Vayu Purana
216
अध्याय 216 / 232

Adhyaya 216

3 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय 216

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे शृङ्गितीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम पञ्चदशोत्तरद्विशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय २१६ श्रीमार्कण्डेय उवाच: अषाढीतीर्थम् आगच्छेत् ततो भूपालनन्दन ।कामिकं रूपमास्थाय स्थितो यत्र महेश्वरः

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe śṛṅgitīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma pañcadaśottaradviśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 216 śrīmārkaṇḍeya uvāca: aṣāḍhītīrtham āgacchet tato bhūpālanandana / kāmikaṃ rūpamāsthāya sthito yatra maheśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

अठारह सहसख्र सहस्र ब्रह्मवंबतं का वर्णन आपने किया । बारह सहन एक सौ इलोकों का ब्रह्माण्ड पुराण, अठारह सहस्न इलोकों का भागवत महापुराण, दस सहष्त इलोंकों का ब्रह्म पुराण, दस सहस्त श्लोकों का वामन पुराण, छः सौ अधिक दस सहस्न एलोकों का आदि पुराण, तेईस सहस्न (?) श्लोकों का वायुपुराण, तेईस सहख्न का नारदीय पुराण, उन्नीस सहस्न का बेनतेय (ग़रुड) पुराण, पचपत सहस्न का पद्म पुराण, सत्रह सह का मनोहर कूमें पुराण, चौबीस सहंख्न परमादुभुत कथाओं से सुगूंफित शोौकर (वाराह) पुराण, परम विस्तृत इक्यासी सहल्न श्लोकों में ग्रथित स्कनन्‍्द पुराण आपने बतलाया । इस्र प्रकार परम विस्तृत अठा रह पुराणों का गान आप ने किया । उन पुराणों में बहुतेरे धर्मों का निरूपण किया गया है ॥५-१ १। रागी, विरागी, यती, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, स्त्री, शूद्र, विशेषतया ब्राह्मण, क्षत्रिय, बेश्य, अन्यास्य

English

A brief review of the main Padas (Sections) of the Purana.

अध्याय 216

श्लोक 2

चातुर्युगम् इदं तीर्थं सर्वतीर्थेष्वनुत्तमम् ।तत्र स्नात्वा नरो राजन् रुद्रस्यानुचरो भवेत्

cāturyugam idaṃ tīrthaṃ sarvatīrtheṣvanuttamam / tatra snātvā naro rājan rudrasyānucaro bhavet

हिन्दी अर्थ

संकर वर्ण द्वारा विधेय धर्मों का उनमें वर्णन है। गंगा आदि महान् नदियों एवं विविध प्रकार के बच्नों, तपों एवं ब्नतों के नियम उनमें वर्णित हैं। अनैक प्रकार के दान, बम, नियम, पोग घमं, सांख्य धर्म, भागवत

English

The scholarly Brahmana who listens to or narrates or teaches this ancient Itihasa rejoices in the worlds of Mahendra for eternal years. * 1 2 After attaining Sdyujya with Brahman along with Brahma he becomes liberated.

अध्याय 216

श्लोक 3

तत्र तीर्थे तु यः कश्चित् कुरुते प्राणमोक्षणम् ।अनिवर्तिका गतिस्तस्य रुद्रलोकाद् असंशयम्

tatra tīrthe tu yaḥ kaścit kurute prāṇamokṣaṇam / anivartikā gatistasya rudralokād asaṃśayam

हिन्दी अर्थ

अनेकविधदानानि यमाश्च नियमेः सह योगधर्मा बहुविधाः सांख्या भागवतास्तथा १४ एतदन्तच्च विविध पुराणेषु निरूपितम् । अतः परं किमप्यस्ति न वा बोद्धव्यभुत्तमम्

English

Eulogising those Prajapatis, the famous noble-souled lords of earth,* he attains the status of Brahman. 3 4

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।