Chandogya Upanishad
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अध्याय 50 / 154

Adhyāya 50

प्रपाठक खण्ड 50

8 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ8 श्लोक

अध्याय 50

श्लोक 3.13.1

॥ तस्य ह वा एतस्य हृदयस्य पञ्च देवसुषयः स योऽस्य प्राङ्सुषिः स प्राणस्तच्चक्षुः स आदित्यस्तदेतत्तेजोऽन्नाद्यमित्युपासीत तेजस्व्यन्नादो भवति य एवं वेद

|| tasya ha vā etasya hṛdayasya pañca devasuṣayaḥ sa yo'sya prāṅsuṣiḥ sa prāṇastaccakṣuḥ sa ādityastadetattejo'nnādyamityupāsīta tejasvyannādo bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

तदाऽसोष्ट पूणिकेति, विधियज्ञ यज्ञस्य यत्सोप्यत्यसेषटेतिशब्द्‌- इसीसे जव माता उसे ननम देनै- तद्धेतदधोर आद्भिरसः कृष्णाय देवकीपुत्रायो- घोर आद्ञिरस छषिने देवकीपुत्र छृष्णको यह॒यज्ञदशंन सुनाकर, निसपते कि वह अन्य विद्याओंके विषयमे तृष्णादीन हो गया था, कहा- 'आदिस्त्नस्य रेतसः' यह एक मन्त्र है ओर “उद्वयं तमसस्परि इत्यादि दूसरा है । इनमे पहला मन्त्र इस प्रकार दहै-आदिखलस्य रेतसो ज्योतिः परयन्ति वासरम्‌ । परो यदिध्यते दिवि इसका अथं यह

English

For that heart there are five gates belonging to the Devas (the senses). The eastern gate is the Prâna (up-breathing), that is the eye, that is Âditya (the sun). Let a man meditate on that as brightness (glory of countenance) and health. He who knows this, becomes bright and healthy.

अध्याय 50

श्लोक 3.13.2

अथ योऽस्य दक्षिणः सुषिः स व्यानस्तच्छ्रोत्रँ स चन्द्रमास्तदेतच्छ्रीश्च यशश्चेत्युपासीत श्रीमान्यशस्वी भवति य एवं वेद

atha yo'sya dakṣiṇaḥ suṣiḥ sa vyānastacchrotram̐ sa candramāstadetacchrīśca yaśaścetyupāsīta śrīmānyaśasvī bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

आदिदित्यत्राकारस्यायुबन्ध- “आत्‌ इत्‌ इसमे आकारके रिं वातः पीलेका तकार ओर इत्‌ शब्द स्तकारोऽनथक इच्छन्द । श्रत्न- अर्थरहित है । ्रलस्य'-चिरन्तन मन आदि दषटिचे अध्यात्म ओर आधिहैविक बह्मोपास्ना मनोमय ईश्वर उक्त आका- चतुर्दश ण्डके द्वितीय मन्त्रे ईैश्वरके गुणोकि एकदेशको लेकर

English

The southern gate is the Vyâna (back-breathing), that is the ear, that is the moon. Let a man meditate on that as happiness and fame. He who knows this, becomes happy and famous.

अध्याय 50

श्लोक 3.13.3

अथ योऽस्य प्रत्यङ्सुषिः सोऽपानः सा वाक्सोऽग्निस्तदेतद्ब्रह्मवर्चसमन्नाद्यमित्युपासीत ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भवति य एवं वेद

atha yo'sya pratyaṅsuṣiḥ so'pānaḥ sā vākso'gnistadetadbrahmavarcasamannādyamityupāsīta brahmavarcasyannādo bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

“मन ब्रह्म हः इस प्रकार उपासना करे । यह अध्यालदृ्टि है । तथा (आकाश ब्रहम हैः यह अथिदेवतदष्टि ह । इस प्रकार अध्यात्म ओर अधिदेवत दो्नोका उपदेश किया गया मनो मदतेऽनेनेत्यन्तःकरणं मन--जिससे पाणी मनन करता तद्र परमित्युपासीतेति, एत- है उस॒ अन्तःकरणको मन कहते = वेह परब्रहम है- एेसी उपासना तदेतच्तुष्पाद्ब्रह्म । वाक्पादः प्राणः पादशश्षुः

English

The western gate is the Apâna (down-breathing), that is speech, that is Agni (fire). Let a man meditate on that as glory of countenance and health. He who knows this, becomes glorious and healthy.

अध्याय 50

श्लोक 3.13.4

अथ योऽस्योदङ्सुषिः स समानस्तन्मनः स पर्जन्यस्तदेतत्कीर्तिश्च व्युष्टिश्चेत्युपासीत कीर्तिमान्व्युष्टिमान्भवति य एवं वेद

atha yo'syodaṅsuṣiḥ sa samānastanmanaḥ sa parjanyastadetatkīrtiśca vyuṣṭiścetyupāsīta kīrtimānvyuṣṭimānbhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

वह्‌ यह ( मनःसंक्क ) बरहम चार पादोवाला है । वाक्‌ पाद है, भाण पाद्‌ हे, च्च पाद है घोर श्रोत्र पाद है । यह भध्यास है । अव अधिदेवत कहते है- म्नि पाद दहै, वायु पाद ह, मदितय पाद तदेतन्मनआख्यं चतुष्पा- वह यह मनस्क ब्रहम चतुष्पाद्‌ है । जिसके चार पाद हों उसे चतुष्पाद्‌ रहय, चत्वारः पादा अस्येति । कृते है । यह मनोत्रह चतुष्पाद्‌

English

The northern gate is the Samâna (on-breathing), that is mind, that is Parganya (rain). Let a man meditate on that as celebrity and beauty. He who knows this, becomes celebrated and beautiful.

अध्याय 50

श्लोक 3.13.5

अथ योऽस्योर्ध्वः सुषिः स उदानः स वायुः स आकाशस्तदेतदोजश्च महश्चेत्युपासीतौजस्वी महस्वान्भवति य एवं वेद

atha yo'syordhvaḥ suṣiḥ sa udānaḥ sa vāyuḥ sa ākāśastadetadojaśca mahaścetyupāsītaujasvī mahasvānbhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

तिषा भाति च तपति च। भाति च तपति च कीया यासा बह्मवचसेन य एवं वेद्‌ वाक्‌ ही बरहमका चौथा पाद ह; वह्‌ अभिरूप ज्योति दीप्त होत है ओर तपता है । जो देसा जानता है वह कीर्ति, यश ओर ब्रह्मने कारण देदीप्यमान होता जोर तपता हे वागेव मनसो ब्रह्मणश्चतुर्थः वाक्‌ ही मनरूप ग्रहन, श , है। जिस प्रकार गौ आदि नैव दि पादेनेव गवादि वक्तव्य- पदद्रारा इष्ट ॒स्थानपर जाकर्‌ म

English

The upper gate is the Udâna (out-breathing), that is air, that is ether. Let a man meditate on that as strength and greatness. He who knows this, becomes strong and great.

अध्याय 50

श्लोक 3.13.6

ते वा एते पञ्च ब्रह्मपुरुषाः स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपाः स य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान्स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान्वेदास्य कुले वीरो जायते प्रतिपद्यते स्वर्गं लोकं य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान्स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान्वेद

te vā ete pañca brahmapuruṣāḥ svargasya lokasya dvārapāḥ sa ya etānevaṃ pañca brahmapuruṣānsvargasya lokasya dvārapānvedāsya kule vīro jāyate pratipadyate svargaṃ lokaṃ ya etānevaṃ pañca brahmapuruṣānsvargasya lokasya dvārapānveda

हिन्दी अर्थ

घ्राण एव ब्रह्मणश्चतुथेः पादः । स वायुना ज्यो- तिषा भाति च तपति च । माति च तपति च कीत्य यदासा बह्यव्यसेन य एवं वेद पराण ही भनोग बरहका चोथा पाद है । वह वायुरूप प्यते रकशित होता ओर तपता है । जो इस प्रकार जानता है वह कीरति, यज्ञ॒ ओर ब्रह्तेजसे भरकाशित दोता ओर तपता है

English

These are the five men of Brahman, the doorkeepers of the Svarga (heaven) world. He who knows these five men of Brahman, the door-keepers of the Svarga world, in his family a strong son is born. He who thus knows these five men of Brahman, as the door-keepers of the Svarga world, enters himself the Svarga world.

अध्याय 50

श्लोक 3.13.7

अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु सर्वतः पृष्ठेष्वनुत्तमेषूत्तमेषु लोकेष्विदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे ज्योतिः

atha yadataḥ paro divo jyotirdīpyate viśvataḥ pṛṣṭheṣu sarvataḥ pṛṣṭheṣvanuttameṣūttameṣu lokeṣvidaṃ vāva tadyadidamasminnantaḥ puruṣe jyotiḥ

हिन्दी अर्थ

चक्षुरेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः । स आदित्येन कीर्त्या यासा बह्यवर्चसेन य एवं वेद्‌ ॥ "+ ॥ च्च ही मनःसंज्क तरहक चौथा पाद्‌ है । वह आदियर श्रोत्रमेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः । स दिग्मिरज्योतिषा भाति = तपति च। भाति च तपति च कीरस्य यशस बह्मवचसेन य एवं वेद य एवं वेद्‌ रत्र ही मनोप ब्रहमका चथा पाद्‌ है । वह दिशारूप ज्यो भक्मरित होता ओर तपता है । जो इस प्रकार जानता है वह कीरिं तथा प्राण एव ब्रह्मणशवतुर्थः इसी प्रकार प्राण दी ब्रह्मका चौथा

English

Now that light which shines above this heaven, higher than all, higher than everything, in the highest world, beyond which there are no other worlds, that is the same light which is within man. And of this we have this visible proof :

अध्याय 50

श्लोक 3.13.8

तस्यैषा दृष्टिर्यत्रितदस्मिञ्छरीरे सँस्पर्शेनोष्णिमानं विजानाति तस्यैषा श्रुतिर्यत्रैतत्कर्णावपिगृह्य निनदमिव नदथुरिवाग्नेरिव ज्वलत उपशृणोति तदेतद्दृष्टं च श्रुतं चेत्युपासीत चक्षुष्यः श्रुतो भवति य एवं वेद य एवं वेद

tasyaiṣā dṛṣṭiryatritadasmiñcharīre sam̐sparśenoṣṇimānaṃ vijānāti tasyaiṣā śrutiryatraitatkarṇāvapigṛhya ninadamiva nadathurivāgneriva jvalata upaśṛṇoti tadetaddṛṣṭaṃ ca śrutaṃ cetyupāsīta cakṣuṣyaḥ śruto bhavati ya evaṃ veda ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

आदित्य ओर अण्डहष्टित्े अध्यात्म एवं आपिरैविक्त उपासना आदित्यो ब्रह्मणः पाद उक्त आदिव्यको ब्रह्मका पाद बतलय ¦ ई थ दृष्टि करनेके लि इस्त खण्डक आदित्य तरह है-एेखा उपदेश है; उसीकी भ्याख्या की नाती है । पहले यह असत्‌ ही था । वह सत्‌ ( का्यमिषुल ) हुभा । व अङ्कुरित हुआ । वह एक अण्डेमे परिणत हो गया । वह एक वर्षपयन्त

English

Namely, when we thus perceive by touch the warmth here in the body . And of it we have this audible proof: Namely, when we thus, after stopping our ears, listen to what is like the rolling of a carriage, or the bellowing of an ox, or the sound of a burning fire (within the ears). Let a man meditate on this as the (Brahman) which is seen and heard. He, who knows this, becomes conspicuous and celebrated, yea, he becomes celebrated.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।