Chandogya Upanishad
32
अध्याय 32 / 154

Adhyāya 32

प्रपाठक खण्ड 32

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 32

श्लोक 2.19.1

॥ लोम हिंकारस्त्वक्प्रस्तावो माँसमुद्गीथोस्थि प्रतिहारो मज्जा निधनमेतद्यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतम्

|| loma hiṃkārastvakprastāvo mām̐samudgīthosthi pratihāro majjā nidhanametadyajñāyajñīyamaṅgeṣu protam

हिन्दी अर्थ

विनदिगुणवियथिष्ट सामक्री उपासना सामोपासनप्रसङ्गन गान सामोपासनाके प्रसङ्गसे उद्गाता- १. = को गानविशोषादि' सम्पत्तिका सामक "विनर्दिः नामक गानका वरण करता ह; वह पडुोके ल्मि हितकर है ओर अग्निदेवतासम्बन्धी उद्गीथ है । प्रजापतिका उद्गीथ अनिरुक्त है, सोमका निरुक्त है, वायुका मृदुल ओर ररक्ष्ण ८ सरर्तासे विनदिं विशिष्टो नदः स्वर विनर्दि जिसका न्द यानी स्वरविरोष छछषभ ( बेरु ) के शब्द- के समान विरिष्ट है वह विनर्दि

English

The hiṅkâra is hair, the prastâva skin, the udgîtha flesh, the pratihâra bone, the nidhana marrow. That is the Yagñâyagñîya Sâman, as interwoven in the members of the body.

अध्याय 32

श्लोक 2.19.2

स य एवमेतद्यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतं वेदाङ्गी भवति नाङ्गेन विहूर्छति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या संवत्सरं मज्ज्ञो नाश्नीयात्तद्व्रतं मज्ज्ञो नाश्नीयादिति वा

sa ya evametadyajñāyajñīyamaṅgeṣu protaṃ vedāṅgī bhavati nāṅgena vihūrchati sarvamāyureti jyogjīvati mahānprajayā paśubhirbhavati mahānkīrtyā saṃvatsaraṃ majjño nāśnīyāttadvrataṃ majjño nāśnīyāditi vā

हिन्दी अर्थ

स्यि हितकर ओर अम्निदेवता- इस प्रकारके उस विशिष्ट ॒सामका मँ वरण करता हँ अर्थात्‌ उसके म देवताओकि स्यि अगृतत्वका आगान ( साधन ) कर्--इस प्रकार चिन्तन करते हुए आगान करे । पितृगणके स्यि स्वधा, मनुरष्योके ल्म भारा ( उनकी इष्ट वस्तुओं , पुकि रियि तृण ओर नलः, अमृतत्वं वेभ्य आगायानि भँ देवताओोके लये अमृतका साधयानि । स्वधां पितृभ्य आ- गान ¬ साषन करू पिवृगणके ४ , स्यि स्वषाका आगान क मनुर्यो-

English

He who thus knows the Yagñâyagñîya, as interwoven in the members of the body, becomes possessed of strong limbs, he is not crippled in any limb, he reaches the full life, he lives long, becomes great with children and cattle, great by fame. His rule is, 'Do not eat marrow for a year,' or 'Do not eat marrow at all.' Next: II, 20 Sacred Texts | Hinduism

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।