Chandogya Upanishad
47
अध्याय 47 / 154

Adhyāya 47

प्रपाठक खण्ड 47

4 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय 47

श्लोक 3.10.1

॥ अथ यत्पञ्चमममृतं तत्साध्या उपजीवन्ति ब्रह्मणा मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति

|| atha yatpañcamamamṛtaṃ tatsādhyā upajīvanti brahmaṇā mukhena na vai devā aśnanti na pibantyetadevāmṛtaṃ dṛṣṭvā tṛpyanti

हिन्दी अर्थ

हृदयस्थित परमग्योतिका अनुमापक लिङ्ग ङित उस ग्योतिका अनुमापक लिङ्ग तलगिन्दरियकी विषयताको करि यत्र यस्मिन्कारे, एतदिति यतर जिस समय, "एतत्‌, यह 'विजानातिः इस्त ॒क्रियाका ८ विशेषण दहे, इस शरीरम हाथसे

English

On the fifth of these nectars the Sâdhyas live, with Brahman at their head. True, the Devas do not eat or drink, but they enjoy by seeing the nectar.

अध्याय 47

श्लोक 3.10.2

त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति

ta etadeva rūpamabhisaṃviśantyetasmādrūpādudyanti

हिन्दी अर्थ

जरते इए अग्निका शब्द होता है उस्र प्रकारके शब्दका भपने शरीर के भीतर श्रवण करता है । सर्वटष्टिते ब्रह्मोपा्तना गोऽनन्तगुणवतोऽनन्तशक्तरनेक- अनेक ्रकारसे उपासनीय ब्रह्मी खूपसे उपासनाका विधान कनेकी यह सारा जगत्‌ निर्चय तरह ही दे, यहं उपीपे उतयन होनेबाला, उसमे लीन होनेवाला जोर उसमे चेष्टा करनेवाखा है--इस प्रकार शन्त रागद्ेषरहित) होकर उपासना करे, क्योंकि पुरुष निर्चय ह करुमय--

English

They enter into that colour, and they rise from that colour.

अध्याय 47

श्लोक 3.10.3

स य एतदेवममृतं वेद साध्यानामेवैको भूत्वा ब्रह्मणैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति

sa ya etadevamamṛtaṃ veda sādhyānāmevaiko bhūtvā brahmaṇaiva mukhenaitadevāmṛtaṃ dṛṣṭvā tṛpyati sa etadeva rūpamabhisaṃviśatyetasmādrūpādudeti

हिन्दी अर्थ

सवं समस्तं खल्विति वाक्या- सर्व- समस्त लल यह निपात । वाक्यकी शोमा बद्रानके ल्थि है । लङ्काराथों निपातः । इदं जग- यह अर्थात्‌ नाम-ूपमय विक्षरो न॒ भावको स्मरण करता हषा अन्तम शरीर त्यागता है षीः उसी भावके प्राप्त होता है" क्योंकि

English

He who thus knows this nectar, becomes one of the Sâdhyas, with Brahman at their head; he sees the nectar and rejoices. And he, having entered that colour, rises again from that colour.

अध्याय 47

श्लोक 3.10.4

स यावदादित्य उत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता द्विस्तावदूर्ध्वं उदेतार्वागस्तमेता साध्यानामेव तावदाधिपत्यँस्वाराज्यं पर्येता

sa yāvadāditya uttarata udetā dakṣiṇato'stametā dvistāvadūrdhvaṃ udetārvāgastametā sādhyānāmeva tāvadādhipatyam̐svārājyaṃ paryetā

हिन्दी अर्थ

किस प्रकार निश्चय करना आकाशात्मा सवकमा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः वहं ब्रह्म मनोम्‌य्‌, भाणडरीर, भाकारशरीर, सर्वकर्म, स्वकाम्‌, सगन्ध, सव ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाक्रहित घौर मनोमय--मनःपाय; जिसके हारा जीव मनन करता है उसे भन कहते है, यह अपनी वृदद्ारा

English

So long as the sun rises in the north and sets in the south, twice as long does it rise above, and set below; and so long does he follow the sovereign power of the Sâdhyas .

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।