Harivamsha Purana
122
अध्याय 122 / 318

Parva 2, Adhyāya 67

72 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ72 श्लोक

अध्याय 122

श्लोक 1

श्रीकृष्णेन पृष्टे सति सत्यभामया स्वरोषस्य खेदस्य च कारणकथनम्, श्रीकृष्णेन तस्यै पारिजातवृक्षस्य आनयनस्य विश्वासेन सन्तुष्टकरणम्, सत्यभामया श्रीकृष्णेन साकं नारदस्य सत्कारम्, नारदेन पारिजातस्य उत्पत्तेः एवं महिम्नस्य वर्णनम् ।नारायणः सत्यभामां पुनरेवैष भारत ।प्रोवाच प्रणयात् क्रुद्धामभिमानवतीं सतीम्

śrīkṛṣṇena pṛṣṭe sati satyabhāmayā svaroṣasya khedasya ca kāraṇakathanam, śrīkṛṣṇena tasyai pārijātavṛkṣasya ānayanasya viśvāsena santuṣṭakaraṇam, satyabhāmayā śrīkṛṣṇena sākaṃ nāradasya satkāram, nāradena pārijātasya utpatteḥ evaṃ mahimnasya varṇanam | nārāyaṇaḥ satyabhāmāṃ punarevaiṣa bhārata | provāca praṇayāt kruddhāmabhimānavatīṃ satīm

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—भारत! नारायणस्वरूप श्रीकृष्णने प्रेमवश कुपित हुई अपनी अभिमानिनी पत्नी सती सत्यभामासे पुनः इस प्रकार कहा

अध्याय 122

श्लोक 2

दहतीव ममाङ्गानि शोकः कमललोचने ।किमु तत् कारणं येन त्वमेवमतिविक्लवा

dahatīva mamāṅgāni śokaḥ kamalalocane | kimu tat kāraṇaṃ yena tvamevamativiklavā

हिन्दी अर्थ

श्रीभगवान्‌ू बोले—कमललोचने! तुम्हारा दुःख देखकर मुझे जो शोक हुआ है, वह मेरे सारे अड्ोंको दग्ध-सा कर रहा है। वह कौन-सा ऐसा कारण है, जिससे तुम इस तरह अत्यन्त व्याकुल हो उठी हो

अध्याय 122

श्लोक 3

शापितासि मम प्राणैराचक्ष्वानत्ययो यदि ।श्रोतव्यं यदि भक्तेन भर्त्रा सर्वाङ्गशोभने

śāpitāsi mama prāṇairācakṣvānatyayo yadi | śrotavyaṃ yadi bhaktena bhartrā sarvāṅgaśobhane

हिन्दी अर्थ

सवज्ञिशोभने ! मैं अपने प्राणोंकी शपथ दिलाकर पूछता हूँ। यदि तुम्हें मेरा विनाश अभीष्ट नहीं है और यदि वह बात एक पत्नीभक्त पतिके सुननेयोग्य है तो उसे कहो

अध्याय 122

श्लोक 4

ततः प्रोवाच भर्तारं सत्या सत्यव्रते स्थितम् ।बाष्पगद्गदया वाचा तथैनैधोमुखी स्थिता

tataḥ provāca bhartāraṃ satyā satyavrate sthitam | bāṣpagadgadayā vācā tathainaidhomukhī sthitā

हिन्दी अर्थ

तब सत्यभामा सत्यब्रतके पालनमें स्थित हुए अपने स्वामी श्रीकृष्णसे पूर्ववत्‌ मुख नीचे किये हुए, ही अश्रुगदूद वाणीमें यों बोली—

अध्याय 122

श्लोक 5

त्वयैव स्थापितं पूर्वं सौभाग्यं मम मानद ।जगत्यमलपत्राक्ष यत् ख्यातं केशिनाशन

tvayaiva sthāpitaṃ pūrvaṃ saubhāgyaṃ mama mānada | jagatyamalapatrākṣa yat khyātaṃ keśināśana

हिन्दी अर्थ

दूसरोंको मान देनेवाले कमलनयन! केशिनाशन! तुमने ही पहले मेरे सौभाग्यकी स्थापना की थी, जो जगतमें विख्यात हो गया था

अध्याय 122

श्लोक 6

शिरो वहामि चेष्टत्वात् तवाहं देव गर्विता ।सर्वसीमन्तिनीमध्ये स्पृहणीयास्मि सर्वथा

śiro vahāmi ceṣṭatvāt tavāhaṃ deva garvitā | sarvasīmantinīmadhye spṛhaṇīyāsmi sarvathā

हिन्दी अर्थ

देव! तुम्हारी प्रियतमा होनेके कारण मैं बड़े गर्वसे सिर उठाकर चलती थी और समस्त सौभाग्यवती स्त्रियोंके बीचमें सर्वथा स्पृहणीय बनी हुई थी

अध्याय 122

श्लोक 7

साहमद्यावहास्यास्मि सपत्नीनां जनस्य च ।इति प्रेष्याभिराख्यातं श्रुत्वा तथ्यं ततस्ततः

sāhamadyāvahāsyāsmi sapatnīnāṃ janasya ca | iti preṣyābhirākhyātaṃ śrutvā tathyaṃ tatastataḥ

हिन्दी अर्थ

परंतु आज मैं अपनी सौतों और दूसरे लोगोंकी दृष्टिमें उपहासका पात्र बन गयी हूँ । मेरी दासियोंने जहाँ-तहाँसे इस तथ्य बातको सुनकर मुझे बताया है

अध्याय 122

श्लोक 8

यत् पारिजातकुसुमं दत्तवान् नारदस्तव ।तत् किलेष्टजने दत्तं त्वयाहं परिवर्जिता

yat pārijātakusumaṃ dattavān nāradastava | tat kileṣṭajane dattaṃ tvayāhaṃ parivarjitā

हिन्दी अर्थ

देवर्षि नारदने जो पारिजातका पुष्प तुम्हारे हाथमें दिया था, उसे तुमने अपने प्रियजनको दे दिया और मेरी उस अवसरपर उपेक्षा कर दी

अध्याय 122

श्लोक 9

रत्नातिशयदानेन तस्यामभ्यधिकः किल ।स्नेहश्च बहुमानश्च प्रकाशं गमितस्त्वया

ratnātiśayadānena tasyāmabhyadhikaḥ kila | snehaśca bahumānaśca prakāśaṃ gamitastvayā

हिन्दी अर्थ

जो वस्तु सम्पूर्ण रत्नोंसे बढ़कर थी, उसे देकर तुमने देवी रुक्मिणीके प्रति अपने अधिक स्नेह और विशेष आदरको प्रकाशमें ला दिया है

अध्याय 122

श्लोक 10

तामस्तौषीत् समक्षं ते प्रियां स किल नारदः ।तमश्रौषीश्च दृष्टस्त्वं प्रियायाः संस्तवं किल

tāmastauṣīt samakṣaṃ te priyāṃ sa kila nāradaḥ | tamaśrauṣīśca dṛṣṭastvaṃ priyāyāḥ saṃstavaṃ kila

हिन्दी अर्थ

कहा जाता है कि तुम्हारे सामने ही नारदजीने तुम्हारी उस प्रियतमाका स्तवन किया और तुम बड़े हर्षके साथ प्राणवल्लभाकी वह स्तुति सुनते रहे

अध्याय 122

श्लोक 11

स्तोतव्यो यदि तावत् स नारदेन तवाग्रतः ।दुर्भगोऽयं जनस्तत्र किमर्थमनुशब्दितः

stotavyo yadi tāvat sa nāradena tavāgrataḥ | durbhago'yaṃ janastatra kimarthamanuśabditaḥ

हिन्दी अर्थ

यदि नारदजीको तुम्हारे सामने उन महारानीकी स्तुति करनी थी तो वहाँ उन्होंने इस अभागिनीके नामका उल्लेख किसलिये किया ?

अध्याय 122

श्लोक 12

प्रणयस्य रसं दत्त्वा पश्चात्तापः प्रभो यदि ।अनुज्ञां मे प्रयच्छस्व तपः कर्तुं प्रसीद मे

praṇayasya rasaṃ dattvā paścāttāpaḥ prabho yadi | anujñāṃ me prayacchasva tapaḥ kartuṃ prasīda me

हिन्दी अर्थ

प्रभो! यदि पहले प्रणयका रस. पिलाकर (प्रेमका आनन्द देकर) पीछे संताप ही देना है तो मुझे तपस्या करनेकी आज्ञा दो। मुझपर इतनी कृपा अवश्य करो

अध्याय 122

श्लोक 13

स्वप्नेनापि न दृष्ट्वाहं श्रद्दध्यां पुष्करेक्षण ।यदन्यदेव निर्वृत्तमश्रौषं पश्यतस्तव

svapnenāpi na dṛṣṭvāhaṃ śraddadhyāṃ puṣkarekṣaṇa | yadanyadeva nirvṛttamaśrauṣaṃ paśyatastava

हिन्दी अर्थ

कमलनयन ! सपनेमें अपनी आँखों देखकर भी जिस बातपर मैं विश्वास नहीं कर सकती थी, वही तुम्हारे देखते-देखते घटित हुई—यह मैंने सुना है। मैं जैसा सोचती थी, उससे कुछ और ही बात हो गयी

अध्याय 122

श्लोक 14

कामं कामोऽस्तु तस्यैव मुनेरतुलतेजसः ।अत्र मन्युस्तु मे देव सान्निध्यं तव तत्र यत्

kāmaṃ kāmo'stu tasyaiva muneratulatejasaḥ | atra manyustu me deva sānnidhyaṃ tava tatra yat

हिन्दी अर्थ

देव ! उन अतुल तेजस्वी मुनिके मनमें जो रुक्मिणीदेवीकी स्तुति करनेकी कामना थी, वह भले ही पूर्ण होती; परंतु मुझे तो यहाँ इसी बातका दुःख और रोष है कि वहाँ तुम्हारा सांनिध्य बना रहा (तुम वहाँ बैठकर प्राणवल्लभा महारानीजीकी स्तुति सुनते रहे)

अध्याय 122

श्लोक 15

मानार्थं जीव्यते लोके सद्भिरित्युक्तवानसि ।तदेवं सति नेच्छामि जीवितुं मानवर्जिता

mānārthaṃ jīvyate loke sadbhirityuktavānasi | tadevaṃ sati necchāmi jīvituṃ mānavarjitā

हिन्दी अर्थ

तुमने ही कभी कहा था कि श्रेष्ठ पुरुष संसारमें सम्मानके लिये ही जीते हैं; अत: ऐसी दशामें मैं मानरहित होकर जीवित रहना नहीं चाहती

अध्याय 122

श्लोक 16

ममाभवद् यतो रक्षा भयमद्य ततो मम ।सर्वतो रक्षते यो मां स मां नाद्याभिरक्षति

mamābhavad yato rakṣā bhayamadya tato mama | sarvato rakṣate yo māṃ sa māṃ nādyābhirakṣati

हिन्दी अर्थ

हाय! जिससे सदा मेरी रक्षा होती आयी है, उसीकी ओरसे आज मुझे भय प्राप्त हुआ। जो सब ओरसे मेरी रक्षा करते रहे हैं, वे आज मेरा संरक्षण नहीं कर रहे हैं

अध्याय 122

श्लोक 17

हा गतिं कां गमिप्यामि त्यक्ता देव त्वया विभो ।कुमुद्वतीगतां नूनं गतिं यास्याम्यसङ्गता

hā gatiṃ kāṃ gamipyāmi tyaktā deva tvayā vibho | kumudvatīgatāṃ nūnaṃ gatiṃ yāsyāmyasaṅgatā

हिन्दी अर्थ

हा देव! हा प्रभो! तुम्हारे त्याग देनेपर मैं किस गतिको प्राप्त होऊँगी। तुम्हारे सज़से वद्धित होनेपर मेरी दशा निश्चय ही कुमुद्रतीकी-सी हो जायगी (जैसे कुमुदिनी चन्द्रकिरणोंका स्पर्श न पाकर मुरझा जाती है, उसी प्रकार वही दशा मेरी भी होगी)

अध्याय 122

श्लोक 18

किमकार्षमहं मोहादीश्वराणां प्रियाप्रियम् ।प्रिया भूत्वा प्रिया भूता यद्यहं तव मानद

kimakārṣamahaṃ mohādīśvarāṇāṃ priyāpriyam | priyā bhūtvā priyā bhūtā yadyahaṃ tava mānada

हिन्दी अर्थ

मानद! पता नहीं मैंने मोहवश ऐशधर्यशाली देवताओंका कौन- सा प्रिय और अप्रिय किया था, जिससे मैं आपको प्रिया होकर फिर अप्रिया हो गयी

अध्याय 122

श्लोक 19

वसन्तकुसुमैश्चित्रं तदा रैवतकं गिरिम् ।प्रिया भूत्वाप्रिया भूता कथं द्रक्ष्याम्यहं पुनः

vasantakusumaiścitraṃ tadā raivatakaṃ girim | priyā bhūtvāpriyā bhūtā kathaṃ drakṣyāmyahaṃ punaḥ

हिन्दी अर्थ

जब प्रिया होकर मैं अप्रिया हो गयी, तब वसन्त-कुसुमोंसे विचित्र शोभा धारण करनेवाले इस रैवतक पर्वतका मैं पुनः कैसे दर्शन कर सकूँगी ?

अध्याय 122

श्लोक 20

परपुष्टस्वनोन्मिश्रं पुष्पगन्धवहं शुचिम् ।कथं नामानिलं द्वेष्या सेस्रेयं दुर्भगा सती

parapuṣṭasvanonmiśraṃ puṣpagandhavahaṃ śucim | kathaṃ nāmānilaṃ dveṣyā sesreyaṃ durbhagā satī

हिन्दी अर्थ

आपके द्वेषका पात्र तथा दुर्भाग्यसे दूषित होकर मैं कोकिलकी काकलीसे मिश्रित फूलोंकी सुगन्ध लेकर बहनेवाली यहाँकी पवित्र वायुको कैसे सेवन कर सकूँगी ?

अध्याय 122

श्लोक 21

जलक्रीडां तवाङ्कस्था देव कृत्वा महोदधौ ।कथं दौर्भाग्यमापन्ना पश्येयमपि सागरम्

jalakrīḍāṃ tavāṅkasthā deva kṛtvā mahodadhau | kathaṃ daurbhāgyamāpannā paśyeyamapi sāgaram

हिन्दी अर्थ

देव! आपके अड्डमें स्थित हो महासागरमें जलक्रीड़ा करनेका सौभाग्य प्रात करके अब दुर्भाग्यकी मारी हुई मैं कैसे इस समुद्रकी ओर दृष्टिपात कर सकती हूँ?

अध्याय 122

श्लोक 22

सात्राजिति प्रिया नान्या त्वत्तो मेऽस्तीति विद्धि माम् ।यदवोचः क्व तद् यातमथ वा कः स्मरिष्यति

sātrājiti priyā nānyā tvatto me'stīti viddhi mām | yadavocaḥ kva tad yātamatha vā kaḥ smariṣyati

हिन्दी अर्थ

तुम जो मुझसे यह कहा करते थे कि सत्राजितकुमारी ! तुमसे बढ़कर मेरी प्रिया दूसरी कोई स्त्री नहीं है; इसे ठीक समझो। तुम्हारी वे बातें कहाँ हैं ? अथवा अब कौन उन बातोंको याद करेगा 2

अध्याय 122

श्लोक 23

यदद्राक्षीद्धि मां श्वश्रूर्बहुमानेन नन्दिनी ।अवज्ञातां त्वया राज्ञीं नूनं दौर्भाग्यकर्शिताम्

yadadrākṣīddhi māṃ śvaśrūrbahumānena nandinī | avajñātāṃ tvayā rājñīṃ nūnaṃ daurbhāgyakarśitām

हिन्दी अर्थ

जब तुम मेरा सम्मान करते थे, तब मेरी आनन्द- दायिनी सास मुझे बड़े आदरके साथ देखा करती थीं। अब तुम्हारे द्वारा अपमानित हुई सत्या रानीको वे निश्चय ही दुर्भाग्यसे दुर्बल हुई देखेंगी

अध्याय 122

श्लोक 24

किं नु गूढेन मे प्रेम्णा सुस्निग्धैनापि मानद ।यत्समानां जनैर्देवो मां न पश्यति नित्यदा

kiṃ nu gūḍhena me premṇā susnigdhaināpi mānada | yatsamānāṃ janairdevo māṃ na paśyati nityadā

हिन्दी अर्थ

मानद! मेरे अत्यन्त खिग्ध गूढ़ प्रेमसे क्या लाभ, जब कि देवस्वरूप तुम सदा मुझे दूसरे लोगोंके समान भी नहीं समझते

अध्याय 122

श्लोक 25

नाहं त्वां कितवं धूर्तमज्ञासिषमरिन्दम ।अद्य ज्ञातोऽसि तत्पक्षचञ्चलो जनवञ्चकः

nāhaṃ tvāṃ kitavaṃ dhūrtamajñāsiṣamarindama | adya jñāto'si tatpakṣacañcalo janavañcakaḥ

हिन्दी अर्थ

शत्रुदमन! मैं नहीं जानती थी कि तुम इतने कपटी और धूर्त हो। आज तुम्हारा स्वरूप समझमें आया है। तुम मेरी सौतका पक्ष लेनेवाले चपल और मुझ-जैसी भोली- भाली अबलाओंको ठगनेवाले हो

अध्याय 122

श्लोक 26

स्वरवर्णेङ्गिताकारैर्निगूढो देव यत्नतः ।चौर ज्ञातोऽसि तत्पक्षवाङ्मात्रमधुरः शठः

svaravarṇeṅgitākārairnigūḍho deva yatnataḥ | caura jñāto'si tatpakṣavāṅmātramadhuraḥ śaṭhaḥ

हिन्दी अर्थ

देव! तुम स्वर, वर्ण, चेष्टा और आकृतिके द्वारा यत्नपूर्वक अपने असली स्वरूपको छिपाये हुए थे; किंतु चोर ! आज तुम पहचान लिये गये। सौतके पक्षपाती तुम केवल वाणीमात्रसे मधुर हो; वास्तवमें बड़े ही शठ हो '

अध्याय 122

श्लोक 27

एवमीर्ष्यावशं प्राप्तां देवीं सात्राजितीं हरिः ।अभिमानवतीं देवः सान्त्वपूर्वमथाब्रवीत्

evamīrṣyāvaśaṃ prāptāṃ devīṃ sātrājitīṃ hariḥ | abhimānavatīṃ devaḥ sāntvapūrvamathābravīt

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार ईष्यकि अधीन हुई सत्राजितकुमारी अभिमानिनी देवी सत्यभामाको सान्त्वना देते हुए भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा—

अध्याय 122

श्लोक 28

मैवं पद्मपलाशाक्षि प्राणेश्वरि वद प्रिये ।किमत्र बहुनोक्तेन त्वदीयमवगच्छ माम्

maivaṃ padmapalāśākṣi prāṇeśvari vada priye | kimatra bahunoktena tvadīyamavagaccha mām

हिन्दी अर्थ

कमललोचने ! प्राणेश्वरि ! प्रिये ! ऐसा न कहो । अब इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या लाभ ? तुम मुझे अपना ही समझो

अध्याय 122

श्लोक 29

तत् पारिजातकुसुमं तस्या देवि ममाग्रतः ।नारदो मत्प्रियं कुर्वन् मुनिरक्लिष्टकर्मकृत्

tat pārijātakusumaṃ tasyā devi mamāgrataḥ | nārado matpriyaṃ kurvan munirakliṣṭakarmakṛt

श्लोक 29–30 का हिन्दी अर्थ

देवि ! अनायास ही महान्‌ कर्म करनेवाले नारद मुनिने मेरा प्रिय करनेके लिये वह पारिजातका फूल रुक्मिणीके सामने ही मेरे हाथमें दिया था। उसे मैंने उदारतावश और रुक्मिणीके अनुरोधसे उसके हाथमें दे दिया था। इसमें संशय नहीं है। पवित्र मुसकानवाली प्रिये ! यदि तुम्हारी दृष्टिमें यह अपराध है तो तुम मेरे इस एकमात्र अपराधको सह लो और मुझपर प्रसन्न हो जाओ

अध्याय 122

श्लोक 30

दाक्षिण्यादानुरोधाच्च दत्तवान् नात्र संशयः ।प्रसीदैकापराधं मे मर्षयस्य शुचिस्मिते

dākṣiṇyādānurodhācca dattavān nātra saṃśayaḥ | prasīdaikāparādhaṃ me marṣayasya śucismite

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 122

श्लोक 31

पारिजातकपुष्पाणि यदीच्छस्यतिकोपने ।तदा दातास्मि सुश्रोणि सत्यमेतद्ब्रवीमि तम्

pārijātakapuṣpāṇi yadīcchasyatikopane | tadā dātāsmi suśroṇi satyametadbravīmi tam

हिन्दी अर्थ

अत्यन्त कोपमें भरी हुई प्रियतमे ! सुश्रोणि ! यदि तुम पारिजातके फूल ही चाहती हो तो वह तुम्हें अवश्य दूँगा। यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ

अध्याय 122

श्लोक 32

स्वर्गास्पदादानयित्वा पारिजातं द्रुमेश्वरम् ।गृहे ते स्थापयिष्यामि यावत्कालं त्वमिच्छसि

svargāspadādānayitvā pārijātaṃ drumeśvaram | gṛhe te sthāpayiṣyāmi yāvatkālaṃ tvamicchasi

हिन्दी अर्थ

वृक्षराज पारिजातको स्वर्गसे लाकर जितने समयतक तुम चाहोगी, उतने समयके लिये तुम्हारे घरमें स्थापित कर दूँगा

अध्याय 122

श्लोक 33

एवमुक्ता तु हरिणा प्रोवाच हरिवल्लभा ।यद्येवं स द्रुमः शक्यस्त्विहानयितुमच्युत

evamuktā tu hariṇā provāca harivallabhā | yadyevaṃ sa drumaḥ śakyastvihānayitumacyuta

श्लोक 33–34 का हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर हरिवल्लभा सत्यभामा बोलीं-' अच्युत ! यदि इस प्रकार उस वृक्षको यहाँ लाया जा सके तो मैंने यह रोष त्याग दिया और मेरा सुख कई गुना बढ़ सकता है। अधोक्षज ! उस दशामें मैं समस्त भाग्यवती स्त्रियोंमें सबसे अधिक गौरवशालिनी हो जाऊँगी'

अध्याय 122

श्लोक 34

मन्युरेव प्रमृष्टो हि भवेद् बहुगुणं मम ।सीमन्तिनीनां सर्वासामधिका स्यामधोक्षज

manyureva pramṛṣṭo hi bhaved bahuguṇaṃ mama | sīmantinīnāṃ sarvāsāmadhikā syāmadhokṣaja

अर्थ श्लोक 33 के साथ

अध्याय 122

श्लोक 35

तथास्तु प्रथमः कल्प इति तां मधुसूदनः ।प्रोवाचाप्रतिमो देवो जगतः प्रभवाप्ययः

tathāstu prathamaḥ kalpa iti tāṃ madhusūdanaḥ | provācāpratimo devo jagataḥ prabhavāpyayaḥ

श्लोक 35–36 का हिन्दी अर्थ

युद्धमें विजय पानेवाले जनमेजय! जब श्रीकृष्णने तथास्तु' कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली, तब पत्पुरुषोंकी इष्टदेवी और कंसनाशन श्रीकृष्णकी वल्लभा पत्यभामा बहुत संतुष्ट हुईं

अध्याय 122

श्लोक 36

तथेत्युक्तेति कृष्णेन तुतोष समितिञ्जय ।सत्यभामा सतामिष्टा कंसनाशनवल्लभा

tathetyukteti kṛṣṇena tutoṣa samitiñjaya | satyabhāmā satāmiṣṭā kaṃsanāśanavallabhā

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 122

श्लोक 37

ततः स्नातो जगन्नाथः सर्वेशः सर्वभावनः ।चकारावश्यकं सर्वं सर्वकामप्रदः सताम्

tataḥ snāto jagannāthaḥ sarveśaḥ sarvabhāvanaḥ | cakārāvaśyakaṃ sarvaṃ sarvakāmapradaḥ satām

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर सबकी उत्पत्ति करनेवाले सर्वेश्वर जगन्नाथ श्रीकृष्णने, जो सत्पुरुषोंकी सम्पूर्ण कामनाओंके दाता हैं, स्नान और अन्य सब भावश्यक कार्य किया

अध्याय 122

श्लोक 38

दध्यौ च नारदं देवः स्नातो देवमुनिर्नृप ।अभ्याजगाम स्नानान्ते मुनिश्रेष्ठो महोदधौ

dadhyau ca nāradaṃ devaḥ snāto devamunirnṛpa | abhyājagāma snānānte muniśreṣṭho mahodadhau

हिन्दी अर्थ

नरेधर ! तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ने देवर्षि नारदका चिन्तन किया। नारदजी उस समय महासागरमें स्नान कर रहे थे। स्नानके पश्चात्‌ वे मुनिश्रेष्ठ भगवान्‌ श्रीकृष्णके पास आये

अध्याय 122

श्लोक 39

तमागतं नरपते सतां गतिरधोक्षजः ।सत्यया सह धर्मात्मा यथाविधि अपूजयत्

tamāgataṃ narapate satāṃ gatiradhokṣajaḥ | satyayā saha dharmātmā yathāvidhi apūjayat

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! उन्हें आया देख सत्पुरुषोंके आश्रयदाता धर्मात्मा अधोक्षज श्रीकृष्णने पतत्याके साथ उनका विधिपूर्वक पूजन किया

अध्याय 122

श्लोक 40

पादौ प्रक्षालयाञ्चक्रे मुनेः सात्राजिती स्वयम् ।जलं देवः स्वयं कृष्णो भृङ्गारेण ददौ तदा

pādau prakṣālayāñcakre muneḥ sātrājitī svayam | jalaṃ devaḥ svayaṃ kṛṣṇo bhṛṅgāreṇa dadau tadā

हिन्दी अर्थ

उस समय सत्राजित्‌की पुत्रीने स्वयं ही नारदजीके दोनों पर धोये और भगवान्‌ श्रीकृष्णने स्वयं ही झारीसे जल गिराया

अध्याय 122

श्लोक 41

अथोपकल्पयामास सुखासीनाय केशवः ।परमान्नं स मुनये प्रयतात्मा जगद्गुरुः

athopakalpayāmāsa sukhāsīnāya keśavaḥ | paramānnaṃ sa munaye prayatātmā jagadguruḥ

हिन्दी अर्थ

जब वे सुखपूर्वक बैठ गये, तब अपने ननको वशमें रखनेवाले जगद्‌गुरु भगवान्‌ श्रीकृष्णने ुनिके लिये उत्तम अन्न परोसा

अध्याय 122

श्लोक 42

तल्लोककर्त्रा सत्कृत्य दत्तं मुनिरुदारधीः ।बुभुजे वदतां श्रेष्ठः श्रद्धया परया युतः

tallokakartrā satkṛtya dattaṃ munirudāradhīḥ | bubhuje vadatāṃ śreṣṭhaḥ śraddhayā parayā yutaḥ

हिन्दी अर्थ

लोकस्रष्टा भगवान्‌ प्रीहरिके सत्कारपूर्वक दिये हुए उस अन्नको वक्ताओंमें ष्ठ उदारबुद्धि नारद मुनिने बड़ी श्रद्धाके साथ भोजन कैया

अध्याय 122

श्लोक 43

उपस्पृश्य ततस्तृप्तः प्रददौ चाशिषः प्रभो ।ताश्च प्रीतेन मनसा प्रतिजग्राह केशवः

upaspṛśya tatastṛptaḥ pradadau cāśiṣaḥ prabho | tāśca prītena manasā pratijagrāha keśavaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रभो! तदनन्तर हाथ-मुँह धो आचमन ररके तृप्त हुए मुनिने भगवान्‌को बहुत-से आशीर्वाद देये और भगवान्‌ केशवने प्रसन्नचित्तसे उन आशीर्वादोंको हण किया

अध्याय 122

श्लोक 44

ततः सात्राजितीं देवीं प्रणतां नारदोऽब्रवीत् ।प्रसार्य दक्षिणं हस्तं सजलं जलजेक्षणाम्

tataḥ sātrājitīṃ devīṃ praṇatāṃ nārado'bravīt | prasārya dakṣiṇaṃ hastaṃ sajalaṃ jalajekṣaṇām

श्लोक 44–45 का हिन्दी अर्थ

देवि! तुम इस समय जैसी हो, वैसी ही पतित्रता सदा नी रहो तथा मेरे तपके बलसे तुम विशेष सौभाग्यशालिनी ओ '

अध्याय 122

श्लोक 45

यथेदानीं तथैव त्वं भव देवि पतिव्रता ।सविशेषं च सुभगा भव मत्तपसो बलात्

yathedānīṃ tathaiva tvaṃ bhava devi pativratā | saviśeṣaṃ ca subhagā bhava mattapaso balāt

अर्थ श्लोक 44 के साथ

अध्याय 122

श्लोक 46

इत्युक्ता मुनिमुख्येन सत्यभामा हरिप्रिया ।उत्तस्थौ महता युक्ता हर्षेण तु नराधिप

ityuktā munimukhyena satyabhāmā haripriyā | uttasthau mahatā yuktā harṣeṇa tu narādhipa

श्लोक 46–47 का हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! मुनिप्रवर नारदजीके ऐसा कहनेपर रिप्रिया सत्यभामा महान्‌ हर्षसे उत्फुल्ल होकर उठी ॥ छंद ॥ स समय मुनिवर नारदजीसे आज्ञा लेकर अआप्रमेय राक्रमी बुद्धिमान्‌ श्रीकृष्णने भी यज्शिष्ट अन्नका भोजन कया॥ '

अध्याय 122

श्लोक 47

स कृष्णोऽप्यभ्यनुज्ञां तु लब्ध्वा मुनिवरात्तदा ।बुभुजे विघसं धीमानप्रमेयपराक्रमः

sa kṛṣṇo'pyabhyanujñāṃ tu labdhvā munivarāttadā | bubhuje vighasaṃ dhīmānaprameyaparākramaḥ

अर्थ श्लोक 46 के साथ

अध्याय 122

श्लोक 48

ततस्त्वावश्यकं कृत्वा सत्यभामापि भारत ।अनुज्ञया तदा भर्तुर्विवेशान्तर्गृहं मुदा

tatastvāvaśyakaṃ kṛtvā satyabhāmāpi bhārata | anujñayā tadā bharturviveśāntargṛhaṃ mudā

हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन! तदनन्तर आवश्यक कृत्य ररके सत्यभामाने भी पतिकी आज्ञासे अपने घरके ीतर प्रसन्नतापूर्वक प्रवेश किया

अध्याय 122

श्लोक 49

ततो विनिर्गता देवी कृष्णस्यैवाभ्यनुज्ञया ।स्थिता पार्श्वे च कृष्णस्य नमस्कृत्वा महात्मने

tato vinirgatā devī kṛṣṇasyaivābhyanujñayā | sthitā pārśve ca kṛṣṇasya namaskṛtvā mahātmane

हिन्दी अर्थ

इसके बाद न: श्रीकृष्णकी ही आज्ञासे सत्यादेवी भीतरसे निकलीं और महात्मा नारदजीको नमस्कार करके श्रीकृष्णके रभागमें बैठ गयीं

अध्याय 122

श्लोक 50

ततो मुहूर्तमासित्वा नारदः कृष्णमब्रवीत् ।आपृच्छे त्वां गमिष्यामि शक्रलोकमधोक्षज

tato muhūrtamāsitvā nāradaḥ kṛṣṇamabravīt | āpṛcche tvāṃ gamiṣyāmi śakralokamadhokṣaja

हिन्दी अर्थ

दो घड़ीतक बैठनेके पश्चात्‌ रदजीने श्रीकृष्णसे कहा—' अधोक्षज ! अब मैं इन्द्रलोकको ऊँगा; अत: जानेकी अनुमति चाहता हूँ

अध्याय 122

श्लोक 51

तत्राद्यं देवमीशानं नमस्कृत्य महेश्वरम् ।गास्यन्ति देवगन्धर्वास्तथैवाप्सरसां गणाः

tatrādyaṃ devamīśānaṃ namaskṛtya maheśvaram | gāsyanti devagandharvāstathaivāpsarasāṃ gaṇāḥ

हिन्दी अर्थ

वहाँ देवगन्धर्व और अप्सराएँ आदिदेव ईशान भगवान्‌ महेश्वरको नमस्कार करके उनकी प्रसन्नताके लिये नृत्य एवं गान करेंगी

अध्याय 122

श्लोक 52

मासि मास्युचितं ह्येतन्महेन्द्रसदने प्रभो ।पूजार्थं देवदेवस्य गान्धर्वं नृत्यमेव च

māsi māsyucitaṃ hyetanmahendrasadane prabho | pūjārthaṃ devadevasya gāndharvaṃ nṛtyameva ca

हिन्दी अर्थ

प्रभो ! देवाधिदेव पहादेवजीकी पूजाके लिये महेन्द्रभवनमें प्रतिमास इस ृत्य और गानका समुचित आयोजन होता है

अध्याय 122

श्लोक 53

अन्तर्हितो देवदेवः सोमः सप्रवरो विभुः ।पश्यत्यमरमुख्येन कृतं भक्त्याद्रिघातिना

antarhito devadevaḥ somaḥ sapravaro vibhuḥ | paśyatyamaramukhyena kṛtaṃ bhaktyādrighātinā

हिन्दी अर्थ

र्वतोंका विघात करनेवाले देवश्रेष्ठ इन्द्रद्वारा भक्तिभावसे केये गये उस आयोजनको अपने श्रेष्ठ पार्षदों तथा भगवती उमासहित देवाधिदेव भगवान्‌ महादेव अदृश्य हकर देखते हैं

अध्याय 122

श्लोक 54

निमन्त्रितोऽहं पूर्वेद्युः पुष्पं दत्त्वा महाद्युते ।पारिजातस्य भद्रं ते तरुराज्ञो महात्मनः

nimantrito'haṃ pūrvedyuḥ puṣpaṃ dattvā mahādyute | pārijātasya bhadraṃ te tarurājño mahātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

महाद्युते! आपका भला हो। न्द्रने विशालकाय वृक्षराज पारिजातका फूल देकर पहले ही दिन मुझे वहाँ आनेके लिये निमन्त्रित किया था

अध्याय 122

श्लोक 55

यदेतदाहृतं स्वर्गात् त्वदर्थं तु मया विभो ।देवोपभोग्यमेतद्धि तरुराजसमुद्भवम्

yadetadāhṛtaṃ svargāt tvadarthaṃ tu mayā vibho | devopabhogyametaddhi tarurājasamudbhavam

हिन्दी अर्थ

पभो ! तरुराज पारिजातका यह फूल, जिसे मैं स्वर्गसे भापके लिये ही लाया था, देवताओंके उपभोगकी वस्तु

अध्याय 122

श्लोक 56

इष्टः स वृक्षः सततं शच्याः पुष्करलोचन ।सौभाग्यमावहत्येव पूज्यमानोऽपि नित्यशः

iṣṭaḥ sa vṛkṣaḥ satataṃ śacyāḥ puṣkaralocana | saubhāgyamāvahatyeva pūjyamāno'pi nityaśaḥ

हिन्दी अर्थ

कमलनयन! वह वृक्ष इन्द्रपत्ती शचीको सदा री प्रिय है। प्रतिदिन पूजित होनेपर वह अवश्य ही मौभाग्यकी प्राप्ति कराता है

अध्याय 122

श्लोक 57

पुण्यं कर्तुं तदा सृष्टः पारिजातो महाद्रुमः ।अदित्या धर्मनित्येन कश्यपेन महात्मना

puṇyaṃ kartuṃ tadā sṛṣṭaḥ pārijāto mahādrumaḥ | adityā dharmanityena kaśyapena mahātmanā

हिन्दी अर्थ

धर्मपरायण महात्मा कश्यपने अदितिदेवीके पुण्यकर्मके लिये उस समय गरिजात नामक महावृक्षकी सृष्टि की थी

अध्याय 122

श्लोक 58

पुरादित्या महातेजास्तोषितः किल कश्यपः ।वरेण च्छन्दयामास मारीचस्तपसो निधिः

purādityā mahātejāstoṣitaḥ kila kaśyapaḥ | vareṇa cchandayāmāsa mārīcastapaso nidhiḥ

हिन्दी अर्थ

कहते , पूर्वकालमें अदितिदेवीने महातेजस्वी कश्यप मुनिको भपनी सेवासे संतुष्ट किया। तब तपोनिधि मरीचिनन्दन रश्यपने उन्हें इच्छानुसार वर माँगनेके लिये कहा

अध्याय 122

श्लोक 59

सोवाच सुभगा येन भवेयं मुनिसत्तम ।स्वलङ्कृता कामतश्च सर्वैरेव विभूषणैः

sovāca subhagā yena bhaveyaṃ munisattama | svalaṅkṛtā kāmataśca sarvaireva vibhūṣaṇaiḥ

श्लोक 59–61 का हिन्दी अर्थ

स समय उन्होंने उनसे कहा-' मुनिश्रेष्ठ! मुझे कोई सी वस्तु दीजिये, जिससे मैं सदा सौभाग्यशालिनी बनी हूँ। इच्छा होते ही समस्त आभूषणोंसे विभूषित हो ताऊँ। तपोधन! मुझे मनोवाज्छित गीत और नृत्य प्राप्त ता रहे। तपोनिधे! मैं सदा कुमारी-सी ही बनी रहूँ गौर निर्मल, शोकरहित, पतिभक्तिमती एवं धर्मशीला ऊँ

अध्याय 122

श्लोक 60

ईप्सितं गीतनृत्यं च भवेन्मम तपोधन ।कुमारी नित्यदा चैव भवेयं तपसो निधे

īpsitaṃ gītanṛtyaṃ ca bhavenmama tapodhana | kumārī nityadā caiva bhaveyaṃ tapaso nidhe

अर्थ श्लोक 59 के साथ

अध्याय 122

श्लोक 61

विरजा शोकरहिता भवेयमिति नित्यदा ।पतिभक्तिमती चैव धर्मशीला तथैव च

virajā śokarahitā bhaveyamiti nityadā | patibhaktimatī caiva dharmaśīlā tathaiva ca

अर्थ श्लोक 59 के साथ

अध्याय 122

श्लोक 62

पारिजातं ततोऽस्राक्षीददित्याः प्रियकाम्यया ।सर्वकामप्रदैः पुष्पैरावृतं नित्यगन्धदैः

pārijātaṃ tato'srākṣīdadityāḥ priyakāmyayā | sarvakāmapradaiḥ puṣpairāvṛtaṃ nityagandhadaiḥ

हिन्दी अर्थ

तब मुनिवर कश्यपने अदितिका प्रेय करनेकी इच्छासे पारिजातकी सृष्टि की । जो सम्पूर्ण नोवाज्छित वस्तुओंको देनेमें समर्थ और नित्य सुगन्धप्रद ठलोंसे भरा रहता है

अध्याय 122

श्लोक 63

त्रिशाखं सर्वदा दृश्यं सर्वभूतमनोहरम् ।सर्वपुष्पाणि दृश्यन्ते तस्मिन्नेव महाद्रुमे

triśākhaṃ sarvadā dṛśyaṃ sarvabhūtamanoharam | sarvapuṣpāṇi dṛśyante tasminneva mahādrume

हिन्दी अर्थ

वह सदा तीन शाखाओंसे युक्त दिखायी देता है और अपनी शोभासे सम्पूर्ण णियोंका मन हर लेता है। उसी महान्‌ वृक्षमें सभी रहके फूल दिखायी देते हैं

अध्याय 122

श्लोक 64

ईदृशान्यपि पुष्पाणि बिभर्त्येकापि रूपिणी ।बहुरूपाणि चाप्यन्या पद्मानि च ततोऽपरा

īdṛśānyapi puṣpāṇi bibhartyekāpi rūpiṇī | bahurūpāṇi cāpyanyā padmāni ca tato'parā

हिन्दी अर्थ

देवताओंकी कोई पपवती स्त्री तो ऐसे फूल भी धारण करती है (जैसे | यहाँ लाया था), दूसरी उसके अनेक रूपवाले लोंको ग्रहण करती है तथा तीसरी उस वृक्षसे केवल ममल-जैसे फूलोंको ही चुनती है

अध्याय 122

श्लोक 65

मन्दारादपि वृक्षाच्च सारमुद्धत्य कश्यपः ।तस्मादेष तरुश्रेष्ठः सर्वेषां श्रेष्ठतां गतः

mandārādapi vṛkṣācca sāramuddhatya kaśyapaḥ | tasmādeṣa taruśreṣṭhaḥ sarveṣāṃ śreṣṭhatāṃ gataḥ

हिन्दी अर्थ

कश्यपजीने मन्दार-वृक्षसे भी सार निकालकर स वृक्षका निर्माण किया था; इसलिये यह तसश्रेष्ठ गारिजात समस्त देववृक्षोंमें उत्कृष्ट माना गया है

अध्याय 122

श्लोक 66

ततस्तत्र निबध्याथ कश्यपं प्रददौ शुभा ।अदितिर्मम पुण्यार्थं सौभाग्यार्थं तथैव च

tatastatra nibadhyātha kaśyapaṃ pradadau śubhā | aditirmama puṇyārthaṃ saubhāgyārthaṃ tathaiva ca

हिन्दी अर्थ

दनन्तर शुभलक्षणा देवी अदितिने पुण्य और सौभाग्यकी द्धिकि लिये उस वृक्षके पास कश्यपजीकों बाँधकर पुझे दान कर दिया था

अध्याय 122

श्लोक 67

अदित्या कश्यपो दत्तः पुण्यार्थं च तथा मम ।पुष्पदाम्ना वेष्टयित्वा कण्ठे पुण्यार्थमात्मवान्

adityā kaśyapo dattaḥ puṇyārthaṃ ca tathā mama | puṣpadāmnā veṣṭayitvā kaṇṭhe puṇyārthamātmavān

हिन्दी अर्थ

अदितिने पुण्यके लिये कश्यपजीके गलेमें फूलोंकी माला लपेटकर उन पनस्वी मुनिको मेरे हाथमें दानके रूपमें दे दिया था। इस दानका एकमात्र उद्देश्य था पुण्यकी प्राप्ति एवं तरृद्धि

अध्याय 122

श्लोक 68

निष्क्रयेण मया मुक्तः कश्यपस्तु तपोधनः ।इन्द्रो दत्तस्तथेन्द्राण्या सौभाग्यार्थं ततो मम

niṣkrayeṇa mayā muktaḥ kaśyapastu tapodhanaḥ | indro dattastathendrāṇyā saubhāgyārthaṃ tato mama

हिन्दी अर्थ

उस समय मैंने निष्क्रय (मूल्य) लेकर तपोधन कश्यपकों मुक्त कर दिया था। इसी प्रकार डन्द्राणीने भी सौभाग्यकी वृद्धिकि लिये मुझे इन्द्रका दान कर दिया था

अध्याय 122

श्लोक 69

सोमश्चाप्यथ रोहिण्या ऋद्ध्या च धनदस्तथा ।एवं सौभाग्यदो वृक्षः पारिजातो न संशयः

somaścāpyatha rohiṇyā ṛddhyā ca dhanadastathā | evaṃ saubhāgyado vṛkṣaḥ pārijāto na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

रोहिणीने सोमका तथा ऋद्धिने धनाध्यक्ष कुबेरका दान भी इसी उद्देश्यसे किया था। इस प्रकार वह पारिजात-वृक्ष सौभाग्य प्रदान करनेवाला है, इसमें संशय नहीं है

अध्याय 122

श्लोक 70

परि जातो विष्णुपद्याः पारिजातेतिशब्दितः ।मन्दारपुष्पैर्यद्युक्तो मन्दारस्तेन कथ्यते

pari jāto viṣṇupadyāḥ pārijātetiśabditaḥ | mandārapuṣpairyadyukto mandārastena kathyate

हिन्दी अर्थ

यह वृक्ष विष्णुपदी गड्ाके ऊपर प्रकट हुआ था, इसलिये इसका नाम पारिजात हुआ। मन्दारके फूलोंसे भी संयुक्त होनेके कारण यह मन्दार कहलाता है

अध्याय 122

श्लोक 71

कोऽप्ययं दारुरित्याहुरजानन्तो यतो जनाः ।कोविदार इति ख्यातस्ततः स सुमहातरुः

ko'pyayaṃ dārurityāhurajānanto yato janāḥ | kovidāra iti khyātastataḥ sa sumahātaruḥ

हिन्दी अर्थ

जो लोग इसे नहीं जानते थे, वे इसे देखकर कहने लगे-' कोडप्ययं दारु:' (यह कोई दारु है); इसलिये वह महान्‌ वृक्ष कोविदार नामसे विख्यात हो गया

अध्याय 122

श्लोक 72

मन्दारः कोविदारश्च पारिजातश्च नामभिः ।स वृक्षो ज्ञायते दिव्यो यस्यैतत्कुसुमोत्तमम्

mandāraḥ kovidāraśca pārijātaśca nāmabhiḥ | sa vṛkṣo jñāyate divyo yasyaitatkusumottamam

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार वह दिव्य वृक्ष मन्दार, कोविदार और पारिजात—इन तीन नामोंसे जाना जाता है, जिसका यह उत्तम पुष्प मैं लाया था

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

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भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

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शोध टिप्पणीResearch note

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.