Vayu Purana
127
अध्याय 127 / 232

Adhyaya 127

4 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय 127

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे अयोनिप्रभवतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम षड्विंशत्युत्तरशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १२७ मार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र अग्नितीर्थमनुत्तमम् ।तत्र स्नात्वा तु पक्षादौ मुच्यते सर्वकिल्बिषैः

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe ayoniprabhavatīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma ṣaḍviṃśatyuttaraśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 127 mārkaṇḍeya uvāca: tato gacchet tu rājendra agnitīrthamanuttamam / tatra snātvā tu pakṣādau mucyate sarvakilbiṣaiḥ

हिन्दी अर्थ

यथार्थंतः बलवान थी, सत्य बुद्धि था, शरीर दुढ़ था, सबंदा राक्षसों से ही युक्त रहता था, स्वभाव से ही वह परम दारुण, एवं क्र था, बहुत जोर से रव (शब्द) करने के कारण वह रावण नाम से विख्यात था पूर्व जन्म में वह हिरण्यकशिपु नाम से देत्यों का राजा था वह राक्षसराज चारों युगों तक राज्य करता रहा भोर राक्षसों के राजाओं में बह तेरहवाँ था (?) उसके राज्य काल की अवधि संख्या जाननेवाले पण्डितों ने पाँच करोड़ इकसठ नियत (?) बतलाया है। साठ लाख वर्षों तक वह रावण देवताओं और ऋषियों

English

"Who are these Pitrs? What are their names? How were they born? How did they attain Pitr-hood?

अध्याय 127

श्लोक 2

तत्र तीर्थे तु यः कन्यां दद्यात् स्वयमलंकृताम् ।तस्य यत्फलमुद्दिष्टं तच्छृणुष्व नरोत्तम

tatra tīrthe tu yaḥ kanyāṃ dadyāt svayamalaṃkṛtām / tasya yatphalamuddiṣṭaṃ tacchṛṇuṣva narottama

हिन्दी अर्थ

त्रिशिरा दूषणश्चेव विद्युज्जिह्श्व राक्षसः कन्या ह्यसलिका चेव वाकाया:ः प्रसवाः सस्‍्मृताः

English

What is the reason for which Pitrs are worshipped at the outset in every Yajna? All the holy rites of noble souls begin with the performance of Sraddhas.

अध्याय 127

श्लोक 3

अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां शतं शतगुणीकृतम् ।प्राप्नोति पुरुषो दत्त्वा यथाशक्त्या ह्यलंकृताम्

agniṣṭomātirātrābhyāṃ śataṃ śataguṇīkṛtam / prāpnoti puruṣo dattvā yathāśaktyā hyalaṃkṛtām

हिन्दी अर्थ

इत्येते ऋरकर्माणः पौलस्त्या राक्षणा दश । दारुणाभिजना: सर्वे देवरपि दुरासदाः ५१ आमस्त्यवेश्वामित्रा्णां क््राणां ब्रह्मरक्षसाम् । वेदाध्ययनशीलानां तपोन्नत निषेदिणाम् ५३ तेषामैडविलो राजा पौलस्त्यः सव्यपिड्भलः । इतरे वे यज्ञमुखास्तेम रक्षोगणास्त्रथः ३४४ यातुधाना ब्रह्मधाना वार्ताश्वव दिवाचराः । निशाच रगणास्तेषां चत्वार: कविभिः स्वृताः

English

To whom all these Sraddhas are to be offered? What is the great benefit when they are offered? In which of the holy centres and sacred rivers does the Sraddha performance yield ever-lasting benefit?

अध्याय 127

श्लोक 4

तस्याः पुत्रप्रपौत्राणां या भवेद् रोमसंगतिः ।स याति तेन मानेन शिवलोके परां गतिम्

tasyāḥ putraprapautrāṇāṃ yā bhaved romasaṃgatiḥ / sa yāti tena mānena śivaloke parāṃ gatim

हिन्दी अर्थ

पौलस्त्या ने ऋताश्चेब आगस्त्या: कौशिकास्तथा । इत्येताः सप्त तेषां वे जातयो राक्षसाः स्प्ृता:

English

What are those holy centres in Which excellent Brahmanas (ought to) perform Sraddha to obtain all (desired) benefits? What is the (proper) time for Sraddha? What is the procedure to be followed?

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।