प्रश्नोपनिषद्

Praśna 4श्लोक 4.8/1173%

Prashna Upanishad 4.4.8

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

पृथिवी च पृथिवीमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा चाकाशश्चाकाशमात्रा च चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं च घ्राणं च घ्रातव्यं च रसश्च रसयितव्यं च त्वक् च स्पर्शयितव्यं च वाक् च वक्तव्यं च हस्तौ चादातव्यं चोपस्थश्चानन्दयितव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च पादौ च गन्तव्यं च मनश्च मन्तव्यं च बुद्धिश्च बोद्धव्यं चाहङ्कारश्चाहङ्कर्तव्यं च चित्तं च चेतयितव्यं च तेजश्च विद्योतयितव्यं च प्राणश्च विधारयितव्यं च

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

पृथिवी और उसकी सूक्ष्म-मात्रा, जल और उसकी मात्रा, अग्नि और मात्रा, वायु और मात्रा, आकाश और मात्रा; नेत्र और दर्शनीय, श्रोत्र और श्रोतव्य, घ्राण और घ्रातव्य, रस और रसयितव्य, त्वचा और स्पर्शनीय; वाणी और वक्तव्य, हाथ और ग्राह्य, उपस्थ और आनन्दनीय, पायु और त्याज्य, पैर और गन्तव्य; मन और मन्तव्य, बुद्धि और बोद्धव्य, अहङ्कार और अहङ्कर्तव्य, चित्त और चेतयितव्य, तेज और विद्योत्य, प्राण और धारयितव्य —

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Earth and its essence, water and its essence, fire and its essence, air and its essence, space and its essence; eye and the seen, ear and the heard, nose and the smelled, taste and the tasted, skin and the touched; speech and the spoken, hands and the grasped, generative organ and the enjoyed, anus and the eliminated, feet and the trodden; mind and the thought, intellect and the known, ego and what it claims, citta and what it perceives, tejas and what it illumines, prāṇa and what it supports —

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

समस्त अस्तित्व की संपूर्ण और व्यापक सूची जो आत्मा में विश्राम पाती है: 'पृथिवी च पृथिवीमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा चाकाशश्चाकाशमात्रा च चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं च घ्राणं च घ्रातव्यं च रसश्च रसयितव्यं च त्वक् च स्पर्शयितव्यं च वाक् च वक्तव्यं च हस्तौ चादातव्यं चोपस्थश्चानन्दयितव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च पादौ च गन्तव्यं च मनश्च मन्तव्यं च बुद्धिश्च बोद्धव्यं चाहङ्कारश्चाहङ्कर्तव्यं च चित्तं च चेतयितव्यं च तेजश्च विद्योतयितव्यं च प्राणश्च विधारयितव्यं च'। पांचों महाभूत और उनकी तन्मात्राएं, पांचों ज्ञानेंद्रियां और उनके विषय, पांचों कर्मेंद्रियां और उनके कार्य, अंतःकरण चतुष्टय (मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त) और उनके विषय, तथा प्राण और उसके द्वारा धारण किया जाने वाला सब कुछ — यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड उस परम आत्मा में ही प्रतिष्ठित है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
हम अक्सर अपने जीवन को टुकड़ों में देखते हैं — मेरा शरीर अलग है, मेरा काम अलग है, मेरा पर्यावरण अलग है और मेरी आत्मा अलग है। इस विखंडित दृष्टि के कारण हमारे भीतर एक गहरा अलगाव बना रहता है। यह मंत्र हमें संपूर्णता की दृष्टि (Unitive Systems View) प्रदान करता है। आपकी आंखें और जो आप देखते हैं, आपके कान और जो आप सुनते हैं, आपका मन और जो आप सोचते हैं — यह सब एक ही परम चेतना के ताने-बाने से बुना हुआ है। जब आप यह समझ लेते हैं, तो आपका कोई भी कार्य तुच्छ या सांसारिक नहीं रहता; सब कुछ उसी एक विराट सत्ता का पावन नृत्य बन जाता है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **समग्रता का आदर (Revering the Totality of Being)**: अपने शरीर, अपनी इंद्रियों, अपने विचारों और अपने पर्यावरण को एक ही परमात्मा का विस्तार मानकर सभी के प्रति अत्यंत सजग और आदरपूर्ण व्यवहार करें। - **कर्ता और कर्म के द्वंद्व से पार (Transcending Subject-Object Duality)**: जब भी कोई कार्य करें, तो यह अनुभव करें कि देखने वाला, दिखने वाला और देखने की क्रिया — तीनों वस्तुतः एक ही चेतना के रूप हैं। - **परम आधार में समर्पण (Surrendering Everything to the Source)**: अपनी समस्त क्षमताओं — वाणी, बुद्धि, कला, सामर्थ्य — को अपना निजी अहंकार मानने के बजाय उस परम आत्मा की दी हुई भेंट मानकर विनम्र रहें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आप अपने जीवन के विभिन्न अंगों, इंद्रियों और अनुभवों को अलग-अलग खांचों में बांटकर तनाव में जी रहे हैं, या आप यह देख पा रहे हैं कि यह सब कुछ उसी एक अनंत आत्मा रूपी समुद्र की लहरें हैं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

संपूर्ण प्रणाली सूची और क्वांटम अधिष्ठान (Complete Systems Inventory & Ground State of Reality): आधुनिक सैद्धांतिक भौतिकी और सूचना सिद्धांत (Information Theory) में यह माना जाता है कि ब्रह्माण्ड की समस्त भौतिक अवस्थाएं, कण, बल और सूचनाएं अंततः एक ही मूलभूत क्वांटम वैक्यूम या सबस्ट्रेट (Ground State) पर आधारित हैं। उपनिषद् का यह श्लोक चेतना और पदार्थ के प्रत्येक आयाम (20 से अधिक युग्म: क्षमता और उसका संगत विषय) की संपूर्ण मैपिंग करता है और यह स्थापित करता है कि समस्त व्यक्तिपरक (Subjective) और वस्तुपरक (Objective) यथार्थ एक ही परम चेतना का विस्तार है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
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Last updated
2026-10-24
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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 10.12

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

परमं ब्रह्म परमं धाम पवित्रं परमं भवान्

Translation / Meaning (भावार्थ)

You are the Supreme Brahman, the supreme abode, the supreme purifier.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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