छान्दोग्योपनिषद्

Prapathaka 1 · Khanda 3 — The Sun, the Breaths (Vyana), and the Syllables of Udgithaश्लोक 1.3.1/128%

Chandogya Upanishad 3.1.3.1

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

अथाधिदैवतं य एवासौ तपति तमुद्गीथमुपासीतोद्यन्वा एष प्रजाभ्य उद्गायति ।उद्यँस्तमो भयपहन्त्यपहन्ता ह वै भयस्य तमसो भवति य एवं वेद

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

अब अधिदैवत ज्ञान: जो यह सूर्य तप रहा है, उसकी उद्गीथ रूप में उपासना करे। उदय होता हुआ यह प्राणियों के लिये उद्गान करता है तथा अन्धकार और भय को नष्ट करता है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

This (the breath in the mouth) and that (the sun) are the same. This is hot and that is hot. This they call svara (sound), and that they call pratyâsvara (reflected sound). Therefore let a man meditate on the udgîtha (Om) as this and that (as breath and as sun).

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

महर्षि सनत्कुमार द्वारा देवर्षि नारद को दिया गया भूमा-विद्या का परम उपदेश: "यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखम्"। इसका अर्थ है कि जो 'भूमा' (असीम, अनंत, सर्वव्यापी परमात्मा) है, वही सच्चा सुख है; अल्प (सीमित, नश्वर, संकीर्ण सांसारिक वस्तुओं) में कोई सुख नहीं है। केवल भूमा ही वास्तविक सुख है। समस्त वेदों, उपवेदों, इतिहास, व्याकरण, खगोल और ललित कलाओं के प्रकांड ज्ञाता होने के बावजूद जब देवर्षि नारद शोक और अतृप्ति से व्याकुल होकर सनत्कुमार की शरण में आए, तब सनत्कुमार ने स्पष्ट किया कि सांसारिक ज्ञान केवल शब्दों का संचय (नामादि) है; जब तक मनुष्य आत्मा के असीम विस्तार (भूमा) को नहीं जानता, तब तक शोक से पार नहीं जा सकता।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
आधुनिक समाज की संपूर्ण अर्थव्यवस्था और उपभोक्तावादी जीवनशैली 'अल्प' (सीमित वस्तुओं) के संग्रह पर आधारित है—अधिक वेतन, बड़ा पद, महंगी कार, सोशल मीडिया पर अधिक लाइक्स। हम सोचते हैं कि "बस यह अगला लक्ष्य मिल जाए, फिर जीवन में शांति आ जाएगी।" किंतु लक्ष्य प्राप्त होने के 24 घंटे बाद ही मन पुनः खाली, बेचैन और अतृप्त हो जाता है। हम प्यास बुझाने के लिए खारा पानी पी रहे हैं, जिससे प्यास कम होने के बजाय और तीव्र होती जाती है। सनत्कुमार का यह वचन आधुनिक जीवन की दिशाहीन अंधी दौड़ पर एक वज्रपात है: "नाल्पे सुखमस्ति"—सीमित में कोई सुख नहीं है। आप एक अनंत स्वरूप आत्मा हैं; आपकी प्यास अनंत की है। इसलिए कोई भी सीमित बैंक-बैलेंस, सीमित प्रशंसा या सीमित पद आपको कभी संतुष्ट नहीं कर सकता। वास्तविक और शाश्वत सुख केवल 'भूमा' (असीम, अनंत ब्रह्म) में है। जब आप अपनी ऊर्जा को बाह्य संचय से हटाकर आंतरिक अनंत चेतना की खोज में लगाते हैं, तभी सच्ची शांति का अवतरण होता है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **उपलब्धियों के भ्रम से मुक्ति (Transcending Hedonic Traps)**: जब भी कोई भौतिक उपलब्धि प्राप्त हो और उसके बाद खालीपन महसूस हो, तो निराश मत होइए; पहचानिए कि यह आत्मा का संकेत है कि आपकी क्षमता इस छोटी वस्तु से कहीं अधिक विराट है। - **भूमा के साथ दैनिक मिलन (Connecting with the Infinite)**: प्रतिदिन 15 से 20 मिनट किसी विशाल प्राकृतिक दृश्य (आकाश, समुद्र, पर्वत) को निहारिए अथवा मौन ध्यान में बैठिए; अपनी चेतना को सीमाओं से मुक्त होकर अनंत में फैलने दीजिए। - **अतृप्त दौड़ पर विराम (Mindful Consumption Audit)**: खरीदारी या उपभोग करते समय स्वयं से पूछिए—"क्या यह वस्तु मुझे वास्तविक तृप्ति दे सकती है, अथवा यह केवल एक क्षणिक प्रलोभन है?" यह विवेक आपको फिजूलखर्ची और मानसिक तनाव से बचाएगा।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आप अपनी असीम आत्मा की अनंत प्यास को सांसारिक वस्तुओं के क्षुद्र खिलौनों से बुझाने का असफल प्रयास कर रहे हैं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

आधुनिक मनोविज्ञान में 'हेडोनिक अनुकूलन' (Hedonic Treadmill - Brickman & Campbell; Frederick & Loewenstein) का सिद्धांत यह सिद्ध करता है कि भौतिक वस्तुओं, पदोन्नति या धन से मिलने वाला सुख अत्यंत क्षणिक होता है। जैसे ही मनुष्य किसी सांसारिक लक्ष्य को प्राप्त करता है, उसका डोपामाइन स्तर कुछ ही दिनों में पुनः आधारभूत स्तर (Baseline) पर लौट आता है, और वह और अधिक पाने की अंधी दौड़ में लग जाता है। 'नाल्पे सुखमस्ति' इसी वैज्ञानिक सत्य का आध्यात्मिक निदान है कि सीमित वस्तुएं अनंत की प्यास बुझाने में सर्वथा असमर्थ हैं।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
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Translation
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Last updated
2026-10-24
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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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Chandogya Upanishad 3.1.3.1Current VerseBhagavadBhagavad Gita Bh…BhagavadBhagavad Gita Bh…
🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 2.20

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः

Translation / Meaning (भावार्थ)

The Self is never born and never dies. Unborn, eternal, ever-existing, it is not destroyed when the body is destroyed.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next