प्रश्नोपनिषद्

Praśna 4श्लोक 2/1118%

Prashna Upanishad 4.2

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

तस्मै स होवाच ।यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तेजोमण्डल एकीभवन्ति ।ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत् सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति ।तेन तर्ह्येष पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

उसने कहा — "हे गार्ग्य! जैसे डूबते सूर्य की किरणें उसके तेज-मण्डल में एक हो जाती हैं और उदय होने पर फिर फैल जाती हैं, वैसे ही ये सब इन्द्रियाँ परम देव मन में एकीभूत हो जाती हैं। तब यह पुरुष न सुनता है, न देखता, न सूँघता, न चखता, न छूता, न बोलता, न ग्रहण करता, न आनन्द लेता, न त्यागता, न चलता — 'वह सोता है' कहा जाता है।"

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

He said to him: "O Gārgya, as all the rays of the setting sun gather into the orb of light, and as they spread out again at sunrise, so all this is unified in the supreme deva, the mind. Then this person does not hear, see, smell, taste, touch, speak, take, enjoy, eliminate, or move. He is said to sleep."

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

गार्ग्य के प्रथम प्रश्न का उत्तर — नींद में इंद्रियों का मन में विलीन होना: 'तस्मै स होवाच। यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तेजोमण्डल एकीभवन्ति ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत् सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति'। पिप्पलाद एक अत्यंत मनोहारी उपमा देते हैं: हे गार्ग्य, जिस प्रकार अस्ताचल को जाते हुए सूर्य की समस्त किरणें उस तेजस्वी प्रकाश-मंडल में सिमटकर एक हो जाती हैं, और प्रातःकाल सूर्योदय होने पर वे पुनः दसों दिशाओं में फैल जाती हैं; ठीक उसी प्रकार नींद के समय समस्त इंद्रियां (आंख, कान, नाक, त्वचा, वाणी) अपने से उच्चतर देव — 'मन' — में विलीन होकर एकीकार हो जाती हैं। इसलिए उस समय मनुष्य न देखता है, न सुनता है, न बोलता है — लोग कहते हैं: 'वह सो रहा है'।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
हमारा मन दिनभर अपनी इंद्रियों के माध्यम से बाहर की ओर दौड़ा रहता है — सोशल मीडिया के दृश्य, बाहर का कोलाहल, दूसरों की बातें। इस निरंतर बहिर्मुखता के कारण हमारी चेतना की सारी ऊर्जा बिखर जाती है और हम भीतर से पूरी तरह खाली हो जाते हैं। सूर्य की किरणों का यह दृष्टांत हमें 'प्रत्याहार' (Sensory Withdrawal) की कला सिखाता है। जिस प्रकार सूर्य संध्या समय अपनी किरणों को समेट लेता है, उसी प्रकार दिन में कुछ समय अपनी इंद्रियों को बाहर से खींचकर अपने भीतर समेटना सीखें। यही आंतरिक शांति और मानसिक शक्ति का स्रोत है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **दैनिक प्रत्याहार का अभ्यास (Practicing Sensory Withdrawal)**: दिन में दो बार 5 मिनट के लिए आंखें बंद करें, बाहरी आवाजों से ध्यान हटाएं और अपनी चेतना की सारी किरणों को अपने भीतर मन के केंद्र में समेट लें। - **डिजिटल सूर्यास्त का नियम (Establishing a Digital Sunset)**: सूर्यास्त के बाद अपनी डिजिटल स्क्रीन की चमक और सूचनाओं को सूर्य की किरणों की तरह धीरे-धीरे समेटें ताकि मस्तिष्क स्वाभाविक नींद के लिए तैयार हो सके। - **बिखरी हुई ऊर्जा का संचय (Consolidating Scattered Mental Energy)**: जब भी मन अत्यधिक विचलित या थका हुआ लगे, तो कुछ नया करने के बजाय मौन बैठें और अपनी बिखरी हुई ऊर्जा को एक बिंदु पर केंद्रित करें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आपकी चेतना की किरणें दिन-रात संसार के कचरे और विकर्षणों में बिखरी रहती हैं, या आपके पास सूर्य की तरह अपनी समस्त शक्तियों को अपने भीतर समेटकर शांत होने का विवेक है?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

थैलेमिक गेटिंग, सेंसरी डिएफरेंटेशन और कॉर्टिकल डीएक्टिवेशन (Thalamic Gating & Sensory De-afferentation): न्यूरोसाइंस में जब व्यक्ति नींद में प्रवेश करता है, तो मस्तिष्क का थैलेमस (Thalamus) बाहरी संवेदी सूचनाओं के लिए एक 'गेट' (Thalamic Reticular Nucleus) की तरह बंद हो जाता है। आंखें खुली होने पर भी ऑप्टिक नर्व से आने वाले सिग्नल विजुअल कॉर्टेक्स तक नहीं पहुंचते। समस्त संवेदी डेटा प्रोसेसिंग केंद्रीय मस्तिष्क (Mind/Higher Cortex) में सिमट जाती है। पिप्पलाद की डूबते सूर्य की किरणों की उपमा थैलेमिक गेटिंग और संवेदी विलीनीकरण का 3000 वर्ष प्राचीन सटीक न्यूरो-संज्ञानात्मक विवरण है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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2026-10-24
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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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Prashna Upanishad 4.2Current VerseBhagavadBhagavad Gita Bh…BhagavadBhagavad Gita Bh…
🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 13.2

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत

Translation / Meaning (भावार्थ)

Know Me as the knower of the field (purusha) in all fields (prakriti). Understanding of the field and its knower is true knowledge.

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