपरिमोषं तु कर्तुमर्हति साम्प्रतम्

yogyāni yāni martyānāṃ yāvadicchati keśavaḥ | na svargaparimoṣaṃ tu kartumarhati sāmpratam

हिन्दी अर्थ

जो-जो वस्तुएँ मनुष्यों के योग्य हैं, उन्हें श्रीकृष्ण जितना चाहें ले सकते हैं; परंतु उन्हें इस समय स्वर्गलोकको लूटकर इसे कंगाल बना देना उचित नहीं है

अध्याय 124

श्लोक 73

ददामि रत्नानि यथेप्सितान्यहं बहूनि चित्राणि विभूषणानि च ।न पारिजातं च कथञ्चन द्रुमं मुने प्रदास्यामि दिवौकसां प्रियम्

dadāmi ratnāni yathepsitānyahaṃ bahūni citrāṇi vibhūṣaṇāni ca | na pārijātaṃ ca kathañcana drumaṃ mune pradāsyāmi divaukasāṃ priyam

हिन्दी अर्थ

मुने! मैं श्रीकृष्णकी इच्छाके अनुसार बहुत- से रत्त और विचित्र आभूषण दे रहा हूँ, परंतु पारिजात वृक्षको मैं किसी प्रकार नहीं दूँगा; क्योंकि यह स्वर्गवासियोंको बहुत प्रिय है (इसे वे अन्यत्र जाने देना नहीं चाहते)

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

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पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.