ऐतरेयोपनिषद्

Adhyāya 1 · Khaṇḍa 2 — The Devas Seek a Home in the Human Formश्लोक 5/5100%

Aitareya Upanishad 2.5

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

तमशनापिपासे अब्रूताम् ।आवाभ्यामभिप्रजानीहीति ।ते अब्रवीदेतास्वेव वां देवतास्वाभजाम्येतासु भागिन्यौ करोमीति ।तस्माद्यस्यै कस्यै च देवतायै हविर्गृह्यते भागिन्यावेवास्यामशनापिपासे भवतः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

भूख और प्यास ने उससे कहा — "हम दोनों के लिये भी स्थान दे।" उसने कहा — "तुम्हें इन्हीं देवताओं में अंश दे रहा हूँ; तुम्हें इनके साथ भागी बना रहा हूँ।" इसीलिये जिस किसी देवता के लिये हवि लिया जाता है, उसमें भूख और प्यास भी भागी होते हैं।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Hunger and thirst said to him: 'Find a place for us too.' He said to them: 'I assign you a share in these very deities; I make you partners with them.' Therefore, whatever deity receives an oblation, hunger and thirst share in it.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

भूख और प्यास — मूल प्रेरणाएँ — को अपना अलग अंग नहीं मिलता, वरन् उन्हें प्रत्येक देवता के साथ 'भागीदार' बनाया जाता है। इसलिये प्रत्येक हवि उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से पोषित करती है। प्रेरणाएँ सभी इन्द्रियों में व्याप्त हैं — एक सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक अन्तर्दृष्टि।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
भूख और प्यास (अशनायापिपासे) को सृष्टि में कोई पृथक अंग नहीं दिया गया, बल्कि उन्हें प्रत्येक देवता और प्रत्येक इंद्रिय का अभिन्न सहभोक्ता बनाया गया। यह एक अत्यंत क्रांतिकारी मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि है। हमारी आदिम जैविक भूख केवल पेट तक सीमित नहीं है; वह आँख, कान, वाणी, त्वचा और मन — प्रत्येक संवेदी द्वार में व्याप्त है। जब आप बिना किसी कारण के सोशल मीडिया स्क्रॉल करते हैं, तो वह नेत्रों की डोपामाइन भूख है; जब आप बिना सोचे-समझे बहस करते हैं, तो वह वाणी की प्रभुत्व-पिपासा है। आधुनिक जीवन में अनियंत्रित उपभोक्तावाद और मानसिक विकारों का मूल कारण यही है कि मनुष्य अपनी इन सूक्ष्म संवेदी भूखों को पहचान नहीं पाता। जब हम समझ लेते हैं कि हर इंद्रिय के भीतर भूख-प्यास बैठी है, तो हम अपनी आदतों और व्यसनों को उनकी जड़ से नियंत्रित कर सकते हैं।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **भूख का छिपा चेहरा पहचानना (Deconstructing Underlying Cravings):** जब भी किसी चीज़ (फ़ोन स्क्रॉलिंग, गपशप, ऑनलाइन ख़रीदारी) की तीव्र तलब उठे, तो ठहरकर पूछें: "यहाँ मेरी कौन सी छिपी भूख संतुष्टि माँग रही है?" - **संवेदी उपवास (Sensory Fasting / Dopamine Detox):** केवल अन्न का उपवास नहीं, बल्कि नेत्रों, कानों और वाणी का भी समय-समय पर मौन और उपवास करें, ताकि इंद्रियों की अतृप्त भूख शांत हो सके। - **ऊर्जा का उदात्तीकरण (Sublimating Primal Urges):** अपनी जैविक भूख और जीवन-पिपासा को उच्चतर ज्ञान, रचनात्मक कर्म और जनकल्याण की दिशा में मोड़ें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आपकी अचेतन भूख और प्यास आपकी बुद्धि और इंद्रियों को अपनी कठपुतली बनाकर नचा रही है, या आप उनके साक्षी बनकर उनका विवेकपूर्ण प्रबंधन कर रहे हैं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

प्रेरणा-शोध: भूख, प्यास और जीवन-रक्षा की प्रेरणाएँ प्रत्येक संज्ञानात्मक प्रणाली को प्रभावित करती हैं। वे किसी एक परिपथ में स्थानीयकृत नहीं, बल्कि सर्वव्यापी हैं। उपनिषद् इस प्रणालीगत दृष्टि का पूर्वाभास देती है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
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Translation
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Last updated
2026-10-23
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