Mahanarayana Upanishad
67
अध्याय 67 / 79

Anuvāka 67

3 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय 67

श्लोक 1

अग्नये स्वाहा ।विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा ।ध्रुवाय भूमाय स्वाहा ।ध्रुवक्षितये स्वाहा ।अच्युतक्षितये स्वाहा ।अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा ॥ धर्माय स्वाहा ।अधर्माय स्वाहा ।अद्भ्यः स्वाहा ।ओषधिवनस्पतिभ्यः स्वाहा ।रक्षोदेवजनेभ्यः स्वाहा ।गृह्याभ्यः स्वाहा ।अवसानेभ्यः स्वाहा ।अवसानपतिभ्यः स्वाहा ।सर्वभूतेभ्यः स्वाहा ।कामाय स्वाहा ।अन्तरिक्षाय स्वाहा ।यदेजति जगति यच्च चेष्टति नाम्नो भागोऽयं नाम्ने स्वाहा ।पृथिव्यै स्वाहा ।अन्तरिक्षाय स्वाहा ।दिवे स्वाहा ।सूर्याय स्वाहा ।चन्द्रमसे स्वाहा ।नक्षत्रेभ्यः स्वाहा ।इन्द्राय स्वाहा ।बृहस्पतये स्वाहा ।प्रजापतये स्वाहा ।ब्रह्मणे स्वाहा ।स्वधा पितृभ्यः स्वाहा ।नमो रुद्राय पशुपतये स्वाहा ।देवेभ्यः स्वाहा ।पितृभ्यः स्वधास्तु ।भूतेभ्यो नमः ।मनुष्येभ्यो हन्ता ।प्रजापतये स्वाहा ।परमेष्ठिने स्वाहा

agnaye svāhā | viśvebhyo devebhyaḥ svāhā | dhruvāya bhūmāya svāhā | dhruvakṣitaye svāhā | acyutakṣitaye svāhā | agnaye sviṣṭakṛte svāhā || dharmāya svāhā | adharmāya svāhā | adbhyaḥ svāhā | oṣadhivanaspatibhyaḥ svāhā | rakṣodevajanebhyaḥ svāhā | gṛhyābhyaḥ svāhā | avasānebhyaḥ svāhā | avasānapatibhyaḥ svāhā | sarvabhūtebhyaḥ svāhā | kāmāya svāhā | antarikṣāya svāhā | yadejati jagati yacca ceṣṭati nāmno bhāgo'yaṃ nāmne svāhā | pṛthivyai svāhā | antarikṣāya svāhā | dive svāhā | sūryāya svāhā | candramase svāhā | nakṣatrebhyaḥ svāhā | indrāya svāhā | bṛhaspataye svāhā | prajāpataye svāhā | brahmaṇe svāhā | svadhā pitṛbhyaḥ svāhā | namo rudrāya paśupataye svāhā | devebhyaḥ svāhā | pitṛbhyaḥ svadhāstu | bhūtebhyo namaḥ | manuṣyebhyo hantā | prajāpataye svāhā | parameṣṭhine svāhā

हिन्दी अर्थ

अग्नि के लिए स्वाहा। सब देवताओं के लिए स्वाहा। ध्रुव भूमि के लिए स्वाहा। ध्रुव-निवासी के लिए स्वाहा। अच्युत-निवासी के लिए स्वाहा। स्विष्टकृत् अग्नि के लिए स्वाहा। धर्म के लिए स्वाहा। अधर्म के लिए स्वाहा। जलों के लिए स्वाहा। ओषधि-वनस्पतियों के लिए स्वाहा। राक्षस, देव और जनों के लिए स्वाहा। गृह्य (गृह-देवताओं) के लिए स्वाहा। सीमाओं के लिए स्वाहा। सीमाओं के स्वामियों के लिए स्वाहा। सब प्राणियों के लिए स्वाहा। काम के लिए स्वाहा। अन्तरिक्ष के लिए स्वाहा। जो जगत में हिलता है और जो चेष्टा करता है — नाम का यह भाग नाम के लिए, स्वाहा। पृथ्वी के लिए स्वाहा। अन्तरिक्ष के लिए स्वाहा। द्युलोक के लिए स्वाहा। सूर्य के लिए स्वाहा। चन्द्रमा के लिए स्वाहा। नक्षत्रों के लिए स्वाहा। इन्द्र के लिए स्वाहा। बृहस्पति के लिए स्वाहा। प्रजापति के लिए स्वाहा। ब्रह्मा के लिए स्वाहा। पितरों के लिए स्वधा, स्वाहा। पशुपति रुद्र को नमस्कार, स्वाहा। देवताओं के लिए स्वाहा। पितरों के लिए स्वधा हो। प्राणियों को नमस्कार। मनुष्यों के लिए ‘हन्त’। प्रजापति के लिए स्वाहा। परमेष्ठी के लिए स्वाहा।

English

To Agni, svaha. To all the gods, svaha. To the firm earth, svaha. To the firm dweller, svaha. To the undying dweller, svaha. To Agni Svishtakrit, svaha. To dharma, svaha. To adharma, svaha. To the waters, svaha. To plants and trees, svaha. To the demons, gods and people, svaha. To the household ones, svaha. To the boundaries, svaha. To the lords of the boundaries, svaha. To all beings, svaha. To desire, svaha. To the air, svaha. Whatever moves in the world and whatever stirs — this is the share of the name, to the name, svaha. To earth, svaha. To air, svaha. To heaven, svaha. To the Sun, svaha. To the Moon, svaha. To the stars, svaha. To Indra, svaha. To Brihaspati, svaha. To Prajapati, svaha. To Brahma, svaha. Svadha to the fathers, svaha. Homage to Rudra, lord of beasts, svaha. To the gods, svaha. To the fathers, svadha. Homage to beings. To men, hanta. To Prajapati, svaha. To Parameshthi, svaha.

अध्याय 67

श्लोक 2

यथा कूपः शतधारः सहस्रधारो अक्षितः ।एवा मे अस्तु धान्यँ सहस्रधारमक्षितम् ॥ धनधान्यै स्वाहा

yathā kūpaḥ śatadhāraḥ sahasradhāro akṣitaḥ | evā me astu dhānya~ sahasradhāramakṣitam || dhanadhānyai svāhā

हिन्दी अर्थ

जैसे सौ धाराओं और हज़ार धाराओं वाला कुआँ कभी क्षीण नहीं होता, वैसे ही मेरा अन्न हज़ार धाराओं वाला और अक्षय हो। धन-धान्य के लिए स्वाहा।

English

As a well of a hundred streams, of a thousand streams, is unfailing, so may my grain be of a thousand streams, unfailing. To wealth and grain, svaha.

अध्याय 67

श्लोक 3

ये भूताः प्रचरन्ति दिवानक्तं बलिमिच्छन्तो वितुदस्य प्रेष्याः ।तेभ्यो बलिं पुष्टिकामो हरामि मयि पुष्टिं पुष्टिपतिर्दधातु स्वाहा

ye bhūtāḥ pracaranti divānaktaṃ balimicchanto vitudasya preṣyāḥ | tebhyo baliṃ puṣṭikāmo harāmi mayi puṣṭiṃ puṣṭipatirdadhātu svāhā

हिन्दी अर्थ

जो प्राणी दिन-रात विचरते हैं, बलि की इच्छा से, वितुद के दूत हैं — पुष्टि की कामना से मैं उन्हें बलि देता हूँ; पुष्टि के स्वामी मुझमें पुष्टि स्थापित करें, स्वाहा।

English

The beings who roam day and night desiring an offering, servants of Vitudu — to them I bring the offering, desiring nourishment; may the lord of nourishment place nourishment in me, svaha.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/mahanarayana.itx · प्राप्त 30/9/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with Andhra recension (64 anuvākas) and standard 80-anuvāka recension.