Chandogya Upanishad
49
अध्याय 49 / 154

Adhyāya 49

प्रपाठक खण्ड 49

9 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ9 श्लोक

अध्याय 49

श्लोक 3.12.1

॥ गायत्री वा ईदँ सर्वं भूतं यदिदं किं च वाग्वै गायत्री वाग्वा इदँ सर्वं भूतं गायति च त्रायते च

|| gāyatrī vā īdam̐ sarvaṃ bhūtaṃ yadidaṃ kiṃ ca vāgvai gāyatrī vāgvā idam̐ sarvaṃ bhūtaṃ gāyati ca trāyate ca

हिन्दी अर्थ

ईसम जशो-जर्दा अमुकः राब्द्‌ आया है वरह अपने पुत्रके नाच उच्चारण करना चादिये । ४ काण्ड १५ शाङ्करआस्याथे ३२१ उसर्भैनेजोकहा किर प्राणकी शरण है सो यह जो कुछ सम्पूणं भृतसमुदाय है प्राण ही हे, उसीकी मँ शरण है

English

The Gâyatrî (verse) is everything whatsoever here exists. Gâyatrî indeed is speech, for speech sings forth (gâya-ti) and protects (trâya-te) everything that here exists.

अध्याय 49

श्लोक 3.12.2

या वै सा गायत्रीयं वाव सा येयं पृथिव्यस्याँ हीदँ सर्वं भूतं प्रतिष्ठितमेतामेव नातिशीयते

yā vai sā gāyatrīyaṃ vāva sā yeyaṃ pṛthivyasyām̐ hīdam̐ sarvaṃ bhūtaṃ pratiṣṭhitametāmeva nātiśīyate

हिन्दी अर्थ

तथार्भेनेनो कहा करि भरँ मकौ शरण है इससे मेने यही कहा है कि भ प्रथिवीकी शरण है, अन्तरिक्षकी शरण ह ओर युरोक- फिरर्मेने जोकि भे भुवःकी शरण ह इससे यह कहा गया है किं श्रे अग्निकी शरण है, वाधुकी शरण ह ओर आदियक्री शरण दह ॥ ॥ तथा मने जोकहा कि “मे स्वकी शरण है स यदवोचं प्राणं प्रपद्य इति “उस ने जो कदा किरम प्राणकी व्याख्यानाथेयुपन्यासः । प्राणो ् हः इसीकी व्याख्या करनेके विस्तार किया जाता हे। यह

English

That Gâyatrî is also the earth, for everything that here exists rests on the earth, and does not go beyond.

अध्याय 49

श्लोक 3.12.3

या वै सा पृथिवीयं वाव सा यदिदमस्मिन्पुरुषे शरीरमस्मिन्हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीयन्ते

yā vai sā pṛthivīyaṃ vāva sā yadidamasminpuruṣe śarīramasminhīme prāṇāḥ pratiṣṭhitā etadeva nātiśīyante

हिन्दी अर्थ

पुत्रायुष उपासनगरक्तं जपश्च । पुत्रकौ आयुके ल्य उपासना अथेदानीमातममनो दीधेजीवना- दीरषयुके स्मि इत जप जर उपासनाका विधान करता हु निश्चय पुरूष ही यज्ञ है । उसके ८ उसकी आयुके ) जो चौबीस वष है, वे प्रातः सवन है । गायत्री चौबीस अक्षरोवारी है; ओर भातः- सवन गायत्री छन्दसे सम्बद्ध ह । उस इस प्ातःसवनके वुगण अनुगत

English

That earth again is the body in man, for in it the vital airs (prânas , which are everything) rest, and do not go beyond.

अध्याय 49

श्लोक 3.12.4

यद्वै तत्पुरुषे शरीरमिदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे हृदयमस्मिन्हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीयन्ते

yadvai tatpuruṣe śarīramidaṃ vāva tadyadidamasminnantaḥ puruṣe hṛdayamasminhīme prāṇāḥ pratiṣṭhitā etadeva nātiśīyante

हिन्दी अर्थ

पुरुषो जीवनविशिष्टः कायं- जीवनसे युक्त देह ओर इन्दिोका संघात, जैसा कि प्रसिद्ध दे, वही पुरुष है । वाव शब्द निरचयाथंक यदि इस प्रातःसवनसम्पन्न आयुमे उसे कोई रोग आदि कष्ट पू्हुचावे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये, दे प्राणरूप वुगण मेरे इस प्रातःसवनको माध्यन्दिनिसवनके साथ एकट्प कर दो; यज्ञस्वरूप मँ आप तं वेदयज्ञसंपादिनमेतस्मिन्प्रा- उस यज्ञपम्पादकको यदि भ्रातः- सवनसंपन्ने वयसि किञचिद्धधा- सवनरूपसे निष्पन्न हुई इसे आये त मरणकी शङ्काकी कारणमूत कों

English

That body again in man is the heart within man, for in it the prânas (which are everything) rest, and do not go beyond.

अध्याय 49

श्लोक 3.12.5

सैषा चतुष्पदा षड्विधा गायत्री तदेतदृचाभ्यनूक्तम्

saiṣā catuṣpadā ṣaḍvidhā gāyatrī tadetadṛcābhyanūktam

हिन्दी अर्थ

ण्ड १६ शाङ्करमाष्वाथ ३२७ इसके पश्चात्‌ जो चौवाटीस वषं है, वे माध्यन्दिनसवन है । षट्‌ छन्द चौवालीस क्षरोवाला है ओर माध्यन्दिनवन त्िषटप्‌ विकोप्सीयेदयुद्धेव तत एत्यगदो हेव भवति ॥ ॥ ' इसके पश्चात्‌ नो जड़तारीस वर्ष है, वे तृतीय सवन है । जगती छन्द अडतारीस अ्षरोबाला है तथा तृतीय सवन जगती छन्दसे सम्बन्ध

English

That Gâyatrî has four feet and is sixfold . And this is also declared by a Rik verse (Rig-Veda X, 90, 3):--

अध्याय 49

श्लोक 3.12.6

तावानस्य महिमा ततो ज्यायाँश्च पूरुषः ।पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवीति

tāvānasya mahimā tato jyāyām̐śca pūruṣaḥ | pādo'sya sarvā bhūtāni tripādasyāmṛtaṃ divīti

हिन्दी अर्थ

इस भसिद्ध वि्याको जानने बाले ेतरेय महिदासने कहा -था-- क्यो कष्ट देता है, जो ङ्क इस रोगद्वारा स त्वं है रोग; योऽहं यज्ञोऽनेन षोडशं व्शतमजीवत्‌ । अन्यो- प्रजीवति य एवं यथोक्तं यज्ञ वह पुर्ष जो भोजन करनेकी ह्च्छा करता हे, जो पीनेकी इच्छा करता है ओर जो रममाण ८ प्रसन्न ) नहीं होता --वही इक

English

'Such is the greatness of it (of Brahman, under the disguise of Gâyatrî ); greater than it is the Person (purusha). His feet are all things. The immortal with three feet is in heaven (i. e. in himself).'

अध्याय 49

श्लोक 3.12.7

यद्वै तद्ब्रह्मेतीदं वाव तद्योयं बहिर्धा पुरुषादाकाशो यो वै स बहिर्धा पुरुषादाकाशः

yadvai tadbrahmetīdaṃ vāva tadyoyaṃ bahirdhā puruṣādākāśo yo vai sa bahirdhā puruṣādākāśaḥ

हिन्दी अर्थ

"वह जो भोजन करनेकी इच्छा करता है" इत्यादि पृरुषका यजञसे सादृश्यनिषूपण पूरवरन्थसे दही क्षि बह जो खता हे, जो पीता है ओर जो रतिका अनुभव करता द--वह उपसदोकी सटृताको भ्रा होता है

English

The Brahman which has been thus described (as immortal with three feet in heaven, and as Gâyatrî) is the same as the ether which is around us;

अध्याय 49

श्लोक 3.12.8

अयं वाव स योऽयमन्तः पुरुष अकाशो यो वै सोऽन्तः पुरुष आकाशः

ayaṃ vāva sa yo'yamantaḥ puruṣa akāśo yo vai so'ntaḥ puruṣa ākāśaḥ

हिन्दी अर्थ

फिर वह जो भोजन करता है, पीता है ओर इष्ट पदार्थादिके संयोग- से रतिका अनुभव करता है-वह्‌ तथा वह नो हसता है, जो मक्षण करता है ओर जो मेथुन करता हे-- वे सव स्तुत रक्री दी समानताक प्रा्होते है तथा वह जो हसता है, जो यन्मैथुनं चरति भक्षण करता है जर नो मेथुन कर- ता है वह स्तुतशखकी समानताको

English

And the ether which is around us, is the same as the ether which is within us. And the ether which is within us,

अध्याय 49

श्लोक 3.12.9

अयं वाव स योऽयमन्तर्हृदय आकाशस्तदेतत्पूर्णमप्रवर्ति पूर्णमप्रवर्तिनीँश्रियं लभते य एवं वेद

ayaṃ vāva sa yo'yamantarhṛdaya ākāśastadetatpūrṇamapravarti pūrṇamapravartinīm̐śriyaṃ labhate ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

तथा पुरुषके जो तप्‌ दान्‌, आदि गुण है, वे हीडइसकी' दक्षिणाः; ध्पुटिकरत्वसामा- दक्षिणा हैः व्थोकि धर्मी धृ इससे कहते है कि भरसूता होगी" जथवा श्रसूता हुई” वह इसका पुननन्म ही है; तथा मरण दी अवमृथस्नान है

English

That is the ether within the heart. That ether in the heart (as Brahman) is omnipresent and unchanging. He who knows this obtains omnipresent and unchangeable happiness.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।