श्वेताश्वतरोपनिषद्

Adhyāya 5श्लोक 1/147%

Shvetashvatara Upanishad 5.1

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

द्वे अक्षरे ब्रह्मपरे त्वनन्ते विद्याविद्ये निहिते यत्र गूढे ।क्षरं त्वविद्या ह्यमृतं तु विद्या विद्याविद्ये ईशते यस्तु सोऽन्यः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

पर ब्रह्म में, जो अनन्त और अक्षर है, दो छिपे हैं — विद्या और अविद्या। अविद्या क्षर है; विद्या अमर है। और जो विद्या-अविद्या दोनों का स्वामी है, वह तो इन से भी परे है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

In the imperishable, infinite, supreme Brahman, two are hidden — knowledge (vidya) and ignorance (avidya). Ignorance is the perishable; knowledge is the immortal. The one who is master of both knowledge and ignorance is yet another — the Supreme.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

एक सूक्ष्म त्रिस्तरीय संरचना: विद्या (ज्ञान), अविद्या (अज्ञान), और वह जो इन दोनों से परे है। अधिकांश आध्यात्मिक मार्ग सलाह देते हैं: ज्ञान को चुनो, अज्ञान को त्यागो। श्वेताश्वतर उपनिषद् और गहरे जाता है: वह परम तत्त्व विद्या और अविद्या दोनों से परे (BEYOND) है — वह दोनों का स्रोत है, दोनों का साक्षी है। यह इस अद्वैत शिक्षा का पूर्वाभास देता है कि "ज्ञान/बोध" और "अज्ञान/भ्रम" भी एक अधिक मौलिक चेतना के भीतर प्रकट होने वाले तरंग मात्र हैं।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
सूचना क्रांति के इस दौर में आधुनिक मनुष्य ज्ञान के विशाल सागर में तैर रहा है, किंतु वह विवेक और शांति के मामले में अत्यंत दरिद्र हो चुका है। हमारे पास डेटा और जानकारियों के पहाड़ हैं, लेकिन मन का भटकाव और अशांति पहले से कहीं अधिक बढ़ गए हैं। इसके साथ ही, समाज में एक नया अहंकार पनप रहा है — 'बौद्धिक और आध्यात्मिक श्रेष्ठता का अहंकार' (intellectual and spiritual vanity)। लोग थोड़ी सी किताबें पढ़कर या कुछ दर्शन समझकर स्वयं को ज्ञानी और दूसरों को 'अज्ञानी' या 'मूर्ख' मानकर विभाजित करने लगते हैं। यह बौद्धिक विभाजन भी अज्ञान का ही एक सूक्ष्म और खतरनाक रूप है। श्वेताश्वतर उपनिषद् यहाँ चेतना के एक अत्यंत गहन रहस्य का अनावरण करता है। यह मन्त्र कहता है कि अनंत परम ब्रह्म के गर्भ में 'विद्या' (ज्ञान) और 'अविद्या' (अज्ञान) दोनों छिपे हुए हैं। अविद्या नश्वर और क्षर है, जबकि विद्या अमृतमय है; किंतु वह परम तत्त्व (ईश्वर/चेतना) इन दोनों — ज्ञान और अज्ञान — से परे है और दोनों का नियामक व साक्षी है। उपनिषद् हमें सिखाता है कि असली मुक्ति केवल जानकारियाँ बटोरने में नहीं है, न ही अज्ञान से लगातार कुंठित होकर युद्ध करने में है। असली मुक्ति उस साक्षी चेतना में स्थित होने में है जो यह देखती है कि मन में कब ज्ञान उदित हुआ और कब अज्ञान।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **बौद्धिक अहंकार का विसर्जन (Transcending Intellectual Arrogance)**: अपनी डिग्रियों, पुस्तकों के अध्ययन और बौद्धिक तर्कों को अहंकार का पोषण न बनने दें। ज्ञान वही सार्थक है जो हृदय में विनम्रता, सरलता और असीम करुणा जगाए। - **ज्ञान और अज्ञान का साक्षी भाव (Observing the Known and Unknown)**: जब जीवन में कुछ समझ न आए, तो व्यग्र न हों; और जब बहुत कुछ समझ आ जाए, तो अहंकारी न बनें। दोनों ही मन की अवस्थाएँ हैं; अपने आप को इन दोनों को जानने वाले शांत साक्षी के रूप में अनुभव कीजिए। - **द्वंद्व से परे सहज शांति (Humility of Being)**: दूसरों को 'अज्ञानी' कहकर नीचा दिखाने के मानसिक प्रपंच से बाहर निकलिए। सभी में उसी एक परम सत्ता का खेल देखिए जो कहीं विद्या तो कहीं अविद्या के रूप में लीला कर रही है।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आपका अर्जित ज्ञान आपको अधिक शांत, विनम्र और मुक्त बना रहा है, अथवा वह केवल आपके अहं को पुष्ट करके आपको दूसरों से अलग-थलग कर रहा है?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

सूचना सिद्धान्त (Information Theory) में, संकेत (Signal) और कोलाहल (Noise) एक-दूसरे के पूरक हैं — दोनों एक ही माध्यम (Channel) का अंश हैं। बिना किसी कोलाहल के सन्दर्भ के शुद्ध संकेत अर्थहीन हो जाता है। बिना अज्ञान के विरोध के शुद्ध "ज्ञान" वैचारिक रूप से शून्य है। उपनिषद् इसे संरचनात्मक रूप से पहचानता है: वह परम तत्त्व वह आधार (Substrate) है जो जानने और न-जानने के इस खेल को सम्भव बनाता है — न कि उस द्वन्द्व का कोई एक सिरा।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (Book Code 0073). Gita Press Gorakhpur (Official Publication)
Translation
Gita Press Editorial Board (Hindi)
Last updated
2026-10-23
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Collated with Dashopanishad Anandashram Series.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 10.12

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

परमं ब्रह्म परमं धाम पवित्रं परमं भवान्

Translation / Meaning (भावार्थ)

You are the Supreme Brahman, the supreme abode, the supreme purifier.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next