Chandogya Upanishad
59
अध्याय 59 / 154

Adhyāya 59

प्रपाठक खण्ड 59

8 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ8 श्लोक

अध्याय 59

श्लोक 4.3.1

॥ वायुर्वाव संवर्गो यदा वा अग्निरुद्वायति वायुमेवाप्येति यदा सूर्योऽस्तमेति वायुमेवाप्येति यदा चन्द्रोऽस्तमेति वायुमेवाप्येति

|| vāyurvāva saṃvargo yadā vā agnirudvāyati vāyumevāpyeti yadā sūryo'stameti vāyumevāpyeti yadā candro'stameti vāyumevāpyeti

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मविदिव वै सोम्य भासि को नु तानुशाशासे दे सोम्य तू ब्रहमवेत्त-सा भाषित हो रहा है; त्े किसने उपदेश दिया है ® टेसा आचार्यने पूछा तब उसने उत्तर दिया नुष्योसे भिन्न देवतार्ं ने .मञ्ञे उपदेश दिया है, भव मेरी इच्छाके ब्रह्मविदिव वै सोभ्य मासि । दे सोम्य तु त्रहवे्ता-सा मासित हो रहा है ॥ इतां ब्रह्म निधिन्तः कृताथोँ जह्यविद्धवति वाखा जर चिन्तारदित हुमा करता

English

'Air (vâyu) is indeed the end of all . For when fire goes out, it goes into air. When the sun goes down, it goes into air. When the moon goes down, it goes into air.

अध्याय 59

श्लोक 4.3.2

यदाप उच्छुष्यन्ति वायुमेवापियन्ति वायुर्ह्येवैतान्सर्वान्संवृङ्क्त इत्यधिदैवतम्

yadāpa ucchuṣyanti vāyumevāpiyanti vāyurhyevaitānsarvānsaṃvṛṅkta ityadhidaivatam

हिन्दी अर्थ

भने श्रीमान्‌-जेसे ऋषियोंसे घना है कि भाचार्यसे जानी गयी विया हौ अतिशय साधुताको मरा होती है ।' तव आाचार्यने उसे उसी विद्याका उपदेशच किया । उसमे कुछ भी न्यून नदी (क्योंकि इस विषयमे भगवान्‌-- श्रीमान्‌के सदय छषिर्यासे मेरा यदी पुना हुआ है कि आचायंसे जानी गयी

English

'When water dries up, it goes into air. Air indeed consumes them all. So much with reference to the Devas.

अध्याय 59

श्लोक 4.3.3

अथाध्यात्मं प्राणो वाव संवर्गः स यदा स्वपिति प्राणमेव वागप्येति प्राणं चक्षुः प्राणँ श्रोत्रं प्राणं मनः प्राणो ह्येवैतान्सर्वान्संवृङ्क्त इति

athādhyātmaṃ prāṇo vāva saṃvargaḥ sa yadā svapiti prāṇameva vāgapyeti prāṇaṃ cakṣuḥ prāṇam̐ śrotraṃ prāṇaṃ manaḥ prāṇo hyevaitānsarvānsaṃvṛṅkta iti

हिन्दी अर्थ

उपक्रोसलके प्रति अनिद्रारा बह्मतिाका उपदेश्च पनर्न॑हतर्यां प्रकारान्तरेण पुनः अन्य प्रकारसे त्रहविघाका „ निद्धपण करना है, इर्य तथा उपकोसलनामसे प्रसिद्ध॒ कमरुका पुत्र सत्यकाम बावाङ्के यहो ्रहमचये अर्ण करके रहता था । उसने बारह वर्तक उस भचार्यके अन्यो सेवा को; तु जाचार्यने जन्य बह्मचारि्योका तो समावतन उपकोसलो ह॒वै नामतः कमलके पत्र॒ कामरायनने, कमलस्यापत्यं कामलायनः सत्य- निका नाम॒ उपकोसल ह २ ९ सत्यकाम जावाल्के यहाँ ब्रह्मचय-

English

'Now with reference to the body. Breath (prâna) is indeed the end of all. When a man sleeps, speech goes into breath, so do sight, hearing, and mind. Breath indeed consumes them all.

अध्याय 59

श्लोक 4.3.4

तौ वा एतौ द्वौ संवर्गौ वायुरेव देवेषु प्राणः प्राणेषु

tau vā etau dvau saṃvargau vāyureva deveṣu prāṇaḥ prāṇeṣu

हिन्दी अर्थ

तं जायोवाच तो ब्रह्मचारी कशलमभीन्परिच- उस ( भाचायं ) से उसकी भायनि कहा-- यह बह्चारी खुब तपत्या कर लुका ३, इसने.भच्छी तरह अम्नयंकी सेवा की है । देखिये णम्नियाँ आपकी निन्दा न करं । अतः इसे वि्याका उपदेश

English

'These are the two ends, air among the Devas, breath among the senses (prânâh).' ________________

अध्याय 59

श्लोक 4.3.5

अथ ह शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च काक्षसेनिं परिविष्यमाणौ ब्रह्मचारी बिभिक्षे तस्मा उ ह न ददतुः

atha ha śaunakaṃ ca kāpeyamabhipratāriṇaṃ ca kākṣaseniṃ pariviṣyamāṇau brahmacārī bibhikṣe tasmā u ha na dadatuḥ

हिन्दी अर्थ

तमाचाय जायोवाच तपो उस भाचायंसे उसकी भायनि उपकोचलाय ब्रह्मचारी शलं कहा- इस ब्रह्मचारीने खव तपस्या विदां ब्रूहीति सम्यगग्नीन्परिच- की ह; इसने श जच्छी ब्रह्मचारिन्नशान कि नु नाश्चासीति। स होवाच बहव इमऽस्मनपुरुषे कामा नानात्यया व्याधिभिः पतिपूरण उस उपकोसरने मानसिकं खेदसे अनशान करनेका निश्चय क्रिया । उससे आचायंपलीने कहा-“णरे ब्रह्मचारिन्‌ तु भोजन कर, वर्यो नही भोजन करता ¢ वह बोल-ईस मनुष्य वहुत-सी कामना रहती है

English

Once while Saunaka Kâpeya and Abhipratârin Kâkshaseni were being waited on at their meal, a religious student begged of them. They gave him nothing.

अध्याय 59

श्लोक 4.3.6

स होवाच महात्मनश्चतुरो देव एकः कः स जगार भुवनस्य गोपास्तं कापेय नाभिपश्यन्ति मर्त्या अभिप्रतारिन्बहुधा वसन्तं यस्मै वा एतदन्नं तस्मा एतन्न दत्तमिति

sa hovāca mahātmanaścaturo deva ekaḥ kaḥ sa jagāra bhuvanasya gopāstaṃ kāpeya nābhipaśyanti martyā abhipratārinbahudhā vasantaṃ yasmai vā etadannaṃ tasmā etanna dattamiti

हिन्दी अर्थ

स॒ होपकोसरो व्याधिना खेदादुप- मानसेन द्ःखेनान- कोखलप्या- शितुमनशनं कतु उक्त्वा तुष्णीभूते ब्रह्म- ब्रह्मचारीके इस प्रकार कहकर अथ हान्नयः समूदिरे तप्तो ब्रह्मचारी शलं नः पर्यचारीद्धन्तास्मे परत्रवामति तस्मे होचुः भाणो ब्रह्म

English

He said: 'One god--who is he?--swallowed the four great ones , he, the guardian of the world. O Kâpeya, mortals see him not, O Abhipratârin, though he dwells in many places. He to whom this food belongs, to him it has not been given .'

अध्याय 59

श्लोक 4.3.7

तदु ह शौनकः कापेयः प्रतिमन्वानः प्रत्येयायात्मा देवानां जनिता प्रजानाँ हिरण्यदँष्ट्रो बभसोऽनसूरिर्महान्तमस्य महिमानमाहुरनद्यमानो यदनन्नमत्तीति वै वयं ब्रह्मचारिन्नेदमुपास्महे दत्तास्मै भिक्षामिति

tadu ha śaunakaḥ kāpeyaḥ pratimanvānaḥ pratyeyāyātmā devānāṃ janitā prajānām̐ hiraṇyadam̐ṣṭro babhaso'nasūrirmahāntamasya mahimānamāhuranadyamāno yadanannamattīti vai vayaṃ brahmacārinnedamupāsmahe dattāsmai bhikṣāmiti

हिन्दी अर्थ

फिर अम्नर्योने एकत्रित होकर कहा- यह ब्रह्मचारी तपस्या कर चुका है; इसने हमारी अच्छी तरह सेवा की है। अच्छा, हम इसे उपदेश कर" एसा निश्वयकर वे उससे बोले-श्राण ब्रहम है, क' रह्म है, स' बह्म है" अथ हाग्नयः शुश्रुषयावजिताः किर उसकी सेवासे अनुक अग्नीनां कारुण्याविष्टाः सन्त- नीमस्मे ब्रह्मचारिणेऽस्मद्धक्ता- आपसमे मिख्कर कहा- अच्छा अपने अवक्त इस दुखित, तपस्वी एवं श्रद्धालु ब्रह्म चारीको हम शिक्षा

English

Saunaka Kâpeya, pondering on that speech, went to the student and said: 'He is the self of the Devas, the creator of all beings, with golden tusks, the eater, not without intelligence. His greatness is said to be great indeed, because, without being eaten, he eats even what is not food . Thus do we, O Brahmakârin, meditate on that Being.' Then he said: 'give him food.'

अध्याय 59

श्लोक 4.3.8

तस्म उ ह ददुस्ते वा एते पञ्चान्ये पञ्चान्ये दश सन्तस्तत्कृतं तस्मात्सर्वासु दिक्ष्वन्नमेव दश कृतँ सैषा विराडन्नादी तयेदँ सर्वं दृष्टँ सर्वमस्येदं दृष्टं भवत्यन्नादो भवति य एवं वेद य एवं वेद

tasma u ha daduste vā ete pañcānye pañcānye daśa santastatkṛtaṃ tasmātsarvāsu dikṣvannameva daśa kṛtam̐ saiṣā virāḍannādī tayedam̐ sarvaṃ dṛṣṭam̐ sarvamasyedaṃ dṛṣṭaṃ bhavatyannādo bhavati ya evaṃ veda ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

छ जवि नानात्यया: पद कामाः" का ही विशेषण ह, तथापि भाष्यकारने कामनाओं जौर व्याधियोको एक मानकर उसे व्याधिका भी विदोषण बनाया है। स होवाच विजानाम्यहं यत्पाणो ब्रह्म कं चत वह बोरा--यहतो म नानाह कि प्राण ब््महै; किंतु क जीर 'ख' को नहा जानता ।' तव वे बोले- निश्चय नो कर है वही ख' टै जीर जो ख' है वही क' है इत प्रकार उन्होने उसे प्राण ओर उसके

English

They gave him food. Now these five (the eater Vâyu (air), and his food, Agni (fire), Âditya (sun), Kandramas (moon), Ap (water)) and the other five (the eater Prâna (breath), and his food, speech, sight, hearing, mind) make ten, and that is the Krita (the highest ) cast (representing the ten, the eaters and the food). Therefore in all quarters those ten are food (and) Krita (the highest cast). These are again the Virâg (of ten syllables) which eats the food. Through this all this becomes seen. He who knows this sees all this and becomes an eater of food, yea, he becomes an eater of food.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।