Chandogya Upanishad
96
अध्याय 96 / 154

Adhyāya 96

प्रपाठक खण्ड 96

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 96

श्लोक 5.23.1

॥ अथ यां पञ्चमीं जुहुयात्तां जुहुयादुदानाय स्वाहेत्युदानस्तृप्यति

|| atha yāṃ pañcamīṃ juhuyāttāṃ juhuyādudānāya svāhetyudānastṛpyati

हिन्दी अर्थ

एकके ज्ञाने सवका ज्ञान यत्तरेवतानां त्रिषृत्करणशरुक्तं ¦ उन देवतार्भोका नो त्रवृत्रण , का गया है, उसका उदाहरण अग्निका जो रोहित ( लल ) खूप है वह तेजका ही खूप है, जो शुक खूप है वह नलका है ओर जो इष्ण है वह भन्का है । इष प्रकार सग्निसे भम्नितव निवृत्त हो गया, कोक अग्निरूप विक्र्‌ वाणीसे

English

'And he who offers the fifth oblation, should offer it to Udâna (out-breathing), saying Svâhâ. Then Udâna is satisfied,

अध्याय 96

श्लोक 5.23.2

उदाने तृप्यति त्वक्तृप्यति त्वचि तृप्यन्त्यां वायुस्तृप्यति वायौ तृप्यत्याकाशस्तृप्यत्याकाशे तृप्यति यत्किंच वायुश्चाकाशश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेन

udāne tṛpyati tvaktṛpyati tvaci tṛpyantyāṃ vāyustṛpyati vāyau tṛpyatyākāśastṛpyatyākāśe tṛpyati yatkiṃca vāyuścākāśaścādhitiṣṭhatastattṛpyati tasyānu tṛptiṃ tṛpyati prajayā paśubhirannādyena tejasā brahmavarcasena

हिन्दी अर्थ

परसि दितः मिश्रित ) अग्निका जो रोहित खूप यच्छुक्लं सूपमग्नेरेव तदपामव्रि- उस अगिका ही जो च प है कृतानां यत्कृष्णं तस्यैवाग्ने कह तीन तत्वोकि सम्मश्रणसे रहित चारम्भणं विकारो नामेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्‌। तदपां यक्करष्णं तदन्नस्यापागाचन्द्राचन्द्रलं वाचार- म्भणं विकासे नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्‌

English

'If Udâna is satisfied, Vâyu (air) is satisfied, if Vâyu is satisfied, ether is satisfied, if ether is satisfied, whatever is under Vâyu, and under the ether is satisfied. And through their satisfaction he (the sacrificer or eater) himself is satisfied with offspring, cattle, health, brightness, and Vedic splendour. Next: V, 24 Sacred Texts | Hinduism

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।