Chandogya Upanishad
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अध्याय 60 / 154

Adhyāya 60

प्रपाठक खण्ड 60

5 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ5 श्लोक

अध्याय 60

श्लोक 4.4.1

॥ सत्यकामो ह जाबालो जबालां मातरमामन्त्रयांचक्रे ब्रह्मचर्यं भवति विवत्स्यामि किंगोत्रो न्वहमस्मीति

|| satyakāmo ha jābālo jabālāṃ mātaramāmantrayāṃcakre brahmacaryaṃ bhavati vivatsyāmi kiṃgotro nvahamasmīti

हिन्दी अर्थ

स होवाच बरह्चारी विजाना- वह ब्रह्मचारी षोरा-'आपने जो उपरिष्यमा- म्यहं यद्धवद्धिरुक्त यस्मिन्सति जीवनं यद्पगमे च स्तदाकाशः प्राणस्य संबन्ध्या- भ्रयत्वेन दाद आकाश इत्यथः, खगुणविरिष्टं ब्रह्म तस्स्थं च फिर उसे गा्हपत्याम्नने शिक्षा दी-- पृथिवी, ग्नि, अन्न जोर आदित ये मेरे चार शरीर है । आदित्यके अन्तर्गत जो यह पुर्ष दिखायी देता है वह भ ह, हीमे

English

Satyakâma, the son of Gabâlâ, addressed his mother and said: 'I wish to become a Brahmakârin (religious student), mother. Of what family am I?'

अध्याय 60

श्लोक 4.4.2

सा हैनमुवाच नाहमेतद्वेद तात यद्गोत्रस्त्वमसि बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे साहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि स सत्यकाम एव जाबालो ब्रवीथा इति

sā hainamuvāca nāhametadveda tāta yadgotrastvamasi bahvahaṃ carantī paricāriṇī yauvane tvāmalabhe sāhametanna veda yadgotrastvamasi jabālā tu nāmāhamasmi satyakāmo nāma tvamasi sa satyakāma eva jābālo bravīthā iti

हिन्दी अर्थ

फिर उनसे प्रयेकने भपने- अपनेसे सम्बद्ध विदयाका निरूपण करना आरम्म किया । उनम सबसे खोक भवति सवंमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावर युरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं सुञ्ञामोऽस्मिश्थ लोके-

English

She said to him: 'I do not know, my child, of what family thou art. In my youth when I had to move about much as a servant (waiting on the guests in my father's house), I conceived thee. I do not know of what family thou art. I am Gabâlâ by name, thou art Satyakâma (Philalethes). Say that thou art Satyakâma Gâbâlâ.'

अध्याय 60

श्लोक 4.4.3

स ह हारिद्रुमतं गौतममेत्योवाच ब्रह्मचर्यं भगवति वत्स्याम्युपेयां भगवन्तमिति

sa ha hāridrumataṃ gautamametyovāca brahmacaryaṃ bhagavati vatsyāmyupeyāṃ bhagavantamiti

हिन्दी अर्थ

चह परप, जो इसे इस पकार जानकर इसकी उप्रसना करता है, पापकर्मोको नष्ट कर देता है, अग्नरोकवान्‌ होता है, पूणं मुकर भ्रा होता है, उञ्ञ्वरु जीवन व्यतीत करता है तथा इसके उत्तरवती (संतान स यः केथिदेवं यथोक्त वह परुष, जो कोई कि इस गाहंपत्यमग्निमाजनादत्वेन च कार भोग्य शौर भोक्ताङूपसे ५ ठा प्मिमकतयपासत सोत मकारो विभक्त इए पूर्वोक्त गाह. प्रकार रोकी-- रोकवान्‌ होता है । जेते मिहम है । इस लोकम भी वह सम्पूरण- सो वष॑की आयु प्राप्त

English

He going to Gautama Hâridrumata said to him, 'I wish to become a Brahmakârin with you, Sir. May I come to you, Sir?'

अध्याय 60

श्लोक 4.4.4

तँ होवाच किंगोत्रो नु सोम्यासीति स होवाच नाहमेतद्वेद भो यद्गोत्रोऽहमस्म्यपृच्छं मातरँ सा मा प्रत्यब्रवीद्बह्वहं चरन्ती परिचरिणी यौवने त्वामलभे साहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसीति सोऽहँ सत्यकामो जाबालोऽस्मि भो इति

tam̐ hovāca kiṃgotro nu somyāsīti sa hovāca nāhametadveda bho yadgotro'hamasmyapṛcchaṃ mātaram̐ sā mā pratyabravīdbahvahaṃ carantī paricariṇī yauvane tvāmalabhe sāhametanna veda yadgotrastvamasi jabālā tu nāmāhamasmi satyakāmo nāma tvamasīti so'ham̐ satyakāmo jābālo'smi bho iti

हिन्दी अर्थ

अथ हैनमन्वाहा्यपचनोऽलुशरासापो ददो फिर उसे अन्वाहार्यपचन ( दक्षिणाग्नि ) ने शिक्षा दी-- जल, दिशा, नकषतर ओर चन्द्रमा ये मेरे चार शरीर है । चन्द्रममे नो थह पुरुप दिखायी देता है वह मे है वही मेह

English

He said to him: 'Of what family are you, my friend?' He replied: 'I do not know, Sir, of what family I am. I asked my mother, and she answered: "In my youth when I had to move about much as a servant, I conceived thee. I do not know of what family thou art. I am Gabâlâ by name, thou art Satyakâma," I am therefore Satyakâma Gâbâlâ, Sir.'

अध्याय 60

श्लोक 4.4.5

तँ होवाच नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति समिधँ सोम्याहरोप त्वा नेष्ये न सत्यादगा इति तमुपनीय कृशानामबलानां चतुःशता गा निराकृत्योवाचेमाः सोम्यानुसंव्रजेति ता अभिप्रस्थापयन्नुवाच नासहस्रेणावर्तेयेति स ह वर्षगणं प्रोवास ता यदा सहस्रँ सम्पेदुः

tam̐ hovāca naitadabrāhmaṇo vivaktumarhati samidham̐ somyāharopa tvā neṣye na satyādagā iti tamupanīya kṛśānāmabalānāṃ catuḥśatā gā nirākṛtyovācemāḥ somyānusaṃvrajeti tā abhiprasthāpayannuvāca nāsahasreṇāvarteyeti sa ha varṣagaṇaṃ provāsa tā yadā sahasram̐ sampeduḥ

हिन्दी अर्थ

खोकी भवति सर्वमायुरेति अयोग्जोवति नास्यावर. पुरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं मुञ्जामोऽस्मिःश्च लोके. वह पुरुष, जो इसे इस पक्रार जानकर इस ८ चार भार्गोमें विभक्त भग्न ) कौ उपासना करता हे, पापकमोंका नाश कर देता ह, ोकवान्‌ होता हे, पूणे भायुको पराप्त होता है जर उज्वल जीवन व्यतीत करता अथ हैनमन्वाहा्यपचनोऽलु- फिर उसेः भन्वाहार्यपचन-- ५ । मेरे चार शरीर है । मै अपनेको चतसस्तनवधतुर्ादमन्वाहार्यप- चार प्रकारसे विभक्त करके अन्वा-

English

He said to him: 'No one but a true Brâhmana would thus speak out. Go and fetch fuel, friend, I shall initiate you. You have not swerved from the truth.' Having initiated him, he chose four hundred lean and weak cows, and said: 'Tend these, friend.' He drove them out and said to himself, 'I shall not return unless I bring back a thousand.' He dwelt a number of years (in the forest), and when the cows had become a thousand,

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।