तैत्तिरीयोपनिषद्

Brahmānanda Vallīश्लोक 1/911%

Taittiriya Upanishad 2.1

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

ॐ सह नाववतु ।सह नौ भुनक्तु ।सह वीर्यं करवावहै ।तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ ॐ ब्रह्मविदाप्नोति परम् ।तदेषाऽभ्युक्ता ।सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ।यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् ।सोऽश्नुते सर्वान् कामान्सह ।ब्रह्मणा विपश्चितेति ॥ तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः ।आकाशाद्वायुः ।वायोरग्निः ।अग्नेरापः ।अद्भ्यः पृथिवी ।पृथिव्या ओषधयः ।ओषधीभ्योन्नम् ।अन्नात्पुरुषः ।स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः ।तस्येदमेव शिरः ।अयं दक्षिणः पक्षः ।अयमुत्तरः पक्षः ।अयमात्मा ।इदं पुच्छं प्रतिष्ठा ।तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥ ॥ इति अनुवाकः

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

ब्रह्मानन्दवल्ली का यह प्रथम मन्त्र उपनिषद्-साहित्य के सबसे प्रसिद्ध 'स्वरूप-लक्षण' को प्रस्तुत करता है: "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" — ब्रह्म सत्य (अपरिवर्तनशील, त्रिकाल-अबाधित अस्तित्व), ज्ञान (शुद्ध चेतना, स्वयंप्रकाश ज्ञान) और अनन्त (देश, काल और वस्तु की सीमाओं से परे) है। जो मनुष्य इस परमतत्त्व को अपनी ही हृदय-गुहा के परम आकाश में साक्षात् अनुभव कर लेता है, वह उस सर्वज्ञ ब्रह्म के साथ समस्त कामनाओं को युगपत् (एक साथ) भोग लेता है — अर्थात् वह पूर्णकाम और कृतकृत्य हो जाता है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
आधुनिक मनुष्य का संपूर्ण जीवन सीमाओं (boundaries) और अभाव (lack) के भय से संचालित होता है — शरीर की सीमा, समय की कमी, ज्ञान की सीमितता, और मृत्यु का भय। हम स्वयं को एक 70-80 वर्ष की आयु वाले नश्वर शरीर और एक सीमित मस्तिष्क की पहचान में समेट लेते हैं। इसी क्षुद्र पहचान के कारण हम निरंतर वस्तुओं, उपाधियों और संचय के द्वारा अपने 'अधूरेपन' को भरने की व्यर्थ चेष्टा करते हैं, जो अंततः बर्नआउट और निराशा पर समाप्त होती है। तैत्तिरीयोपनिषद् की यह अमर घोषणा — "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" — हमारी वास्तविक पहचान का उद्घोष है। आप कोई सीमित, लाचार या अपूर्ण प्राणी नहीं हैं; आपके अस्तित्व का मौलिक आधार वही अनंत सत्य और ज्ञान-स्वरूप चेतना है। यह चेतना किसी सुदूर लोक में नहीं, अपितु आपकी ही 'हृदय-गुहा' (आपकी अपनी आंतरिक साक्षी सजगता) में विराजमान है। जब आप अपनी पहचान बाह्य नश्वर आवरणों (अन्नमय, प्राणमय कोशों) से हटाकर इस अंतर्निहित अनंत स्वरूप से जोड़ते हैं, तो जीवन से 'अभाव' का भ्रम सदा के लिए मिट जाता है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **सीमित आत्म-छवि से मुक्ति**: जब भी मन में यह विचार आए कि "मैं असहाय हूँ, अधूरा हूँ या पर्याप्त नहीं हूँ", तो इस महामंत्र का स्मरण कीजिए। अपने विचारों और भावनाओं को देखने वाले उस अपरिवर्तनीय 'साक्षी' में ठहरिए जो स्वयं अनन्त है। - **अपरिहार्य सत्य का आश्रय**: सांसारिक परिस्थितियाँ, प्रतिष्ठा और संबंध सदैव परिवर्तनशील (असत्य/अनित्य) हैं। उनके बीच रहते हुए भी अपने भीतर के 'सत्य' (अपरिवर्तनशील चेतना) से जुड़े रहिए ताकि बाहरी उतार-चढ़ाव आपको विचलित न कर सकें। - **शांत एकांत का क्षण**: दिन में दो बार 5 मिनट आँखें बंद करके अपनी चेतना को हृदय के असीम आकाश में विश्राम करने दीजिए। किसी विचार को पकड़े बिना केवल 'होने' (Being) का आनंद लीजिए।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आप जीवन भर अपनी परिमित उपाधियों (डिग्री, पद, बैंक-बैलेंस) को सहेजने में लगे रहेंगे, अथवा अपने भीतर छिपे उस 'अनंत' का साक्षात्कार करने का साहस जुटाएंगे?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

चेतना का गैर-स्थानीय सिद्धांत (Non-local Consciousness) और क्वांटम सूचना विज्ञान: भौतिक ब्रह्मांड में पदार्थ और ऊर्जा काल और स्थान (Space-time) की सीमाओं में बँधे हैं, किंतु चेतना की मौलिक प्रकृति असीम (Infinite) और सर्वव्यापी है। न्यूरोसाइंस में जब मस्तिष्क की 'डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क' (DMN) की अति-सक्रियता शांत होती है, तब साधक सीमाबद्ध 'अहं' से मुक्त होकर एक अखंड, अपरिवर्तनीय चेतना-क्षेत्र (Oceanic awareness) का अनुभव करता है, जिसे उपनिषद् सत्य, ज्ञान और अनन्त कहता है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (Book Code 0071). Gita Press Gorakhpur (Official Publication)
Translation
Gita Press Editorial Board (Hindi)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain. Digitized by sanskritdocuments.org.
पाठ-भेद · Variant readings
Collated with Anandashram Sanskrit Series No. 12.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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Taittiriya Upanishad 2.1Current VerseConcept:BrahmanBhagavadBhagavad Gita Bh…ChandogyChandogya Upanis…
🟡Philosophical Conceptदार्शनिक सूत्र

Concept: Brahman (ब्रह्मन्)

Taittiriya Upanishad

Translation / Meaning (भावार्थ)

परम सत्य — सर्वव्यापी, अनंत और नित्य वास्तविकता।

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next