Chandogya Upanishad
51
अध्याय 51 / 154

Adhyāya 51

प्रपाठक खण्ड 51

4 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय 51

श्लोक 3.14.1

॥ सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत ।अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत

|| sarvaṃ khalvidaṃ brahma tajjalāniti śānta upāsīta | atha khalu kratumayaḥ puruṣo yathākraturasmim̐lloke puruṣo bhavati tathetaḥ pretya bhavati sa kratuṃ kurvīta

हिन्दी अर्थ

आदित्यो बहेत्यादेश उप- (जादित्य ब्रह्म है" यह भदिश- असत्कायवाद्‌- उपदेश्च है । उस आदिलयका देशस्तस्योपन्या- स्तुतिके ख्यि उपाख्यान का तव्यद्रजतश्सेयं प्रथिवी यत्सुव्णशसा योयं रायु उनमे जो खण्ड रजत हुजा वह॒ यह प्रथिवी है ओर जो वणे इभा वह दुरोक है । उस अण्डेका नो जरायु ( स्थूल गरभवेष्ठन ) था वही व पर्वत है, जो उस्व ( सूक्ष्म गभ॑वेष्टन ) था बह मरषोके सहित इरा

English

All this is Brahman (n.) Let a man meditate on that (visible world) as beginning, ending, and breathing in it (the Brahman). Now man is a creature of will. According to what his will is in this world, so will he be when he has departed this life. Let him therefore have this will and belief:

अध्याय 51

श्लोक 3.14.2

मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यत्तोऽवाक्यनादरः

manomayaḥ prāṇaśarīro bhārūpaḥ satyasaṃkalpa ākāśātmā sarvakarmā sarvakāmaḥ sarvagandhaḥ sarvarasaḥ sarvamidamabhyatto'vākyanādaraḥ

हिन्दी अर्थ

कपालमासीत्‌, सेयं प्रथिवी प्रथि- था वही यह थिवी अर्थ्‌ पृथवी. । ्ुपरकषितमधोऽण्डकपालमित्य- रूपसे उपरकषित नीक भण्ड धः । यतसुवणं कारं सा चरोदयुः ६ भोर नो धवम सष्ड बाद कामास्तस्मात्तस्योदयं प्रति प्रत्यायनं पति घोषा उद वाऽनृत्तिष्ठन्ति सर्वाणि च भूतानि सवे च कामाः

English

The intelligent, whose body is spirit, whose form is light, whose thoughts are true, whose nature is like ether (omnipresent and invisible), from whom all works, all desires, all sweet odours and tastes proceed; he who embraces all this, who never speaks, and is never surprised,

अध्याय 51

श्लोक 3.14.3

एष म आत्मान्तर्हृदयेऽणीयान्व्रीहेर्वा यवाद्वा सर्षपाद्वा श्यामाकाद्वा श्यामाकतण्डुलाद्वैष म आत्मान्तर्हृदये ज्यायान्पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षाज्ज्यायान्दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः

eṣa ma ātmāntarhṛdaye'ṇīyānvrīhervā yavādvā sarṣapādvā śyāmākādvā śyāmākataṇḍulādvaiṣa ma ātmāntarhṛdaye jyāyānpṛthivyā jyāyānantarikṣājjyāyāndivo jyāyānebhyo lokebhyaḥ

हिन्दी अर्थ

फिर उषसे जो उलन हुा वह यह्‌ आदित्य है । उसके उक्र होते दी बडे नोरोका शब्द हज तथा उसीसे सम्पूणं प्राणी 4 ओर सारे भोग हए है । इसीसे उसका उदय जर अस्त होनेषर दो्ध- फिर उस अण्डेमे जो गर्भरूपसे तस्मिन्नण्डे, सोऽसावादित्यः, उतपन्न हआ वह यह आदित्य है । तेषां भूतानां कामाः काम्यन्त स य एतमेवं विद्वानादित्यं ब्रह्मेल्युपास्तेऽभ्यष

English

He is my self within the heart, smaller than a corn of rice, smaller than a corn of barley, smaller than a mustard seed, smaller than a canary seed or the kernel of a canary seed. He also is my self within the heart, greater than the earth, greater than the sky, greater than heaven, greater than all these worlds.

अध्याय 51

श्लोक 3.14.4

सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादर एष म आत्मान्तर्हृदय एतद्ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसंभवितास्मीति यस्य स्यादद्धा न विचिकित्सास्तीति ह स्माह शाण्डिल्यः शाण्डिल्यः

sarvakarmā sarvakāmaḥ sarvagandhaḥ sarvarasaḥ sarvamidamabhyātto'vākyanādara eṣa ma ātmāntarhṛdaya etadbrahmaitamitaḥ pretyābhisaṃbhavitāsmīti yasya syādaddhā na vicikitsāstīti ha smāha śāṇḍilyaḥ śāṇḍilyaḥ

हिन्दी अर्थ

वह जो इस प्रकार जानेवाला होकर आदित्यकी "यह ब्रह है! छ रकार उपासना करता दे, वह आदिव्य्प हो जाता है, तथा उक । समीप शीघ्र ही घुन्दर घोष आते है मौर उसे घुख देते टै, खल देते है ॥॥ । श्रीमच्छंकरभगवतः रतो छान्दोग्योपनिषद्विषवरणे

English

He from whom all works, all desires, all sweet odours and tastes proceed, who embraces all this, who never speaks and who is never surprised, he, my self within the heart, is that Brahman (n.) When I shall have departed from hence, I shall obtain him (that Self). He who has this faith has no doubt; thus said Sândilya , yea, thus he said.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।