Ravana Samhita
8
अध्याय 8 / 19

Niti and Vastu — Ravana's Statecraft and Sacred Space

नीति और वास्तुविद्या

3 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय 8

श्लोक 1

राजा प्रजाहितं कुर्यात् प्रजा राज्ञे हितं तथा ।परस्परोपकारेण स राज्यं सुखमश्नुते

rājā prajāhitaṃ kuryāt prajā rājñe hitaṃ tathā | parasparopakāreṇa sa rājyaṃ sukhamAśnute

हिन्दी अर्थ

राजा प्रजा का हित करे; प्रजा राजा का हित करे। परस्पर उपकार से वह राज्य सुख भोगता है।

English

The king should work for the welfare of the people; the people should work for the welfare of the king. Through mutual service, that kingdom enjoys happiness.

अध्याय 8

श्लोक 22

गृहं वास्तुविधानेन निर्मितं सुखदं भवेत् ।वायुप्रकाशसंयुक्तं आयुरारोग्यवर्धनम्

gṛhaṃ vāstuVidhānena nirmitaṃ sukhadaṃ bhavet | vāyuprakāśasaṃyuktaṃ āyurārogyavardhanam

हिन्दी अर्थ

वास्तु-विधान से निर्मित गृह सुखदायक होता है। वायु और प्रकाश से युक्त — आयु और आरोग्य को बढ़ाता है।

English

A house built according to the principles of Vastu brings happiness. One with proper ventilation and light — increases lifespan and health.

अध्याय 8

श्लोक 38

उत्तरं वा पूर्वं द्वारं गृहे सौख्यप्रदं भवेत् ।दक्षिणं पश्चिमं द्वारं रोगशोकप्रदं स्मृतम्

uttaraṃ vā pūrvaṃ dvāraṃ gṛhe saukhyapradaṃ bhavet | dakṣiṇaṃ paścimaṃ dvāraṃ rogaśokapradaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

उत्तर या पूर्व मुखी द्वार गृह में सुख देता है। दक्षिण या पश्चिम मुखी द्वार रोग और शोक देने वाला कहा गया है।

English

A north-facing or east-facing entrance in a house bestows happiness. A south-facing or west-facing entrance is known to bring disease and grief.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/ · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।