Chandogya Upanishad
95
अध्याय 95 / 154

Adhyāya 95

प्रपाठक खण्ड 95

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 95

श्लोक 5.22.1

॥ अथ यां चतुर्थीं जुहुयात्तां जुहुयात्समानाय स्वाहेति समानस्तृप्यति

|| atha yāṃ caturthīṃ juhuyāttāṃ juhuyātsamānāya svāheti samānastṛpyati

हिन्दी अर्थ

“ओर उनसे एक-एक देवताको तरिषृत्‌्रिृत्‌ क" पेसा विचार कर उस इस देवताने इस जीवातमरूपते दही उन तीन देवतार्भोमिं अनुप्रेशा कर नामरूपका व्याकरण क्रिया तासां च तिचृणां देवताना- “ओर उन तीनों देवताओमसे एक-एककरो त्रिवृत्‌.दरिषृत्‌ कष ।' एक-एक देवताके त्रिष्रकरणम एक-

English

'And he who offers the fourth oblation, should offer it to Samâna (on-breathing), saying Svâhâ. Then Samâna is satisfied,

अध्याय 95

श्लोक 5.22.2

समाने तृप्यति मनस्तृप्यति मनसि तृप्यति पर्जन्यस्तृप्यति पर्जन्ये तृप्यति विद्युत्तृप्यति विद्युति तृप्यन्त्यां यत्किंच विद्युच्च पर्जन्यश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति

samāne tṛpyati manastṛpyati manasi tṛpyati parjanyastṛpyati parjanye tṛpyati vidyuttṛpyati vidyuti tṛpyantyāṃ yatkiṃca vidyucca parjanyaścādhitiṣṭhatastattṛpyati tasyānu tṛptiṃ tṛpyati prajayā paśubhirannādyena tejasā brahmavarcaseneti

हिन्दी अर्थ

तासां ज्िदृतं ्िदतमेकेकामकरो्यथा तु खलु सो. म्येमास्तिछ्लो देवतालिव्रलिवरदेकेका भवति तन्मे उप्त देवताने उनमें प्रतेकको त्रिवत्‌.तरिवृत्‌ किया । है सोम्य बिस प्रकार ये तीनों देवता एक-एक करके प्रत्येक निवरत्‌-त्रिषत्‌ है वह तासां च देवतानां गुणप्रधान- स देवताने उन देवता्भिसे भावेन व्रतं त्रिदृतमेकेकाम- एक-एककनो गुण-्धानमावसे निः करोतकृतवती देवता । तिष्ठतु नित किया । अभी, नामत

English

'If Samâna is satisfied, the mind is satisfied, if the mind is satisfied, Parganya (god of rain) is satisfied, if Parganya is satisfied, lightning is satisfied, if lightning is satisfied, whatever is under Parganya and under lightning is satisfied. And through their satisfaction he (the sacrificer or cater) himself is satisfied with offspring, cattle, health, brightness, and Vedic splendour. Next: V, 23 Sacred Texts | Hinduism

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।