Atharva Veda
18
अध्याय 18 / 20

Kanda 18

काण्ड 18

283 श्लोकभाग 6/6 · श्लोक 4.68–4.89

पूर्ण अध्याय पाठ22 श्लोक

अध्याय 18

श्लोक 4.68

ये॒३स्माकं॑ पि॒तर॒स्तेषां॑ ब॒र्हिर॑सि

ye3smākaṃ pitarasteṣāṃ barhirasi

हिन्दी अर्थ

मु° ६८२) की व्याख्या मे । लोकम् लोक ददने; दशं नीय । पापों को परितप्त करनेवाला, उन जला देनेवाला, तथा (प्रहितः) धति- दिनोदगम के समय (नुभिः) नर-नारियों द्वारा (उपवन्यः) उपासना विधि १४२ अथवेवेद-माष्य का० १८ ।सु०४

English

Wipe tenderly the right hand of thy sire who goes away to heaven. To all, the living and the dead, all that are born, the worshipful. Let the full brook of fatness run, o’erflowing, with stream of mead.

अध्याय 18

श्लोक 4.69

उदु॑त्त॒मं व॑रुण॒ पाश॑म॒स्मदवा॑ध॒मं वि म॑ध्य॒मं श्र॑थाय ।अधा॑ व॒यमा॑दित्य व्र॒ते तवाना॑गसो॒ अदि॑तये स्याम

uduttamaṃ varuṇa pāśamasmadavādhamaṃ vi madhyamaṃ śrathāya | adhā vayamāditya vrate tavānāgaso aditaye syāma

हिन्दी अर्थ

किया है, जिस काकि (ते) वे पितर (स्वधया) आत्मधारण-पोषण की जातवेदाः मन्त्र २५०मे'जातवेदाः'दारा भ्राहवनीय भ्रादि अगिनियों का परमेदवर को मी जाततेदा कहा है 1 जे कि दमन में स्थित परमेश्वर को भ्राहवनीयादि अग्नियां नहीं हौ सकतीं । जातप्रज्ञ तो परमेरवर ही है (निर° ७।५।१९) । तथा “जातवेदस इति जातमिदं सवं सचराचरं स्थित्युत्पत्ति- सनातन भौर सृष्टिकर्ता आदि विशेषण लिखे है, वहीं-वहीं इन नामों से परमेदवर का ग्रहण होता है" 1

English

Far-seeing he flows on, the Bull, the Lord of hymns, promoter of the Sun, of Days, of Dawns, of Heaven.

अध्याय 18

श्लोक 4.70

प्रास्मत् पाशा॑न् वरुण मुञ्च॒ सर्वा॒न् यैः स॑मा॒मे ब॒ध्यते॒ यैर्व्या॒मे।अधा॑ जीवेम श॒रदं॑ श॒तानि॒ त्वया॑ राजन् गुपि॒ता रक्ष॑माणाः

prāsmat pāśān varuṇa muñca sarvān yaiḥ samāme badhyate yairvyāme| adhā jīvema śaradaṃ śatāni tvayā rājan gupitā rakṣamāṇāḥ

हिन्दी अर्थ

२६१. शम्भ॑न्तां लोकाः पितषरदनाः पितृषदने त्वा लोक.आ (पितुषदनाः) पितर अर्थात पिता पितामह भौर प्रपितामह जहां रहते है, वे (लोकाः) वदँनीय आश्रम (चुम्भन्ताम्) पितरों के निवास तथा उद्यान आदि द्वारा सदा सुशोभित रहँ । है पिता ! (पितृषदने) पितरों के रहने के एेसे (लोके) ददयंनीय प्राश्चरम मेँ (त्वा) भापको (भ्रा सादयामि) मै पुत्र स्थापित करता हूं । भाप निवास के लिये सदन का निर्माण कर- ज्ञानी लोगों का स्थान (यजु° ५।२६; दयानन्दमाष्य ) । मध्यकैे फदे को (विश्वथाय) शिथिल दीला. भौर विनष्ट कर भ्रलग १४४ भ्रथर्ववेद-माष्य क० १८ । पु० ४

English

For, Purifier, like the Sun thou shinest with thy radiant glow. Indu is moving forth to Indra’s destined place, and slights not as a friend the promise of his

अध्याय 18

श्लोक 4.71

अ॒ग्नये॑ कव्य॒वाह॑नाय स्व॒धा नमः॑

agnaye kavyavāhanāya svadhā namaḥ

हिन्दी अर्थ

मन्त्रां महि दथानन्द के प्रथं की छाया म किया है (ऋ १। २४।१५) । पाशम् = जीवात्मा पर तीन फे पड़े हुए ह । वे ह--कारणः- दारीररूपी पाश ढीला पड़ जातादहै-। तथा विवेकख्याति हौ जाने पर इसमें भी परवैराग्यहो जाने पर कारणशरीर का पाश्च भीष्डीला पडकृर छट जाता है, भौर जीवान्मा नीवन्धुक्त होकर मोक्ष पालेता है । । जिन-जिन पाप-फंो द्वारा यह जोवात्मा (समामे व्याम) लम्बे-चौड़

English

friend. Thou, Soma, comest nigh as bridegroom meets the bride, reach- ing the beaker by a course of hundred paths.

अध्याय 18

श्लोक 4.72

सोमा॑य पि॒तृम॑ते स्व॒धा नमः॑

somāya pitṛmate svadhā namaḥ

हिन्दी अर्थ

का० १८।सू०४ प्रथर्ववेद-माष्य १४५ (अग्नये) प्रजाजन को जीवनमागं पर भ्रा ले जनेवाले (कव्य- वाहनाय ) मेधावियों के. लिये मेधाव्धंक ज्ञान के वाहनमूत विद्धान् के वाले शि्यु को, (स्वघा नमः) .भात्म-धारणं-पोषणकारी सवत्विक भन्न देना १, सोम" का भर्थं “दूष” भी होता है । यथा “सोमो बुर्वाभिरकाः'' ( ऋ० ६। भर्थात् दुगरवपायी नवजात िषु । इस नवजात शिशु को सात्विक दुष देना चादिये

English

Well have they eaten and rejoiced: their dear ones have they shaken off. Sages, self-luminous, have praised: we who are youngest supplicate.

अध्याय 18

श्लोक 4.73

पि॒तृभ्यः॒ सोम॑वद्भ्यः स्व॒धा नमः॑

pitṛbhyaḥ somavadbhyaḥ svadhā namaḥ

हिन्दी अर्थ

सात्विक दुष मिल सकष निमित्त माता को भी सातिविकाहार वाली होना चाहिए । वाली हो सकेगीं । भरध्वं ° ९।१६।२ का मत्त्राधं निम्नलिखित हैजोकिसोमके परिधातवा ड” । -भर्थात् वेदवाणी कै विदान् पुरोहित ते सोमजा के परहिनने के लिये यह षरं दिय है । नवनात शिशु के संस्कार मे पुरोहित शिशु के लिये जिस प्रकार के वस्त्र का विषान करता ह, शिदयु को कटी वस्र पहिनाना चाहिए । नवि को राजा कडा है स्वस्थ नवलिदरु का मूख कान्तिमान् होता है, इसलिये उसे राजा १४६ भयर्ववेद-माष्य का० १८। सु०४ चाहिए । भर्थात् एसे शिशु को गरिष्ठ तथा भरधिक मसालों वाले भ्रनन न

English

Come hither, Fathers, who deserve the Soma, by the deep path- ways which the Fathers travel. Bestow upon us life and store of children, and favour us with increase of our riches.

अध्याय 18

श्लोक 4.74

य॒माय॑ पि॒तृम॑ते स्व॒धा नमः॑

yamāya pitṛmate svadhā namaḥ

हिन्दी अर्थ

(पितृमते) पिता के सदृश रक्षक धाचायं वाले, (यमाय) यमनियमों के पालकं तथा सरंयमवाले ब्रह्मचारी के लिये (स्वधा नमेः) भात्म-घारण- पोषणकारी सात्विक अन्न देना चाहिए। । स्वधान्न है, भात्म-धारण-पोषणकारी बन्न है.। (च) भौर (ये) जो पितर (त्वामनु) आप कै बाद कै होगे, उनके लिये भी यह स्व॑धान्न है । प्रततामह = प्रपितामह! ततामह मँ “तन्” घातु है, जिसका प्रथं है-- का विस्तार करते है, इसलिये “तन्” का प्रयोग है । त्वामनु भाप कै बाद वानप्रस्थ तथा संन्यासे जो गए है, या जाएंगे । (ततामह) है पितामह 1 (ते) भ्राप के लिये ( एतत्) यह (स्वधा)

English

Depart, O Fathers, ye who merit Soma, by the deep pathways which the Fathers travel; But in a month, rich in fair sons and heroes, come back into our homes to eat oblation.

अध्याय 18

श्लोक 4.75

ए॒तत् ते॑ प्रततामह स्व॒धा ये च॒ त्वामनु॑

etat te pratatāmaha svadhā ye ca tvāmanu

हिन्दी अर्थ

२. इसी भ्रकार यमनियमो के पालन करने बाले ब्रह्मचारी को भी सात्विकाहार बाला होना चाहिए । सात्विक-प्राहार ब्रह्मचयं के पालन में सहायक होता है । उन के वनस्थ गुरभ्रों को भी सात्विकाहारी होना चाहिए । का० १८ सुग. प्रथवेवेद-भाष्यं १४७ मनु) भ्ापके बाद के ठोगि, उनके लिये भी यह स्वधान्न है ।

English

If Agni Jātavedas, as he bore you hence to the Fathers’ world, hath left one single. 241 Limb of your bodies, here do I restore it. Fathers, rejoice in heaven with all your members!

अध्याय 18

श्लोक 4.76

ए॒त् ते॑ ततामह स्व॒धा ये च॒ त्वामनु॑

et te tatāmaha svadhā ye ca tvāmanu

हिन्दी अर्थ

(तत) है पिता ! (एतत्) यह (ते) भ्राप के लिये (स्ववा) स्व- घाप है, भरात्म-घारण-पोषणकारी भन्न है । ५४०1५ ०७७५ 0 0111 ताश । 08५ चन्द “तत” का विकृतसूप है 1 तत. पितुमेव मे इन्हीं तीन का, भर्थात् पिता पितामह भौर पितामहं का करने होति हं । २४ वर्षोकीञायु मँ स्नातक बनकर, २५ वें वषं भे सन्तान हो जाने के समय इस नवपिता के पिता की वायु ५० वर्षों की पितामह की ७५ वषौँ की, तथा प्रपितामह की १०० वर्षो की सम्भावितः है । इससे प्रतीत होता है कि पितृयज्ञ आदि मे इन तीनों के ही जीवित होने के कारण इन्हीं तीन का यजन भर्थात् सत्कार होता है ।

English

Meet for men’s praises, Agni Jātavedas was sent as envoy when the day was closing. Thou gavest to the Fathers with oblation. They ate; eat, God, our offered sacrifices.

अध्याय 18

श्लोक 4.77

ए॒तत् ते॑ तत स्व॒धा

etat te tata svadhā

हिन्दी अर्थ

की साधना मे स्थित (पितृभ्यः) पितरों कै लिये (स्वधा) ब्रातम-घारण- पोषणकारी अन्न होना चाहिए । , १४८ भरथवेवेद-माष्य का० १८॥ सू०४ के लिये (स्वधा) भरात्म-घारण-पोषणकारी भ्रनन होना चाहिए । वक्षःस्थल के फेफड़ोंमे वायुका निवासदहै, नौर हृदयम रक्तरूपी जलं

English

Here hast thou left thy heart; O man, as sisters leave their little pet. Do thou, O earth, envelop him. Bright be to thee those worlds where dwell the Fathers! I seat thee in that sphere which they

अध्याय 18

श्लोक 4.78

स्व॒धा पि॒तृभ्यः॑ पृथिवि॒षद्भ्यः॑

svadhā pitṛbhyaḥ pṛthiviṣadbhyaḥ

हिन्दी अर्थ

“कीर्णो द्योः समवतंतः' ( यजु ३१।१३ ) । भतः दिव् =मूर्धा, सिर । वणन योगदान में किया है । यथा--“कायाकाकायोः. चम्बन्धसंयमाल्लघ वायु में जाकर स्थित हो जाने की सिद्धि का वर्णन हमा है । यथा--“ुनयो वातरशनाः" (ऋ० १०१३६।२); भर्थात् मुनिलोग “वायु की रस्सी"” द्वारा मुनिलोग बहती बायु के भनुकूल शन्तरिक्ष मेँ गति कर॑ते है । “उन्मदिता हए हम वायुभों में प्राकर स्थित हो गये ह । “मन्तरिकेण पतति विश्वा

English

inhabit. Thou art the grass whereon our Fathers seat them.

अध्याय 18

श्लोक 4.79

स्व॒धा पि॒तृभ्यो॑ अन्तरिक्ष॒सद्भ्यः॑

svadhā pitṛbhyo antarikṣasadbhyaḥ

हिन्दी अर्थ

का० १द। सु ४ भरथरवंवेद-माष्य १४९ स्थान-स्थानं के विविध रूपो को देखता है । “बातस्यादवः” (१०।१३६।५) ==मूनि का भरव है वायु ।"उभौ समुत्रा वा क्षेति यज पुवं उतापरः” ( १०। १३६।५); मुनि दोनों समूद्रोंकी सैर करता है, पूवं समुद्रकी भौर परिचम समुद्र की भी, या भाकारीय समुद्र की भी भौर पाथिव समूद्रकी रिक्ष से भी ऊपर महाका्गामी योगी दिधिषब् पितर है । जसे कि वतमान मेँ 98०९ नर्व दवारा चन्द्रलोक भादि में गमन करते है, भौर वहांजा स्थित होते है । सद् गतौ भवसादने च । , पृथिवी में रह कर लोकोपकार करने वाले व्रानप्रस्थी, संन्यासी

English

Loosen, O Varuna, the bond that binds us; loosen the bond above, between, and under. Then under thy protection, O Āditya, may we be sinless and restored to freedom. From all those bonds, O Varuna, release us, wherewith a man is bound at length and cross wise.

अध्याय 18

श्लोक 4.80

स्व॒धा पि॒तृभ्यो॑ दिवि॒षद्भ्यः॑

svadhā pitṛbhyo diviṣadbhyaḥ

हिन्दी अर्थ

१५० भरथरववेद-साष्य का० १८।सू०४ (पित्तरः) हि पितरो ! (वः) प्राप का (यद्) जो (चोरम्) पापहनन का बलं है, (तस्मै) उस की प्राप्ति के लिये (नमः) हम भाप को नन्नभाव पापों के छेदन-मेदन का बल है, (तस्म) उसकी प्राप्ति के लिये (नमः). हम राप को नम्नभाव से प्राप्त होते है।

English

To Agni, bearer of oblation to the Manes, be Hail! and homage! To Soma connected with the Fathers Hail! and homage! To the Fathers connected with Soma Hail! and homage!

अध्याय 18

श्लोक 4.81

नमो॑ वः पितर ऊ॒र्जे नमो॑ वः पितरो॒ रसा॑य

namo vaḥ pitara ūrje namo vaḥ pitaro rasāya

हिन्दी अर्थ

(पितरः) है पितरो ! (वः) भ्राप का (यत्) जो (शिवम) शिव भावसेभ्रापको प्राप्त होते दहै । (पितरः) है पितरो ! (वः) भ्राप को (नमः) नमस्कार हो । (पितरः) हे पितरो ! (वः) भाप को (स्वधा) हम स्वघारण-पोषणकारी श्रन्न भेंट (श्रत्र) इस भूमिः पर (ये) जो (पितरः) हम पितर रहै, भौर (पितरः) हे पितरो ! (भत्र) इस भूमिम (ये) जो (गयम्) तुम (स्थ) हो, (ते) का०.१द ।सूऽ.४ भरथरवेवेद-माष्य १५१

English

To Yama connected with the Fathers Hail! and homage! To thee, O Great-grandfather, and those with thee be this cry of

अध्याय 18

श्लोक 4.82

नमो॑ वः पितरो॒ भामा॑य॒ नमो॑ वः पितरो म॒न्यवे॑

namo vaḥ pitaro bhāmāya namo vaḥ pitaro manyave

हिन्दी अर्थ

(इह) इस भूमि पर ये) जो (जीवाः) जीवित (पितरः) पितर है, भौर जो (वयम्) हम पितर (इह) इस भूमि पर (स्मा). हई, (ते) वे “11096""; यह् सूचित करने के लिये कि मन्त्र मे परलोकगत पितरों का किया गया है । मन्त्र २८० भ्रौर २८१ में सामाजिक ६ सुधार का निदश॒ बच्चों म भी ये दोनों भवृत्तियां सुतरां बद्धमूलं हो जाती है ।

English

Hail To thee, Great-grandfather, and to those with thee be this cry of Hail!

अध्याय 18

श्लोक 4.83

नमो॑ वः पितरो॒ यद् घोरं तस्मै॒ नमो॑ वः पितरो॒ यत् क्रू॒रं तस्मै॑

namo vaḥ pitaro yad ghoraṃ tasmai namo vaḥ pitaro yat krūraṃ tasmai

हिन्दी अर्थ

२८२. आ त्वाप इधीमहि धमन्तं देवाजर् । तथा (अ्रजरम्) कभी भी जीर्णं न होनेवाले (त्वा) भाप को (भा इधीमहि) हम अपने हृदयो मे प्रदीप्त करते है, (यस्य ते) जिस भराप की (पनीयसी) सहस्रारचक्रं । भ्रथर्ववेद भँ.सिर को तृतीय लोक कहा दहै । यथा--शीषं- लोक तृतीयकम् ( १९।२९।१०), अर्थात् सिर तीसरा लोकं है । भाधिहैविक १५२ परथर्ववेद-माष्य का० १८1 सू ४ मर्षा तथा सिर को क्रमदः दिवं तंथा द्यौः कहू है ।

English

To thee, O Fathers, be this cry of Hail! Hail to the Fathers who inhabit earth!

अध्याय 18

श्लोक 4.84

नमो॑ वः पितरो॒ यच्छि॒वं तस्मै॒ नमो॑ वः पितरो॒ यत् स्यो॒नं तस्मै॑

namo vaḥ pitaro yacchivaṃ tasmai namo vaḥ pitaro yat syonaṃ tasmai

हिन्दी अर्थ

जैसे (चन्द्रमाः) - चन्रमा (सुपर्णः) मानो उड़ता हृभासा, (दिवि) उड़ता हा (श्रा घावते) दौडता ४५ । है मनुष्यो ! (वः) तुम्हारे मनौ की पदम् ) गतियो, चञ्चलताभ्रों को ( हिरण्यनेमयः) सुवणंसदृ् चमक-धमक वाली, या हिरण्य के सदृश ॒चमकते वच्ववाली (विद्युतः) विजुलियां भी गतियो को, चञ्चलतां को (रोदसी) है चुलोकं तथा पृथिवीलोक २८२-२८३ मे हृदयो भे, परोर्पकाररत परमेदवेर कै 'समिन्धन भ्रौर उसके स्तवन; तथो मनोवेगो भौर मौनसिंक चञ्चलतां के संयर्भन का उपदेश

English

Hail to the Fathers who inhabit the firmament! Hail to the Fathers who dwell in heaven! Hail, Fathers, to your energy! Hail, Fathers, to your sap!

अध्याय 18

श्लोक 4.85

नमो॑ वः पितरः स्व॒धा वः॑ पितरः

namo vaḥ pitaraḥ svadhā vaḥ pitaraḥ

हिन्दी अर्थ

किया है । ॥ चतुरं ्नुवाकं सभ॑ष्त । "व्रथर्वचेद के भठारहेवें काण्डं क" यह्वमिमं व॑र्षयता गिरः संस्राथ्येण हविषां जुहोमि ॥१॥ भावता से राज्य की वृद्धि करना चाहता है। इस लिये वेदवाणी क रहस्याथं- १५४ भथवेवेद-भाष्य का० १९1 सू० १

English

Hail Father; to your wrath! Hail, Fathers, to your ardour! Hail, Fathers, to what is awful! Hail to what is terrible in you!’

अध्याय 18

श्लोक 4.86

येऽत्र॑ पि॒तरः॑ पि॒तरो॒ येऽत्र॑ यू॒यं स्थ यु॒ष्मांस्तेऽनु॑ यू॒यं तेषां॒ श्रेष्ठा॑ भूयास्थ

ye'tra pitaraḥ pitaro ye'tra yūyaṃ stha yuṣmāṃste'nu yūyaṃ teṣāṃ śreṣṭhā bhūyāstha

हिन्दी अर्थ

घन का प्रवाह करते हैँ । पिघला कर शुद्धं क्यिघीके दूषके भौर उदक प्रवाहो दवारा हम सब मिलकर राज्यमेँधन को बहा लाते हैँ । यह् धन से ान्यस्य॒ या स्फातिः स॑खान्येण हविषा होमि ॥॥. यज्ञ का सम्पादन करता हूं ॥ मै राज्य-पति राज्य मेँ योदुरध सींचता हूं,भौर गौभों के घृत ह्वार भ्रजाजन मेँ बल भौर रस-रक्त सीचता हूं । हमारे शुर

English

Hail, Fathers, to all that is propitious! Hail to all that is plea- sant in you! Homage to you Fathers! Hail to you, Fathers! All Fathers who are here, the Fathers here are you: let then- follow you. May ye be the most

अध्याय 18

श्लोक 4.87

य इ॒ह पि॒तरो॑ जी॒वा इ॒ह व॒यं स्मः॑ ।अ॒स्मांस्तेऽनु॑ व॒यं तेषां॒ श्रेष्ठा॑ भूयास्म

ya iha pitaro jīvā iha vayaṃ smaḥ | asmāṃste'nu vayaṃ teṣāṃ śreṣṭhā bhūyāsma

हिन्दी अर्थ

करता हःधान्य प्रौर नानाविध रसो को उपस्थित करता हं । हमारे बुर.-वीर विराजमान रहँ ॥ मन्त्र मं जिन-जिन वस्तुओं का वणेन हृभा दहै, वे सब “संसाग्य हविः” रूप है, जिनके दारा कि राज्य-यज्ञ को वृद्धि होनी है । २. इमं होमा यह्म॑वतें संस्बणा उत । का० १६1 सू० १ परथ्ववेद-माष्य १५५ इहैव हवमा याव म इद सखादणा उतिमं वंधेयता गिरः ।

English

excellent of these. All living fathers who are here are we here: let them follow us.

अध्याय 18

श्लोक 4.88

आ त्वा॑ग्न इधीमहि द्यु॒मन्तं॑ देवा॒जर॑म्।यद् घ॒ सा ते॒ पनी॑यसी स॒मिद् दी॒दय॑ति॒ द्यवि॑ ।इषं॑ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र

ā tvāgna idhīmahi dyumantaṃ devājaram| yad gha sā te panīyasī samid dīdayati dyavi | iṣaṃ stotṛbhya ā bhara

हिन्दी अर्थ

(भायात) मेरे समीप प्राया करो । तथा (निरः) है वेदवाणियो कै रहस्या के विज्ञो. तुम भी (इहैव) इसी राज्य मेँ रहते हए ( इमम्) इस राज्य की (व्यत) वृद्धि करते रहो । (यः) जो हमारा (पञ्चः) पञुसंघ है, वह (सवः) सब (इह एतु) इस राज्य मेँ रहे । (या रथिः) राज्य को जो सम्पत्ति दारा प्राप्य (हविषा) धन को हविरूप जान कर, इस हविं द्वारा (जुहोसि) के खनिज पदां तथा वन, राज्य के भवन तथा उपजः भ्रादि राउ्य के विविध रूप है । वयोवयः=वयः का र्थं है बायुः । मन्व मेँ “वयः” द्वारा १५६ यर्ववेद-माष्य का० १६ । सु०र

English

May we be the most excellent of these. Bright Agni, we will kindle thee, rich in thy splendour, fading. not. So that this glorious fuel may send forth to heaven its light for thee. Bring food to those who

अध्याय 18

श्लोक 4.89

च॒न्द्रमा॑ अ॒प्स्व॑१न्तरा सु॑प॒र्णो धा॑वते दि॒वि।न वो॑ हिरण्यनेमयः प॒दं वि॑न्दन्ति विद्युतो वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी

candramā apsva1ntarā suparṇo dhāvate divi| na vo hiraṇyanemayaḥ padaṃ vindanti vidyuto vittaṃ me asya rodasī

हिन्दी अर्थ

राज्य में यज्ञभावन होने पर प्रजाजन ओर अधिकारी, धनलालसा तथा पदनालसा से राज्य मे शासन नहीं करते, प्रपितु राज्यको यज्ञ जानकर, धर्मं-मावनां से प्रेरित होकर राज्यवधंन करते ह । विह्ेष वक्तव्यः-- (१) नदियों के प्रवाहो से नहर निकाल कर उपज- वृद्धि कर, तथा नगरवासियो को जल देकर, इन प्रवाहो मे नौकाश्रं दवारा व्यापार कर, घन की वृद्धिकी जा सकती है । (२) (वाताः) वायुभों की भ्रनुकूलतः मँ पतवारो द्वारा चलाई जानेवाली समूद्रिय नौकाभ्रों तथा हवाई जहाजौ द्वारा धन कमाया जु सकता है । हवाई जहाजों द्वारा षनोपार्जन के धनमाहराणि"(भयववं ०३।१५।२)। मन्त मे र देवयानाः पन्थानः” का भ्रं है ३।१५।१)। (३) अथवंवेदीय बृहत्सर्वानृक्रमणिका मेँ १६१ सूक्त केदो

English

sing thy praise. Within the waters runs the Moon, the strong-winged Eagle soars. in heaven.

स्रोत: bhavykhatri/DharmicData · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।