Chandogya Upanishad
94
अध्याय 94 / 154

Adhyāya 94

प्रपाठक खण्ड 94

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 94

श्लोक 5.21.1

॥ अथ यां तृतीयां जुहुयात्तां जुहुयादपानाय स्वाहेत्यपानस्तृप्यति

|| atha yāṃ tṛtīyāṃ juhuyāttāṃ juhuyādapānāya svāhetyapānastṛpyati

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार जीवसे उदन्त हुम जीवज यानी जरायुज पुरूष एवं पश को ऊपरकी भोर मेदन करता है सेयं देवतेक्षत हन्तादमिमास्तिखो देवता अनेन , जीवेनात्मनानुधविश्य नामरूपे ठयाकरमाणीति

English

'And he who offers the third oblation, should offer it to Apâna (down-breathing), saying Svâhâ. Then Apâna is satisfied. If Apâna is satisfied, the tongue is satisfied, if the tongue is satisfied, Agni (fire) is satisfied, if Agni is satisfied, the earth is satisfied, if the earth is satisfied, whatever is under the earth and under fire is satisfied.

अध्याय 94

श्लोक 5.21.2

अपाने तृप्यति वाक्तृप्यति वाचि तृप्यन्त्यामग्निस्तृप्यत्यग्नौ तृप्यति पृथिवी तृप्यति पृथिव्यां तृप्यन्त्यां यत्किंच पृथिवी चाग्निश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति

apāne tṛpyati vāktṛpyati vāci tṛpyantyāmagnistṛpyatyagnau tṛpyati pṛthivī tṛpyati pṛthivyāṃ tṛpyantyāṃ yatkiṃca pṛthivī cāgniścādhitiṣṭhatastattṛpyati tasyānu tṛptiṃ tṛpyati prajayā paśubhirannādyena tejasā brahmavarcaseneti

हिन्दी अर्थ

ऽप इस सत्‌' नामक देवतान ईक्षण क्रिया, “भं इस नीवाम- समसे" इन तीनों देवता्ेमिं अनुपवेश कर नाम ओर रूपकी अभिव्यक्त सेयं प्रकृता सदाख्या तेजो- उस इस सत्‌ नामक तेन, = ओर अन्नके टोनिमूत॒ पृक्त सेवं तिस देवता अनुप्रविश्य इस ध्रकार उसने उन्‌ ४ स्वातमावस्थे देवता भनुपवेश कर नौर ई ४ नीजभूते अन्याकृते प्रकार ईक्षण कर कि ह श

English

'And through their satisfaction he (the sacrificer or eater) himself is satisfied with offspring, cattle, health, brightness, and Vedic splendour. Next: V, 22 Sacred Texts | Hinduism

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।