अध्याय 5
श्लोक 14.1
कृत्यापरिहरणम्।१-१३ शुक्रः।वनस्पतिः, कृत्यापरिहरणम्।अनुष्टुप्, ३,५,१२ भुरिक्, ८ त्रिपदा विराट्, १० निचृद्बृहती, ११ त्रिपदा साम्नी त्रिष्टुप्, १३ स्वराट्।¬ सु॒प॒र्णस्त्वान्व॑विन्दत् सूक॒रस्त्वा॑खन्न॒सा।दिप्सौ॑षधे॒ त्वं दिप्स॑न्त॒मव॑ कृत्या॒कृतं॑ जहि
kṛtyāpariharaṇam| 1-13 śukraḥ| vanaspatiḥ, kṛtyāpariharaṇam| anuṣṭup, 3,5,12 bhurik, 8 tripadā virāṭ, 10 nicṛdbṛhatī, 11 tripadā sāmnī triṣṭup, 13 svarāṭ|¬ suparṇastvānvavindat sūkarastvākhannasā| dipsauṣadhe tvaṃ dipsantamava kṛtyākṛtaṃ jahi
हिन्दी अर्थ
(यातुधानान् ) यातना के निधिरूप पुरुषों का (अव जहि) हनन कर, (कृत्याकृतम्) सेन्यसंग्रह करनेवाले राजा का (अव जहि) हनन कर । (अधो) , पहुचाना चाहता है (जोषधे) हि ओषधि ! (तम्, उ) उसेही (त्म्)त्ू. (जहि) मार, उसकाहीतु हनन कर। मन्त्र मे ओषधिप्रयोग द्वारा दुःख- । दायक व्यक्तियोंके ही हनन का निदंश किया दहै, सेन्ययुद्ध में सेनिकोंके ॥ छाल से (परीशासम्) गोल छाल-खण्ड को (परिकृत्य) काटकर ओर उसे (देवाः) है विजय चाहनेवाले सेन्यनायको ! तुम (कृत्याकृते) मेनासंप्रह करनेवाले के लिए उसकी ग्रीवा में (प्रति मुञ्चत) पहनाओ ।
English
Attend in every place where men inhabit, with all thy powers, the hymn that tells my praises. Let hymns of praise ascend to thee, uplifted in every place of human habitation.