Chandogya Upanishad
93
अध्याय 93 / 154

Adhyāya 93

प्रपाठक खण्ड 93

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 93

श्लोक 5.20.1

॥ अथ यां द्वितीयां जुहुयात्तां जुहुयाद्व्यानाय स्वाहेति व्यानस्तृप्यति

|| atha yāṃ dvitīyāṃ juhuyāttāṃ juhuyādvyānāya svāheti vyānastṛpyati

हिन्दी अर्थ

उत ( सत्‌ ) ने ईक्षण किया रँ बहुत हो जाऊ-नेक प्रकारसे उत्पन्न होऊं” । इस प्रकार हैक्षण कर उसने तेन उत्पन्न किया । उस तेजने षण किया भे बहुत हो जाञं- नाना भरकारसे उलन्न +, “ अर्थात्‌ दशन किया । इसत हि अतश्च न प्रधानं सांख्यपरि- होता है कि सास्यङ्गा कल्पना कल्पितं जगत्कारणम्‌; प्रधान किया इ परषान जगता का

English

'And he who offers the second oblation, should offer it to Vyâna (back-breathing), saying Svâhâ. Then Vyâna is satisfied,

अध्याय 93

श्लोक 5.20.2

व्याने तृप्यति श्रोत्रं तृप्यति श्रोत्रे तृप्यति चन्द्रमास्तृप्यति चन्द्रमसि तृप्यति दिशस्तृप्यन्ति दिक्षु तृप्यन्तीषु यत्किंच दिशश्च चन्द्रमाश्चाधितिष्ठन्ति तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति

vyāne tṛpyati śrotraṃ tṛpyati śrotre tṛpyati candramāstṛpyati candramasi tṛpyati diśastṛpyanti dikṣu tṛpyantīṣu yatkiṃca diśaśca candramāścādhitiṣṭhanti tattṛpyati tasyānu tṛptiṃ tṛpyati prajayā paśubhirannādyena tejasā brahmavarcaseneti

हिन्दी अर्थ

उद जने हैक्षण श्रिया हम वहत हो जायं--अनेक रूपसे उसन्न रह ॥ उसने अन्लकी रचन की । इससे जहां क वर्षाहोती है वही बहुत-सा अन्न होता है । वह अननाय नखं ही उत्पन्न होता है ५४॥ गया है । उसके पिवा कोर ओर विज्ञातव्य न तो श्रुतिसे घना गवा षै बौरन किञ्ची हिन्नसे ही अनु- उन इन पक्षी आदि प्रसिद्ध प्राणिर्योके तीन ही बीन हेते है भाण्डज, जीवन घोर उद्धिज्ज १ ॥ तेषां जीवाविष्टानां खल्वेषां । जीवद्वारा आविष्ट उन इन पक्षौ

English

'If Vyâna is satisfied, the ear is satisfied, if the ear is satisfied, the moon is satisfied, if the moon is satisfied, the quarters are satisfied, if the quarters are satisfied, whatever is under the quarters and under the moon is satisfied. And through their satisfaction he (the sacrificer or eater) himself is satisfied with offspring, cattle, health, brightness, and Vedic splendour. Next: V, 21 Sacred Texts | Hinduism

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।