अध्याय 46
श्लोक 3.9.1
॥ अथ यच्चतुर्थममृतं तन्मरुत उपजीवन्ति सोमेन मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति
|| atha yaccaturthamamṛtaṃ tanmaruta upajīvanti somena mukhena na vai devā aśnanti na pibantyetadevāmṛtaṃ dṛṣṭvā tṛpyanti
हिन्दी अर्थ
तथा इसका जो उर्व छिद्र है वह उदान है, वह वायु है, वह भाकाश है ओर वही यद ओन ओर महः है--इस प्रकार उसकी उपासना करे । जो इस प्रकार जानता है वह ओजस्वी ८ बल्वान् ) अथ योऽ्स्योध्वैः सुषिःस त्था इसका जो उध्वषद्ि है ९ वह उदान दहै । पेरके तएसे उदान आ पादतलादारभ्योष्व- छक ऊपरक्ो ओर उक्तमण करनेके
English
On the fourth of these nectars the Maruts live, with Soma at their head. True, the Devas do not eat or drink, but they enjoy by seeing the nectar.