Vayu Purana
126
अध्याय 126 / 232

Adhyaya 126

16 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ16 श्लोक

अध्याय 126

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे रवितीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम पञ्चविंशत्युत्तरशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १२६ मार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र परं तीर्थमयोनिजम् ।स्नातमात्रो नरस्तत्र न पश्येद् योनिसङ्कटम्

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe ravitīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma pañcaviṃśatyuttaraśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 126 mārkaṇḍeya uvāca: tato gacchettu rājendra paraṃ tīrthamayonijam / snātamātro narastatra na paśyed yonisaṅkaṭam

हिन्दी अर्थ

शाण्डिल्यानां बचः श्रुत्वा देवलः सुमहायशाः । निश्चुवाः शण्डिला रेभ्ययास्र: पश्चात्तु कश्यपा: प्रजापालन करते हैं ।१४-१८। पूर्वकाल में स्वायम्भुव मन्वन्तर में ब्रह्मा ने इन सबों को राज्यपद पर अभिषिक्त किया था, प्रत्येक मन्वन्तरों में जो मनु होते हैं, वे ही राज्यपद पर अभिषिक्‍त होते हैं। इन व्यतीत मन्वम्तरों में कितने राजागण बीत च॒के हैं। इसी प्रकार भावी मन्वन्तरों के आने पर अन्यान्य अभिषिक्त किये जायेंगे । जितने भूतकालीम एवं भविष्यत्कालीन मन्वन्तरों में होनेवाले राजा लोग हैं, वे सब मन्वन्तरों के अधीश्वर

English

Desirous of knowing (the procedure of) expiatory rites, Devas controlled themselves duly and asked their own sons mutually.

अध्याय 126

श्लोक 2

तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा पूजयेद् देवमीश्वरम् ।अयोनिजो महादेव यथा त्वं परमेश्वर

tatra tīrthe naraḥ snātvā pūjayed devamīśvaram / ayonijo mahādeva yathā tvaṃ parameśvara

हिन्दी अर्थ

कहे जाते हैं । इन्हीं नरपतियो ने प्रतापशाली राजा पृथु को वेदविहित विधि से राजसूय यज्ञ के अवसर पर राजा के पद पर अभिषिक्‍त किया । समस्त प्रजाओं के स्वामी परम ऐश्वयंवान् कश्यप ने प्रजावृद्धि के लिये इन पृत्रों को उत्पन्न कर पुनः पुत्र कामना से परम कठोर तप करना प्रारम्भ किया और यह चिन्तन किया कि मेरे दो गोत्रवृद्धि करनेवाले पुत्र उत्पन्न हों !8-२३। इस प्रकार कश्यप के विशेष मनोयोग पूर्वक ध्यानावस्थित

English

Those sons who were conversant with real Dharma and possessed self-control, explained to them the various modes of expiatory rites—verbal, mental and physical.

अध्याय 126

श्लोक 3

तथा मोचय मां देव सम्भवाद् योनिसङ्कटात् ।गन्धपुष्पादिधूपैश्च स मुच्येत् सर्वपातकैः

tathā mocaya māṃ deva sambhavād yonisaṅkaṭāt / gandhapuṣpādidhūpaiśca sa mucyet sarvapātakaiḥ

हिन्दी अर्थ

होने पर महात्मा कदयप के ब्रह्मा के अंशभूत दो महातेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुये । उनके नाम वत्सार जो असित थे, दो के दोनों ही ब्रह्मचिन्तन में लीन रहनेवाले थे वत्सार से निश्चव एवं महान् यशस्वी रैभ्य का जन्म हुआ, रेम्य की सन्ततियों को रैभ्यगण नाम से जानना चाहिए, निध्रव की सन्‍्ततियों का विवरण सुनिये । च्यवन से सुकन्या में सुमेधा की उत्पत्ति हुई ।२४-२६। निश्चव की जो पत्नी थी वह कुण्डपायिगणों की माता थी । असित से एकपर्णा नामक पललनी में ब्रह्मिष्ठ का जन्म हुआ। शॉंडिल्यों की बातें सुनकर देवल परमयशस्वी हुये । निध्रूवगण, शाण्डिल्यगण और रेम्यगण--ये तीनों कश्यपगोत्रीय थे। ये बर प्रभूति देवगण देवल की

English

The heaven-dwellers who regained their senses became delighted and spoke to their sons—"You are our fathers (Pitrs), since we are enlightened by you. What boon should be granted— virtue, knowledge or love?".

अध्याय 126

श्लोक 4

तस्य देवस्य यो भक्त्या कुरुते लिङ्गपूरणम् ।स वसेद्देवदेवस्य यावत्सिक्थस्य संख्यया

tasya devasya yo bhaktyā kurute liṅgapūraṇam / sa vaseddevadevasya yāvatsikthasya saṃkhyayā

हिन्दी अर्थ

धरप्रभुतयो देवा देवलस्य प्रजास्त्विमाः । चतुर्युगे त्वतिक्रान्ते मनोह्येंकादशे प्रजा: ॥॥

English

Then Brahma spoke to them—"You are the speakers of truth. Hence what is spoken by you shall be so and not otherwise.

अध्याय 126

श्लोक 5

अयोनिजे महादेवं स्नापयेद् गन्धवारिणा ।मधुक्षीरेण दध्ना वा स लभेद् विपुलां श्रियम्

ayonije mahādevaṃ snāpayed gandhavāriṇā / madhukṣīreṇa dadhnā vā sa labhed vipulāṃ śriyam

हिन्दी अर्थ

त्रेतायुगमुखे राजा तृतीये संब॒भूव ह्। तस्य कन्या त्विडिविला रूपेणाप्रतिमाइभवत् ॥। ऋषिरिडिबिलायां तु विश्ववा: समपद्यत । तस्य पत्न्यश्रतस्नस्तु पौलस्त्यकुलवंधेनाः

English

This is what is uttered by you—your own sons have been mentioned by you as your Pitrs (fathers;. They will be your Pitrs. Let this boon be given to them."

अध्याय 126

श्लोक 6

अष्टभ्यां च सिते पक्षे असितां वा चतुर्दशीम् ।पूजयित्वा महादेवं प्रीणयेद् गीतवाद्यकैः

aṣṭabhyāṃ ca site pakṣe asitāṃ vā caturdaśīm / pūjayitvā mahādevaṃ prīṇayed gītavādyakaiḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रहस्पतेब्हत्कीतिदंबाचायंस्प कीतिता । कन्यां तस्थोपयेमे स नाम्ना वे देववरणिनोम् ॥३ ३

English

On account of the words of Brahma, Paramesthin, the sons (Pitrs) attained the status of fathers (of Devas) and Devas, the real fathers, the status of sons.

अध्याय 126

श्लोक 7

वसेत्स च शिवे लोके ये कुर्वन्ति मनोहरम् ।ते वसन्ति शिवे लोके यावद् आभूतसम्प्लवम्

vasetsa ca śive loke ye kurvanti manoharam / te vasanti śive loke yāvad ābhūtasamplavam

हिन्दी अर्थ

पुष्पोत्कटां च वाकां च सुते माल्यव॒तः स्थिते । कंकसी मालिनः कन्यां तासां तु शूणुत प्रजा: 0३४ ज्येष्ठ वैश्ववर्ण तस्य सुषुवे देववर्णिनी । दिव्येन विधिना युक्तमार्षणैव श्रुतेन च ॥। राक्षसेन च रूपेण आसुरेण बलिन च ३५ त्रिपादं सुमहाकाय॑ स्थलशीर्ष महातनुम् । अष्टदंष्ट्रें हरिच्छमश्रुं शइःकुकर्णावलेहितम् ३३६

English

Hence it is declared (in Dharma-Sastra) that the sons (of Devas) are Pitrs and the status of Pitr-hood is proclai¬ med about them.

अध्याय 126

श्लोक 8

तस्य देवस्य भक्त्या तु यः करोति प्रदक्षिणाम् ।विज्ञापयंश्च सततं मन्त्रेणानेन भारत

tasya devasya bhaktyā tu yaḥ karoti pradakṣiṇām / vijñāpayaṃśca satataṃ mantreṇānena bhārata

हिन्दी अर्थ

सन्ततियाँ हैं। “मनु' के ग्यारहवें चतुर्यग के व्यतीत हो जाते पर अर्थात् ग्यारहबार चारों युगों के व्यतीत हो जाने पर, जब द्वापर युग शेष रह जाता है, तब उसमें इन प्रजाओं (१) की सृष्टि हुई”

English

"If anyone will perform any holy rite without worship¬ ping Pitrs in a Sraddha, Raksasas and Danavas will obtain the fruit (good results) thereof.

अध्याय 126

श्लोक 9

तस्य यत्फलमुद्दिष्टं पारम्पर्येण मानवैः ।सकाशाद्देवदेवस्य तच्छृणुष्व समाधिना

tasya yatphalamuddiṣṭaṃ pāramparyeṇa mānavaiḥ / sakāśāddevadevasya tacchṛṇuṣva samādhinā

हिन्दी अर्थ

मानस के पुत्र रिष्यन्त हुये और उनके पुत्र दम नाम से विख्यात हुये । उनके भी पुत्र मानस कहे गये, जो तृणविन्दु नाम से प्रसिद्ध हुये । तीसरे त्रेतायुग के प्रारम्भिक काल में वह राज्यपद पर प्रतिष्ठित था । उसकी कन्या इडिविला अपने सौन्दर्भ में अनृपम थी! राजषि ने अपनी उस कन्या को पुलस्त्य, को समर्पित किया ।३०-३१। इडिविला में ऋषि विश्रववा की उत्पत्ति हुईं। उनकी चार पत्नियाँ थीं. जो पुलस्त्य वंश में उत्पन्न होनेवाले ऋषिओं की वंश वृद्धि कुरनेवाली हुईं। देवाचार्य बृहस्पति की एक परम यशस्विनी कन्या थी, उसका नाम था देवव्णिनी । बृहस्पति की उस कन्या के साथ उसने (विश्ववा ने) विवाह किया माल्थवान् की पुष्पोत्कटा और वाका नामक कन्याओं के साथ भी उसमे विवाह किया तथा माली की ककसी नामक कन्या को भी विवाहा। उन सबों में उत्पन्न होनेवाली प्रजाओं को घुनिये । सब से ज्येष्ठ वेश्रवण (कुबेर) को देव णिनी

English

The Pitrs propitiated and developed by means of Sraddhas (develop) the imperishable Soma. Propitiated and developed by you all, they will always increase.

अध्याय 126

श्लोक 10

अयोनिजो महादेव यथा त्वं परमेश्वर ।तथा मोचय मां शर्व सम्भवाद्योनिसङ्कटात्

ayonijo mahādeva yathā tvaṃ parameśvara / tathā mocaya māṃ śarva sambhavādyonisaṅkaṭāt

हिन्दी अर्थ

ने उत्पन्न किया ।३४-३४१। उसका विधान देवताओं का था, श्रुतिज्ञान ऋषियों का था, रूप राक्षसों का था, बल अधुरो का था, तीन चरण थे, विशाल शरीर था, झिर बहुत बड़ा था, आठ दंत थे, दाढ़ी हरे वर्ण की थी, कान खूँटे की तरह थे, लाल वर्ण था, एक बाहु छोटा और एक-बहुत बड़ा था। देखने में

English

Soma (the Moon-god) strengthened and developed by means of Sraddhas, will develop the people and the entire world, along with mountains and forests surrounded ( = inhabi¬ ted) by mobile and immobile beings.

अध्याय 126

श्लोक 11

किं तस्य बहुभिर्मन्त्रैः कंठशोषणतत्परैः ।येनौंनमः शिवायेति प्रोक्तं देवस्य संनिधौ

kiṃ tasya bahubhirmantraiḥ kaṃṭhaśoṣaṇatatparaiḥ / yenauṃnamaḥ śivāyeti proktaṃ devasya saṃnidhau

हिन्दी अर्थ

१. यह अप्रासंगिक अंज्ष प्रक्षिप्त जान पड़ता है, बंगला प्रति में इसका पाठ नहीं है। पर आनन्दश्रम की प्रति ही यतः हमारे सामने आदर्श रूप में थी, अतः शाब्दिक अनुवाद मात्र कर दिया यथा; पर संगति नहीं बैठती । यस्माद्विश्रवसो5पत्यं सादृश्याद्विश्रवा इव । तस्मावेश्ववणों नाम नाम्ता लोके भविष्यति १४० ऋद्धचां कुबेरोइजनयद्विभुतं जलकूबरम् । रावण कुस्भकर्ण च कन्यां शुपंणद्षां तथा ॥

English

Those men, who, desirous of nourishment, perform Sraddhas are always granted development and progeny by Pitrs.

अध्याय 126

श्लोक 12

तेनाधीतं श्रुतं तेन तेन सर्वमनुष्ठितम् ।येनौंनमः शिवायेति मन्त्राभ्यासः स्थिरीकृतः

tenādhītaṃ śrutaṃ tena tena sarvamanuṣṭhitam / yenauṃnamaḥ śivāyeti mantrābhyāsaḥ sthirīkṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

बिभीषणचतुर्थास्तान्केकस्यजनयत्सुताम् ॥४ १ शड्कुकर्णो दशग्रीवः पिड्भलो रक्तमृर्धंज: चतुष्पाद्रिशतिभुजो महाकायो महाबलः ४२ जात्याइञ्जननिभो दंष्ट्री लोहितग्रीव एवं च। राजसेनो यथा युक्तो रूपेण च बलेन च ४३

English

Those (Pitrs) to whom they (the performers of Sraddha) offer three balls of rice ( Pinzas ) mentioning their names and Gotraupto great-grandfather, they (Pitrs) who are present (everywhere), strengthen and develop their progeny by that offering of Sraddha."

अध्याय 126

श्लोक 13

न तत्फलमवाप्नोति सर्वदेवेषु वै द्विजः ।यत्फलं समवाप्नोति षडक्षर उदीरणात्

na tatphalamavāpnoti sarvadeveṣu vai dvijaḥ / yatphalaṃ samavāpnoti ṣaḍakṣara udīraṇāt

हिन्दी अर्थ

हिरण्यकशिपुस्त्वासीत्स राजा पुर्वजन्मनि । चतुर्युगानि (णि) राजा5त्र त्रयोदश स राक्षसः. ताः पत्च कोटबो वर्षाणामाख्याता: संख्यया द्विजे: । नियुतान्येकषष्टिश्न संस्याविख्दिरद्राहत

English

There is no doubt in this that Pitrs grant you perfect knowledge.

अध्याय 126

श्लोक 14

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेच्छिवयोगिनम् ।द्विजानामयुतं साग्रं स लभेत् फलमुत्तमम्

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayecchivayoginam / dvijānāmayutaṃ sāgraṃ sa labhet phalamuttamam

हिन्दी अर्थ

षष्ठि शतसहस्राणि वर्षाणां तु स रावण: । देवतानामृषीणां च घोरं कृत्बा प्रजागरभ् ४७

English

After hearing these words of Suta possessing self- knowledge, the sages asked him again subsequently:

अध्याय 126

श्लोक 15

अथवा भक्तियुक्तस्तु तेषां दान्ते जितेन्द्रिये ।संस्कृत्य ददते भिक्षां फलं तस्य ततो ऽधिकम्

athavā bhaktiyuktastu teṣāṃ dānte jitendriye / saṃskṛtya dadate bhikṣāṃ phalaṃ tasya tato 'dhikam

हिन्दी अर्थ

पीले वर्ण का तथा परमभयानक लगता था। उसे जगत् की माया आदि का पूर्ण ज्ञान था, ज्ञान सम्पत्ति से पूर्ण समृद्ध था, इस प्रकार के विश्वरूप धारी पुत्र को देखकर पिता ने कहा, यह स्वयं कुबेर है, कुशब्द कुत्सित अर्थ का वाची है, अर्थात् कु के अं होते हैं भद्दा, और बेर शरीर को कहते हैं, यतः इसका बेर (शरीर) कुत्सित (देखने में भद्दा) है अतः कुबेर नाम से यह अभिहित किया गया। यत: यह विश्ववा का पुत्र है ओर उसकी आति भी विश्ववा ही के समान है, अतः लोक में वेश्रवण के नाम से इसकी ख्याति होगी

English

How many are the groups of these Pitrs? At what time did those groups (come into existence)—Pitrs who were the excellent ancestors of Devas and who developed and strengthened Soma? I shall recount to you the most excellent creation of Pitrs. This is the same question which had been formerly put to his father Brhaspati by Sarhyu.

अध्याय 126

श्लोक 16

यतिहस्ते जलं दद्याद् भिक्षां दत्त्वा पुनर्जलम् ।सा भिक्षा मेरुणा तुल्या तज्जलं सागरोपमम्

yatihaste jalaṃ dadyād bhikṣāṃ dattvā punarjalam / sā bhikṣā meruṇā tulyā tajjalaṃ sāgaropamam

हिन्दी अर्थ

कुबेर ने ऋद्धि नाम पत्नी में नलकूबर को उत्पन्न किया, जो परम विख्यात हुआ। इसके अतिरिक्त कैसी ने रावण, कुम्भकर्ण, शूपर्णला तथा विभीषण--इन चार सन्‍्ततियों को जन्म दिया। उस रावण का कान खूँटे की भाँति था, दस उसके कण्ठ थे, पिगल वर्ण का था, बाल लाल रंग के थे, जन्म से ही कज्जल के समान काला था, बड़े-बड़े दाँत थे, कण्ठ प्रदेश लाल रंग का था, रूप और बल से समन्वित था, उसकी सेना

English

As Brhaspati, the great expertin all fields of knowledge, was seated, his son Sarhyu endowed with humility, put this question.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

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भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

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