Chandogya Upanishad
33
अध्याय 33 / 154

Adhyāya 33

प्रपाठक खण्ड 33

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 33

श्लोक 2.20.1

॥ अग्निर्हिंकारो वायुः प्रस्ताव आदित्य उद्गीथो नक्षत्राणि प्रतिहारश्चन्द्रमा निधनमेतद्राजनं देवतासु प्रोतम्

|| agnirhiṃkāro vāyuḥ prastāva āditya udgītho nakṣatrāṇi pratihāraścandramā nidhanametadrājanaṃ devatāsu protam

हिन्दी अर्थ

समू सवर इन््रके भासा रै, समस्त ऊष्मवणं प्रनापतिके आमा है, समस्त स्पकशैवणे मृयुके मात्मा है । ईइ प्रकार जाननेवलि उस उद्गाताको यदि को पुरुष स्वरोके उचचारणमे रोष प्रदश्चित ऋरे तो वह सर्वे स्वरा अकारादय इन्द्रस्य बलकर्मणः प्राणस्यात्मानो देदा- सपर्शाः कादयो व्यञ्जनानि अकारादि सम्पूणं स्वर, वरु ही जिसका कर्म है उस इन्द्र॒ यानी पराणके आत्मा अर्थात्‌ देह देदावयव-

English

The hiṅkâra is fire, the prastâva air, the udgîtha the sun, the pratihâra the stars, the nidhana the moon. That is the Râgana Sâman, as interwoven in the deities.

अध्याय 33

श्लोक 2.20.2

स य एवमेतद्राजनं देवतासु प्रोतं वेदैतासामेव देवतानाँसलोकताँसर्ष्टिताँसायुज्यं गच्छति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या ब्राह्मणान्न निन्देत्तद्व्रतम्

sa ya evametadrājanaṃ devatāsu protaṃ vedaitāsāmeva devatānām̐salokatām̐sarṣṭitām̐sāyujyaṃ gacchati sarvamāyureti jyogjīvati mahānprajayā paśubhirbhavati mahānkīrtyā brāhmaṇānna nindettadvratam

हिन्दी अर्थ

ओर यदि को इसे उप्मवर्णोकि उचचारणमे दोष प्रदरित करे ते उससे कटे कि पनापतिके शरणागत था, वही तेरा मर्दन करेगा ॥ ओर यदि कोई इसे स्यशेकि उचारणमे उलाहना दे तो उससे कटे कि अथ यदयेनमृष्मसु तथेवोपा- ओर यदि उसी प्रकार को पुल लभेत प्रजापतिं शरणं परपन्नो- इसे ऊप्वर्णोकि उच्चारण दौ ऽभूवं स त्वा त्वां प्रति पेकष्यति प्रदसित करे तो वह उपे कर. 6 समप स्वर वोषयुक्त ओर बख्युक्तं उच्वारण किये जाने चाहिये; भतः उनका उचारण करते समय र्व इन्दं वलकरा आधान कल! णड १९ शाङ्करभाष्याथे

English

He who thus knows the Râgana, as interwoven in the deities, obtains the same world, the same happiness, the same company as the gods, he reaches the full life, he lives long, becomes great with children and cattle, great by fame. His rule is, 'Do not speak evil of the Brâhmanas.' Next: II, 21 Sacred Texts | Hinduism

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।